Monday, 3 February 2014

आत्मकेंद्रित ध्यान और हम : ध्यान 6

जन्म  लेने के बाद  से किसी भी सांसारिक  संस्कार  का पहला दायित्व है  आपको आपके मूल से जोड़ना ,किसी भी धर्म / अध्यात्म का प्रथम दायित्व है  आपको आपके  नाभि स्थल से जोड़ के रखना , किसी भी   ध्यान का पहला चरण है आपको आपके पृथ्वी तत्व  अस्तित्व से जोड़ना , और सभी का एक मात्र प्रयास आपको आपकी उड़ान में  सहायक बनाना , ध्यान दीजियेगा   यहाँ आपको ही आपका   सहायक बनाना  उद्देश्य है , अपितु दिखता है कि सब मिलके आपकी सहायता कर रहे है।  ये आपकी यात्रा है ,  जन्म से  लेके मृत्यु  तक की।  

पहला चरण आपका  अति महत्वपूर्ण , किसी भी  बच्चे के  पहले कदम   जैसा। ... जिस पे उसके पूरे जीवन के कदम  निर्भर करते है।  यहाँ भी  ठीक वैसा ही है  विशाल भवन की  बुनियाद जैसा ।  





आपका  एक एक कदम  जब अनंत कि तरफ बढ़ता है  तो वो उस परम के लिए  उतना ही  सुंदर है  जैसे  एक बालक का  एक एक कदम  रखना  अपने जन्मदाता कि तरफ ( माता पिता  दोनों ही नाम  जान बूझ के नहीं लिए गए  , क्यूंकि वो एक ही है  संज्ञा  से विघटन की आवश्यकता नहीं , वैसे भी बिना किसी  कारन विघटन हो जाते  है , यहाँ यथा सम्भव जोड़ के रखेंगे ) 


एक एक विचार आपका  आपके अंदर  परिवर्तन आने की  सुचना सा देता प्रतीत होता है 


आपका  ध्यान  से जुड़ना , ध्यान  द्वारा ऊर्जा को  एक नया दृष्टिकोण  मिलता है , एक नयी स्वस्थ ऊर्जा का संचरण , नए भाव का उदय , नया तो नहीं कह सकते , पर हाँ आपके अंदर कोपल जरुर नयी है।   अभी  समझना है  समस्त  कायनात  के रहस्य , उड़ना  है , या के   गिरना  है  उस गहराई में  या के कह ले  फैलना है  विस्तृत  उस थाल जैसे आस्मां  की तरह ,  परन्तु जमीं पे पैर भी जुड़े रहने चाहिए   जिसने  जीवन दिया है , ये धरती , ये   सांसारिक परिवार , संगी साथी इनके प्रति प्रेम  और दायित्व  भी है , इस धरती का कर्ज सबसे बड़ा है , मात्र ऋण   और पितृ  ऋण  , देव ऋण  ,और गुरु ऋण  , सारे ऋण  मिला दो तो धरती का ऋण बनता है  अकेले।  प्रयास करे  सभी ऋणो से उऋण हो सके।   सिर्फ मात्र ऋण  के प्रति आप आभार से भर के ही चूका सकते है  , अन्य कोई उपाय नहीं।   इसी लिए धरती का ऋण भी मात्र  आभार  और प्रेम से चुकता है।  


ध्यान वो पहला कदम है  जो आपको आपके मूल से जोड़ते हुए , आपके  छलांग में  सहायक होता है।  


आइये  आज  आत्मकेंद्रित  ध्यान करते है , उद्देश्य ह्रदय का दिया जलना (वस्तुतः यह एक काव्यात्मक भाषा है , काव्यात्मक  यानि कि  कम में बहुत कुछ कहने का प्रयास )  जब हम दिया जलने  जैसे शब्द का इस्तेमाल करते है , तो उसका अर्थ सिर्फ ये है कि अंदर के अँधेरे को देखना  और दूर करना।  चूँकि  ये यात्रा भाव की है  तो भाव को ही देखेंगे  , बाकी मांस  मज्जा  और अस्थियों को उनका कार्य करने दें। 




अपना स्थान ग्रहण करे , ध्यान केंद्रित करे  ह्रदय पे  ,इस अग्निशिखा को  अति शांत भाव से   देखे  ,  और देखते रहे    सहज रूप से  खो जाने दे सांसारिक दृष्टि को  , आहिस्ता  से आँखे बंद कर ले , और देखे  इस लौ को  , जो आपको अंदर से  पवित्र कर रही है , प्रकाश दे रही है  आपके  उन अंधेरो को जो आपको कष्ट दे रहे है।  





शांत   ................    

           
सहज    ......................... 

सौमया ……………………… अग्नि की रेखा  ………… आपको  विश्रांत कर रही है  .............


थोड़ी देर  परम मौन की अवस्था    …………………………………… 


थोडा समय  शांत    यूँ ही  रहने दे स्वयं को         …………………………… 


अब  धीर से नेत्र खोले       ……………… 


चारों तरफ  के वातावरण से  एकाकार  करे  ………………………… 


आभार  उन सबका    दे   जो भी किसी भी रूप में आपसे जुड़े हुए है। 


आज बस इतना ही 



ॐ प्रणाम 

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