Friday, 7 March 2014

एक विश्लेषण तरंगो का : पुस्तक 2 - सूत्र 21 (पतंजलि ) Note

21. ये सब , जो भी मौजूदगी है वो आत्मा के लिए 

अंश:

आदमी अपनी उत्तेजना में ये मूल बात नहीं समझ पाता कि रचना और विद्यमानता उसी के लिए है और उसी के द्वारा है। और भावनाए संवेदनात्मकता और भी विस्तृत तथा व्यापक है। आत्मा , जो सर्वोच्च की और इशारा कर रही है वो आदमी की आत्मा है , और उसी परमात्मा का हिस्सा लेकिन एक छोटे से छोटा हिस्सा। व्यक्ति का छोटा सा संसार , वातावरण , और संपर्क सूत्र और स्वानुभव के लिए प्रयत्न्शीलता ही उसको अंतिम स्वतंत्रता के लिए उसी के अंदर से बाहर निकल के लाती है। वो स्वयं अपने प्रकटीकरण का कारन है , और उसके अनुभव उसकी गहन सोच का परिणाम है। परन्तु उस (रहस्यमय ) के चारो तरफ जब वो अपने आप को धकेलता है तो पाता है , एक वृहत खाली स्थान ; जिसका वो स्वयं एक हिस्सा है , और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नक्षत्र और सौरमंडल मौजूद रह पा रहे है उस वृहत की माजूदगी से जिसके शरीर (ऊर्जा ) वो एक अति सूक्ष्म कण है। सम्पूर्ण संसार किसी वृहत ऊर्जा के विचारो का का परिणाम लगता है और बृह्मांड , अनुभव के क्षेत्र। "

दोस्तों ! 


आज से वर्षो पहले पतंजलि ऋषि ये लिख के गए , जरुर उनके अति गहरे अनुभव की सघन लहरों में से ये अति सूक्ष्म तरंग है , जो समझने योग्य है , वर्षो से विद्वान कुछ समझाने का प्रयास कर रहे है पर उनकी वास्तविक आवाज कहीं परम्परओं और धर्म के उपकरणों के तले दब सी जाती है , और उभर के आती है परम्पराएं जो संस्कार बन के हावी हो जाती है उन सूक्ष्म तरंगो पे , वास्तव में वो कहना क्या चाह रहे है , क्या वो सोच रहे थे ये सब लिखते समय, ये विचार भी अती_महत्वपूर्ण है , आपके अपने आंतरिक और वास्तविक आत्मिक विकास के लिए |

वो उसी मूल तत्व से जुडने के लिए कह रहे है , मूल तत्व क्या है , एक तो प्रकृति ! और दूसरा मूल तत्व है ऊर्जा , इनसे कैसे जुड़े , गोल गोल घूम के वही पे खड़े हो गए , ध्यान ही मात्र एक उत्तम साधन है , स्वयं को खोजने का। वो एक अवसर है जिसमे आप सिर्फ अपने साथ होते है। यहाँ भी विचार थोडा धोखा देते है , क्यूंकि वो आपको आपके साथ होने नहीं देते , आपका ही विचार आपको भ्रमित करता रहता है , समुद्र की लहरो के समान उमड़ते और उभरते विचार आपके मन मस्तिष्क को उलझा के रखते है ; भूत काल और भविष्य में , जब आप इनपे अधिकार प् पाते है तभी आप स्वयं की यात्रा पे गहरे उतरते है. और अहसास कर पाते है कि ऋषि मुनि ऐसा बहुत कुछ अनकहा कहते थे वो मूल आधार है आज के धर्म ग्रंथो के और धर्म के स्वरुप का ,

ध्यान दीजियेगा ! मैं विवेचनायो और विश्लेषण तथा उनसे उत्पन्न संस्कारों की बात नहीं कर रही हूँ , मैं विशाल समुद्र पटल पे उभरती अति सूक्ष्म स्वाभाविक तरंगो की बात कर रही हूँ। जो कृतिम रूप से बनायीं हुई लहरो में दब सी गयी है। उनके स्वर को सुनना है , वहाँ से जोड़ना है स्वयं को।

क्यूंकि , वे ... वो यात्रा कर चुके है ... जो हम आज शुरू कर रहे है , ब्रह्मांड में ध्यान के द्वारा विचरण और अपनी संवेदनशीलता की अति सूक्ष्म तरंगो द्वारा ही इतना कुछ कह गए , जो आज विज्ञान प्रमाण के साथ पा रहा है ! परन्तु फिर भी विज्ञानं जहा तक जा रहा है ; प्रमाण के साथ उसके साथ चलते है , जहाँ पर वो अक्षम हो जायेगा , वहाँ आप इतने सक्षम हो जायेंगे और परम के लिए ऊंची छलांग के लिए तैयार हो जायेंगे

यही पे सद गुरु कहते है , किताबे , उनके पन्ने , पन्नो को लिखने के लिए कलम और कलम की स्याही जिसको हम देख पाते है , पढ़ पाते है , ये भी कम नहीं मानव के संचित किये प्रयास सराहनीय है , परन्तु इन प्रयास की गंगा जमुना के भी अंदर एक और धारा सरस्वती की बह रही है जो दिख नहीं रही , सिर्फ महसूस की जा सकती है , तरंगो के मंथन और ध्यान प्रयासो द्वारा , कुछ लोग इसीको टाइम ट्रेवल का नाम भी देते है और मैं कहती हु , इस टाइम ट्रेवल रुपी समुद्र में डुबकी गहरे लगाओ , तो रत्न मिलंगे। विषधर नाग की रस्सी बना के समुद्र-मंदारपर्वत का मंथन करो तो दैवीय गुण निकलेंगे , विष भी निकलेगा , सावधान ! इस मंथन में आपके ही आंतरिक दानव और देवता दोनों आपके सहभागी होगें। निरपेक्ष तटस्थ भाव से उन सभी का आभार करे , और आगे बढ़ जाए , रुके नहीं , अटके नहीं , उलझे नहीं। ये सब आपकी जीवन-यात्रा के ही अंश है। 





ये भी अति विशाल जीवन यात्रा का अति सूक्ष्म उपलब्धियों में से एक है। सब कुछ अनंत और अंतहीन है।

कोशिश कीजिये , मूल से जुड़ने की , उनकी तत्कालीन और स्वयं की , आज की तरंगो का मेल करा के उन में बहने की और फिर किसी निर्णय तक पहुंचे और अपनाये ! ऊपर सतह की छायी हुई जलकुम्भी स्वयं ही निरर्थक हो जायेगी।

यदि आप जुड़ सके तो आपको वो उनके अनुभव के अनकहे स्वर गूंजते सुनायी पड़ेंगे !



शुभकामनाये , शुभेक्षा , ॐ प्रणाम

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