Friday, 14 February 2014

"मेरा सन्यासी हँसता गाता होना चाहिए .... उदास नहीं ! " Osho

"मेरा सन्यासी हँसता गाता होना चाहिए .... उदास नहीं ! Osho "





जिसने जन्म मृत्यु का मर्म समझ लिया , फिर क्या उदासी ! फिर तो जीवन उत्सव हो गया। आनन्द हो गया। फिर तो बस नदी सा बहना हो गया। सम्पूर्ण समर्पण हो गया। जन्म मृत्यु जीवन रुपी धागे के दो छोर है इनके बीच का उत्सव बोधत्व है सन्यास है।

जीवन का सम्पूर्ण संज्ञान यही है , कि आप अपने जीवन को कितने उत्सव के साथ जीते है , विपरीत परिस्थतियों में भी ,कठिनतम को भी सन्यास भाव सहज और आसान बना देता है।

सन्यास का अर्थ कतई हिमालय पे जाने से नहीं हो सकता , क्यूंकि सच्चा सन्यासी कभी गैर जिम्मेदार नहीं हो सकता। इसीजीवन में इन्ही सम्बन्धो के साथ , अपने कर्तव को हँसते खेलते पूरा करना और वो भी बुद्धत्व के साथ अर्थात सांसारिक कटुता लोभ मोह क्रोध जय पराजय के भाव पे विजय करके सम भाव से जीवन जीना।

बुद्धत्व का भाव तो और भी गहरा है , जीवन उत्सव तो है ही साथ में कल्याण का भाव भी है , परम के प्रति परम आभार का भाव भी है।

और इसी आत्म दर्शन की पहली सीढ़ी ध्यान है। पता नहीं कब ये ध्यान नृत्य पूर्ण हो जाता है। 


Om Pranam 

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