Wednesday, 5 March 2014

तुममें प्रश्न ऐसे ही लगते हैं जैसे वृक्षों में पत्ते लगते हैं Osho प्रश्न - समाधान



दूसरा प्रश्न : आपसे प्रश्नों का समाधान तो मिलता है, पर समाधानों से समाधि घटित क्यों नहीं हो पा रही है? समाधानों में मुझे क्या जोड़ना आवश्यक है?

Osho : समाधानों से समाधि कभी घटित नहीं होती। उस भूल में मत पड़ जाना। तुम्हारे प्रश्नों का समाधान भी हो जाए अगर, तो भी समाधि घटित न होगी, क्योंकि तुम तो भीतर वैसे के वैसे रहोगे। प्रश्न हल हो गए, तुम थोड़े ही हल हो गए! जब तुम हल हो जाते हो, तब समाधि घटित होती है। प्रश्न का उत्तर तो समाधान लाता है; तुम्हारा उत्तर, तुम्हारे पूरे जीवन को उत्तर मिल जाता है जिस क्षण, उस क्षण समाधि घटित होती है।तो प्रश्नों के उत्तर तो मैं दे सकता हूं, क्योंकि प्रश्न तुम पूछ सकते हो; लेकिन तुम्हारा उत्तर तो तुम्हें खोजना पड़ेगा। तो अगर मेरे प्रश्न और उनके समाधान इतना ही कर सकें कि तुम्हें सजग कर दें और तुम्हें उस यात्रा पर गतिमान कर दें, जहां समाधि उपलब्ध होती है, तो बस काफी है। ये तो मील के पत्थर हैं, इनको पकड़ कर मत बैठ जाना; ये मंजिल नहीं हैं।मील के पत्थर पर तीर बना रहता है--और आगे जाना है, और आगे जाना है! जो भी मैं तुमसे कह रहा हूं, हर उत्तर पर तीर लगा है--और आगे जाना है, और आगे जाना है! --

जब तक तुम न हल हो जाओ! तुम एक उलझन हो। तुम्हारे प्रश्न तो तुम्हारी उलझन से पैदा हो रहे हैं। प्रश्नों के कारण थोड़े ही तुम उलझे हुए हो; तुम्हारी उलझन के कारण प्रश्न पैदा हो रहे हैं। प्रश्न तो केवल ऊपर के सिंपटम्स हैं। जैसे किसी आदमी को बुखार चढ़ा, शरीर गरम है--अब शरीर गरम होना थोड़ी बीमारी है! वह तो केवल लक्षण है। तुम बर्फ ले कर ठंडा मत करने लगना उसके शरीर को। ठंडा कर भी दो तो हो सकता है कि मरीज बिलकुल ठंडा ही हो जाए। यह शरीर का गरम होना बीमारी नहीं है; शरीर के भीतर कोई बहुत उपद्रव मचा है, कोई गृह-युद्ध चल रहा है, उसकी वजह से सारा शरीर उत्तप्त हो गया है। उस गृह-युद्ध को मिटाना है। उसके लिए औषधि खोजनी होगी।तुम्हारे प्रश्न तुम्हारी भीतर की आंतरिक उलझन से पैदा होते हैं। मैं एक प्रश्न हल कर दूंगा; तुम्हारी आंतरिक उलझन हजार नए प्रश्न खड़े करती जाएगी। यह बीमारी सदा चल सकती है। इसका कोई अंत नहीं है।मनुष्य ने करोड़ों प्रश्न पूछे हैं, करोड़ों उत्तर दिए गए हैं। ऐसा कोई प्रश्न नहीं है, जिसका उत्तर न दिया गया हो; लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है? उत्तर किताबों में बंद रहते हैं, आदमी अपनी मुसीबत में।उत्तर से कोई उत्तर नहीं मिलता। उत्तर से तुम्हें इतना ही दिखाई पड़ जाए कि तुम्हारे भीतर तुम्हारी आत्मा ही रुग्ण है और वहां कुछ करना जरूरी है . . .।

इसलिए तो मेरा सारा जोर ज्ञान पर नहीं है, सारा जोर ध्यान पर है। ध्यान का अर्थ है : भीतर की आत्मिक उलझन को सुलझाना है और ज्ञान का अर्थ है : तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर समझ लो।तुम पूछोगे आज, मैं तुम्हें समझाऊंगा, समझ में भी आ जाएगा : तुम यहां से जा भी न पाओगे, रास्ते पर भी न पहुंच पाओगे कि हजार प्रश्न खड़े हो जाएंगे। और अगर तुम बहुत कुशल हो, ज्यादा बीमार हो, क्रानिक हो तो यहीं बैठे-बैठे जब मैं तुम्हें उत्तर दे रहा हूं, तभी तुम्हें पच्चीस प्रश्न खड़े होते रहेंगे।उत्तर से कोई प्रश्न हल नहीं होने वाला। तुममें प्रश्न ऐसे ही लगते हैं जैसे वृक्षों में पत्ते लगते हैं। अब पत्तों को काट दो, इससे क्या होता है? एक पत्ता काटो तो तीन पत्ते लगते हैं। वृक्ष समझता है, तुम कलम कर रहे हो। जड़ तो तब कटेगी, जब तुम ध्यान से जुड़ोगे। ज्ञान से जुड़ने से थोड़ी-बहुत राहत मिल सकती है।इसलिए कबीर ने कहा है कि ज्ञान गुड़, ध्यान महुआ और जीवन के अनुभव की भट्टी में बनती है शराब; और वह शराब ही समाधि है। जीवन की भट्टी में, जीवन के अनुभव से! इसलिए कच्चे जो भागना चाहते हैं; जो जीवन के अनुभव से बचना चाहते हैं; जो कहते हैं, हमें बचाओ--उनको नहीं बचाया जा सकता।

तुम्हें अनुभव से तो गुजरना ही पड़ेगा।सस्ते समाधि नहीं मिलती। उसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। तुम्हें जीवन के अनेक-अनेक रास्तों पर भटकना ही पड़ेगा। बहुत द्वार खटखटाने पड़ेंगे। कूड़ा-कर्कट बटोरना पड़ेगा। बड़ी व्यर्थता को जीना पड़ेगा। दुःख और विषाद को झेलना पड़ेगा। उस सबसे तुम पकोगे। वही तो जीवन की भट्टी है। लेकिन ध्यान का महुआ अगर न हो तो भट्टी तो जलती रहेगी, शराब तैयार न होगी।तो ध्यान का महुआ लेकर जीवन की भट्टी से भागना मत। बहुत से लोग भाग जाते हैं। ध्यान का महुआ हाथ लगा कि वे चले हिमालय। वे भट्टी को छोड़कर ही भाग रहे हैं, महुए को ही लेकर क्या करोगे? बिना भट्टी के शराब न बनेगी। महुए से थोड़े ही नशा आता है! महुए को आग से गुजरना जरूरी है।और कबीर बड़ी सीधी बात कहते हैं। वे कहते हैं, ज्ञान ज्यादा से ज्यादा गुड़। अगर महुए की शराब बना ली तो थोड़ी तिक्त होगी अगर गुड़ पास न हो, बस। नशा तो चढ़ जाएगा।तो बिना ज्ञान के भी समाधि उपलब्ध हो सकती है, लेकिन ज्ञान मात्र से समाधि उपलब्ध नहीं होती। कबीर कोई बहुत बड़े ज्ञानी थोड़े ही हैं। जो प्रश्न तुम मुझसे पूछ रहे हो, वही अगर तुम कबीर से पूछते तो तुम उत्तर की आशा नहीं कर सकते थे। कबीर तो बेपढ़े-लिखे आदमी हैं। कबीर तो बिलकुल गंवार हैं। तुम उनसे शास्त्रों की पूछो, उन्हें कुछ पता नहीं। हां, सत्य की पूछो तो उन्हें फता है।

शब्दों की पूछो, उन्हें कुछ पता नहीं। निःशब्द की पूछो तो वे इशारा कर देंगे।कबीर तो बेपढ़े-लिखे हैं, न सुसंस्कृत हैं, न शास्त्री हैं, न किसी विश्वविद्यालय में कोई शिक्षा पायी है; बस जीवन की भट्टी में जल कर ही जो पाया है, वही पाया है।हां, बुद्ध से पूछो तो तुम्हें उत्तर दे सकेंगे वे सभी--राजपुत्र हैं, सुशिक्षित हैं; जीवन की भट्टी में भी जले हैं, ज्ञान का गुड़ भी हाथ है। तो कबीर की शराब तो जिसको गांव में लोग ठर्रा कहते हैं--बिलकुल घरु, देसी, शुद्ध! वह कोई फ्रांस से आई हुई शैम्पेन नहीं है। हां, बुद्ध शैम्पेन दे सकते हैं।

परिष्कृत है! लेकिन जिसको समाधि चाहिए, क्या लेना-देना कि शराब घरु थी कि फ्रांस में बनी थी? कोई लेना-देना नहीं है। जिसे मस्त हो कर नाचना है, उसके लिए ठर्रा भी काफी है।तो कबीर कहते हैं, ज्ञान ज्यादा से ज्यादा गुड़! पकड़ ली उन्होंने बात कि थोड़ा मिला दोगे तो थोड़ी स्वादिष्ट होगी, बस इतनी बात है। वैसे स्वाद कितनी देर रहता है?--जरा-सा! जब मुंह में गई और कंठ तक पहुंची, तब तक; फिर जब नीचे उतर गई, आकंठ डूब गए उसमें, फिर कहां स्वाद! किसको स्वाद! सब खो जाता है।समाधि को कबीर शराब कहते हैं--जीवन के अनुभव से मिलेगी, ध्यान के महुए से मिलेगी। ज्ञान का थोड़ा गुड़ रहा पास तो अच्छा।तो मेरे प्रश्न-उत्तरों से, मेरे बोलने से अगर तुम थोड़ा-सा गुड़ जमा कर लो, बस उतना काफी है। लेकिन अगर गुड़ ही गुड़ इकट्ठा कर लो, महुआ पास न हो, जीवन का अनुभव पास न हो तो वह गुड़ मिठास तो न देगा, बड़ी सड़ांध पैदा करेगा।पंडित सड़ जाता है। उसके पास गुड़ ही गुड़ है। उससे दुर्गंध उठने लगती है; उससे मिठास नहीं उठती। वह गुड़ का ही धंधा करने लगता है। तुम गुड़ के व्यवसाय में मत पड़ जाना। थोड़ा-सा गुड़ पास रहे, अच्छा। इसलिए मैंने कहा कि सोने में थोड़ी सुगंध आ जाती है।

अन्यथा सोना तो ऐसे ही सोना है, कोई सुगंध की जरूरत नहीं है। लेकिन समाधि में थोड़ी सुगंध आ जाती है।मेरे प्रश्नों से, मेरे उत्तरों से कोई समाधान तो मिल सकता है, समाधि नहीं मिल सकती। और जब तक समाधि न मिले, तब तक समाधान भी क्या समाधान है?समाधि ही समाधान है। उसके बाद फिर कोई प्रश्न नहीं उठते। नहीं कि तुम्हें सब प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं; समाधि का अर्थ है, वहां प्रश्न उठने बंद हो जाते हैं, उत्तर की कोई जरूरत नहीं रह जाती। तुम निष्प्रश्न हो जाते हो--तब समाधि की दशा। तब तुम नाचोगे, गाओगे; पूछोगे नहीं। तब तुम्हारे जीवन में शब्दों का जो बहुत बड़ा व्यापार चलता था, वह बंद ही हो जाएगा। तब तुम पहली दफा अस्तित्व के साथ सीधे-सीधे मिलोगे, साक्षात्कार होगा।मुझे सुनो! उस सुनने से बस एक बात सीख लो कि महुए खोजने हैं, महुए बीनने हैं। झाड़ मैं तुम्हें बताए देता हूं, बीनने तुम्हें ही होंगे। कोई दूसरा तुम्हारे लिए नहीं बीन सकता।यह तो जीवन की शराब है, यह उधार नहीं मिल सकती। यह तुम्हें ही निचोड़नी होगी और तभी इसका महारस तुम्हारे ऊपर बरसेगा।ध्यान में जाओ! ध्यान में डूबो। ध्यान में मिटो! ध्यान में मरो! ध्यान बचे, तुम न बचो। वहीं समाधि है। वहीं समाधान है।


Kahe Kabir Diwana - 18

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