Saturday, 15 February 2014

दैवीय संकेत और आप -Note

कुछ ऐसी बातें मूल में है , जो धार्मिक और अध्यात्मिक ज्ञान की परत में समयांतराल में छिप जाती है , परम्पराओं का निर्वहन करते करते धूल में लिपट जाती है , जिनको समय समय पे खगालना आवश्यक है ,

मूल बहुत सह है , साधारण है , स्वयं को जमीं पे जमा के असमान की छलांग लगाने जैसा है , ताकि फिर वापिस का रास्ता मिल सके , और छलांग इसलिए कि अस्तित्व का पता चल सके।


यही धर्म का प्रयास , यही अध्यात्म का प्रयास , विवेचनाएं और विश्लेषण भी जरुरी है , परन्तु सच की ज़मीं और आकाश की छलाँग आपकी ही है , बहुत निजी है। आपकी अपनी यात्रा है। इसलिए संवेदनशील भी है।

कुछ ऐसी ही बांते है जिनको व्याख्या में न जा के सांकेतिक रूप से समझते है

१- सजह होना २- सरल होना ३- स्वीकार होना ४- वास्तविकता के निकट होना ५- और क्या आपका है और क्या नहीं इसका आभास करते हुए जीवन व्यतीत करना। ६- अपनी क्षमताओं का आकलन रखना ७- परम के प्रतिअस्था रखना ८ - जीवन के स्पंदन को ह्रदय की धड़कन के द्वारा महसूस करना ९ शरीर का और मस्तिष्क को स्वक्छ रखने का सतत प्रयास और अंत में १०- आत्म शुध्धि के लिए प्रयत्न शील।

यही बातें आपको सीखनी ही है , सिर्फ सीखनी नहीं ; जीवन का हिस्सा बनाना है , यही मूल भाव छिपा है। आपके हर प्रयास में कि आपका जीवन शारीरिक और मानसिक कष्ट और आघातो से रहित हो।

आईये अब समझते है कि सार-सार को ग्रहण करते हुए अन्य लहरो और उनके आघातो तथा प्रभावों से बचा जाये

ऊपर लिखी जितनी भी बातें है , वो सब स्वयं ही साधनी होती है , आपकी निष्ठां और आपका रुझान ..... आपको संकेत देता है।

मुझे तो सब तरफ एक ही स्वर सुनायी देता है , " जितना हो सके .... निर्भार हो , पूर्व कर्मो बंधन के बोझ से (सत्कर्म दवरा ) और इस जीवन के बोझ से (ध्यान द्वारा दैवीय गुणो के प्रकटन को स्वीकार करते हुए ) , " इसके मर्म को जानते हुए। संकेतों को पकड़ के आगे बढ़ना ही सही है , क्यूंकि व्याख्या में उलझ के सिर्फ मस्तिष्क को खुराक मिलती है और आपको व्यर्थ की भटकन ।

आपका पहला संकेत - अपनी साँसों की गति पे ध्यान दीजिये

आपका दूसरा संकेत - जागरूकता के साथ ध्यान पे बैठ के अंतरयात्रा कीजिये

आपका तीसरा संकेत - सहजता और सरलता को बीज मन्त्र बनाना है।

आपका चौथा संकेत - शारीरिक शुध्धि (खानपान और व्यायाम द्वारा ) और मानसिक शुध्धि ( वाणी और ध्य़ान पद्धति दवरा ) वैसे तो पद्धति उसकी राह में कोई है ही नहीं , नियम सिर्फ आपको आपसे जोड़े रखने के लिए है।

आपका पांचवा संकेत - जिस दिन आपको वास्तविकता का भान हो और आपमें विराग उपस्थित हो , प्रेम करुणा और जिम्मेदारियां इनको निमंत्रण दीजिये , जो आपके आस पास ही है बस आपके संकेत का इन्तजार कर रही है। पर जिम्मेदारियों से पलायन बिलकुल नहीं।

आपका छठवां संकेत - प्रकृति से आप प्रेमपूर्वक एकात्मकता अनुभव करेंगे , एकाकार अनुभव करेंगे। और इस पल से आपकी यात्रा समाप्त नहीं होती , एक नया अध्याय जुड़ जायेगा।

अभी तो आपको अपनी सीमित शक्ति सीमित ऊर्जा , सीमित क्षमता में निराशा घेरती है , तब आपने अट्टहास उभरेगा , यही सीमित भाव आपको असीमित से मिलवायेगा।

और फिर आपको , किसी के भी द्वारा .... धर्म न अध्यात्म के किसी भी संकेतों की आवश्यकता रह जायेगी । आपको आपका रास्ता स्वक्छ , धुला साफ़ , चमकदार , स्वयं दिखायी देगा।

और वही से ; ध्यान दीजियेगा इस अंतिम संकेत पर , वहीं से एक ऐसे बालक के सामान जिसने अभी अभी कदम डालना शुरू किया है , आपको सबकी उंगलिया छोड़ के , छोटे छोटे कदमो से आगे बढ़ जाना है ( सबकी यानिकि सब की आपके पूज्य गुरु , आपके आराध्य देव देवी , आपके मोह - क्रोध - अहंकार - वासना - धर्म अध्यात्म के पथ प्रदर्शक , मित्र सम्बन्धी )

यक़ीन कीजिये उस पल के उपस्थित होते ही ; आप स्वयं आगे बढ़ जायेंगे।

( ये तो मेरे दिए संकेत है , आपके वास्तविक दैवीय संकेत आपको स्वयं आपसे मिलंगे , एक एक करके .................................उस पल में ; उस महत्वपूर्ण पल में .... आपको यह भी भास् होगा कि तमाम लौकिक सिध्ही , मन्त्र , पूजा देवी, देवता , धर्म, अध्यात्म , पुस्तके , गुरु , सद गुरु , सब सिर्फ और सिर्फ माध्यम है ; सिर्फ और सिर्फ उस परम सत्ता की ओर इशारा मात्र है। इस से अधिक इनका कोई महत्त्व नहीं। इतना आप स्वयं पे भरोसा कर सकते है। )


 these are actually baby steps of your leap with absolutely 

zero gain 

ॐ प्रणाम

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