Wednesday, 31 December 2014

Nuts (Nov-Dec 2014) -5

31 Dec 2014.

Lessons Beyond Learning !
for a very easy to understand , when i read a book of the class which i get promoted to go for next year , it gives different pleasure , while i am on going in class and reading same book gives different stress and when i get clear the class and year back i read same book it gives different kind of pleasure and this time learning too .... amazing three layers of learning present in every aspect .

(calceolaria uniflora; nature is amazing teacher)



4 Dec 2014 


* Now i understand the meaning exact ,' i 'm loud cos of genuine listener ' ( if i get silent .. may some "one" get thirsty or needful get needy..) ( *quotations are fragrance bottle , decorated nicely at flagrance shop not flower shop , go select according to budget and come happy with selected one ... wild flowers are amazing they come they have fragrance and they get dry .. but where they bloom that area get fragrant (but limit is of time cos of world is changeable continues ))

*receivers are many , many meaning many senses ,many perceptions , but center is one . same with One word. according bhava and to receiver it get change shape and size. 

* May find many definitions of love this and that all are just covers one circle . of one layer ......either in higher energy , it cover higher circle or in lower it cover lower "One at a time" ... Love also lives in layers and give effect in layers according to callings . the very being of love is gravity less ... or can say free of gravity . so deep so profound on every layer , love is pure .

* In duality watching covers from both ends .. one is from down and one is from far above ..but in Non-duality, who is watcher and to whom ! Om


2 Dec 2014 

Calculation-less Small math of life :-
Life = Love with Regards Including Responsibility and Respect

1 Dec 2014 

Very beautiful verdict by Murari Bapu :- "those have interested in reading Geeta for knowledge , They should have to read start , but those who want to learn and absorbs, they can go from any page .. Geeta is One Maha gratnta which have capable to change sorrow into pleasure ..; even till today though it is very old . "
It is well known fact , each and every shlok is meaning full as life , it is according to social life. it is wise and broad and running as bhrahm putra . each shlok embraced deep meaning. (s , mind to mind) . just read again last line " it is capable to change even today" means we are same psychologically as we were with little good and most bads , little patience more hurts .Otherwise this verdict also get diluted , but some how Geeta is still today applicable as before ( human's hardluck).



28 nov 2014 

जे पहुंचे ते कहि गए, तिनकी एकै बात।।
सबै सयाने एकमत, उनकी एकै जात।। Dadu


27 nov 2014 

Welcome to Time , as is where is basis:-prior of ripe if fruit get cut forcefully it may sour in the place of sweet . do not force to destiny , welcome smoothly whatever time is comes and say bye bye in going . do not hooked with sentiments . cos they have to pass with time . to control time , to pull or push time not in our limit . do not try hard like kid . Only in hand , to live with good deed option .
Om Pranam





26 nov 2014 
The Circles of life :-
There are many circle and their complete rounds here is love , cos love most in talks ... love is this and love is that , so one to understand the complete circle ... nothing you can take with self , you are born empty and go empty is your full and final circle ....
.... Its Amazing sequence , the Love was First encounter and soul was very first receiver from Mother , and Love is the last sentiment for ceremonial offering to an lotus feet of Source.
So ; the way One the very important and main alike festive circle of LOVE take complete walk on life circle . it has biggest walk in front of Other sentiments .
Om Pranam

25 nov 2014 

* Sentiments are very commonly flows within Common man , Sentiments are not for Center , Nature and Sages , their dealings are Same as with particle or Center in the form of Gunas

* Human made world may look attractive in first appearance of polishing on surface , but after look again entire human made world is developed with little wisdom of Science and big foolishness of Ingnorence of life; as basic.
Om



23 nov 2014 



I find do you find friends , any similarity among beheaded flowers and humans, both are equal brutal act . One is Silent and another is crying . In vast nature if you are not listening those voices , how may nature will listen your 's , and very center is most far to listen your selfish voice .
you did beheaded flowers for reason and another human doing beheaded for their reason ! both are brutal same in front of Lord and Mother Earth





21 nov 2014 

Gunas (as one thread) comes in cyclic motion .. 
again n again , in many rounds . 
they may be different shape color and sizes. 
just be witness. is more than enough. 
*Patience, *Acceptance and *Surrender is the Only Key.

गुरु को भी विदा : Osho

आप ने भक्ति—साधना के प्रसंग में अवतारी पुरुषों की चर्चा की उस प्रसंग में आप ने भगवान बुद्ध का वचन उद्धृत किया कि मुझे भी राह से हटाकर आगे जाना। लेकिन शायद इसी प्रसंग में कहा गया भगवान कृष्ण का प्रसिद्धवचन है —‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज,’ सब धर्म इत्यादि छोड़कर मेरी शरण आ। क्या इन परस्पर विरोधी वचनों पर कुछ प्रकाश डालने की कृपा करेंगे? 


जरा भी विरोध नहीं है। कृष्ण जो कह रहे हैं, वह यात्रा की शुरुआत है। बुद्ध जो कह रहे हैं, वह यात्रा का अंत है। कृष्ण जो कह रहे हैं, वह अर्जुन से कह रहे है जो नाव पर बैठा नहीं, जो झिझक रहा है नाव पर बैठने में कृष्ण कहते है—तू फिकर छोड़, यह नाव तेरे पास आकर लगी;’सर्वधर्मान् परित्यज्य’, छोड़—छाड़ सबबातचीत, सब बकवास, आ बैठ, मेरी शरण आ;मैं तेरा माझी, मैं तेरा सारथी, मैं तुझे उसपार ले चलूं? यह नाव तुझे ले जाएगी। सब छोड़कर निर्भय होकर इस नाव में बैठ।जब बुद्ध ने कहा है कि अगर मैं भी तुम्हारी राह में आ जाऊं,तो मेरी गर्दन काट देना, यह उस किनारे की बात है जब नाव दूसरी तरफ लग गयी और अर्जुन कहने लगा कि अब मैं उतरूंगा नहीं नाव से। इस नाव ने कितनी कृपा की है, मुझे संसार के सागर से ले आयी परमात्मा के किनारे तक, नहीं,इसे अब मैं छोडूंगा नहीं;और कृष्ण के पैर पकड़ ले और कहे कि तुमने ही तो कहा था— ‘मामेकंशरणं बज,’ अब कहा जाते हैं? अब नहीं छोडूंगा,अब चाहे प्राण रहें कि जाएं, तुम्हारे चरण पकड़े ही रहूंगा। तब उस दूसरी घड़ी मे कृष्ण को भी कहना पड़ेगा, 

जो बुद्ध ने कहा, कि पागल,अब नदी से उतर आया, अब नाव छोड़। अब मुझे भी छोड़। अब तो दूसरा किनारा आ गया, अब तो परमात्मा आ गया ! नाव का उपयोग था, संसार से परमात्मा तक, शरीर से आत्मा तक, अंधकार से प्रकाश तक, मृत्यु से जीवन तक, लेकिन अब तो परमात्मा के द्वार पर आकर खड़ा हो गया है,अब इसे भी छोड़, अब इस नाव को थोड़े ही ढोका! बुद्ध बार—बार कहते थे कि जब उतर जाओ दूसरे किनारे, तो नाव को सिर पर मत रख लेना। वह मूढ़ता होगी,अनुग्रह और कृतज्ञता नहीं। नाव को धन्यवाद देकर आगे बढ़ जाना।

कृष्ण का वचन पाठशाला मे भर्ती होने के दिन विद्यार्थी को दिया गया सूत्र है। बुद्ध का वचन,दीक्षांत समारोह समाप्त हो गया, विश्वविद्यालय से लौटते हुए विद्यार्थी को दिया गया अंतिम संबोधन है।विरोध जरा भी नहीं। चूंकि दोनों अलग —अलग समय में दिये गये और अलग— अलग लोगों को दिये गये,इसलिए तुम्हें चिंता हो सकती है।कृष्ण ने कहा था अर्जुन से, जो एक सामान्य व्यक्ति है। बुद्ध ने कहा था बोधिसत्वों से,जो आखिरी घड़ी में पहुंच गये है। बुद्ध मर रहे हैं, आखिरी घड़ी आगयी, उनके बोधिसत्व उन्हीं घेरे हुए हैं, उनके परम शिष्य उन्हें घेरे हुए हैं, आनंद रोने लगता है, बुद्ध आंख खोलते हैं, पूछते है—क्यों रोता है?तो आनंद कहता है—आप चले, अब हमारा क्या होगा? तब बुद्ध ने कहा है—अप्प दीपो भव, अपने दीये बनो। मेरे साथ जंहा तक आ सकते थे, आ गये।बुद्ध का वचन और कृष्ण का वचन एक ही यात्रा के दो छोर हैं। विरोध जरा भी नहीं। जैसे तुम सीढ़ी चढ़ते हो और मैं तुमसे कहूं—बिना सीढ़ी पर चढ़े तुम छत तक न पहुंचोगे। और फिर तुम सीढ़ी के अंतिम सोपान पर जाकर अटक जाओ और तुम कहो—अब मैं सीढ़ी नहीं छोडूंगा,क्योंकि इसी सीढ़ी ने मुझे इस ऊंचाई तक लाया, तो मैं तुमसे कहूंगा कि अब सीढ़ी छोड़ो, नहीं तो छत पर न पहुंच सकोगे। क्या मेरी बातों में विरोध होगा? दोनों में कुछ विरोधाभास है? सीढ़ी चढ़ाने के लिए कहा था—चढ़ो, छत पर नहीं पहुंचोगे;अब कहता हूं —सीढ़ी छोड़ो नहीं तो छत पर नहीं पहुंचोगे।विधियां पकड़नी होती हैं, एक दिन छोड़ देनी होती हैं। रास्तों पर चलना होता है, एक दिन रास्तों को नमस्कार कर लेनी होती है।परमात्मा मे प्रवेश के पहले तुमने जो भी किया था जो भी सोचा था,जो भी साधन, विधि—विद्यान, अनुशासन अपनेजीवन में आरोपित किये थे, सब को तिलांजलि दे देनी होती है। परमात्मा मे प्रवेश के क्षण में न तो कोई विधि पास होनी चाहिए न कोई मंत्र, न कोई तंत्र, परमात्मा में प्रवेश के समय सारी सीढ़ियां समाप्त हो जानी चाहिए। सारी नाव विदा हो जानी चाहिए। तो ही तुम प्रवेश कर सकोगे।

वचनों में भेद है, क्योंकि अर्जुन और आनंद में भेद है। अर्जुन अभी चलने को ही तैयार नहीं है, अभी वह ठिठक ही रहा है, आनंद चल चुका है अंत तक,आखिरी घड़ी आ गयी… और तुम्हें पता है, बुद्ध के मरने के चौबीस घंटे के भीतर आनंद परम ज्ञान को उपलब्धहो गया था;तो आखिरी घड़ी में था, बिलकुल आखिरी घड़ी में था,उतनी सी बाधा बची थी,बस थोड़ी सी बाधा बची थी,कि बुद्ध से जो लगाव था, जो आसक्ति थी,वही अटका रही थी। सब आसक्तिया टूट गयी थी—न धन से कुछ रस था, न पद से कुछ रस था, न मित्रों में कोई रस था, सारे रस जा चुके थे, सारे रसों में एक ही रस व्याप्त हो गया था,यह सदगुरु का रस, यह सदगुरु के चरणों को पकड़ लेने की आसक्ति गहन हो गयी थी। यह मोह प्रबल हो गया था। 

बुद्ध ने आनंद को कहा है—तू मुझे भी छोड़, तू अपना दीपक अब खुद बन, अब तू इस योग्य है, अपने पैर पर खड़ा हो सकेगा। मेरे कंधे पर कबतक बैठकर चलेगा? अब जरूरत भी नहीं है।मां चलाती है बच्चे को हाथ पकड़कर, एक दिन हाथ पकड़ कर चलाना होता है। फिर अगर बच्चा सदा के लिए यह हाथ पकड़ ले तो मां हाथ छुड़ा की, एक दिन हाथ छुड़ाना भी होता है,नहीं तो बच्चा जवान कब होगा, प्रौढ़ कब होगा?अगर मां अपने बीस साल के जवान लड़के को भी हाथ पकड़कर चलाए, तो तुम भी कहोगे कि मां भी पागल है और यह लड़का भी पागल है। और अगर मां पहले से ही अपने आठ महीने के बच्चे को हाथ का सहारा न दे, तो भी तुम पागल कहोगे।विरोधाभास कहा है ? अर्जुन छोटा सा बच्चा है, दुधमुंहा। आनंद युवा हो गया, लेकिन अब भी मां का आचल छोड़ना नहीं चाहता।अभी भी चाहता है मां को पकड़े रखे। ये दोनों वचन सत्य हैं, और दोनों वचन तुम्हारे लिए भी सत्य है—पहले दिन कृष्ण का वचन, अंतिम दिन बुद्ध का वचन। इस में विरोधाभास मत देखना। अक्सर धार्मिक महावचन विरोधाभासी दिखायी पड़ सकते हैं;क्योंकि धर्म एक बड़ा रहस्यपूर्ण जगत है—तर्कातीत।उल्टी ही चाल चलते हैं दीवानगाने इश्क करते हैं बंद आंखों को दीदार के लिए जब देखना हो परमात्मा को तो आंख बंद करनी होती है। तुम कहोगे, यह  क्या उल्टी बात? आदमी आंख खोल कर देखता है। आंख बंद करके देखने का क्या मतलब? मगर यही है हाल।असली को देखना हो तो आंख बंद करनी पड़ती है। छुद्रको ही देखते रहना हो तो आंख खुले भी चल जाता है। आंख खोलकरभी देखा जाता है और आंख से बंद करके भी देखा जाता है। जो खुली आंख से दिखता है, वह सपना है और जो बंद आंख दिखता है,वही सत्य है।कबीर का प्रसिद्ध वचन है—भला हुआ हरि बिसरियो सर से टली बलाय, जैसे थे वैसे भये अब कछु कहा न जाय। बड़ा अदभुत वचन है। ठीक बुद्ध का वचन है। भला हुआ हरि बिसरियो, झंझट मिटी, यह हरि भी मिटे और भूले,यह झंझट भी मिटी। भला हुआ हरि बिसरियो, सर से टली बलाय। तुम चौकोगे थोड़ा कि हरि और सर की बलाय! शांडिल्य तो कह रहे हैं कि भजो, हरि नाम संकीर्तन, डूबो;और कबीर का दिमाग खराब हुआ है कि कहते है— भला हुआ हरि बिसरियो, सर से टली बलाय। बलाय ! हरि का नाम ! यही तो, हरि का नाम ही तो साधन है; इसको बला कहते हो!एक दिन बला हो जाती है।जो विधि एक दिन सहयोगी होती है,वही विधि एक दिन बाधक हो जाती है। तुम बीमार हो, तुम्हें औषधि देते हैं। फिर बीमारी चली गयी,फिर औषधि लेते रहोगे तो बलाय हो जाएगी। जिस दिन बीमारी गयी,उसी दिन बोतल फेंक देना और नहीं तो लाइंस क्लब में जाकर भेंट कर आना, मगर छुटकारा पा लेना उस से। फिर बोतल को लिए मत घूमना। और यह मतकहना कि इससे इतना लाभ हुआ, अब कैसे छोडूं? ऐसा कृतझ कैसे हो जाऊं? इसी बोतल ने तो सब दिया, स्वास्थ्य दिया, बीमारी गयी, अब तो पीता ही रहूंगा, अब छोड़नेवाला नहीं हूं। अब तो इस पर मेरी श्रद्धा बड़ी सघन हो गयी। शांडिल्य  कह रहे हैं—डूबो हरि भक्ति में;यह कृष्ण की शुरुआत। और कबीर  बुद्ध के तल से कह रहे है—भला हुआ हरि बिसरियो सर से टली बलाय, जैसे थे वैसे भये अब कछु कहा न जाए। अब क्या कहना है? कैसा राम— भजन किस का भजन कौन करे! किसलिए करे! अब शब्द का कोई संबंध न रहा। अब तो मौन है, सन्नाटा है।

हद टप्पै सो औलिया, बेहद टप्पै सो पीरहद बेहद दोनों टपै, ताका नाम फकीर हद टप्पै सो औलिया जो हद के बाहर चला जाए उसको कहते है—औलिया। बेहद टप्पै सो पीर जो बेहद के भी आगे चला जाए—सीमा के पार जाए, औलिया;असीम के भी पार चला जाए, उस का नाम पीर। हद बेहद दोनो टप्पै सब के पार चला जाए,वही फकीर है। उसे ही मैं संन्यासी कहता हूं।पकड़ना छोड़ने के लिए। विधियों का उपयोग कर लेना, ले लेना जितना रस उनमे हो, फिर जब रस उन का पी चुके तो उस थोथी विधि का ढोते मत रहना, फिर वह बला हो जाएगी।गुरु के सहारे दूसरे किनारे तक पहुंच जाओगे, फिर गुरु को भी विदा दे देनी होगी।संसार से गुरु छुड़ा लेता, फिर गुरु अपने से छुड़ाता है,तभी परमात्मा का मिलन है।

Monday, 29 December 2014

कर्ज का दर्द

एक  यौगिक  विकसित दृष्टि की व्याख्या 
                      ध्य स्थिरता का हिन्दू यौगिक मूल-मंत्र  गजब का प्रभावी है , अंदर से  स्थिर हो तो कारगर , बाहर से एक एक कारण पे स्थिरता आये  तो भी उत्तम फलदायी ,लेन देन के कारोबार से मुक्ति तो अंतर्मन से भारहीनता की अनुभूति , इसीका  बृहत् स्वरुप  देखें तो लेन देन का कार्यक्रम उलझने वाला  और लेने  से भी अधिक चुकाने वाला होता साबित होता है।  बिलकुल जरुरत या गैरजरूरत  बैंक के दिए गए धन के समान , निश्चित अवधि पे  कर्ज का मूल  और सूद  चुकाना ही है वर्ना खैर नहीं , यही कर्ज का उसूल भी है और लेनदार देनदार के बीच का गहरा रिश्ता भी , न ! न !  ;  ये  धन की सांख्यकी से ज्यादा जीवन की सांख्यकी है ,संसार में न जाके  अपने ही नजदीक के इतिहास में देखे , मुस्लिम आये  हिन्दू राज्य पे  शासन किया  और बहुत कुछ दिया भी , कला  संस्कृति  भाषा  एक तरफ कट्टरता  की तश्तरी  तो दूजी तरफ सूफी थाली। और बीच में हिन्दू कर्जदार (धर्म की जिरह  पे मत अटक जाना  क्यूंकि मामला  कर्जदार का है ) मुस्लिम स्वयं में  असंतुलित थे जो उनका  धार्मिक और सामाजिक  समग्र व्यक्तिव  बताता  है  धर्म का पलड़ा  और सूफी पलड़ा  दोनों ही अधिक गंभीर  और भारी थे , उनके देने  में जितनी उदारता थी  लेने  में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।  यानी खूब दिया भी  और बहुत खूब  लिया भी  की सांख्यकी सिद्धांत  यहाँ काबिज  है,फिर अंग्रेजों से हमारा लेन देन का खाता नहीं खुला था जब तक उनका  व्यापारिक उत्सुकता से देश में आगमन  नहीं हुआ था,वस्तुतः  अगर मुस्लिम ताकतवर होते  तो शायद  ये व्यापार  व्यापार  ही रहता , खैर , इतिहास के पन्नो में  कुछ और ही दर्ज हुआ , फिर भी उनसे हमारा खाता  चाहे  या अनचाहे  खुल गया , अंग्रेजों ने  भी इसी सांख्यकी के  नियम  का पालन किया , खूब दिया  और दोगुना  लिया वापिस।

                       ये तो पास के  अतीत का हाल है , इसके पहले भी  भारत  स्वयं में ही उलझा हुआ था , हिन्दू स्वयं में एकत्रित नहीं हो पा रहे थे , हमारी धार्मिकता की सीख यही है, संसार के तल  पे कर्त्तव्य पालन , समग्र कण कण  में ईश्वर का दर्शन  हिन्दू धर्म का सार  है , फिर ईश्वर स्वयं के प्रति  कठोर नहीं हो सकता  मात्र जीवनदायी और न्यायप्रिय  स्वाभाविक  गुण   जागृत होते है, सच्चा धार्मिक हिन्दू कभी  मुस्लिम जैसे कठोर और मारकाट की इक्षा शक्ति से इकठा नहीं हो सकते।  फिर भी  कुछ  हिन्दू भी  इस लेन देन के व्यापार में उलझ ही जाते है।  कभी धार्मिक तो कभी राजनैतिक  मंशा से।  यहाँ भी संतुलन का फर्क है , यदि थोड़ा गौर से समझें  तो  अमूमन मुस्लिम समुदाय  में सच्चे धार्मिक की परिभाषा  और हिन्दू में सच्चे धार्मिक की परिभाषा  जरा  अलग ही तराजू  पे  तौलती  है।  मुस्लिम् का एक विशाल समुदाय है जो  शिक्षा से ज्यादा जनसख्या  बढ़ाओ का सिद्धांत  मानता  है  उसी  अनुपात में अंध धर्म को मानने  वालों  संख्या में  भी  अंतर है।यदि  संसार  की मानवजाति को  दो भागों में बाट तराजू के दो पलड़ों पे  रखें   समूची  अन्यधर्म की जातीयां  है तो  एक पे मात्र मुसलमान  समुदाय  आता है ,  यही कारन है  की  आतंक में  भी मुस्लिम वर्ग ही  संसार का सशक्त विशाल समूह है , यद्यपि  किसी भी धर्म का वास्तविक मूल  आतंकी नहीं,सभी धर्म द्वैत से  अद्वैत  की  कील पे ठहरते है।  एक एक  मुस्लमान आंतरिक रूप से एक है जुड़ा हुआ है। जहाँ हिन्दुओं में बलि की प्रथा  मात्र  गिने चुने लोग  या विशेष वर्ग  द्वारा मानी  जाती  है , वही सम्पूर्ण अमीर गरीब मुसलमान वर्ग  इसे  एक उत्सव  के रूप में सामूहिक रूप से घर घर मानता  है।  वैसे तो हिन्दू धर्म  प्रसिद्द है उत्सव  लिए , किन्तु  व्यवहार में  कोई  उत्सव  राष्ट्रिय  रूप से  बाध्य नहीं , क्षेत्र , मान्यता   और तर्क के अनुसार हिन्दुओं में  स्वतंत्रता है।  छोटा सा उदहारण जेहन में आया  है राम और रावण का  दीपावली  जैसा पर्व समूचे भारत में  प्रसिद्द है  किन्तु दक्षिण के  लंका से जुड़े  प्रदेश में रावण का पुतला  जलाने  की  मान्यता में नहीं  आता  वहीं  पूर्वी पश्चिमी उत्तरभारत  में रावण दहन सामान्य  है।  ये तो मात्र  धार्मिक स्वतंत्रता की बात है  जो हिन्दू धर्म में  दिखती है।  कहने का उद्देश्य  मात्र इतना है  की  धार्मिक व्याख्या  जन्म  लिए बालक के समाजीकरण में विशेष भूमिका  निभाती है।  उसके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण पहलू धर्म की छत्रछाया के अधीन विकसित होता है  और फिर सामाजिक  वातावरण जो स्वयं धर्म से प्रभावित है।  और इसी कारण संसार का समूचा मुस्लिम समुदाय  आतंक से दुखी हो सकता है  ( वो भी जब स्वयं पे आघात हो ) अन्यथा सामूहिक रूप से   जीतने की और मुस्लिम साम्राज्य पुनः स्थापित करने की योजना से  उनका कोई  मतभेद नहीं।  और यही वजह है जनसख्या के विस्तार की , स्त्रियां माता से ज्यादा   मुस्लिम बच्चा प्रजनन का कारन है।  ये धार्मिक अनुमोदन ही है  की रिश्ते  कोई भी हो बहुविवाह और असंख्य  बालक के जन्म  धार्मिक परिभाषा में ही है।   वस्तुतः मारकाट भी  उनके प्रचलित  धर्म की  सीख है , ये अलग बात है  गिनी चुनी उन्नत आत्माए सूफी पंथ में आ जाती है।  अपने धार्मिक  स्वातंत्र्य स्वभाव के कारन ही  हिन्दू न तो संगठित  है न ही एकमत ।  ये धार्मिक  स्वतंत्रता  न मुस्लिम  में है न ही  क्रिस्टियन  में।  पर इतिहास  साक्षी है की  मौलिक रूप से  हिन्दू अपने स्वभाव से ही स्वयं के प्रति ईमानदार नहीं थे  न है  इसका खामियाजा भी  वे स्वयं ही सामूहिक रूप से भोगते ही रहे  है।  यदि आप इसका भी आंकलन करना चाहे  तो  इतिहास  से या फिर आज से आंकड़े  इकठा  करके  स्वयं भी सोच सकते है  की हिन्दू  का आपसी  सामाजिक धार्मिक  तानाबाना ,  व्यवसाय  के प्रति  अधकचरा समर्पण  और बाह्य  व्यावसायिक  गुणात्मक  सम्पूर्णता  के प्रति अत्यधिक आकर्षण  स्वयं की अर्धविकसित चेतना के प्रमाण है।  स्वक्छ भारत  अभियान  छोटी सी सकारात्मक राजनैतिक योजना है।  वस्तुतः  जो हमारी अपनी ही कई  व्यवहारिक खामियों को उजागर करती है।  आज भी विदेशीय व्यापर का स्वागत मात्र  इसलिए है की हम उस विकसित बिंदु तक जाके व्यापार का प्रदर्शन और अधिग्रहण नहीं कर पा रहे ( किसी भी कारन से > आध्यात्मिक सामाजिक  अथवा राजनैतिक या फिर  स्वयं की  अनुवांशिक  विकृतियों के कारन )  यहाँ अध्यात्म का महत्त्व इसीलिए है  क्यूंकि आध्यात्मिक विकसित दृष्टि समग्र होती है , दर्शन एक पक्षीय नहीं बल्कि  चौथा कोण  लिए है  जो पक्षरहित है  , समग्र है।

                       संक्षेप में  , इस वार्ता का उद्देश्य  न तो धार्मिक है  न ही राजनैतिक, हाँ !  इतिहास पे  दृष्टि डाल के मात्र  उस आध्यात्मिक  अविकसित  किन्तु  विकसित होते हुए चैतन्य महत्त्व को समझना है  जो समस्त सांसारिक  व्यापार से परे है  , इतना समझ के (जान के नहीं ) अनुभव करके  अब आपको  वजह नजर आएगी  की क्यों  सन्यासी  सांसारिक व्यापार से अलग हो जाते है , क्यों लेन और देन  सामूहिक रूप से व्यक्ति  देश  और समुदाय के लिए  महंगा सौदा साबित होता है।   क्यों  जबरदस्ती या इक्षा  से  मिले  उधार का मूल चुकाना तो असंभव है  सूद भी भारी होता जाता है । इक्षा में तो फिर योजना शामिल है  जबरदस्ती में तो कोई  परिस्थिति  हो  वो नियंत्रण से बाहर है ,  वापसी की तैयारी  के आभाव में  कोई  योजना भी काम नहीं आती,   पर कर्ज तो कर्ज है   और कर्ज तो  चुकाना ही पड़ेगा।

                        वार्ता  को जब एक योगी की दृष्टि देते है तो विवेचना आसान और दृष्टि विकसित  हो जाती है , फिर ये अस्वस्थ  प्रलाप न बनके , मात्र राजनैतिक धार्मिक बहस न बनके  एक विचारवान  समर्थ  बौद्धिक  भाव के रूप में  निकलती है।  उदाहरण के लिए  तीन सन्दर्भ उदाहरण में लेती हूँ , १-  मनोरंजक  सर्कस  चल रहा है , अंदर दो वर्ग बनते है  एक दर्शक में  और दूसरा  जो  प्रदर्शन करता है।  २-  मेरा सर्कस के दोनों वर्गों से भेद है , न मैं  दर्शक बनना चाहता हूँ न ही प्रदर्शनकारी किन्तु   मैं   अपने मस्तिष्क से  विरोध में होते हुए भी  उनके संपर्क में हूँ  इसलिए  मैं  सर्कस से  बाहर  खड़ा हुआ हूँ  और हर एक को नसीहत भी कर रहां हुँ  की सर्कस  में जाना  बैठना या  प्रदर्शन  दोनों ही घातक है।  ३-  एक और विकसित दृष्टि है  जिसमे  व्यक्ति न तो  तम्बू के अंदर है  न बाहर  बल्कि  ऊपर से  उन सभी  तीनो वर्गों को  खुली  छत  से यूँ   देख पा  रहा है  जैसे  विमान पे बैठा  यात्री  विशाल फैली राजनैतिक  सीमाओं  से परे  मात्र क्षितिज  की सीमा के अंदर   धरती को  देख   ये विकसित   यौगिक बौद्धिक दृष्टि  का  चौथा  कोण है।  योगी के लिए  संसार के सभी धर्म उनके पालनकर्ता , आलोचक वर्ग  उसी क्षेत्र  में आते है , और उसकी दृष्टि चौथा कोण  है।  और इनसबसे परे  वो पांचवां  शक्तिशाली केंद्र है  जो सब के योग का  कारण है।

                       योगी  जब मध्य में स्थिर होता है  तो ये दृष्टि  भी विकसित हो जाती है , वार्ना तो सामान्यतः  लेने में जो मजा है  वो सभी को आकर्षित करता है,किन्तु देने  का विचार आते ही  सोचते है , जब वो मौका आएगा  देखलेंगे !  पर ये भी सच है की  कभी  कभी ये मौका  स्वयं की परिस्थति  इक्षा और मौका  नहीं देखते, और फिर  बस ताउम्र  चुकाते रह जाओ  वो भी सिर्फ ब्याज।

                          एक सिद्ध योगी पूर्ण आंतरिक शक्ति  और संकल्प से  कहता है ' मध्य  में स्थिर हो जाओ ' हर परिस्थिति में  हर काल  में  हर युग में यही सत्य है। ध्यान की आध्यात्मिक शक्ति से अंदर का फाल  अपने ही केंद्र  को सौंप दो।  फिर विकसित दृष्टि से  संसार को पुनः देखो।  तो खुली किताब जैसा संसार  स्वयं को स्वयं के व्यवहार को पूर्ण नंगेपन के साथ अनावृत हो के   कहता , वैसे या भी  गलतफहमी ही  है की आध्यात्मिक कायर है, अजीब से  बात है , ध्यान से आध्यात्मिक जब सत्य को जानता है  तो उसका स्वयं का मूल गुण ( जो भी है  जैसा भी है )  बदलता नहीं  बल्कि स्नान से  स्वक्छ  हो के और निखरता है।   इसीलिए सन्यासी में भी क्रमिकता है ,अति  आक्रामक (लड़ाकू योद्धा )  भी है  और शांत सौम्य ( प्रेमी और  कारुणिक )  भी।  बस ये जान लीजिये  ध्यान में आप की  अपनी  मौलिक चेतना और स्पष्ट होती है।  यदि आप योद्धा है  तो संकल्प और प्रखर होता जाता है।  यदि आप  मौन प्रेमी है  शांत है  तो वो स्वाभाव और स्पष्ट होता जाएगा।  और हाँ  दोनों ही  स्वाभाविक स्थति में  सांसारिक  लेनदेन  से  वितृष्णा  पैदा होगी , मात्र ये  अति स्वाभाविक अज्ञान के ऊपर  बौद्धिक  चेतना की उपलब्धि है।  फिर  उस अवस्था में कृष्ण  का वक्तव्य भी  पीड़ारहित  और अधिक स्पष्ट होगा , "  कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

Saturday, 27 December 2014

Raise your consciousness: Anant sri

 Raise your consciousness through meditation and love, live in gratitude



Is there something like evil or dark forces and white forces ?



Anant Sri : yes, dark forces do exist, but there is no such thing as darkness, there are only different levels and frequencies of light. When light is at such level that it is not perceivable by our seeing faculties then we call it darkness. Dark or evil forces are those entities who are at very low level of light or they don't want to see light knowingly or unknowingly. They prefer to live in a world of illusions and fantasies
.
Life has many dimensions, known and unknown. You don't need to be superstitious but there are many hidden forces in life that can affect your life positively or negatively, so called dark forces can wreck a havoc and disorder in life. You attract hidden energies according to your similar patterns of energy. Dark or evil first takes place in your thoughts and emotions then it sets stage for hidden forces and entities to play.

It is fear and by products of fear as hate, rage, jealously, manipulation, greed,possessiveness, lust for power and control etc. that creates an opening for the dark forces to play and love is a great force that protects you from all evil and dark forces. Always remember that like attracts like. You attract what you are, so bring focus on yourself. Raise your consciousness through meditation and love, live in gratitude. Never condemn or hate evil or dark forces, instead, pray for their awakening, send vibes of love and awareness towards them, because it is lack of love and awareness that makes someone evil.


Rise in love and light and soon there will be no evil or dark around you.

Tuesday, 23 December 2014

और ऐसा पहले भी हो चुका है ! (विचार)

   ॐ 
प्रार्थना : 

सर्वे  भवन्तु  सुखिनः 
सर्वे सन्तु निरामया 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु 
मा 
कश्चिद्  दुःखभाग्भवेत् 

प्रथम उस ओम से  विश्व  अपने वास्तिविक  मौलिक  अस्तित्व से जुड़  के ही  द्वतिया  विश्व कल्याण को समर्पित  हो।  मौलिक अस्तित्व के जुड़ाव  के  आभाव में  वृत्तियाँ  आसानी से घेरती है। और सिर्फ घेरती नहीं कब्ज़ा भी जमा लेती है। नतीजा  दुष्ट शक्तियों का  तांडव जो वास्तव में किसी एक धर्म  या राजनीती की उपज नहीं  सिर्फ  उनके मात्र शक्तिशाली शरणस्थल है  , दुर्ग है , कवच है और हथियार भी , जहाँ से  और जिनके माध्यम से  वो रक्तपात को शक्ल  अपनी अक्ल और पराक्रम से   देते है , क्या आपको अभी भी समझ नहीं आया !!!!


जिसके नाम की आड़  में तुमने सैकड़ों  सर  कलम कर डाले 
 तमाशबीन हो छुप के बैठा, शहादत में "वो"  भी शामिल था 

 !! ओम !!


           रसंहार  और युद्ध  मनुष्य  के लिए नए नहीं , इतिहास , धर्मशास्त्र  कई कई बार  स्वयं को दोहरा चुका है  चूँकि  मैं इतिहासविज्ञ नहीं , दर्शनशास्त्री भी नहीं , विषयों से  मेरा कोई परिचय नहीं ,किन्तु सत्य अनावृत हो चूका है  , उस परमं  ने स्वयं अपना परिचय दिया है , जिसमे मेरा भी  बिंदु-अंश समाया हुआ है।  मुनियों ने  वो सब रहस्य दिए जो वो लिखना  और कहना चाहते थे  किन्तु स्याही में कुछ और ही  दिखा  जो दिखा  मस्तिष्क तक कुछ और गया , मस्तिष्क ने जो व्याख्या की वो  अलग ही हो गयी।

          मनुष्यता  को कई बार कई कई अर्थों में  जानने का अवसर आया , जिनमे  आयु , समाज परिस्थतियां  और  व्यक्ति  महत्वपूर्ण थे , और कुछ  जीवन की दिशा  भी इधर ही ले जा रही है।  इसलिए मात्र खटखटाने के लिए  जो भी  पढ़ना चाहे जानना चाहे  मंथन करना चाहे  स्वतंत्रता है , जैसे  मैंने अपनी स्वतंत्रता  को प्रमुख  पाया  आप सब भी अपने अपने अनुसार  सोचे  शायद यही जीवन गति  भी है !  मनुष्य का  युद्ध संहार  और वैमनस्य द्वेषा का इतिहास  रक्तरंजित है।   हथियार के विषय  में समझ  धीरे धीरे  आ रही है , की  सिर्फ आज के युग में  हम ही नहीं है  एकमात्र ज्ञाता और अर्थसंपन्न , विषय के ज्ञाता , शस्त्रों  के आधुनिक प्रयोग पहले भी थे , हर युग में थे।   वस्तुतः हर युग के अंत में समग्रता के साथ  विषय अपने चरम वैज्ञानिक  विकसित  अर्थों  पे थे।   चूँकि  इतिहास  इतिहास है , विज्ञानं नहीं ,  जैसे जैसे इतिहास  पुराना पड़ता है प्रमाण भी धूमिल होते जाते है  वैसे तो इतिहास अपने को बहुत कम सप्रमाण प्रस्तुत कर पाता  है , अनेक मात्र सामाजिक कथाएं  बन के रह जाती है  जो अत्यंत सीमित  समय को दर्शा पाती है   उदाहरण  के लिए तत्कालीन   सामाजिक कथाकार शेक्सपियर   प्रेमचंद  टैगोर   सरीखे   हीरे सदृश  साहित्यकार  भी  समय की चाल के साथ धुंधले पड़ने लगते है  , इनमे से भी कुछ जादू नगरी में वासित   कुछ अचरज से भरी शक्ति कथाओं के  नायक  और खलनायक  को दर्शाती  नायिका के सौंदर्य से भरी होती है,  इनमे से भी  नगण्य कथाएं  भगवन जैसे  पद को छू  पाती है , आप स्वयं  इनके  अस्तित्व की गहराई का अंदाजा  लगा सकते है ।

          किन्तु   सर्व स्पष्ट  जो आज जान पड़ा कि  मनुष्य की मनुष्यता  का इतिहास भी उतना ही विषैला है  जितना मनुष्य का मन काला  है । और उतना ही गहरा धार्मिक भी है  और उतना ही  आध्यात्मिक  भी।  कुछ नहीं बदला  सिवाय काल  चरित्र  "संज्ञा" के।  कुछ  कथाये  धर्म कथा में प्रवेश  पा चुकी है  , लोगो की आस्था  अति गहरी है जो बुद्धि से ऊपर  है  ह्रदय बंद पड़े है  सदियों से , सांसारिक  कर्त्तव्य पूरित भाव प्रदर्शन को ही प्रेम की संज्ञा मिल जाती है , और स्त्री परुष के दो शरीरों के प्राकृतिक सम्मिलन को अलौकिक प्रेम  की उपाधि  ।

          मनुष्यता का कोई भी काल  राम  का काल  या कृष्ण का  काल  कहें  अथवा  कलियुग ; मनुष्य  जीवन  ऐसे ही युद्धों से भरा पड़ा है  जहाँ राम  १४  वर्ष की आयु से युद्ध  कौशल में प्रवेश करते है  और ताजीवन  युद्ध ही करते रहे।   अनेक सक्षम हथियारो  और कभी  अकेले और कभी  सेना बल  के साथ।  कृष्णा का काल  भी उनके  गर्भ में आने के साथ ही युद्ध  विष से भरा था , जहाँ वो तथाकथित  दानव  और देवों के मध्य युद्ध करके संतुलन ही लाते रहे। . उन्ही के जीवन काल  में  महाभारत जैसी  शर्मनाक यौद्धिक घटना  भी घटी , जिसने सारे सामाजिक मापदंडो की धज्जियाँ  उड़ा दी।


           और फिर आज भी आधुनिक  भारत का  हर दिन , हर मास , हर वर्ष खून से रंगा ही तो है , नर संहार की घटनाएं  आज भी इसी मनुष्यता का अंग है , क्या बदला है ? कुछ नहीं ? धर्म की वास्तविक स्थापना कब हुई ? कभी नहीं।  धर्म भी सत्ता का ही खेल  बन गया  या कहे एक अलग प्रभुत्वसम्पन्न  शक्ति धर्म कहलायी , जिसमे  सैकड़ो नासमझ  मनुष्यों की आस्था की होली खेली जाती है , कुछ गिने चुने प्रभावशाली व्यक्तियों के द्वारा , तो राजनीती भी यही है ,  मुठी भर लोग  निर्णय करते है , युद्ध का  और हजारों गर्दन  जमीन पे गिरी नजर आती है।

         जैसे श्री राम काल  में  राजा रावण का निर्णय था की समस्त  प्रजा  अपना संहार युद्ध भूमि में राम के हाथों कराएगी  वैसे ही  हर काल  देश और परिस्थति में  यदि राजतंत्र है तो  उस देश का राजा  अथवा  लोकतंत्र है तो  प्रधान मंत्री की गद्दी पे बैठा प्रधान सेवक  ही  निर्णायक होता है  अपनी प्रजा के जीवन का  कब कहाँ  और कैसे  सीमा पे या फिर सीमाओं के अंदर  उपयोग में लाना है ।  कृष्णकाल में कृष्ण स्वयं  समस्त जीवन  यही संतुलन करते रहे  जब राजा नहीं थे  और जब राजा बने  , अंत में  उन्ही के  वंशज  यदुवंशी   स्वयं ही जलन और क्रोध में सामूहिक संहार भीषण रक्तपात  का कारन बने , ये तो मात्र  उतना है  जितना इतिहास या धर्म शास्त्रो से पता चल पाया , धार्मिक  कथाओं के संकलन से  परे वास्तविकता  और भी कठिन विशाल  दुखद  तथा भयावह  हो सकती है.

         मोहन जोदड़ो  की खुदाई में  पाया गया , नरकंकाल सड़को में  गिरे  पड़े थे , कोई तो हाथ भी पकडे थे  कोई समूह में थे  तो कोई अकेले , अवश्य  भयंकर नरसंहार का दृश्य है , प्राकृतिक आपदा का नहीं  ये चित्र   मोहनजोदड़ो  की खुदाई का है , कुछ  द्वेष , कुछ शक्ति प्रदर्शन अवश्य हुआ है , जिसने  उस समाज को समूल उखड दिया।



ऐसा ही इतिहास साक्षी है  आयरलैंड , स्कॉटलैंड  फ़्रांस और तुर्की  आदि  भी युद्ध नरसंहार से जूझ  चुके है

         वैदिक काल से  नरसंहार के  इतिहास में जो आज भी मुखर है ( इतिहास संकलन  के कारन ) , चाणक्य  का  काल  नंदवंश का समाप्य , ये साधारण नहीं असाधारण रूप से  रक्तपात से भरा है  जिसमे उल्लेखित नाम  गिनती के है शव की संख्या  अनगिनत है , ऐसा ही  रक्तपात से भरा मुग़ल काल, सिर्फ मुग़ल अपने ही अंदर की पारिवारिक   मारकाट में नहीं  वरन  बाह्य युद्ध कौशल  में भी पारंगत थे ,  युद्ध की विजयगाथा  बच्चो का खेल नहीं , मनुष्यों के शवो की समयपर्यन्त  यात्रा है।   यूँ तो  मनुष्य का वास जहाँ भी हुआ  ये नरसंहार  होते ही रहे किन्तु  भाव ग्राह्यता  के लिए अपने ही देश की देखें संसार की छोड़ें  , नजदीक  की समझ  आसानी  से होती है , मुग़लों का  और  अंग्रेंजो का काल  कहना ही पर्याप्त होता है , उसके  दृश्य से  वेदना  स्पष्ट हो जाती है  जिन्होंने जिया होगा  उनका भाव चित्रण की गंभीरता  शब्दों  में संभव नहीं , हाँ ! यदि आप अत्यधिक  संवेदनशील है  तो उस काल में ध्यान द्वारा जा के  अनुभव कर सकते है ,  देशविभाजन के सामूहिक नरसंहार और रक्तपात आज भी याद करके आज भी जीवन की  असहाय पीड़ा  लाचारी  और जीवन की  शवों में  परिणीति  करुणा बन उभर आती है। 


       मनुष्य  संहार युद्ध   ये सब  जुड़े है  अदम्य  लालच  शक्ति  प्रदर्शन  और  आध्यात्मिकता के आभाव से आजादी के बाद भी युद्ध  का इतिहास थमा नहीं, अनेक  कारन  और समाप्ति युद्ध  और नरसंहार , आज कल के नरसंहार को तो इतिहास के प्रमाण की जरुरत नहीं , सीमाओं पे  , देश में  , धर्म जाति   यहाँ तक अध्यात्म के नाम पे  जारी नरसंहार  सब आँखों के आगे ही है।
        इसमें आध्यात्मिकता खोज  अपने गंतव्य पे  चल के  उस परम बिंदु को चुना , और वह से पुनः पलट के मनुष्य को और उसकी सोच कार्यप्रणाली को  देखना ,  अट्टहास  देता है।  " महाभारत  " अति गहरा  शब्द है , अस्थायुक्त है , विचारवान है !  संवेदनशील भी है  ! आंतरिक और बाह्य  दोनों जगत की बेचैनी  को समेटे हुए है। बहुत चर्चा हुई , समय समाप्त हुआ , अब  ध्यान ही मात्र  उपाय है।

             यहाँ  ये लेख लिखने का  आशय आपका ह्रदय द्वार खटखटाना है   मात्र , इतना  कहना है की , धर्म या राजनीती तो मात्र  दैत्यों के शरणस्थल है  जहाँ से  प्रभुतासम्पन्न  होके  ये  अत्यधिक बलशाली धनसम्पन्न होके  नरसंहार कुशलता  से कर पाते है  ,  वस्तुतः  चूँकि सफल नरसंहार  अथवा शासन को   युद्ध बल  छल  धन  और  मारकाट सभी की आवश्यकता है , जो मात्र  राजनैतिक और धार्मिक  आधार  पा के ये अधिक क्रियाशील होते है।  इसमें शुद्ध धर्म दोषी नहीं  इसमें शुद्ध राजनीती दोशी  नहीं , इनमे लिप्त  मानसिक्  लिप्सा  अतृप्त  इक्षाए ही दोषी है  और जिनसे  बचना असंभव है। इसको काजल की कोठरी भी कहा गया है , कितना भी  उन्नत  आध्यात्मिक  शक्तिसम्पन्न संत पुरुष इनमे ( धर्म और राजनीती ) प्रवेश करे   यदि स्वयं को  रक्तपात से और छल से अलग भी  रख्हे   पर  समूह  युद्ध में रक्त के छींटे  पड़ते ही है  कभी खुद के अस्तित्व की रक्षा के लिए  तो कभी , युद्ध, नरसंहार , धर्म  अधर्म  तथा राजनीती से परे हर  जीव  साम्राज्य  और बल के  विस्तार के लिए की योजना  की सहमति  के लिए  ,. ( क्यूंकि   सभी  एक जैसे एक  समान  आध्यात्मिक अथवा  निश्चित एक ही  विषय  के प्रेमी  नहीं  हो सकते  , कारण , व्यक्तिगत  कार्मिक   आध्यात्मिक  यात्रा अलग अलग  और अत्यंत निजी है   , समाज  और  देश   निर्माण  हर गति  और मति  संयोग  से  हो पाता है , भी  सच  है , सब यूँ  ही  चलेगा  इन्द्रधनुष  जैसे  सातों  रंग  समेटे   फिर भी   प्रार्थना  है  दुआ  है की अधिकतर मानव जाति   के विकास  में शामिल  हो , आध्यात्मिक  हो , ताकि  मनुष्य  समेत  समस्त  जीव जगत   कल्याण  हो  )

            किन्तु  इन सबसे अलग हर  जन्मित जीव की अपनी  एक  अध्यात्म  की निजी यात्रा  भी है और एक जन्म का  महत्वपूर्ण उद्देश्य है  जिसका  पता अक्सर  अंतिम आखिरी  श्वांस के बहुमूल्य  क्षण में ही जान  पड़ता है , वर्ना , मनुष्य मनुष्यता राजनीती समाज  रिश्ते नाते संघर्ष  सोचने का अवसर ही नहीं देते , और जब अवसर जान पड़ता है  तो देर हो चुकी होती है , मनुष्य अपने भरम के कारन ही बहुत कुछ खो चूका है , खोता ही जा रहा है। .  धर्म  का स्वरुप भ्रामक है , राजनीती  में दबदबा है ,  अध्यात्म  स्वचेतना सेजोड़ता है।आप स्वयं निश्चय कीजिये।   अपने दीपक स्वयं बनिए ,   सिद्धार्थ को मात्र चार  आर्य सत्यों ने बुद्ध बना दिया। । ये सत्य ही तो है जो स्वयं से जोड़ते है।  माया तो  परदे डालती है ,  न मिलने वाली मृगतृष्णा भी  जागाती है , मृग सदृश जीव   कुछ ऐसा पाने के लिए  भटकता हुआ प्राण त्याग देता है जो मिल ही नहीं सकता  ।

            एक दो  विकसित चेतना  के आध्यात्मिक व्यक्ति गुरु का पद  ही संभल सकते है , किन्तु जागृत विकसित आध्यात्मिक जन समुदाय , समाज में नवचेतना का संचार कर सकते है। ये भी कल्पना ही है कि  यदि समस्त  संसार आध्यात्मिक  राह को  बढ़ चले  तो सुन्दर संसार  की कल्पना भी मात्र  कल्पना नहीं  रह जाएगी   यहीं की यहीं   साकार  हो सुन्दर जीवन  होगी ।   फिलहाल ;  मूर्खतापूर्ण  धार्मिक  राजनैतिक विवादों में उलझी चेतना , बैलों के सामान है , जिसको   गाडी  से  बाँध गाडी को  मनचाही  दिशा में कुछ मुठी भर चालक हांके  लिए जा रहे है।  और शक्तिशाली  बैल की मूक  आँखो से अश्रु भी बह रहे है , पर निरर्थक। क्यूंकि वो अपने तथाकथित  आकाओ  से वचनबद्ध है और सेवायुक्त है । और उसके आका  उसको दो वख्त के खाने का भरोसा और सुरक्षा  का वचन देते है।

सोचिये ! 
विचारिये ! 
ध्यान कीजिये  ! 
अध्यात्म से जुड़िये  ! 
अपनी स्वचेतना से जुड़िये ! 
फिर अपने स्वकेंद्र से जुड़िये ! 
इसके बाद ही अपने कर्त्तव्य और स्वधर्म  की चर्चा कीजिये , पहले नहीं !

         उसके पहले की समस्त चर्चा  मात्र संगठन की चर्चा होगी  संगठन के निमित्त  स्वार्थ से भरी  तर्क की धरती की  होगी , जो सांसारिकता  से भरी होगी , सत्य का अंश मात्र भी प्रकाश नहीं होगा।   चाहे आप पूर्ण बौद्धिक शक्ति से   चर्चा करें  , उचित  निर्णय तक भी आना चाहे  , फिर भी वो भी आध्यात्मिकता के आभाव में  अप्रासंगिक हो जायेगा।  फिर वो कितना भी शुद्ध सांसारिक कोई भी धर्म क्यों न हो। कोई भी मतलब  कोई भी।  हर माँनुष जनित धर्म सांसारिक ही है। जो  मस्तिष्क से   अपंग  लोगो द्वारा  जाना  और माना  जाता है ,  जिसकी बुनियाद ही भय है  और लालच है।  आश्चर्य है इस  छूत की बीमारी का पता भी  ध्यान अवस्था में ही होने लगता है की वास्तविक  धर्म सांसारिक नहीं  आध्यात्मिक ही है।  अध्यात्म   से  एक्लै हुई चेतना   मंगल ही सोचती है मंगल ही करती है।  जब की सांसारिक धर्म की बुनियाद ही  स्वार्थ पद सम्मान  सम्पदा  से जुड़ती है।  आप स्वयं सोचिये स्वयं विचार कीजिये।   अध्यात्म स्वयं में शक्तिशाली है , जो अखंड शक्ति का सृजनकर्ता भी है।

ओम





Sunday, 21 December 2014

व्यक्तिगत धर्म- * देह-धर्म , * आत्म-धर्म




अति गूढ़ और अति सरल  व्यक्तिगत धर्म सार्वभौमिक और  सर्वोपरि  है  यदि इस धर्म को  जाने  तो इस व्यक्तिगत धर्म  को इन दो मुख्य  रूप से  देखा जा सकता है  * देह-धर्म ,  * आत्म-धर्म ,  वस्तुतः  मुख्य धर्म वैसे ही एक है   जैसे प्रेम धर्म शब्द अपने विस्तृत और सूत्र रूप में मौलिक अर्थ  में  एक ही है।   परन्तु इसको जीने के दौरान  अनेक मस्तिष्क से संपर्कऔर  सम्बन्ध होने के कारन  , इनमे  विस्तार और अधिक तथा व्याख्यायात्मक अर्थ  गहरे होने लगते है,  जितना  अर्थ  समझने में  मस्तिष्क उलझता जाता  है , जलकुम्भी के फैले  जाल  समान उसका घने  जाल से  बाहर निकल सांस  लेना असंभव प्रतीत होता जाता  है।

मात्र स्वध्यान  ही सहयोगी है , पठन पाठन ,  विवेचना , समझने  और समझाने  की चेष्टा  व्यर्थ  होती जाती है।

इस स्वध्यान  में जब ह्रदय  की गहराई से  उतरे  तो पहली बार  दृष्टि  स्वयं की ओर  घुमी , वर्ना तो  दूसरों के लिए औचित्य और अनुचित ही निर्धारित करने में समय बीता रहे थे।   तो जाना  धर्म  की सबसे बड़ी उपलब्धि है स्वयं को संतुलित करना , स्वयं के संतुलित होते ही  संसार संतुलन में आने लगता है , फिर  समुद्र के  स्वभाव को समझना  ज्वार  भाटा  को देखना  सहज और सरल हो जाता है।  वर्ना  खुद  ही असंतुलित से पहले ही  ढेर हो जायेंगे। स्वाध्यान के  इस प्रयास में योग  और ध्यान , मनन और चिंतन  , बहुत बड़े   लगते  है  शास्त्रों की नाव बना  पार करना  तो  कागज की नाव पे बैठना है  जो पहले अधकचरे ज्ञान के कारन  गल जाएगी ,  और अनुभवहीनता की स्थति में  व्यक्ति पानी में  गिरा ही हुआ  सा होगा।

मात्र  केंद्रीकरण  एक मात्र उपाय ,  संसार की और से उलट  दृष्टि घुमा  संसार को साक्षी भाव  से देखना  जानना तब  मानना  ही आगे के दृष्टिकोण को  विस्तार  देता है।   तब  एक ही धर्म का उदय होता है  , स्वचेतना का विकास , स्वशक्ति का आविर्भाव , और स्व की  शक्ति  से साक्षात्कार , स्व प्रेम  के द्वारा   व्यव्हार का दर्शन , अद्भुत है , आश्चर्यपरिणामकारी है। लौकिक- स्वार्थरहित  स्वप्रेम  वो शक्ति  है  जो आत्मचेतना का प्रादुर्भाव करती है , प्रकृति से जोड़ती है।  सभी और स्व  एक ही नजर आते है  अपना अपना भोग  भोगते हुए , बिना मनुष्य के प्रयास के , वो  प्रारब्ध से  नियत  है।  किन्तु मनुष्य मस्तिष्क के जुड़ते ही  ये प्रारब्ध कर्म में बदल भाग्यफलदायी होने लगता है।  फिर प्रारब्ध का पुनः संचय  होने लगता है।  और यही  मनुष्य मन अपने ही फैलाये जाल में  अपने ही जन्म दिए कर्म जाल को ईश्वर को समर्पित करता और पुनः पुनः उलझता जाता है। और अज्ञान  एक क्षण ऐसा भी आता है  जब  एक एक सांस  के अंतराल में जो भी कर्म घटते है  वो सब उसको उसी प्रभु की इक्षा समझ आते है , जबकि  अधिकांश  स्वयं की  उस शांत झील में  फेंके गए कंकड़ से उत्पन्न लहरों के समान ही होते है।  पर इसका आभास  भी सहज नहीं , मात्र  साक्षीभाव से ही संभव है।

यही  साक्षित्व  सहज सुलभ करता  है व्यक्तिगत धर्म ,  व्यक्तिगत धर्म पुनः  दो धाराओं  में स्पष्ट  विभाजित है   पहला धरती से   उत्पन्न तत्वों  का देह धर्म  और दूसरा  आत्म उत्तान केंद्र  से जुड़ा  आत्मधर्म  , दोनों ही पालनीय  है , अनुसरणीय  है , जिस प्रकार  देह और ऊर्जा मिल के  जीवन बनता है  वैसे  ही   देह धर्म  और आत्म धर्म  का संतुलित  व्यवहार  सद्गति  का सूचक है।  कोई भी एक छोड़नें  जैसा नहीं  वर्ना दूसरा  भी अपूर्ण ही रह जायेगा।  दोनों  का  सुखद  मिलन बनता है  व्यक्तिगत  धर्म।

देह-धर्म  के अंतर्गत  अलिप्त अवस्था  में  समस्त  सम्बन्धो  के पालन का दायित्व है।  जो अति दुष्कर भी लगता है , अलिप्त भी और प्रेम युक्त संलग्न भी।  पर संभव है  और अत्यंत सुखद परिणाम दाई है , क्यूंकि ये  धर्म महत्वाकांशी नहीं  , सहज  है।  ये  निर्णयात्मक नहीं  , स्वीकार से भरा है।   और  प्राकर्तिक तादात्म्य के कारण ही   दोनों ही  तरफ ( बाह्य  और आंतरिक ) को उन्मुख  किन्तु  मध्य में  स्थति  करुणायुक्त है।

चूँकि साक्षी को ज्ञात है , की उसका वास्तविक धर्म आत्म-उन्मुख   है  अतः  देह धर्म   उसे (जीव ) बांधता  नहीं। वो स्वतंत्र भाव से  अपने आत्म धर्म के प्रति सजग  रह सकता है।   क्या आपको पता है , इसके लिए  तीन ही शब्द है  जो मूल मंत्र  है  , "सहजता , सरलता  और सतर्कता " ।

पर  ये भी मध्य की  स्थति है  जब  जीव दोनों धर्म का पालना  सरलता पूर्वक कर लेता है।  मन की  और बुद्धि की लहरो को  काटने के बाद , शरीर  के संस्कारगत  , जन्मगत  , शिक्षागत और समाजगत विषपान के  प्रभाव को निष्काम  करने के बाद  ,   समस्त बाह्योन्मुख  उम्मीदों से भरे  धर्म विषयुक्त  है इनका आभास भी  तभी  हो पाता है  जब  उसका  विष  और बाह्य  से प्राप्त विष  अपना प्रभाव दिखाने लगते है।

तभी समझ आता है  आत्मस्वस्थ्य  आत्मप्रेम  का महत्त्व अधिक है  , विष और अमृत  के संतुलन का प्रश्न जन्म लेता है।  जो साधा भी जाता है ,  अपने ही सातों चक्रों के संतुलन के  द्वारा , स्वयं को संतुलित करते ही करते   दृष्टि भी  आंतरिक होती है , साक्षी भी जगता है।  और अपना ही  जन्म का उद्देश्य भी स्पष्ट  होता है।

(चक्रों  के बारे में अधिक पढ़ने के लिए  इसी  ब्लॉग में  विवेचना  है )

व्यक्तिगत धर्म से  जागरूक हुआ  जीव   संसार धर्म का भी पालन  उतनी सुंदरता से कर पाता है  ( वस्तुतः माया के प्रभाव का  कहना कठिन है किसी भी समय भ्रम उपज सकता है  परन्तु यहाँ जो भी कहा  गया है  वो सहज और संतुलित  जागृत  के लिए , संभवतः माया के लिए  छाया डालना  जरा कठिन है )  ऐसा व्यक्ति सामाजिक  धर्म से ऊपर होता है , संभवतः प्रेम धर्म के महत्त्व को समझता  है।  जीव  के  जन्म का प्रयोजन समझता है।   संहार के लिए  वो  नहीं  ये भी समझता है क्यूंकि वो जन्मदाता नहीं  माध्यम है  जीवन को आगे बढाने का , वो आत्मबल युक्त शक्तिशाली तो है  किन्तु  दमनकारी नहीं  हो सकता।

व्यक्तिगत धर्म से  उत्पन्न हुआ  बौद्धिक विकास समस्त जीव जगत के लिए कल्याणकारी ही है।   वो ही ऋषि है  , वो ही गुरु  है  स्वयं का और फिर सभी का ( जो भी चाहे ) पर  ये व्यक्तिगत धर्म साधने की आवश्यकता समस्त मनष्यों को है।   क्यूंकि  ये  धर्म  बहुत  निजी है। बिलकुल वैसे ही  जैसे क्षुधा लगने पे  स्वयं ही ग्रहण किया भोजन।  

दूसरे की क्षुधा  और मेरे दवरा  उसकी भूख के अनुसार  आवश्यकता  से अधिक ग्रहण किया  भोजन अपच करता है , ठीक वैसे ही  मेरी क्षुधा गहरी हो और दूसरे का आवश्यकता से  अधिक ग्रहण  भोजन  मुझे कमजोर ही करता है ।

वैसे तो  विषय इतना गहरा है की जितना भी लिखो कम  है किन्तु  यहाँ लिखने से भी ज्यादा  महत्त्व  स्वानुभूति का है।  स्वानुभूति के समक्ष शब्द  और व्याख्या के विस्तार का महत्त्व  है ही नहीं , यदि  कम से कम शब्दों का उपयोग किया भी गया  तो मात्र  सांकल  खटखटाने के लिए।


सबका कल्याण  सबके जीवन यात्रा के लिये मंगलकामना के साथ

प्रणाम







Saturday, 20 December 2014

A Letter to Soul to Soul ( religion of terror )


Om

To ,

Dear Kind Shine Soul , 

Cos ; you are restricted in body , in limits of everything , besides of restrictions you are busy to spread love is everywhere in the form of meditation and in the form of reiki , your wisdom can not be restricted to only area or one nationality , you are above of nationality ... you know ! as they bloodsuckers are , they have no any nationality , no any religion other than Terror , they do not even know the kind of love is your part of life . their love only towards terror so that they involve only to give birth of another terror-tale ,the only reason they use womanhood for by hook or by crook or they give them death penalty , their love is only Bombs and Human - Blood in this hunger / thirst ; relation , age and sex is no criteria . ( its shame part of them but it is comes under their growing terror populations ), they are so smart , they know real religion can not accept them so they they create own forceful religion Under Jehadi-tale , they take those all tips from Religion .. like they allow religiously many marriages with no restriction of any cast or any relation , they appreciated by their group for uncounted birth-rate , this law is exist only in " Islam culture " and old Islamic-Grass-roots In those areas . , this is also surprising they find most adoption from Islam (!) with the declaration One day they will get all their Ancestor,s lost sovereignty from entire world ... ( thinking what goes if oldest religion of world starts to ask about their existence ! cos Muslim growth is in middle of Era ). means, their declared-mission is big n bloody , with all Islamic religious laws which in Favors of them ...

( just for  reference  want to add muslim growth history pic , with the word  Nature and time need  growth   for change and developments .. with acceptance of present developments .. as we can not get back  Vadic Indian Golden Age , we can not make  India  as 100 % Hindu Oriented  Kingdom , these thoughts  are artificial and  propagated  by political minds .. but yes we can do  best at  our own limit  we can  adopt all goodness of our  culture  and leave mud , this is development ...  as  every  big mind  think  on same  pattern  for example ;   Sidharth  was much before from  Jesus  but his preaching adopted  by Jesus... because they were up from sattled  mental mud of Society ...  they visited in those area Including  India and Other places  to adoppet  and to give encouragments to take good from all religions ... he was  flexible  though basically  he was Jews and  In The Qurʼan mentions the names of numerous figures considered prophets in Islam, including  Adam,  Noah,  Abraham,  Moses  and  Jesus , among others ... Muslims believe that God finally sent Muhammad as the last prophet (Seal of the Prophets) to convey the divine message to the whole world (to sum up and to finalize the word of God). In Islam, the "normative" example of Muhammad's life is called the Sunnah (literally "trodden path"). now see the pic below with wise thoughts :-




Readers  may find  here clearly the whole span of growth and developments  of Muslim Religion till today  , it is not Islamic Tale  every religion have own history growth and  downing , but  here is something  Satire  which is not in another  religion practically , i am not saying  about  what real  dharma is saying , cos real dharma is  not squeezed and narrowing from any one casts-ism   it is much bigger  and most is  same  in base  of every religion -  

.( O'  , one thing is  noticeable ; Touch-wood there is nothing to learn to terrorists  from the christians which are sub-root of Jews as muslim itself are ,next the hindus and  sub-root of hindus the budhha and jain or sikhh religion and the other religion .. Cos they have option of long-spreadsheet to learn from any religion but they pic points only from Islam !! this is separate issue "few" sensitive muslims starts to say those terrorists are not real muslims... but when ! at-least good to all ; with this one thing get more good if those sensitive and good hearts may check religious loopholes from where these tendencies are getting strength to grow ) with their tendency to win wars and grow population only with no respect of human being and no relation or effort regarding Social , Individual and Science developments , basically ; they are parasite and user of all developments and economics given by you to humanity by your kind sacrifices in past .

Dear Soul , they are true heartless and mentally challenged tuned puppet , can say mechanical clone . So what ! you have another heights of love and lives . though there is no comparison.... true ! but wisdom should be there , while thinking wise . Come out from any nationality any area any religion and get unite ( is it dream , for you ! ), though you are more powerful, get collect unitedly as whole universe is you only , not divided here n there . 


Do you know history what says ! divided get weaker , and United get stronger ... that time in History when Chankya unite the small divided areas and its converted into Big Unbroken Area .. 

In the little more broader spectrum entire souls are divided in to two groups on Earth .. here is , * one based on religion of love and * other is based on religion of terror . its wide earthy division of religion among devil and deity as on today also applicable ... but hard luck is this soft love religion is further divided upon other pieces of religion .. so that Love  appears weaker ... 

Unity of love magnet pieces .... " Only solution " against them ... as i am thinking !


Under One Mission to spread awareness  to spread  One love for Abundance  Peace  and Development , Are you able to collect world-over unitedly ! though you are late in application  but  not out of time ....... are you able to contribute  where  few enlightened  were and are involve aggressively ... to show light in dark

benefits of love message ! appreciation of love living !and with  the purpose of life !



Namaste 

बुद्धि की जिज्ञासा है जानना: कैसे ! कब ! क्यों ! - ओशो






जो भी हम जानते हैं, जिन दीयों से
भी हमारा परिचय है, वे सभी तेल से जलते हैं; उन
सभी में बाती की जरूरत है। अकारण
हमारी जानकारी में कुछ भी नहीं है। आग
जलेगी तो ईंधन होगा। आदमी चलेगा तो भोजन
जरूरी है। भोजन ईंधन है।
जो भी हम जानते हैं, जो भी हमारा ज्ञान है, वह
सभी कारण से बंधा है।

यह सूत्र ऐसे तो सरल है, कि उस अगम-अगोचर
का जो दीया है, परमात्मा की जो ज्योति है,
वह बिना तेल, बिना बाती के जल रही है। पर
कठिन बहुत है; क्योंकि हमारी कोई पहचान ऐसे
किसी स्रोत से नहीं।

हमारी जानकारी तो उन्हीं वृक्षों से है,
जो बीज से पैदा होते हैं। निर्बीज, अबीज वृक्ष से
हमारा कोई परिचय नहीं। इसलिये कठिन है, लेकिन
थोड़ा समझने की कोशिश करें। कुछ उपाय अलग-अलग
आयाम से समझने में सहयोगी होंगे।

बुद्धि से समझने से यह बात कभी भी न
आयेगी क्योंकि बुद्धि कारण को समझती है, अकारण
को नहीं। लेकिन बुद्धि से गहरे में छिपा हुआ एक और
स्रोत भी है। हृदय अकारण को ही समझता है, कारण
को नहीं।

जिन्होंने यह कहा है: ‘दीया बले अगम का बिन
बाती बिन तेल’, उन्होंने कोई सिद्धांत
प्रतिपादित नहीं किया है। वे किसी विचार
की सरणी को उपस्थित नहीं कर रहे हैं। ऐसा उन्होंने
देखा। वे उस दीये के आमने-सामने पड़ गये, जहां न
बाती थी, न तेल था। ऐसा उन्होंने अनुभव किया,
ऐसा उन्होंने जाना।

और यह दीया अगर अलग होता जानने वाले से,
तो शायद भूल-चूक भी हो जाती। शायद तेल
छिपा हो, शायद बाती इस ढंग से
बनी हो कि दिखाई नहीं पड़ती, लेकिन जिन्होंने
जाना उन्होंने जाना कि वे स्वयं ही वह दीया हैं;
उन्होंने अपने भीतर ही उस ज्योति को जलते देखा।
भूल-चूक की कोई गुंजाइश न थी। उन्होंने स्वयं
को ही पाया कि अकारण हैं।

जीवन का न कोई उदगम है, न कोई अंत।
न जीवन का कोई स्रोत है, न कोई समाप्ति।
न तो जीवन का कोई प्रारंभ है, और न कोई
पूर्णाहुति।

बस, जीवन चलता ही चला जाता है।
ऐसी जिनकी प्रतीति हुई, उन्होंने यह सूत्र
दिया है। यह सूत्र सार है बाइबिल, कुरान,
उपनिषद–सभी का; क्योंकि वे सभी इसी दीये
की बात कर रहे हैं।

पहली बात: जिस जगत को हम जानते हैं, विज्ञान
जिस जगत को पहचानता है, तर्क और
बुद्धि जिसकी खोज करती है, उस जगत में
भी थोड़ा गहरे उतरने पर पता चलता है
कि वहां भी दीया बिना बाती और बिना तेल
का ही जल रहा है।

वैज्ञानिक कहते हैं, कैसे हुआ कारण इस जगत का, कुछ
कहा नहीं जा सकता। और कैसे इसका अंत होगा, यह
सोचना भी असंभव है। क्योंकि जो है, वह कैसे
मिटेगा? एक रेत का छोटा-सा कण भी नष्ट
नहीं किया जा सकता। हम पीट सकते हैं, हम
जला सकते हैं, लेकिन राख बचेगी। बिलकुल समाप्त
करना असंभव है। रेत के छोटे से कण को भी शून्य में प्रवेश
करवा देना असंभव है–रहेगा; रूप बदलेगा, ढंग बदलेगा,
मिटेगा नहीं।

जब एक रेत का अणु भी मिटता नहीं, यह
पूरा विराट कैसे शून्य हो जायेगा?
इसकी समाप्ति कैसे हो सकती है? अकल्पनीय है!
इसका अंत सोचा नहीं जा सकता;
हो भी नहीं सकता।

इसलिये विज्ञान एक सिद्धांत को स्वीकार कर
लिया है, कि शक्ति अविनाशी है। पर
यही तो धर्म कहते हैं कि परमात्मा अविनाशी है।
नाम का ही फर्क है। विज्ञान कहता है,
प्रकृति अविनाशी है। पदार्थ का विनाश
नहीं हो सकता। हम रूप बदल सकते हैं, हम आकृति बदल
सकते हैं, लेकिन वह जो आकृति में छिपा है निराकार,
वह जो रूप में छिपा है अरूप, वह जो ऊर्जा है जीवन
की, वह रहेगी।

और अगर अंत नहीं है, तो प्रारंभ नहीं हो सकता।
जिस डंडे का एक छोर न हो, उसका दूसरा छोर
भी नहीं हो सकता। क्योंकि अगर हम
यही नहीं सोच सकते कि जगत कैसे समाप्त होगा,
तो हम यह कैसे सोच सकते हैं कि कैसे शुरू हुआ? अगर रेत
का एक कण शून्य में नहीं जा सकता, तो शून्य से रेत
का कण कैसे आ सकता है?

दोनों ही बातें एक ही हैं, एक जैसी हैं। अगर जगत शून्य
से पैदा हो तो जगत शून्य में खो सकता है। अगर जगत
शून्य में नहीं खो सकता तो शून्य से पैदा भी नहीं हुआ।
इसका अर्थ हुआ कि जगत सदा था। अस्तित्व सदा-
सदा था और सदा-सदा रहेगा। इसका कोई उदगम
नहीं है।

जिस ऊर्जा का कोई उदगम न हो, वह अकारण है।
जिस ऊर्जा का कोई अंत न हो, वह अकारण है।
क्योंकि जब भी कारण हो तो अंत हो सकता है।
अगर आप भोजन के कारण जी रहे हैं–भोजन बंद,
आपकी मृत्यु हो जायेगी। अगर श्वास के कारण जी रहे
हैं–श्वास टूटी, आप समाप्त हुए। अगर सूरज
की रोशनी के कारण जी रहे हैं–सूरज बुझा, आप बुझे।
अगर कारण है तो कारण हटाया जा सकता है।
सिर्फ उसका ही अंत नहीं होगा, जिसका कोई
कारण न हो। तर्क भी, विचार भी, इतना तो समझ
ही पा सकता है कि इस जीवन
की लीला का कोई प्रारंभ नहीं।

लेकिन बुद्धि चकराती है। क्योंकि तब और उलझनें उठ
आती हैं। अगर इसका कोई प्रारंभ न हो, अगर
इसका कोई अंत न हो, अगर यह अंतहीन शृंखला है,
तो फिर इसका प्रयोजन क्या होगा? फिर
इसका अर्थ क्या है? फिर सारी बात अर्थहीन
हो जाती है; फिर इसका कोई प्रयोजन नहीं रह
जाता।

और बुद्धि को यह मानना कठिन होता है कि कुछ है
और उसका प्रयोजन नहीं। क्योंकि बुद्धि व्यवसाय है।
प्रयोजन हो तो बुद्धि फैलती है। कुछ पाने
को हो तो बुद्धि कुछ करती है, कुछ कर सकती है। अगर
कुछ पाने को नहीं, कोई अंत नहीं, यह अंतहीन
शृंखला चलती ही रहेगी। तुम क्या करते हो, इससे
कोई फर्क न पड़ेगा। तुम्हारा कृत्य कोई अंतर न
लायेगा। तुम्हारा कृत्य स्वप्न जैसा है।

एक सूफी फकीर जुन्नैद ने कहा है, कि बुद्धि के सारे
कृत्य ऐसे हैं, जैसा एक मच्छर लोहे के हाथी को काटने
की कोशिश कर रहा हो। लोहे का हाथी! और
मच्छर उसमें से खून पीने की कोशिश कर रहा हो।
बुद्धि के सारे उपाय, बुद्धि के सारे कृत्य ऐसे हैं।
अगर जगत अंतहीन शृंखला है, तो तुम्हारे किये
क्या होगा? बुद्धि इससे डरती है क्योंकि फिर
अहंकार निर्मित नहीं होता। 

मेरे करने से कुछ भी न
होगा; मेरे होने के पहले था, मेरे होने के बाद
होगा। जब मैं हूं तब भी मैं एक स्वप्न से ज्यादा नहीं;
यथार्थ वैसा का वैसा बना रहेगा। मेरे होने, न
होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। अहंकार
को निर्मित होना कठिन हो जाता है। और
बुद्धि का सारा खेल अहंकार को निर्मित करने
का है–‘मैं हूं।’ लेकिन मेरे होने में वजन तभी आता है, जब
मैं कुछ कर सकूं; कृत्य मेरे बस में हो।

तो जितना ज्यादा मैं कर सकूं, उतना वजनी मैं
हो जाता हूं। अगर कुछ भी न कर सकूं, उतना ही मैं
नष्ट हो जाता हूं, उतना ही मैं खो जाता हूं।

अस्तित्व प्रयोजन-शून्य है तो अहंकार को बनने
की कोई जगह न रही। और अगर इसका कोई प्रारंभ,
अंत नहीं तो बुद्धि को खोजने को कुछ न बचा।
बुद्धि की जिज्ञासा है जानना: कैसे हुआ प्रारंभ?
किसने बनाया? क्यों बनाया? कब होगा अंत? कब
आयेगी प्रलय? कैसे होगा अंत? बुद्धि को खोजने के
लिये जगह मिलती है। बुद्धि और अहंकार इस प्रयोजन-
शून्य, अंतहीन विस्तार में कहीं भी नहीं टिकते;
खो जाते हैं।