Wednesday, 23 August 2017

Atma Pooja Upanishad

" आत्म पूजा उपनिषद " एक बहुत छोटा सा 17 श्लोकों वाला उपनिषद है

आत्म पूजा उपनिषद ज्ञान और भक्ति के  वर्तुल को पूरा करता है , ये रहस्यमयी अदृश्य पायदान है , आध्यात्मि  साधक  प्रथम से लेकर अंतिम सूत्र तक एक एक को आध्यात्मिक तल मान के चलें -

1- आत्मपूजा उपनिषद के पहले श्लोक - 
" ॐ तस्य निश्चिन्त्नम ध्यानम" 
( ॐ का निरंतर स्मरण ही उसका ध्यान है - Ceaseless remembrance of ॐ is His meditation ) 
1- OM! TASYA NISHCHINTANAM DHYANAM
AUM! MEDITATION IS THE CONSTANT CONTEMPLATION OF THAT.

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2-आत्म पूजा उपनिषद के दूसरे श्लोक - 
सर्वकर्म निराकरण आवाहनम ( सब कर्मों के कारण की समाप्ति ही आवाहन है - cessation of the cause of all actions is the invocation or avahanm )
2- SARVA KARMA NIRAAKARANAM AAWAHANAM
CESSATION OF THE CAUSE OF ALL ACTIONS IS AAWAHANAM -- THE INVOCATION.

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3- "आत्म पूजा उपनिषद" के तीसरे श्लोक 
निश्चलं ज्ञानं आसनम ( निश्चल ज्ञान ही आसन है - non-wavering knowing is Asan or the posture )
3- NISCHAL GYANAM ASANAM
NON-WAVERING KNOWING IS ASANA -- THE POSTURE.

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4- "आत्म पूजा उपनिषद" के चौथे श्लोक- 
उन्मनि भावः पाद्यम ( मन का ऊपर की ओर बहना ही पाद्यम है, परमात्मा की पूजा के लिये जल है - the upward flow of the mind is "padyam" the holy water for divine worship )
4-UNMANI BHAAVAH PADDYAM
THE UPWARD FLOW OF THE MIND IS PADDYAM -- THE WATER OF DIVINE WORSHIP.

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5- "आत्म पूजा उपनिषद" के पांचवें श्लोक- 
सदामनस्कं अघ्र्यम ( मन के तीर का निरंतर उसी की ओर लक्ष्य होना ही अघ्र्य है, अर्पण है. - mind constantly arrowed toward That is the offering, arghyam. ) 
5-SADAAMANSKAM ARGHYAM
MIND CONSTANTLY ARROWED TOWARDS THAT IS ARGHYAM -- THE OFFERING.
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6- "आत्म पूजा उपनिषद" के छठे श्लोक - 
सददीप्तिः अपार अमृतवृत्तिः स्नानम .( आंतरिक प्रकाश में तथा अंतर के अनंत अमृत में निरंतर केन्द्रित रहना ही पूजा की तैयारी के लिये स्नान है. - to be centered constantly in the inner illumination and in the unbounded inner nectar is the preparatory bath for the worship )

6-SADAADEEPTIH APAAR AMRIT VRITTIH SNAANAM
TO BE CENTERED CONSTANTLY IN THE INNER ILLUMINATION AND IN THE INFINITE INNER NECTAR IS THE PREPARATORY BATH FOR THE WORSHIP.

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7-"आत्म पूजा उपनिषद" के सातवें श्लोक - 
सर्वत्र भावना गन्धः ( सब जगह उसी की अनुभूति ही एकमात्र गंध है. - 
the feeling of That everywhere is gandha, the only fragrance )

7-SARVATRA BHAVANA GANDHAH
THE FEELING OF THAT EVERYWHERE IS GANDHA -- THE ONLY FRAGRANCE.

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8- "आत्म पूजा उपनिषद" के आठवें श्लोक -
दृक स्वरूप अवस्थानम अक्षताः ( अपने भीतर साक्षी स्वभाव में स्थिर हो जाना ही अक्षत है, जो कि बिना निखारा व बिना टूटा ही पूजा में काम आता है - to be established in one own witnessing nature is " akshat " the unpolished and unbroken rice used for the worship ) 

8-DRIK SWAROOP AWASTHANAM AKSHATAHA
TO BE ESTABLISHED IN ONE'S OWN WITNESSING NATURE IS AKSHAT -- THE UNPOLISHED AND UNBROKEN RICE USED FOR THE WORSHIP.

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9- "आत्म पूजा उपनिषद" के नौवें श्लोक -
 चिदाप्तिः पुष्पम् 
( चेतना से भरे होना ही पूजा के लिये पुष्प हैं - to be filled with consciousness are flowers for the worship ) 
9-CHIDAAPTIH PUSHPAM
WHAT ARE THE FLOWERS FOR THE WORSHIP? -- TO BE FILLED WITH CONSCIOUSNESS.

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10- "आत्म पूजा उपनिषद" के दसवें श्लोक - 
चिदाग्नि स्वरूपं धूपः 
( स्वयं के भीतर चैतन्य की अग्नि को जलाना ही धूप है.- igniting fire of consciousness within is "dhoop" for the worship. )
10-CHIDAGNI SWAROOPAM DHOOPAH
TO CREATE THE FIRE OF AWARENESS IN ONESELF IS DHOOP, THE INCENSE.

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11- "आत्म पूजा उपनिषद" के ग्यारहवां श्लोक - 
चिदादित्य स्वरूपम् दीपः ( चैतन्य के सूर्य में स्थित हो जाना ही पूजा के लिये दीपक है. - to be rooted in the sun of consciousness is the lamp or Deepak for the worship )
11-CHIDADITYA SWAROOPAM DEEPAH
TO BE ESTABLISHED IN THE SUN OF AWARENESS IS THE ONLY LAMP.

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12- आत्म पूजा उपनिषद" के बारहवें श्लोक - 
परिपूर्णचन्द्र अमृत रसैकीकरणं नैवेद्यम्. 
( अंतस के पूर्ण चन्द्र के अमृत को इकट्ठा करना ही नैवेद्य है. - collecting the nectar of full moon of witnessing shining in the sky of consciousness is the oblation or bhog for the worship.)
12-PARIPOORN CHANDRA AMRIT RASAIKI KARANAM NAIVEDYAM
ACCUMULATION OF THE NECTAR OF THE INNER FULL MOON IS NAIVEDYA, THE FOOD OFFERING.

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13- "आत्म पूजा उपनिषद" के तेरहवें श्लोक -
 निश्चलत्वं प्रदक्षिणं 
( निश्चलता ही प्रदक्षिणा है, अर्थात उसकी पूजा हेतु परिक्रमा है - inner stillness is the revolution or parikrma for the worship of That )
13-NISCHALATWAM PRADAKSHINAM
STILLNESS IS PRADAKSHINA, THE MOVEMENT AROUND THAT FOR WORSHIP.

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14- "आत्म पूजा उपनिषद" के चौदहवें श्लोक - 
सोहं भावो नमस्कारः 
( मैं वही हूँ, यह भाव ही नमस्कार है - feeling of 'Iam That' is the regard or salutation for the worship ) 
14-SOHAM BHAVO NAMASKARAH
THE FEELING OF I AM THAT -- SO-AHAM -- IS THE SALUTATION.

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15-"आत्म पूजा उपनिषद" के पन्द्रहवें श्लोक -
मौनं स्तुतिः ( मौन ही प्रार्थना है - silence is the prayer )
15-MOUNAM STUTIHI
SILENCE IS THE PRAYER.

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16- "आत्म पूजा उपनिषद" के सोलहवें श्लोक -
सर्व संतोषोविसर्जनमिति स एवं वेद. ( पूर्ण संतोष विसर्जन है, अर्थात पूजा की क्रिया की समाप्ति है, जो ऐसा जानता है, वही ज्ञान को उपलब्ध है - complete contentment is the dissolution, the end of the process of the worship. One, who knows this, has attained the ultimate understanding. )
16-SARVA SANTOSHO VISARJANAMITI YA AEVAM VEDA
TOTAL CONTENTMENT IS VISARJAN, THE DISPERSION OF THE WORSHIP RITUAL. ONE WHO UNDERSTANDS SO IS AN ENLIGHTENED ONE.

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"आत्म पूजा उपनिषद" के सत्रहवें और अंतिम श्लोक -
सर्व निरामय परिपूर्णोअहमस्मीति मुमुक्षनां मोक्षैक सिद्धिर्भवति. ( मैं ही वह परिपूर्ण ब्रह्म हूँ, ऐसा जान लेना ही मोक्षोपल्ब्धि है - realizing the boundless, absolute, interconnected, indestructible and all pervading nature of the self is the salvation. )
17-SARVA NIRAMAYA PARIPOORNOHAMASMITI MUMUKSHUNAM MOKSHAIK SIDDHIRBHAWATI
I AM THAT ABSOLUTELY PURE BRAHMAN: TO REALIZE THIS IS THE ATTAINMENT OF LIBERATION.
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the end 

Collective Talks on Sanskrit and Hindi of Anant shree / Shree Kunal ji at 2007 
source youtube https://www.youtube.com/channel/UCx7h6hya-Z1iLCdECzbLCRg
and 
another Source  Sutra collected on a set of two books :
The Ultimate Alchemy Volume Vol. 1 & 2-Osho.

Here ends the Atm puja Upanishad, 
as contained in Mandukyopnishad, at Atharva-Veda.
where described many ways Soul is Supreme and drop of ultimate Origin Ocean

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