Saturday, 1 March 2014

प्रारब्ध और उसका अस्तित्व -(Note )

प्रारब्ध बहुत प्यारा शब्द है , पर ये है क्या ? कहाँ से इसका जन्म हुआ ? और क्यों ये प्रचलित हुआ एक मुहावरे कि तरह। प्रारब्ध शब्द मूलतः इशारा करता है उस फलित कर्मो की ओर जो इंसान पिछले जनम से साथ लाता है और जिनमे सभी प्रयास के बाद भी फल अपने ही तरीके से मिलते है। लेकिन जो जन्मो कि श्रृंखला को नहीं तर्क पे उतर पाते उनको प्रारब्ध भी समझ नही आता। अब जरा मीलों लम्बा चौड़ा हाईवे छोड़ के छोटे रस्ते पे चलते है , जैसा कि सब जानते है , सब मूलतः सड़को का तान बाना और बनावट एक सी होती है , और थोडा बहुत घूम घाम के मंजिल तक पहुंचा ही देती है।

हर व्यक्ति का एक बहुत निजी स्वभाव होता है , बहुत निजी इसलिए जिसपर नेत- नेति के सिद्धांत से जब हम पहुँचते है तो पाते है कि इस स्वभाव पर न समाज का और न दोस्तों का और न परिवार का ज्यादा असर होता है , ये बहुत निजी है , और इस पे तक कि स्वयं उस आत्मन का भी वश नहीं होता ( ये बहुत महीन है अतः रोजमर्रा के कार्यकलापों में थोडा दखल / प्रभाव तो हो सकता है परबिना उस व्यक्ति की जानकारी के .. ज्यादा नहीं हल्का फुल्का क्यूंकि ये विशेष स्वभाव जिसका परिचय खुद व्यक्ति को नहीं होता , किसी विशेष परिस्तिथि में उसका अपने इस स्वभाव से सामना होता है ) अक्सर आप ने ये कहा होगा या सुना होगा , कि मेरा किसी वस्तु स्थान या व्यक्ति के प्रति बहुत आकर्षण है बार बार समझाने पर भी ह्रदय मानता नहीं। जिसको अक्सर विद्वान जन उत्तर देते मिले है कि इसका ये आकर्षण किसी पिछले जनम का परिणाम है।

हर ताने बाने कि तरह ये भी जो सोचा गया है , कभीकभी अति सतही भी होसकता है , ह्रुदय के अलावा दिमाग के वशीभूत भी हो सकता है पर मैं जिस अर्थ में कह रही हु , ये अति गहरा है अति सूक्ष्म। इस विवशता और आकर्षण को व्यक्ति पिछले जन्म के आकर्षण से बांधते है। यही पर किसी-किसी के ह्रदय में समर्पण का भाव इतना प्रबल होता है कि सारा जीवन सहज समर्पित हो जाता है , बिना दोबारा सोचे ; फिर ये कोई व्यक्ति हो , स्थान हो या ब्रह्मत्व का आकर्षण। इस में कुछ भी अजीब नहीं कुछ भी जादू नहीं , कोई पूर्वजन्म का होना या न होना मायने नहीं रखता। क्यूँ? क्यूंकि यदि बड़े रूप में देखें तो पाएंगे , और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी साथ ले के चले तो पाएंगे कि नक्षत्रों का बड़ा योगदान है किसी व्यक्ति के जन्म और जन्म के स्वभाव में। और एक साथं एक स्थान पे इकठी और सम्मलित हुई ऊर्जा और उसमे निहित रंग के मेल और समय नक्षत्र की गति आगे की उसी जीवन कहानी लिखते है।

काल्पनिक कथाओं का उदय वह होता है , जहाँ व्यक्ति का तार्किक दिमाग उलझ जाता है। यहाँ भी इस गुथी को सुलझाने के लिए कुछ तर्क और कुछ कथाये अपने अपने धर्म के अनुसार शामिल है। और व्यक्ति उलझ के रह गए। क्यूंकि सवाल तो पैदा होते ही जाते है एक के बाद एक , एक बालक के मस्तिष्क कि तरह मानव जन्म से जिज्ञासु है , और होना भी चाहिए आखिर सब रहस्यमय जो है ! और इस माया में इस अँधेरे में दिल और दिमाग दोनों छटपटाते है। ये इतना महीन ताना बाना है कि आप और हमारे महीन से महीन वस्त्रो कि बुनावट भी इसके समक्ष मोटी है।

सिर्फ स्वभाव और अवसर और फल को पकड़ के चलते है , प्रारब्ध को माने या न माने। … पर जन्म के इस सिद्धांत को जरुर मानेंगे कि नक्षत्र हमारे मानस पे और शरीर को प्रभावित करते है। स्वास्थ्य से लेकर स्वभाव तक। और कद काठी सौष्ठव से लेकर सुंदरता तक। सिर्फ अभी उलझा हुआ एक सवाल है कि जन्म का स्थान कैसे निश्चित होता है अगर सब कुछ यूँ ही नहीं किसी एक ताने बाने का ही हिस्सा है। इसको बाद में किसी अन्य उचित अवसर पे समझेंगे !

ये स्वभाव जो व्यक्ति को मिला और जन्म से जो उसका आकर्षण विषय और वस्तु से जुड़ा तो इसके लिए व्यक्ति के प्रयास स्वाभाविक रूप से प्रभावशाली होतेहै , उसकी प्रार्थनाये भी अगर इस मूल से जुडी है तो प्रभावशाली होती है। यहीं ये निश्चित होता है कि रुझान बालक का किस तरफ है।

अब यहाँ ये भी साफ़ होना जरुरी है कि क्या क्या हमने बनाया और क्या क्या प्रकृति से मिला , प्रकृत में विषय मिले जुले है अलग नहीं , जबकि हमने विषय अलग अलग सूचि बना के रखे है , पृकृति में पाठशाला और कक्षा अलग अलग नहीं , जबकि हमने विषय कक्षा और संस्थानो कि क्रमबढ सूची बना रखी है।

पृकृति में भेद सिर्फ पात्रता का है , यदि व्यक्ति पात्र है तो उसको अवसर मिलते ही वो अनुभव उपलभ्ध हो जाता है। यहाँ उसका मूल आकर्षण के अनुसार पृकृति भी संलग्न होती है क्यूंकि ऐसा करना प्रकृति का स्वाभाव है उसकी तरफ जैसा भी भाव और जैसा भी कर्म बढ़ता है वो दुगुना तिगुना करके वापिस देती है । जिसको लोग भाषा में प्रारब्ध भी कहते है। वास्तव में देखे तो इस जन्म कि घटना का उस प्राप्ति कि घटना से अगर कोई सम्बन्ध है तो सिर्फ इतना कि सम्पूर्ण सौर मंडल का चुंबकीय आकर्षण उस व्यक्ति को किसी निश्चित कर्म के लिए प्रेरित कर रहा है.

इसी लिए कहा जाता है कि किसी बालक या व्यक्ति के स्वाभाविक रुझान को समझ के ही उसको प्रेरित करना उसके जीवन की यात्रा में सहयोग करने जैसा है। अन्यथा प्रयास सिर्फ संघर्ष और पीड़ा को जन्म देते है। फिर चाहे वो स्वाभाव आपके पक्ष में है कि नहीं इस से प्रकृति को फर्क नहीं पड़ता।





सात रंगो से सजी इस पृथ्वी पे जन्म लेने वाले हर जीव में रंगो का अलग अलग मेल होता है , रंगो के तो हम बहुत कम शेड निकल पाये है , प्रकृति तो इसमें बहुत पहले से संलग्न है। उसकी हर कृति इसलिए अनूठी और अद्वितीय है। किसी कि किसी से तुलना नहीं , बस जो जैसा है वो है , अनोखा अद्वितीय। उस परम की अनूठी कृति। उसके दैवीय रंगो के सामन्जस्य से जन्मा। । जिस पे जिस रंग का प्रभाव ज्यादा ; उसका आकर्षण उधर ही ज्यादा , ध्यान देने योग्य है!! सात रंगो में जिस रंग कि उपस्थिति नहीं या अति सूक्ष्म है , उसको पूर्ण करने या संतुलित करने के लिए आत्माए प्रयास रत देखि गयी है , और यह अति स्वाभाविक आकर्षण है जिसके तहत व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन कार्य और जीवन शैली निर्भर है , और इनके संयोग ही प्राकृतिक फल उपलब्ध करते है। जिनके सुख दुःख उपलब्धि और अनुपलब्धि का लेखा जोखा मानव समाज रखता है ,

ध्यान दीजियेगा ! प्रकति के पास लेखा जोखा कि ऐसी व्यवस्था नहीं ,वो सहज है वो संतुलित होने कि चेष्टा में है और परिवर्तन शील है और आपके भाव को प्रसाद रूप में बढ़ा के आपको ही लौटती है । घटनाये , रूचि अवसर और व्यक्तिगत उपलब्धिया मात्र जन्म से शुरू हुए कई संयोगो का समूह है , और व्यक्ति के दौड़ते दिमाग ने उनको सूचिबध्ध करलिया।

" और इसी नियम के तहत प्रकृति के पास उसी ऊर्जा के उसी समूहः के साथ पुनः पुनः जन्म देने कि कोई व्यवस्था नहीं। जिसका जन्म जिस रूप में हो चूका , वो दोबारा ही बिलकुल वैसा और उसी चेतना के साथ नहीं हो सकता ।"

पर भावनात्मक रूप से उलझे मानस मन ये मैंने को सहज तैयार नहीं होता , उसने जो जिस रूप में खोया प्रबल वेदना और उसको उसी रूप में पाने क़ी प्रबल इक्षा के मोह से घिरा कृत्या करता चला जाता है , जबकि पृकृति ऐसा कर ही नहीं सकती , यहाँ से ही मानव कि उनसुलझी इक्षाएं ही माया के नृत्य को जनम देती है। सांसारिक व्यापार ईश्वर की रचना नहीं , न ही ऐसे देव और देवता , ये शुध्ह मानवीय डर और धर्म के 
गठन के बाद मानवीय स्वभाव का प्रतिफल है। इस सिद्धांत के आधार पे यदि देखें तो कई उत्तर मिलते है।जैसे जो उसने बनाया ही नहीं उसके कार्यवहन में उसका दखल भी नहीं। ये सब रचना और उसके प्रति प्रति फल सिर्फ और सिर्फ इंसान कि देन है। 


प्रार्थनाये उसके अंदर के डर को कम और साहस को पुष्ट करती है ,जिस कारन उसको स्वयं से ही प्रेरणा का अहसास होता है। और वो ही उसकी आंतरिक शक्तिउसको अगर उसका वांछित दिल देती है तो वो सोचता है किसी देवता ने उसपे प्रेम दिखाया है। बृहत रूप में  तो उस ईश्वर के साम्राज्य में बस एक "ऊर्जा" है और दूजी "प्रकृति"। एक और उदाहरण देती हूँ , प्रकृति समस्त भूमण्डल के साथ संयोजित है , मिली जुली है। प्रकृति ने देश देशांतर नहीं बनाये। सिर्फ दिशा अनुसार मौसम और इसके प्रभाव भूमण्डल पे प्राकृतिक है। कद काठी और नयन नक्श का ताना बाना पूर्वजो से मिले खून और वंशानुगत शृखला जिसको जींस भी कहते है ; का परिणाम है। तरंगित जगत सम्पूर्ण पृथिवी पे अपनी तरंगो से व्याप्त है। स्थूल शरीर कि अपनी सीमाए है। इन्होने ही देश और प्रान्त को जनम दिया। परम ऊर्जा का इसमें कोई दखल नहीं न ही प्रकृति कि इस विभाजन में कोई रूचि। अब देखिये , व्यापर और धन भगवान् ने नहीं बनाये। मानव ने बनाये। और जब सामान वितरण और रहन सहन में फर्क आया तो भगवन के पास चले गए एक और कुबेर देवता कि प्रार्थना भी तैयार हो गयी , लक्ष्मी देवी बन गयी। पूजा विधान हवन होने लगे। इसी तरह सरस्वती , काली , माँ पार्वती या अन्य देव देवता । इत्यादि इत्यादि मानवीय संरचनायों का कारन बनी। उन्हें मानव समाज को व्यवस्था देनी थी जिससे प्रकृति अपने संतुलन में चलती रहे। उसका और कोई दूसरा औचित्य था ही नहीं। 


अब आप स्वयं समझिये , जो धन उसने नहीं बनाया , जो व्यापार उसने नहीं बनाया , जो देश उसने नहीं बनाये ........ न उसने कहा किस घर में जनम लेना और देना है इसका भी व्यापारिक लेखा जोखा उसके पास नहीं। ये समझ हमारी और हमारी बाह्य दृष्टि की है , धन वैभव में जन्म यानि की ऊॅच आत्मा , गरीब के घर जनम यानि कि निम्न आत्मा। परमात्मा कि दृष्टि सहज है , ऊर्जाएं प्रस्फुटित हो रही है। यदि अभिभावक के भाव से समझे तो आपने सुंदर उद्यान बनाया पर उसमे खेले जाने वाले खेल आपने नहीं बनाये , उसमे बालक स्वतत्र है , खेल के थक गए , वापिस घर को आ गए। बस इतना ही है सारा ताना बाना। उच्छता और निम्नता निहायत दिमागी उपलब्धि है जो सामाजिक रूप से और धार्मिक रूप से मानय है।परमात्मा कि दृष्टि से ऊर्जाओं का प्रकटीकरण धरती पे होता है और जिस जिस के संयोग से ये कार्य घटित होता है ऊर्जा वो ही शरीर धारण करती है। बाकि गुण है जिनका प्रकटीकरण जीव के वंशानुगत जींस और नक्षत्रीय स्वभाव वश होता है।चूँकि सब सरल सहज और खुला है तो जादू जैसा शब्द भी गायब है अब यहाँ जादू क्या है ? यानि कि जादू वही है जहाँ ज्ञान की कमी है , यही तो विज्ञानं भी कहता है , एक एक कदम आगे बढ़ाओऔर मानो जानो प्रमाण के साथ ; जादू के साथ नहीं। है ना अतिरुचिकर महीन ताना बाना , इक्षाओं , और महत्वाकांक्षाओं का !!! और यहाँ प्रकृति निर्दोष है , स्वाभाविक है। 


     ॐ प्रणाम
 

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