Sunday, 9 February 2014

सुबह सुबह का सपना

ॐ 

आज सुबह सुबह , एक विचित्र सपना देखा , मुझे तो वो सब कह गया , शायद आपको भी वैसे ही कह सके , एक रेलवे स्टेशन पे बहुत यात्री खड़े है , अपना अपना बोझ लिए हुए , सब छोटी बड़ी गठरी अपने अपने सर पे रखे है। ये स्टेशन भी सन्नाटे में है जिसके बाहर चारों तरफ जंगल है , ये स्पष्ट नहीं कि सब इकठा कैसे हुए , पर है खड़े है साथसाथ। वो हरे रंग की एक स्वचालित गाडी (ट्रैन ) खड़ी है कुछ डब्बो के साथ , चलने वाली है , टाइम हो गया है । पर सब ले चेहरे पे घबराहट है , कोई उसमे प्रवेश की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। जबकि सभी को मालूम है कि इस ट्रैन में ऑटोमेटिक व्यवस्था है , जो कि वहा खड़े हर राहगीर को पता है । फिर भी घबराहट है कि टाइम तो हो गया और ट्रैन में अँधेरा , दरवाजे भी बंद है अधीरता बढ़ती जा रही है .... अब क्या करें , कहीं ट्रैन छूट गयी ! अगली का पता नही। क्या करे ! । एक इंसान गेरुए वस्त्र में जिसके शरीर से श्वेत प्रकाश निकल रहा था , उसने कहा अपनी एक उंगली ऊपर उठा के ,' विश्वास रखो ' उचित समय पे दरवाजे खुलेंगे , प्रकाश दिखेगा , और तुम सब यात्रा पे जा सकोगे। कोई नहीं छूटेगा , सब जायेंगे। "





और उस दिव्य के ये कहते ही , उस गाडी के दरवाजे खुल गए और वो गाडी पूरे प्रकाश से भरी थी।

बस आँख खुल गयी , घडी में समय देखा तो सुबह के पांच बजे थे। 


प्रभु आभार !!

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