Monday, 17 March 2014

Note - एक दूसरे के रंगो के प्रति आकर्षित है या विपरीत है.........?

प्रश्न : अपने अपने रंग में सब रंगे हैं........फिर भी सब एक दूसरे के रंगो के प्रति आकर्षित है या विपरीत है.........? 




कश्मकश आंतरिक अनसुलझे भाव में घिरा सवाल .......................... ये वैज्ञानिक नियम है , पिक्चर वास्तव में जो है उसके विपरीत दिखायी देती है , बिलकुल कैमरे से उतरे नेगटिव जैसी उसको सत्य रूप में देखने के लिए संसार के दृष्टिगत लेन्स से बाहर निकल के देखना पड़ेगा , परा दृष्टि से समझाना होगा।

मूलतः जो दिखता है होता उसका विपरीत में , जो आकर्षण दिख रहा है दरअसल वो अपना खालीपन है एक गढ़हा है जिसको भरने का प्रयास है , बाहर की ओर उन्मुख इक्षाएं भी ऐसी ही है , कुछ इस तरह से वस्तुतः संतुलन है , और दिखायी पड़ता है आकर्षण के रूप में। और जब यही आकर्षण अंतर्मुखी हो जाता है तो वो सब जो बाहर ढूंढ रहे थे , वो सब अपने ही अंदर पा लिया जाता है , और इस प्रकार बहिर्मुखी क्षुधा शांत हो जाती है।

तब आपको अहसास होता है कि अंदर का संसार बाह्य संसार से ज्यादा विस्तृत , ज्यादा विशाल और ज्यादा संपन्न है। ईश्वर का अद्भुत सम्पूर्ण सामंजस्य और संतुलन आपके अपने ही अंदर है।

जो इस सत्य को समझे भी यदि बाह्य संसार के रंग में रंगना चाहते है , उनका सिर्फ एक और एक ही अर्थ हो सकता है जिसको समझने के लिए बुध्ह के तीन सत्य , तीन नदी के स्रोत या तीन परिवार में उतरना पड़ेगा। प्रथम बुद्धम शरणम् गच्छामि , अर्थात परम बुद्ध सत्य स्वयं अपनी शरण में जाना या फिर किसी सदगुरु की. दूसरा सत्य संघम शरणम् गच्छामि अर्थात ऐसे संघ या समुदाय की शरण में जाना है जो गुरु अधीन है , वहाँ से भी राह मिल सकती है। तीसरा सत्य धम्मम शरणम् गच्छामि , अर्थ न स्वयं को समझ प् रहे है न गुरु से सामना हो रहा है न संघ से लाभ हो रहा है तो धर्म की शरण में जाना है , धर्म की शरण अर्थात आडम्बर से नहीं मूल धर्म वाक्यों से जुड़ना है।

तो मित्र ये जो एक दूसरे के रंगो के प्रति आकर्षण में दिखते है दरअसल ये उस समुदाय की तरफ आकर्षित है जिसके अंदर वो ..... वो सब रंग देखते है जिसकी कमी वो महसूस करते है और उनको लगता है कि इस समुदाय के रंग उनके अंदर के रंगो की कमी को पूरा कर सकते है या इस व्यक्ति के अंदर की ये ( कोई भी ) विशेषता उनके अंदर की इस कमी को भर सकती है , वही आकर्षण है , वही ये आवश्यकता महसूस होती है। यदि अपना अंदर पूर्ण हो तो बाहर के आकर्षण , वो ही रहेंगे , वहीँ पे रहेंगे पर व्यक्ति की दृष्टि बदल जायेगी। इसके अलावा कोई दूसरा अर्थ है ही नहीं। ये संसार अपना संतुलन ऐसे ही कर रहा है ! 



पर जिस दिन स्वयं के बुध्ह से सामना होता है , ये क्षुधा तो तभी शांत होती है। तब तक भटकाव जारी रहता है।

ॐ प्रणाम

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