Sunday, 16 March 2014

छठवां प्रश्न: क्यों? साधक को बहुत प्रयास, श्रम और तपश्चर्या से क्यों गुजरना पड़ता है? osho

छठवां प्रश्न: कल आपने समझाया कि सुख-पूर्वक सुरति से समाधान घटता है, परंतु, मुझे तो बड़े प्रयास, अभ्यास और श्रम से गुजरना पड़ रहा है, क्यों? साधक को बहुत प्रयास, श्रम और तपश्चर्या से क्यों गुजरना पड़ता है?


आलस्य हो मन में, तो छोटी-मोटी चीजें बड़ा प्रयास मालूम होती हैं। तुम्हारी व्याख्या की बात है। कुछ भी तुम्हें श्रम नहीं करना पड़ रहा है। मैं तुमसे कहता हूं कि मेरे निकट जो लोग साधना में लगे हैं, पृथ्वी पर सबसे कम श्रम उन्हें करना पड़ रहा है। तुम्हें श्रम का कुछ पता ही नहीं है।
मगर महाआलसी व्यक्तित्व हो; तो छोटी-छोटी बातें श्रम मालूम पड़ती हैं। कर क्या रहे हो तुम? किस बात को तुम बार-बार कहते हो, कि बड़े प्रयास। कौन-सा बड़ा प्रयास कर रहे हो?
थोड़ा नाच लेते हो, इसको बड़ा प्रयास कहते हो? नाचना प्रयास है? नाचना तो आनंद है। लेकिन तुम्हारी दृष्टि गलत है! आनंद को प्रयास समझोगे, चूक गए। नाचना तो उत्सव है, एक रसपूर्ण घटना है, प्रयास क्या है? अगर नाचना भी प्रयास है, तो फिर अप्रयास क्या होगा?
अगर मैं तुमसे कहूं कि, खाली बैठे रहो, तो भी तुम कहते हो, कि बड़ा प्रयास करना पड़ता है। खाली बैठे रहो, आंख बंद करके बैठो। बड़ा प्रयास करना पड़ता है। नाचने को कहूं तो बड़ा प्रयास है। तुम्हारे आलस्य का कोई अंत नहीं मालूम पड़ता। और तुम इसे बड़ा गौरवपूर्ण समझ रहे हो, कि बड़ा प्रयास कर रहे हो।
मैंने सुना है, कि एक गांव में वन-महोत्सव चल रहा था और एक बड़े नेता ने व्याख्यान दिया और लोगों को समझाया, कि वृक्षों को बचाना चाहिए, रक्षा करनी चाहिए। वृक्ष जीवन है, उनके बिना पृथ्वी उजाड़ हो जाएगी। और फिर उसने कहा, कि जहां तक मैं जानता हूं, यहां जो लोग भी मौजूद हैं, इनमें से किसी ने भी कभी अपने जीवन में किसी वृक्ष की कोई रक्षा नहीं की। कोई नहीं उठा, लेकिन मुल्ला नसरुद्दीन बड़े गौरव से खड़ा हो गया। उसने कहा, आप गलत कहते हैं। एक बार मैंने पत्थर से एक कठफोड़वा को मारा था--वह जो कठफोड़वा पक्षी होता है--उसको मैंने पत्थर से मारा था। मरा नहीं, मगर चेष्टा मैंने बड़ी की थी।
इसको वे वृक्षों की रक्षा समझ रहे हैं, कठफोड़वा को मारा क्योंकि कठफोड़वा वृक्षों को खराब करता है वह भी मरा नहीं मगर पत्थर चूक जाए तो इसमें मेरा क्या कसूर है, मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, मैंने कोशिश की थी। बड़ा प्रयास कर रहे हो --  कठफोड़वा  मार रहे हो! थोड़ी सांस ले ली जोर से, इसको तुम बड़ा अभ्यास कहते हो? इससे सिर्फ तुम्हारा महातमस और आलस्य पता चलता है और कुछ भी नहीं।
तो तुम्हें साधना का कुछ पता ही नहीं। तुमको तो कोई महावीर मिलता, तब पता चलता कि साधना क्या है! जब वे तुम्हें तीनत्तीन चार-चार महीने भूखा रखवाते, बारह साल तक मौन करवाते तब तुम्हें पता चलता, कि साधना क्या है? मैं तो तुमसे नाचने को कह रहा हूं, मैं तुमसे हंसने को कह रहा हूं, मैं तुम्हें जीवन में कुछ भी तोड़ने को नहीं कह रहा हूं, जीवन ने जो कुछ दिया है उसका उपभोग करने को कह रहा हूं। मैं तुम्हें पहाड़ों पर भागने को नहीं कह रहा हूं, पहाड़ को तुम्हारे बाजार में लाने की चेष्टा कर रहा हूं!
वस्तुतः तुमसे कुछ करने को नहीं कह रहा हूं, तुमसे कह रहा हूं, तुम समर्पण कर दो। समर्पण का मतलब है, कुछ भी तुम अपने ऊपर मत लो। करने की बात ही छोड़ दो। करने दो परमात्मा को। तुम चरणों को पकड़ लो और कह दो, अब तू जो करे, तेरी मर्जी। तुम नाचो कृतज्ञता से। बहुत मिला है।
मैं तुम्हें अहोभाव सिखा रहा हूं, साधना करवा ही नहीं रहा। वही दादू का अर्थ है, जब वे कहते हैं, सुखपूर्वक सुरति--सुख सुरति।
लेकिन तुम कहते हो, मुझे तो बड़े प्रयास, अभ्यास और श्रम से गुजरना पड़ रहा है।
मुझे दिखाई नहीं पड़ता कौन-सा श्रम तुम कर रहे हो, कौन-सा बड़ा अभ्यास कर रहे हो, कौन-सी तपश्चर्या तुमसे करवाई जा रही है? लेकिन तुम्हारे आलस्य को मैं समझता हूं। तुम्हारी दृष्टि से हो सकता है नाचना भी बड़ी भारी तपश्चर्या हो। इससे तुम केवल अपनी दृष्टि की खबर देते हो।
मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन अपने एक मित्र के साथ एक वृक्ष के नीचे लेटा था। आम पक गए थे, एक आम गिरा। मित्र ने नसरुद्दीन से कहा, कि देख बिलकुल तेरे पास पड़ा है, उठाकर मेरे मुंह में लगा दे। नसरुद्दीन ने कहा, तू मित्र नहीं शत्रु है। थोड़ी ही देर पहले एक कुत्ता मेरे कान में मूत रहा था, तूने उसे भगाया तक नहीं, और मैं आम उठाकर तेरे मुंह में लगा दूं।
बस, ऐसा ही तुम्हारा जीवन है। पड़े हो, आम भी कोई उठाकर तुम्हारे मुंह में लगा दे। कुत्ता भी तुम्हारे साथ दर्ुव्यवहार कर रहा हो, तो भगा नहीं सकते। खुद नहीं भगा सकते, उसकी भी अपेक्षा दूसरे से कर रहे हो। और सोचते हो कि महातपश्चर्या में तुम संलग्न हो।
छोड़ो व्यर्थ की बातें। अपने आलस्य को तोड़ो, प्रमाद को हटाओ। जितने कम पर मैं तुम्हें जीवन-यात्रा को ले जाने के लिए कह रहा हूं उससे कम पर कभी किसी दूसरे ने नहीं कहा है। और अगर तुम मेरे द्वारा चूक जाते हो, तो फिर तुम्हारे लिए कोई उपाय नहीं है।
Piv Piv Lagi Pyas - 08

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