Sunday, 18 May 2014

स्वयंसिद्धा ही योगी (note)



किसने कहा ?  

प्रमाण क्या ? 

आदि प्रश्नो के साथ....  ये सच है ,  ये झूठ  है  आदि मान्यताओं को लादे हुए  घोड़े और गधे के सामान ,  तर्क वितर्क  करते हुए  और यहाँ भी शक्ति प्रदर्शन   के  अचूक  सिद्धांत का उपयोग करते हुए  , स्वयं को झूठे  अहंकार  और अथाह अन्धकार में  समेटते चले जा रहे है।  अब तक पाये हुए दिमाग और अनुभव ; जो दुसरो के दिए हुए है  ऐसे अनुभव से हम पीढ़ियों  से  सिर्फ  धारणा  बनाते जा रहे है , और आहिस्ता से  इन धारणाओं को  ही धरोहर की धरोहर मान बैठे है और चाहते है की स्वस्थ समाज का निर्माण हो , कैसे होगा ?  कभी विचार ही नहीं किया , बस पीढ़ियों से जो होता चला आरहा है वो ही मानना  और जीना  हमारी नैतिक  जिम्मेदारी  हो गयी है। धर्म ,समाज , परिवार की ही परंपरा जैसी गुरु शिष्य  परंपरा भी है।


स्वयं सिद्धा  का पहला पाठ *पूर्णरूप से   न सब सही है न सब गलत। संतुलन में ही जीवन है।

स्वयं सिद्धा  का दूसरा पाठ * स्वयं के द्वारा किया गया अनुभव चेतना का अनुभव है जो परम सत्य है।

स्वयं सिद्धा  का तीसरा पाठ *  पुरातन धरोहर  जीवन का आधार बनाने के लिए नहीं उनके सहयोग  से स्व  अनुभव  के द्वारा  मानने योग्य है इस प्रकार धरोहर और भी  संपन्न होती जाती है।

स्वयंसिद्धा  का चौथा पाठ *  गहरी जटिल   बुनावट का   एक सिर  पकड़ में आजाये , यदि आगया  तो सम्पूर्ण  बुनावट को खोलने  में  रंच मात्र देर नहीं लगती।  इसको एक स्वेटर   खोलने से समझा जा सकता है।

स्वयंसिद्धा  का पांचवां पाठ * घनी जटिल बुनावट का ये धागा   आपको अपनी  चेतना दवरा ही प्राप्त होगा।  पराया ज्ञान , पराया अनुभव  आपको इशारा तो दे सकता है , परन्तु  दीपमय प्रज्वलित  राह नहीं बन सकता।

प्रकति प्रदत्त  ऊर्जा  के दो ही  रूप है  स्त्रैण और पौरुष ,  जो   चलित  जीवों  में  विभाजित है  दो  ऊर्जाओं में , जबकि  जो अचल  है   उनमे  सुन्दरतम  पूर्णता के साथ  यही  एक ही ऊर्जा के रूप में   मिलती है

( fruits and roots  are both are essential part of  one tree of yin & yang or Complete wisdom )

नीचे  एक वाक्य है ,  जिसमे पुराण  की  मान्यता  का उल्लेख है ; कहा गया है  की जो समस्त  प्रकृति का पुरुष पक्ष है  वो  बुद्धि का दर्शन है , और  जो आकर्षण है  वो स्त्री पक्ष का दर्शन है , इस  वाक्य  को देख के ही समझ आ जाता है , रचनाकार स्वयं पुरुष था  जिसका आकर्षण स्त्री नाम के शब्द तक था  जो उसने अपने अनुभव दवरा जाहिर किया।   जिसको  भान था  की  इससे बेहतर और कोई उपाय ही नहीं  दो उर्जाओ के अस्तित्व  को आम सामान्य  से  मस्तिष्क के लिए  महत्त्व  समझाने का .....या फिर उनके समझाए को हम ऊर्जा के तत्व को  इसी रूप में समझ सके ।

बस ;  इसके बाद यहाँ न सही  की चर्चा हो रही है न गलत की।  एक पक्ष की चर्चा हो रही है।

" In the Puranas, the male form is used to indicate the mind and the female form is used to indicate the world that the mind perceives. "

अब जरा इस  उपर्लिखित  वाक्य की बुद्धि  से उत्तर के इस  वाक्य के ह्रदय की यात्रा करें  तो भाव कुछ और ही मिलेगा , यहाँ ऋषि  इंगित  कर रहे है  पूरी सृष्टि  की ऊर्जा की तरफ  और उसके आकर्षण की तरफ , माया  की तरफ। पुरे सृष्टि के सञ्चालन की व्यवस्था की  तरफ  उनका बेहतर इशारा , जिसको अधिकांश रूप में  अपनाया भी गया।  पर  जो भाव था इसको समझने के पीछे  वो कहीं पीछे ही रह गया , और उसका  मूर्त रूप समाज में चला गया।  नतीजा  स्त्री को  माया मान के  अपनी इक्षाओं को उसकी खूंटी पे टांग दिया गया।  स्त्री पुरुष में  उत्पन्न शरीर के अनुसार भेद  पाया गया , और उसी को उसी मूर्त  रूप में सामाजिक  व्यवस्था  में शामिल किया गया।

यहाँ  थोड़ा  भेद  इसलिए  की  प्रकृति में ऐसा कुछ था ही नहीं  जो  उसके द्वारा दी गयी इन्द्रियों द्वारा जाना गया  , माना गया ,  और पालन किया गया।   इतना तो मान के चलिए  की प्रकृति स्वयं में माया स्वरुप है  तो इसमें जो भी हासिल होता है  वो माया में ही है।  ये शरीर  मन इन्द्रिय बुद्धि और भाव भी।   सिर्फ माया रहित  होने की चेष्टा होती है  ज्ञानियों द्वारा , इसके एक एक फेरे को काटते हुए।

* हृदय द्वार की प्रथम   घंटी के लिए -" प्रकर्ति  का एक एक कण  अपने आपमें पूर्ण है  जब पूर्ण पूर्ण में मिलकर एक आकार में ढलता है , तो वो भी पूर्ण ही होता है।
उदाहरण के लिए  वृक्ष  का जीवन   पूर्ण जीवन है।  एक वृक्ष इसीलिए  दैवीय  है , उसको भागना नहीं पड़ता  उसके अंदर ही सारी येन यांग  शक्तियां समायी है। उसका जीवन भी  चलायमान जीवो से कही ज्यादा है।

* हृदय द्वार की दूसरी घंटी  के लिए -"  मनुष्य  अन्य जीव बंधुओं  के सामान अधूरा  इसलिए है  क्यूंकि उसका  आधा हिस्सा  उससे अलग हो गया , प्राकृतिक रूप से।  और उस हिस्से को ढूंढने के लिए ही  उसको चलायमान शरीर दिया गया।  पर वो पुरुष  सम्पूर्ण अधूरा नहीं।   एक स्त्री  सम्पूर्ण अधूरी नहीं। यद्यपि प्रथम दृष्टि से  पुरुष पौरुष  प्रधान है  और स्त्री  भाव प्रधान ... पुरुष  बुद्धि तर्क प्रधान और स्त्री भाव  और प्रेम प्रधान ....    सिर्फ संतुलन  में  उलझन है ,  पुरुष  में स्त्री का भी आंशिक अनुपात है  और स्त्री में पुरुष का , जो उनके जीवन को दिशा और  ज्ञान देने में  सक्षम बनाता है।  यदि ये नहीं होता , तो पुरुष प्रेम नहीं कर पाता  और स्त्री के अधिकार में पुरुषार्थ नहीं आता। बात यहाँ  मूलतः सिर्फ संतुलन की आती है , गुणों की उपस्थिति  हर जीव में भिन्न भिन्न पायी गयी।


अब  इतना तो सपष्ट है  असंतुलन के साथ स्त्री एक  स्त्री है और पुरुष एक  पुरूष।  और जो असंतुलित शक्तियाँ  सहज रूप से मिलती है  तो  उनके  आधे आधे असंतुलित घेरे  मिलके  पूर्ण हो जाते है।

दुर्भाग्य से  हो कुछ ऐसा रहा है  की .... शक्ति प्रदर्शन और अज्ञानतावश ...अधिकारभाव  समभाव  सहभाव की  जगह  कब्जे के रूप में  ज्यादा स्थापित हो गया ,  एक दब गया एक  ने दबा लिया ,  ये शक्तिप्रदर्शन भी मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव ही है।  येन यांग के संतुलन को   नकारात्मक और सकारात्मक शक्तियों  को संतुलित करने के प्रयास से भी समझा जा सकता है


 दो सम शक्तियां विपरीत हो के अपने ही शक्तियों को  नष्ट  कर रही है ..

अब  उस वाक्य को समझना आसान हो जायेगा  जो पुराण में मिलता है।  कोई भी वाक्य या वाकया यानि की घटना  पूर्ण नहीं हो सकती , सिर्फ इशारा ही हो सकती  है ,.....  उदाहरण के लिए ;  यदि तराजू में एक पलड़े  में   सम्पूर्ण इक्षाओं  को ( मनुष्य की छोटी छोटी इक्षाएं नहीं  समस्त विश्व  की  ऊर्जा रूप इक्षाओं को ) एक तरफ  रख दिया जाए।   तो दूसरी तरफ के  पलड़े  में रखने के लिए  आकषर्ण  ही बचेगा , तो इस प्रकार   बुद्धि से उपजी इक्षाएं   पुरुष के पराक्रम का रूप है , और समस्त आकर्षण  जो  प्रेरक है ह्रदय में छद्म वास कर रहे मन से उपजे है  वो स्त्री का रूप  माने गए।

क्यूंकि निष्कर्ष  तौर पे  समाज में  स्त्री में  माना गया की वो अधिकार  से  पाने योग्य है  उसमे पुरुष को आकर्षित  कर पाने योग्य आकर्षण है।   पर ये धारणा  जब समाज में व्यवस्था के रूप में उतरी  तो  मूर्त रूप बना  स्त्री  बल पूर्वक पुरुष  द्वारा  अधिकार के योग्य है , पालन के योग्य है। परिणाम स्वरुप   वैदिक काल के ऋषियों  ने  सामान अधिकार की व्यवस्था की थी , वो ही  मलिन हो गयी। जिसका असर आज भी समाज में बढे रूप में देखा जा सकता है , सिर्फ भारत में नहीं पुरे विश्व मे  महिलाएं सामान अधिकार के लिए  संघर्षरत  देखी जा सकती है।
येन और यांग  का सिद्धांत भारत  का नहीं  अन्य देशो में भी जो भी प्राचीन मानवीय  सभ्यता से सम्बंधित है  चीन  ( जापान कोरिया )  आदि देशो  से आया है।   वह भी  उनके अधिष्ठताओ ने   यही विचार रखा जो भारत के ऋषिओं ने रखा।  जिसमे  माना गया  स्त्री पुरुष  यद्यपि स्वयं में पूर्ण है परन्तु   फिर भी प्रकृति से अपूर्ण , इनकी पूर्णता  मिल के ही होती है ।
* हृदय द्वार  की तीसरी घंटी के लिए -  मिलना सिर्फ शारीरिक  नहीं मानसिक भी है , भावनात्मक भी  है , जब तीनो एक साथ इकठे  हो जाते है तो  आत्म साथी  कहलाते है।  ये व्यवस्था प्रकृति से है।  प्रकृति ही मान्यता देती है।  हमारे मन / बुद्धि .. स्वयं की उपजी .... क्षणिक सी चाह से चाह  के भी कुछ नहीं कर सकते ।  और यही संज्ञानी की  सम्पूर्ण की सत्ता  की तरफ प्रथम स्वीकरोक्ति है

निष्कर्ष :

" समभाव , सहभाव , सह जागृति"  से ही सामाजिक उत्थान संभव है ....

*** अब जरा इस  वेदवाक्य को जो हिन्दू समाज में बीज मन्त्र रूप है, इस   नए ज्ञान  भाव  के साथ पढियेगा ,

 ॐ सह नाववतु ।
सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः


 (Om): Symbol of Parabrahman

सह (Saha): Together

नाववतु (Nau-Avatu): May He Protect us Both 
नौ (Nau) = Both 
अवतु (Avatu) = May He protect


नौ (Nau): Both of us

भुनक्तु (Bhunaktu): May Nourish

वीर्यं (Viiryam): Strength, Power, Energy

करवावहै (Karava-Avahai): [May] we Work Together 
कर (Kara) = Hand, Doer, Doing


तेजस्वि (Tejasvi): Possessing Vigour, Enlightening

नावधीतमस्तु (Nau-Adhiitam-Astu): May our Study be [Enlightening] 
नौ (Nau) = Both 
अधी (Adhii) = Study 
अस्तु (Astu) = Let it be


मा (Maa): Not

विद्विषावहै (Vidvissaavahai): [May our Study not] give rise to Hostility 
द्विष् (Dviss) = to Hate, be Hostile


शान्तिः (Shaantih): Peace

Meaning:
1: Om, May God Protect us Both (the Teacher and the Student),
2: May God Nourish us Both,
3: May we Work Together with Energy and Vigour,
4: May our Study be Enlightening and not give rise to Hostility,
5: Om, Peace, Peace, Peace.


दो ऊर्जाओं की प्रकर्ति में मान्यता सिर्फ इतनी है  " ॐ = सह "  , 
आपकी अपनी सामाजिक  पैदाईशी मान्यताओं से प्रकृति का कोई लेना देना नहीं  ...




साथ ही  इस विचार को धारण कीजिये  की ,' स्वयंसिद्धा ही योगी  होना , ज्ञानी होना , विचारवान होना समाज के उथान के लिए कितना आवशयक है , परम्परागत  व्यवस्था  , परंपरागत समाज को ही  जन्म देती है।'


ज्ञान अपनी हर खुलती परत में एक नए गंभीर अर्थ को समेटे रहता है , बस आपकी हमारी यात्रा की प्रतीक्षा में .......  सम्पूर्ण प्रकृति  अवसर पे अवसर दिए जा रही है।



असीम शुभकामनाओ के साथ  समस्त उर्जाओ के ईश्वर तत्व को  प्रणाम 

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