Wednesday, 19 February 2014

योग का बहुत पुराना अनुभव है ; ध्यान और तत्काल सक्रिय केंद्र Osho


जिस केंद्र पर हम भीतर ध्यान करते हैं वह केंद्र तत्काल सक्रिय हो जाता है।



योग का बहुत पुराना खयाल है--खयाल ही नहीं, अनुभव है--कि जिस केंद्र पर हम भीतर ध्यान करते हैं वह केंद्र तत्काल सक्रिय हो जाता है। उसकी सक्रियता, उसकी कलियों को जो बंद थीं, खोल देती है। जैसे सूरज सुबह पक्षियों को जगा देता है। 

आपका ध्यान ही जाना शुरू हो जाए भीतर की तरफ और आपके चक्र सक्रिय होने शुरू हो जाते हैं। सिर्फ जाना शुरू हो जाए और आपके भीतर अनूठे अनुभव होने लगते हैं। अभी तीन दिनों में न मालूम कितने मित्रों ने आकर न मालूम कितने अनुभव मुझे कहे। वे सदा से हुए अनुभव हैं। किसी को प्रकाश के तीव्र अनुभव भीतर होने शुरू हो जाते हैं; वह किसी केंद्र से फूटता हुआ प्रकाश है। किसी को सुगंध का अनुभव भीतर होना शुरू हो जाता है; वह किसी केंद्र से फूटती हुई सुगंध है। किसी को संगीत के अनूठे नाद सुनाई पड़ने लगते हैं; वे किसी केंद्र से फूटते हुए संगीत की ध्वनियां हैं, नाद हैं। और अलग-अलग अनुभव भीतर से प्रकट होने शुरू हो जाते हैं। जितना बड़ा जगत हमारे बाहर है, उससे छोटा जगत हमारे भीतर नहीं है। अभी हमने बाहर ही ध्यान दिया है, इसलिए बाहर की चीजें सक्रिय हो गई हैं। अभी हमने भीतर ध्यान नहीं दिया, अन्यथा भीतर भी सब सक्रिय हो जाए। एक-दो छोटे प्रयोग आपको कहूं, जिससे आपको स्मरण में आ सके कि यह हो सकता है।

रास्ते पर जा रहे हों, सामने आपके कोई चल रहा हो। एक दो मिनट के लिए ऐसा करें कि ठीक उसकी चेंथी पर दो मिनट तक उसके पीछे से आंख गड़ा कर देखते रहें, पलक न झपकें। पलक बिना झपके उसकी चेंथी पर देखते रहें एक दो मिनट तक।

दो मिनट से ज्यादा आप न देख पाएंगे कि उस आदमी को आपको लौट कर देखना पड़ेगा। उसके केंद्र पर सक्रियता हो गई, वह तत्काल बेचैन होकर पीछे लौट कर देखेगा कि क्या हुआ, पीछे क्या हो रहा है! आप ऐसा आदमी नहीं खोज सकते जिसको आप दो मिनट तक देखें और वह पीछे लौट कर न देख ले। और अगर ऐसा आदमी मिल जाए तो समझना कि बड़ा कीमती आदमी मिला है।

अपने ही शरीर में आप कोई भी केंद्र चुन लें और उस पर थोड़ी चेतना ले जाना शुरू करें। हम सबको अगर पूछा जाए कि अगर आपका हाथ कट जाए, तो हम कहेंगे कि हमारा कुछ बहुत नहीं कट जाएगा। थोड़ी तकलीफ होगी, लेकिन बहुत नहीं कट जाएगा। लेकिन कोई कहे कि सिर कट जाए, तो हम कहेंगे कि सब कट जाएगा। क्योंकि हमारी आइडेंटिटी हमारे सिर्फ मस्तिष्क में रह गई है, हमारा होना सिर्फ वहीं है। हम कहेंगे कि हमारा होना ही वहां है। जो कुछ भी हमारी संपत्ति है, विचार हैं, ज्ञान है, जो भी हमने जाना है अपने बाबत, वह मस्तिष्क के छोटे से केंद्र पर है, बाकी पूरे शरीर पर वह नहीं है।

अपने भीतर किसी भी केंद्र पर ध्यान करना शुरू करें। जैसे मैंने प्रयोग के लिए आपसे बाहर के लिए कहा, आप एक चार-छह दिन सिर्फ आंख बंद करके हृदय पर ध्यान ले जाएं; सिर्फ ध्यान ले जाएं, और कुछ न करें--एक पांच मिनट रोज। और आप पाएंगे आपके व्यक्तित्व में प्रेम बढ़ना शुरू हो गया। वह आपको दिखाई पड़ेगा, आपके पड़ोसियों को दिखाई पड़ेगा, आपके घर के लोगों को दिखाई पड़ेगा। कहने की जरूरत नहीं, चुपचाप आप ध्यान देते रहें। और आप पाएंगे कि लोग आपसे कहने लगे कि आप में बड़ा फर्क हो रहा है। आप इतने प्रेमपूर्ण कभी भी नहीं थे।

जिस केंद्र पर चेतना जाएगी, वह केंद्र सक्रिय हो जाता है। और हमारे सात केंद्र हैं। इन सातों पर चेतना ले जाई जा सकती है। अगर ले जाएंगे तो ही चेतना जाएगी। स्व चेतन होने का यह फायदा भी है और खतरा भी है। नहीं ले जाएंगे तो नहीं जाएगी। और नहीं ले जाएंगे, तो स्व अचेतन पशुओं में और आदमी में कोई फर्क नहीं है। अगर मैं इसे ऐसे कहूं कि योग पशु को मनुष्य बनाने का विज्ञान है, तो यह परिभाषा अतिशयोक्ति नहीं है।
योग में पशु का अर्थ भी बहुत अदभुत है। योग उसको पशु कहता है जो पाश में बंधा है। जैसे भैंस या गाय को हम रस्सी में बांध कर ले जाते हैं। वह जो रस्सी है उसका नाम पाश और उसमें बंधे हुए का नाम पशु।

योग कहता है, जो आदमी अचेतना की जंजीरों में बंधा है, वह पशु; और जो आदमी अचेतना की जंजीरों को तोड़ कर खड़ा हो गया, वह मनुष्य। मनुष्य का मतलब है, जो मन हो गया पूरा। और मन कांशसनेस, चेतना का नाम है। मन का अर्थ है चेतना, जो चेतन हो गया पूरा। अंग्रेजी का मैन भी संस्कृत के मन से ही बना है। जो मन हो गया पूरा अर्थात जो पूरा चेतन हो गया। और यह जो चेतन हो गया पूरा, यह मनुष्य है।


YOG NAYE AAYAM 03

No comments:

Post a comment