Wednesday, 19 February 2014

मोक्ष और ‘रामाधार, Osho

दूसरा प्रश्न : भगवान! मैं मोक्ष नहीं चाहता हूं। मैं तो चाहता हूं कि बार- बार जीवन मिले। आप क्या कहते हैं?



‘रामाधार,

मोक्ष तो भी, तो भी मिलना आसान कहां? नहीं चाहते हो, नहीं मिलेगा, घबड़ाओ मत। नाहक की चिंताएं न लो। कोई मोक्ष ऐसे तुम्हारे पीछे नहीं पड़ा है! मोक्ष के पीछे भी तुम पड़ो तो भी मिलेगा कि नहीं, आसान नहीं।
तुम व्यर्थ की दुश्चिन्ताओं से घिर रहे हो। कोई मोक्ष तुम्हें दे रहा है? कहीं मोक्ष मिल रहा है, जो तुम कहते हो मैं मोक्ष नहीं चाहता हूं? तुम तो ऐसे डरे मालूम पड़ते हो कि जैसे मैं तुम्हारे ऊपर मोक्ष डालने को ही तैयार हूं!

मोक्ष कोई वस्त्र तो नहीं कि मैं बदल दूंगा। और मोक्ष कोई रंग तो नहीं कि मैं तुम्हें रंग दूंगा। मोक्ष कोई वस्तु तो नहीं कि तुम न भी चाहो तो तुम्हें दे दूंगा। मोक्ष कोई जबर्दस्ती तो नहीं। मोक्ष का अर्थ समझते हो? परम स्वातंड़य तुम नहीं चाहते हो, तो नहीं घटेगा। निश्चित रहो, जन्मों -जन्मों तक निश्चित रहो। अनंत काल तक निश्चित रहो। तुम नहीं चाहते तो नहीं घटेगा। मोक्ष तुम्हारी परम स्वतंत्रता में घटेगा। तुम जब परिपूर्णता से चाहोगे तो घटेगा। और तब भी आसान नहीं कि तुमने चाहा और घट गया। बड़ी परीक्षाएं और बड़ी अग्नियों से गुजरना है। बड़ी मुश्किल से घटता है। यह कोई उतार नहीं है, चढ़ाव है। यह पर्वत -शिखरों की ऊंचाइयों पर चढ़ना है; सांस घुटने लगती है, पैर टूटने लगते हैं, हिम्मत छूटने लगती है। यह कोई छोटी-मोटी नदी की जलधार नहीं है कि छलांग लगा गये। यह अपार सागर है, जिसमें दूसरा किनारा तो दिखाई ही नहीं पड़ता। और नावें हमारी छोटी हैं
और हा
थ हमारे छोटे हैं, पतवार हमारी छोटी है। इनमें तो सिर्फ दुस्साहसी उतर पाते हैं।

तुम
चिंतित न होओ रामाधार, तुम मोक्ष नहीं चाहते, तथास्तु! मोक्ष नहीं होगा! तुम कहते हो : ‘मैं तो चाहता हूं कि बार-बार जीवन मिले। ‘ जरूर मिलेगा। अब तक मिलता रहा, आगे भी मिलता रहा, आगे भी मिलता रहेगा। अब तक अनंत – अनंत जीवन मिले हैं। चौरासी कोटि योनियों में भटके हो, तब मनुष्य हुए हो। कीड़े -मकोड़ों से लेकर अब तक की लंबी यात्रा है। जैसी तुम्हारी मर्जी। फिर चौरासी कोटि योनियों में जाना हो तो जा सकते हो। तुम जो कामना करोगे, परमात्मा उसी को आशीष दे देता है। तुम्हारी ही मौज है। अगर तुम्हें नालियों में ही सरकना है, आकाश में उड़ना नहीं, तो नालियों में सरको। गुबरीले को तो गोबर ही स्वर्ग मालूम होता है। गुबरीले को गोबर से अलग करो तो गोबर ही स्वर्ग मालूम होता है। गुबरीले को गोबर से अलग करो तो कहेगा : यह क्या करते हो? मुझे तो बार -बार गुबरीला ही होना है। तुम जानते हो कि बेचारा गोबर में सड़ रहा है, मगर गुबरीले की तो समझ ही उतनी है। गोबर ही उसकी दुनिया है। उस दुनिया के पार तुम उसे गुलाब के फूलों के पास बिठाओ, वह कहेगा : यहां कहां ले आए? तुम उसे कमल के फूलों पह बिठा दो, भाई, क्यों मुझे मार रहे हो? क्यों मेरा जीवन लेने को तैयार हो? मुझे तो गऊ माता का गोबर चाहिए।

तुम्हें अगर बार -बार जन्म लेना है तो बार -बार जन्म मिलेगा। परमात्मा तुम्हारे विपरीत कभी कुछ न करेगा। परमात्मा ने तुम्हें परम स्वतंत्रता दी है। यही मनुष्य का गौरव है और यही मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना भी है। गौरव है कि तुम जो चुनो वही हो जाओ और दुर्घटना, कि तुम भूल-चुक से ही कभी ठीक चुन पाते हो। तुम्हारे सब गणित गलत हैं। तुम्हारे हिसाब-किताब गलत हैं।

क्यों बार -बार जन्म लेना चाहते हो? इस जन्म में क्या पाया है? जरा पूछो, इस जन्म में क्या पाया है? दौड़े – धापे, मिला क्या? और अगर कुछ मिला भी गया, थोड़ा धन भी मिल गया, थोड़ा पद भी मिल गया-कि हो गये देश के प्रधानमंत्री कि राष्ट्रपति-तों भी
क्या मिला?

थोड़ा सोचो, जीवन तो तुम्हारे पास है, इस जीवन में तुमने क्या पा लिया है, जो तुम फिर -फिर जीवन पाना चाहते हो? मेरा अनुभव कुछ और। मेरा अवलोकन कुछ और। मेरा अवलोकन यह है कि जीवन में कुछ नहीं मिला वह ही बार-बार जीवन पाना चाहते हैं। जिनको कुछ मिला है वे तो कहेंगे : अब बहुत हुआ।

क्यों? तुम्हें बात उल्टी लगेगी, पर समझने चलोगे तो साफ है, साफ -सुथरी है-दों और दो चार जैसी साफ-सुथरी है। जिन्हें कुछ नहीं मिला, वे ही बार -बार जीवन पाना चाहते हैं। क्योंकि कुछ मिला नहीं, इस जीवन में भी नहीं मिला, शायद अगले में मिल जाये; अब तक नहीं मिला, शायद कल मिल जाये।

कल की आशा उन्हीं को होती है जिनका आज खाली है। और मजा यह है कि जिनका आज खाली है उनका कल और भी खाली होगा, क्योंकि कल आयेगा कहां से? आज से ही तो निकलेगा! कल आज का ही तो विस्मित रूप होगा! कल कहीं आसमान से नहीं आता; तुम्हारे आज मैं से ही निकला हुआ अंकुर होता है। जब आप खाली है, कल और भी खाली होगा। खालीपन का और चौबीस घंटे का अभ्यास बढ़ जायेगा। जब आप तुम रिक्त हो तो कल तुम और भी दरिद्र हो जाओगे।


बच्चे समृद्ध होते हैं, बूढ़े दरिद्र हो जाते हैं। बच्चे भरे -पूरे होते हैं, बूढ़े बिलकुल चूक जाते हैं। रस उनका वह जाता है छिद्रों से। बच्चों में तो थोड़ा उल्लास दिखाई पड़ता है; बूढ़ों में न कोई उमंग न कोई उल्लास, सब सूख गया होता है। क्या हुआ? जीवन अगर महत्वपूर्ण था तो बूढ़े तो शिखर हो जाते स्वर्ण के; मंदिर की गरिमा हो जाते, कलश हो जाते। नहीं; चूंकि जीवन में कुछ नहीं मिला है, इसलिए तुम डरते हो कि कहीं जीवन छिन न जाये; अभी कुछ मिला ही नहीं, और कहीं जीवन छिन न जाये! इसलिए कहते हो, और- और जीवन मिले। मगर जिस ढंग से तुम जी रहे हो इसी ढंग से फिर भी जीओगे। इस ढंग से जीने से तुम्हें कुछ नहीं मिला; तुम कितनी बार इसी ढंग से जीओ, कुछ भी न मिलेगा।

एक व्यक्ति ने जीवन में आठ बार विवाह किया। अमरीका में तो आसान है। आठवीं बार विवाह करने के बाद उसे यह बोध आया, यह खयाल आया-बड़ी हैरानी का खयाल कि मैंने हर बार स्त्रिया बदलीं लेकिन हर बार मैंने फिर उसी तरह की खोज ली। आठों बार बार -बार उसने उसी तरह की स्त्री खोजी। आखिर खोजने वाला तो वही है।

तुम थोड़ा सोचो, एक स्त्री के प्रेम में तूम पड़े या एक पुरुष के प्रेम में पड़े, किसने खोजा? तुमने खोजा। तुम्हारी खोजने की एक दृष्टि है। तुम्हें कौन-सी चीजें जंची, तुम्हें कौन -सी चीजें मन भायी, कौन-सी बात तुम्हें मनचीती लगी? तुम्हारे पास एक मन है, उस मन से तुमने एक स्त्री को प्रेम किया। फिर ऊब गये क्योंकि आशायें पूरी नहीं हुइ। आशायें कभी पूरी होती ही नहीं। आ
शायें हैं, सपने सिर्फ सपने हैं। सपनों में ही अच्छे लगते हैं; जब यथार्थ में उतारने चलोगे, सब व्यर्थ
हो जाते हैं, सब टूट-फूट जाते हैं। पानी के बबूले हैं। ओस की बूंदें हैं; दूर से लगती है कि मोती चमक रहे हैं, हाथ से पकड़ने जाते हो पानी रह जाता है, हाथ में कुछ और लगता नहीं।

एक स्त्री से ऊब गये, एक पुरुष से ऊब गये; तुमने सोचा कि यह स्त्री काम न आई, गलत स्त्री चुन ली। तुम सोचते हो कि गलत स्त्री चुन ली; तुम यह नहीं सोचते कि मेरा चुनना ही गलत है, चुनने वाला ली गलत है। तुम यह नहीं सोचते
। कोई अपने पर जुम्मेवारी थोड़े ही लेता है। यही तो अहंकार के अपने को बचाए रखने गहरे से गहरे उपाय हैं। कोई यह नहीं कहता कि मेरी भूल है। यह गलत स्त्री चुन ली-चूक हो गई। समझा था कुछ और, निकली कुछ और। धोखा दे गई, बेईमान थी। ऊपर -ऊपर रंग बना रखा था, भीतर – भीतर कुछ और थी। मुझ भोले- भोले आदमी को ठग गई। अब फिर चुनूगा, दूसरी स्त्री चुनूगा।

मगर चुनेगा कौन? तुम फिर चुनोगे। तुम ही तो चुनोगे! फिर तुम्हें वे ही बातें जंचेगी। वही चाल फिर तुम्हें पसंद आयेगी। वही नाक, वही बालों का रंग, वही शरीर की आकृति – अनुपात फिर तुम्हें जयेग।। तुम्हें फिर वैसी ही स्त्री पसंद पड़ेगी। थोड़े – बहुत हेर -फेर होंगे, मगर उन हेर -फेरो से कुछ फर्क नहीं पड़ता। बुनियादी रूप से तुम्हें फिर वैसी स्त्री पसंद पड़ेगी जैसी पहली स्त्री थी और फिर चार-छ: महीने में वही उपद्रव। फिर भ्राति का टूटना।

उस आदमी ने आठ बार विवाह किया और फिर अपने संस्मरणों में लिखा कि आज मैं यह कह सकता हूं कि हर बार मैंने जैसे फिर -फिर उसी स्त्री से विवाह किया और ही बार वही हुआ। हर बार वही दुख, दुखांत, नाटक एक ही जगह आकर समाप्त हुआ। तुम पूछो उसने नौवीं बार विवाह किया या नहीं? नहीं किया, क्योंकि एक बात उसे समझ में आ गई कि मैं जो भी चुनूंगा वह गलत होगा। मैं गलत हूं; जब तक मैं नहीं बदल जाता तब तक मेरा सारा चुनाव गलत ही रहेगा।

मोक्ष का अर्थ क्या है? आत्म- रूपांतरण। जीवन को चुनने का अर्थ है : तुम वही-कें -वही, फिर जीवन चुनोगे, करोगे क्या? समझो कि मैं तुमसे कह दूं कि सौ वर्ष तुम्हें और दिये, तुम करोगे क्या? तुमने जो कल किया था, परसों किया था, उससे कुछ अन्यथा करोगे? क्या करोगे भिन्न तुम? तुम वही मूढ़ता फिर -फिर दोहराओगे। तुम पुनरुक्ति करोगे। सौ वर्ष भी तुम गंवा दोगे -ऐसे ही जैसे तुमने इतने वर्ष अभी गंवा दिये।


और जन्मों के साथ तो एक अड़चन और भी है कि हर मृत्यु के बाद ही तुम पुराने जन्म के संबंध में सब भूल जाते हो। इसलिए उनको पुनरुक्त करना भूलों को और आसान हो जाता है। याद ही नहीं रहती कि पहले कभी भूलें की हैं। हर नये जन्म में ऐसा लगता है कि नया-नया कुछ कर रहे हो। हर बार जब प्रेम होता है तो ऐसा लगता है नया-नया कुछ… हर बार पद की आकांक्षा, नया- नया कुछ…। कितनी बार तुम यह कर चुके हो, कितनी बार!

महावीर के पास एक युवक दीक्षित हुआ, राजकुमार था। महावीर की बातें सुनीं, समझ पड़ी, दीक्षित हो गया। बात समझ पड़ना और दीक्षित हो जाना एक बात है; फिर दिखा की अपनी कठिनाइयां हैं, अपनी अड़चनें हैं। महावीर के संघ का नियम था कि जो पहले दीक्षित हुए हैं, उनको आदर दिया जाये; जो बाद में दीक्षित हुए हैं, चाहे उनकी उस ज्यादा हो, ज्यादा धनी हों, शिक्षा ज्यादा हो, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता जो पीछे दीक्षित हुए हैं, वे अपने से बड़ों को आदर दें।

पहली रात एक गांव में विश्राम हुआ। धर्मशाला छोटी थी तो उसके कमरों में तो उनको जगह मिली जो वृद्ध थे, जो पहले… वृद्ध से मेरा मतलब उस में वृद्ध नहीं, दीक्षा में जो वृद्ध थे। उन मैं कई उस में छोटे भी होंगे। उन में कई भिखमंगे भी होंगे, दीन-दरिद्र भी होंगे अपनी जिंदगी में। लेकिन राजकुमार तो अभी- अभी दीक्षित हुआ था। उसको किसी कमरे में जगह न मिल सकी। उसकी गलियारें में सोना पड़ा। रात भर लोग आते -जोते रहे और गलियारे में उसे नींद न आये। मच्छर काटें। कभी सोया नहीं था गलियारे में। राजमहलों में रहा था। रातभर नींद न आई लगा यह तो एक झंझट मोल ले ली। सुबह होते ही माफी मांग लूंगा कि क्षमा करो, जो गलती हो गई माफ करो, मैं घर चला। लेकिन इसके पहले कि वह महावीर से जाकर कुछ कहता, सुबह होते ही महावीर उसके पास आये और कहा : तो चले घर? वह तो बहुत चौंका। उसने कहा : आपसे किसने कह दिया? महावीर ने कहा : जो तुमसे कह गया वही मुझसे भी कह गया।… तो चले घर? मगर एक बात जतला दूं र यह पहला मौका नहीं है जब तुम घर जा रहे हो। और यह पहली दीक्षा नहीं है, ऐसी दीक्षायें तुम पहले जन्मों में भी कई बार ले चुके हो। और ऐसी ही छोटी-छोटी बातों में उलझ कर वापिस लौट गये हो। अस बार जरा हिम्मत कर लो। आया अवसर हाथ से फिर न चूक जाये।

महावीर का यह कहना कि पहले भी तू ऐसी ही दीक्षा ले चूका है और बार -बार छोटी -छोटी अड़चनों से लौट गया है, लौट गया है, कभी टिक नहीं पाया- किसी अचेतन गर्भ से स्मृति उठी, आंख के सामने दृश्य पर दृश्य खुलने लगे। उसे दिखाई पड़ा कि है।, पहले भी ऐसा हुआ है। वह महावीर के चरणों में झुक गया और उसने कहा : अब ऐसा न होने दूंगा। महावीर और बुद्ध दोनों ने एक बहुत अदभुत विज्ञान का प्रयोग किया था-जाति -स्मरण। वह प्रत्येक अपने संन्यासी को पिछले जन्मों की याद दिलाते थे। उसके ध्यान के प्रयोग हैं, जिनसे पिछले जन्मों की याद आनी शुरू हो जाती है। क्योंकि याद तो तुम्हारे अचेतन में पड़ी है, सिर्फ उठाने की बात है। और पिछले जन्मों की याद आने लगे तो बड़े हैरान होओगे तुम। रामाधार, फिर ऐसा प्रश्न न पूछ सकोगे। क्योंकि जन्म तो कई बार हुए, जीवन तो कई बार लिए, हाथ तो कभी कुछ न लगा। हाथ तो सदा राख से ही भरे रहे! आगे भी बहुत बार लेकर क्या करोगे? मन को लोग समझा लेते हैं, अच्छी- अच्छी बातें समझा लेते हैं।

कल मैं एक कविता पढ़ रहा था.....


मुक्ति मरण, बंधन है जीवन!

श्रमिक विहग देखे हैं प्रतिदिन

भू से नभ तक दौड़ लगाते!

बंध ओ तिनकों के बंधन में,

वे पुनरपि नीड़ों में आते!

बार -बार कह उठता है मन,

मुक्ति मरण, बंधन है जीवन!

सरिता तब तक ही सरिता है,

जब तक तट का मिले सहारा!

बंधन टूटे कौन कहे फिर- सरिता,

कहते जल की धारा,

बंधन सौम्य रूप आकर्षण!

मुक्ति मरण, बंधन है जीवन!

बंधन सरल स्नेह -बंधन पर,

अगणित बार मुक्ति म वारूं।

हार अगर यह है जीवन की,

जन्म- जन्म यों ही मैं हारू!

बंधन जीवन का अवलंबन,

मुक्ति मरण, बंधन है जीवन!

तुम चाहो तो अच्छी- अच्छी कविताएं गढ़ सकते हो। अच्छे – अच्छे विचार के पीछे इस भ्रांतधारणा को छिपा ले सकते हो। तुम कह सकते हो कि सरिता सागर में उतर कर खो जायेगी, फायदा क्या उतरने से?

सरिता तब तक ही सरिता है,

जब तक तट का मिले सहारा!

बंधन टूटे कौन कहे फिर सरिता,

कहते जल की धारा

बंधन सौम्य रूप आकर्षण!

मुक्ति मरण, बंधन है जीवन!

तुम कह सकते हो : मुक्ति तो मृत्यु मालूम होती है, बंधन में ही जीवन है! सरिता देखो किनारों से बंधी जीवित है और किनारों से छूटी कि मरी! बात सच है। किनारों से छूटी कि मरी, यह आधी बात है लेकिन। और आधे सत्य पूरे झूठों से भी बदतर होते हैं। सरिता किनारों से छूट कर मरती नहीं, मुक्त होती है, सागर होती है। सरिता को अब सरिता तो कोई न कहेगा, लेकिन अब सागर हो गई, सरिता कोई कहेगा कैसे? छोटा विराट हो गया, सीमित असीम हो गया। परिभाषा में बंधा अपरिभाष्य हो गया।

अहंकार तो चाहता है बंधनों में बंधा रहे, क्योंकि अहंकार जी ही सकता है सीमित में। जितनी सीमित स्थिति हो उतना ही अहंकार मजबूत रहता है और जितना ही बड़े होने लगो उतना ही अहंकार क्षीण होने लगता है। जितने फैलोगे, जितने विस्तीर्ण होओगे, जितने ब्रह्म के करीब आओगे-उतना ही अहंकार विदा होने लगेगा। और अहंकार समझाको।, अपने को बचाने की सब तरह से चेष्टा करेगा।

बंधन सरल स्नेह -बंधन पर,

अगणित बार मुक्ति मैं वारूं!

अहंकार कहेगा, हजार मोक्ष निछा्ंवर कर दूंगा में बंधन पर!

बंधन सरल स्नेह -बंधन पर,

अगणित बार मुक्ति मैं वारूं।

हार अगर है यह जीवन की,

जन्म- जन्म यूं ही मैं हारू!

बंधन जीवन का अवलंबन

मुक्ति मरण, बंधन है जीवन!

लेकिन जरा सावधान। मीठी-मीठी बातों से कुछ भी न होगा। सुंदर-सुंदर तर्को से कुछ भी न होगा। सत्य छिपाए जा सकते हैं, झुठलाए नहीं जा सकते। जहर कितना ही मीठा क्यों न हों-जहर है। और अमृत कितना ही कडुवा क्यों न हो- अमृत है। और अमृत कडुवा होता है और जहर अक्सर मीठा होता है। जहर को मीठा होना ही पड़ता है, नहीं तो पीयेगा कौन? अमृत को क्या पड़ी कि मीठा हो। पीने वाले, पहचानने वाले पी ही लेंगे। और अमृत उन्हीं के लिए है-जों पीने वाले हैं, जो पहचानने वाले हैं। जहर तो अपना विज्ञापन करता है, अपनी मिठास का विज्ञापन करता है। अमृत तो विज्ञापन करता ही नहीं। आ जायेंगे खोजी।

तो रामाधर, तुम्हारा मन तुम्हें समझा दे सकता है कि जीवन बड़ा सुंदर है। और मैं नहीं कहता कि जीवन सुंदर नहीं है, मगर मैं किसी और जीवन की बात कर रहा हूं! मैं उस जीवन की बात कर रहा हूं जब तुम्हारे भीतर मोक्ष का आकाश खुल गया। और तुम उस जीवन की बात कर रहे हो, जब तुम्हारे भीतर न कोई प्रकाश है, न कोई आत्मा है, न कोई बोध है। तुम्हारे भीतर छोटी-सी किरण भी नहीं है जागरण की। मूर्च्छित, तद्रित, सोये हुए-तुम्हारा यह जीवन कोई जीवन है? यह केवल एक लंबी राम है, अंधेरी रात, जिसमें तुम बड़बड़ा रहे हो, सपने देख रहे हो और सपनों को ही सत्य समझ रहे हो।

मगर जैसी तुम्हारी मर्जी। जबर्दस्ती तुम्हारे ऊपर कोई मोक्ष थोपा नहीं जा सकता। कम-से – कम मैं तो ऐसा न करूंगा। अगर तुम्हारी यही इच्छा है कि बार-बार जीवन मिले, तथास्तु!

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