Thursday, 6 February 2014

शारीरिक और आत्मिक अधिकार क्षेत्र और आपके वास्तविक प्रभावित स्थान - Hindi Note


आज इसी को समझते है। दोनों अर्थो में , शारीरिक और आत्मिक। शारीरिक रूप से यदि जाने तो आपका सूचनातंत्र का मुखिया यानि कि आपकी सरकार आपको निर्देश देती है. कि आपका क्षेत्र आपके द्वारा मूल्य चुकाए गए निर्धारित वर्गमीटर तक सीमित है। घर के अंदर आपको कमरे भी बने बनाये मिले , फिर इन कमरो का विभाजन हुआ। कमरो में भी आपकी बैठक का स्थान निश्चित हुआ जाने अनजाने में , (आप स्वयं निश्चित करें एक कोई स्थान है जहाँ बैठ कर आपको अच्छा लगता हो ) , ये तो घर के अंदर के वर्गीकरण या विभाजन है , चलिए अब इसी रस्ते से वापिस चलते है। घर से शहर , प्रांत देश और फिर संसार सब आपको पूर्वनिश्चित सीमाओं के आधार पे मिलते है ( जन्म से इस स्थिति में रहते हुए हम इसको सामान्य सी प्रक्रिया मान के स्वीकार करते है ) . तरंगो की कोई सीमा नहीं होती ..... तरंगित जगत एक अणु से लेकर ब्रमांड की यात्रा करता है। इसको कल्पना भी कहते है क्यूंकि तरंगे या कल्पनाये वहीँ तक जाती है जहॉ तक मस्तिष्क को सूचना होती है। उसके बाद तरंगे भी नहीं जा सकती उनकी भी सीमा है (ऐसा मनुष्य को लगता है) जबकि वास्तव में तरंगो की कोई सीमा नहीं। बस मस्तिष्क अज्ञानता का शिकार हो जाता है।

इसी लिए तरंगे वास्तव में देश प्रान्त की मन और मस्तिष्क की सीमा से परे है।

ध्यान में साधक को तरंगित यात्रा में जाने के लिए , कल्पनाओ का सहारा लेने को कहा जाता है , साँसों को पे ध्यान ठहराते हुए .......धीरे धीरे साँसे गहरी और गम्भीर होने लग
ती है , और अभ्यासी कल्पनाओ में विचरण करने लगता है। यहाँ पे ही विचरण करते करते , कुछ ऐसी तरंगो से साक्षात्कार होता है ,  जो उसको उसकी वास्तविकता से परिचय करवाती है ; या के कहे आभास करवाती है ये ज्यादा उचित है। क्यूंकि शाब्दिक परिचय तो एक बालक का भी होता है पर आभास नहीं। ये आभास ही उसको नयी तरंगो में प्रवेश की अनुमति देता है। 

इसके लिए आपको ऐसा स्थान चुनना होता है , जहाँ आपको आराम मिले मानसिक रूप से आप उस स्थान से अपने को संयोजित कर सके। फिर आपकी सीमा रहित यात्रा शुरू होती है , और कुछ देर इसी स्थिति में विचरण करते करते …… आत्मा / मन / मस्तिष्क को निर्देश आप दे या फिर आपके गुरु दे वापिस लाने का , उसी प्रकार जैसे आप गए थे , उसी रास्ते वापिस आना होता है। …औरआस पास के वातावरण से पुनः समायोजित करना होता है , मस्तिष्क को तरंगित आभास दिलाना होता है , कि आप अब इस वास्तविक से दिखते काल्पनिक जगत में अपनी शारीरिक उपस्थिति को माने और सांसारिक जिम्मेदारयिों को प्रेम पूर्वक पूरा करे। तरंगे आपको उस जगत की वास्तविकता बताती है और आँखे खोलते ही आपका इस जगत कि वास्तविकताओं से सामना होता है। ऐसा आपको हर ध्यान में बैठने के बाद आभास होता है। 




निश्चित रूप से , ध्यान के फलस्वरूप आपको ये ख़याल आने लग जाता है। कि उस जगत में तरंगित विचरण अगर वैज्ञानिको को काल्पनिक आधार का लगता है , तो ये जगत आपको काल्पनिक लगने लगता है।
अपनी अनिश्चितता से जुड़ते ही आपके अंदर के दानव (लोभ मोह क्रोध द्वेष) सामहिक रूप से कमजोर पड़ने लगते है। और स्वतः समझ आने लगता है कि ये सब कितना क्षणिक और निरर्थक मस्तिष्क का सारा आयोजन है। स्वतः ही माया जनित खेल सपष्ट होने लगते है।

परन्तु ध्य़ान रहे , किसी भी जगत में रहे संतुलन करना कभी न भूले , आध्यात्मिकता ने अपना कराया किया जो आपको आपके वास्विक रूप से मिलवाया , और सामाजिकता जिसका आपके ऊपर जन्म से ऋण है जो इसी जीवन में पूरा करना है। कोई भी उचित ध्यान आपको आपके कर्तव्यों से दूर नहीं ले जा सकता बल्कि वो संतुलन में जीना सिखाता है।

करुणा और प्रेम जैसे गुण उपजने के बाद आप कर्त्तव्य विमुख हो ही नहीं सकते अपितु आप प्रेम अनुग्रह से भर के स्व की वास्तविकता के ज्ञान के साथ अपने कर्तव्यों को जब पूरा करते है तो एक अलग ही प्रकाश आपके समूचे व्यक्तिव को घेरता है।

निश्चित रूप से ध्यान करते करते आप अपने अस्तित्व से जुड़ जाते है। यानि कि प्रकृति से एकाकार होने लगते। प्रकृति का कण कण आपसे बात करता है। । तब आपमें एक अलग ही भाव जागता है समस्त जड़ चेतन के लिए ----- करुणा का , आभार का।

एक एक कण और उसकी उत्पत्ति के रहस्य से आप स्वयं को जोड़ पाते है , यहाँ तक कि उन कनो में स्वयं के होने का आभास होता है। और तब आपको शारीरक और आत्मिक स्तर पे अपने वास्तविक प्रभावित अधिकार क्षेत्र का ज्ञान भी होता है। (ये ज्ञान लौकिक वैषयिक ज्ञान से सर्वथा अलग है )

ॐ प्रणाम

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