Wednesday, 21 May 2014

गुर्जिएफ़-क्षण



गुर्जिएफ़- क्षण होता है, समय का वो पल  जब ठहरा हुआ पल भी हजारो  पलों में   अलग अलग  ठहरे हुए पल के रूप में स्पष्ट हो जाये ......ऐसा ही ठहरा हुआ  
महान  छोटा सा पल  ही ज्ञान का दिया जला जाता है , अंतरात्मा को आनंद के  अनुभव से भर देता है   एक ऐसी सुगंध  फैला जाता है  जो आस पास के  वातावरण को सुवासित करती ही जाती है।  



बहुत बार जीवन में हुआ की दरवाजा खोला एक ठन्डे कमरे से निकल के बाहर आये काम किया और वापिस दरवाजा खोल के कमरे में दूसरे काम में व्यस्त हो गए। बहुत साधारण सी घटना है। जो दिन में कई कई बार किसी के भी जीवन में घटती है।

( * यहाँ मैं आपको कहना चाहूंगी ऐसा नहीं की अध्यात्म में सिर्फ सनातन धर्म का वर्चस्व है , संसार का कोई भी प्राणी प्रकृति से और परम ऊर्जा से एकाकार हुआ आध्यात्मिक है और यदि एकाकार नहीं हुआ तो किसी भी विषय का महारथी अभी अपनी मंजिल से दूर है फिर वो वैषयिक कला विज्ञानं या फिर स्वयं अध्यात्म ही क्यों न हो ! )

पर यही घटना जब विज्ञानं की और अध्यात्म की तरफ एक कदम और बड़ा दे शिखर दिखा दे , तो अद्भुत संयोग बन जाता है जो आत्मा को परमात्मा की तरफ प्रत्यक्ष और ले जाता है। इसी को ओशो ने गुर्जिएफ़ क्षण कहा है।

मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ , कई बार अलग अलग रूपं में इस गुर्जिएफ़ क्षण से सामना हुआ , ऐसा ही एक क्षण आपसे बांटती हूँ ; काफी समय से दिमाग में ऐसे प्रमाण इकठे हो रहे थे जहाँ विज्ञानं और अध्यात्म जुड़ते है , विज्ञानं तत्व रूप में तरंग रूप में और अध्यात्म विलक्षण तत्व और तरंग रूप में।

विज्ञानं का खोज के बाद प्रमाण पूर्वक ये कहना की जल से भरे बर्तन में जितना बड़ा लोहे का टुकड़ा डालोगे पानी उतना बाहर निकल जायेगा , ऐसा ही कुछ , विज्ञानं के अर्थ में ठंडी हवा और गर्म हवा के आदान प्रदान में महसूस हुआ। जितनी गर्म हवा कमरे में गयी वो तभी जा पायी जब उसी अनुपात में ठंडी हवा कमरे से बाहर निकली।

अब इसको जब अध्यात्म में उतारते है तो भी यही सिद्धांत कार्य करता है , क्यूंकि सिद्धांत विषय से नहीं प्रकृति से जुड़ा होता है , तो यहाँ भी हम प्रकृति से जुड़ के परम ऊर्जा के चक्र को जान पाते है।

शरीर से जुड़ के सोचे तो , जितनी शुद्ध हवा जिस अनुपात में अंदर गयी , अशुद्ध हवा उसी अनुपात में बाहर निकली , तो हम शक्ति से और उत्साह से भर गए , जीवन दौड़ने लगा। भाव से सोचे तो , जितनी नकारात्मकता हमने बचा के रखीं है , एक एक करके जाती हुई सांस के माध्यम से बाहर फेंकते है तो सकारात्मक ऊर्जा स्वयं अपने लिए स्थान पाती है और सहज प्रवेश करती है। सकारात्मक ऊर्जा , जीवन की तरफ ले जाती है , उत्साह का प्रतीक है , और नकारात्मक ऊर्जा क्षय की तरफ ले जाती है , मृत्य का प्रतीक है। एक मृत्यु के आगोश में गिरता हुआ इंसान पूर्ण रूप से नकारात्मक ऊर्जा से घिर चूका होता है।

एक नया नया जन्म लिया बच्चा पूर्ण जीवन ऊर्जा से भरा संपन्न , शरीर स्वस्थ प्रति पल बढ़ता हुआ दीखता है , जन्म से प्रथम वर्ष में बालक का शरीर प्रति पल बढ़ता है और ये वृद्धि का सिलसिला चलता है पंद्रह वर्ष की आयु तक , उसके बाद धीरे धीरे पच्चीस वर्ष तक ये वृद्धि होती जाती है। फिर वृद्धि का सिलसिला समाप्त हो जाता है। निश्चित है की यदि या तो कोई तत्व बढ़ रहा है अथवा घट रहा है। प्रकृति की ऐसी ही व्यवस्था है। उसके बाद , शरीर का क्षय शुरू हो जाता है। पर अनुभव हमको नहीं हो पता क्यूंकि अब हमको प्रकृति से बढ़ता नहीं मिल रही पर सांसारिक उपभोग जुड़ते जा रहे है अभी भी , अभी भी एक और कर्म जो प्रकृति आपके लिए नियत किया है संतानोत्पत्ति का वो बाकी है और उसके बाद ही ,शारीरिक और भावनात्मक झटके आपको अहसास दिलाने लगते है कुछ है जो आपसे दूर जा रहा है , अब खाते में संचित धन बढ़ नहीं रहा अपितु पचीस वर्ष तक संचित या प्रारब्ध से संचित चूकना शुरू हो गया , हमको मृत्यु रुपी घंटी के आवाज ही तब सुनाई देती है जब बाहरसे मिलने वाली ऊर्जा भी मिलने की जगह दूर जाने लगती है , तब पता ही तब चलता है , हे भगवान ये क्या हो रहा है , मेरे साथ ? या तो आने वाली पीढ़ी बर्बाद है , या मेरे लालन पालन में कमी है। ऐसा कुछ नहीं है सिर्फ जो आपको पंद्रह वर्ष में अहसास हो जाना चाहिएथा , वो ही भाव आपको प्रकृति द्वारा पचास या पचपन वर्ष में दिया जा रहा है।

यहाँ चूँकि प्रकृति के पास हमारे जैसे भाषा नहीं (जो दूसरे की सुनते ही नहीं अपनी कहते है और सुनते भी अपनी ही है ) यदि उसकी भाषा सुने तो सहज सुनाई देगा , उसकी व्यवस्था में सब ठीक चल रहा है। समझ तो हमारी ही बिगड़ी है। जो प्रकृति की मुखर ध्वनि सुनाई नहीं देती

ध्यान दीजियेगा ! जो जीवन आपका था , आप जिसके हक़दार थे वो मिल चूका है पंद्रह साल के अंदर , उसके बाद आप प्रक्ति द्वारा स्थापित कृत्य में शामिल हुए ..... धीरे धीरे पच्चीस वर्ष तक ये वृद्धि होती जाती है। फिर वृद्धि का सिलसिला समाप्त हो जाता है। इस माया मोह में और इसी सांसारिकता में उलझे उलझे हमको बाहर आते आते जीवन चुक जाता है !!!

यही है न !!

तो ये जो जीवन है अब पचीस के बाद का ....वो .....प्रारब्ध का है..... यदि माने तो ........और यदि न माने तो .......  प्रतीक ,,,,,, कृपा का है ---- पर आपका  तो.... बिलकुल भी नही। 


अब जो भी सुख दुःख आपको स्वीकार हो या नहीं इनके आने जाने पे आपका वश भी नहीं , शारीरिक अवस्था का क्षय होने लगता है , वृद्धावस्था दरवाजा खटखटाने लगती है , अकेलेपन को कभी आपने जिया ही नहीं तो वो भी आपको बीमारी ही लगने लगता है , शरीर में अन्य बीमारियां भी अपनी जगह पा के प्रवेश करती है। सकारात्मकता का स्वस्थ्य से सीधा सम्बन्ध है। नकारात्मकता के प्रवेश करते ही सैकड़ो बीमारियों को निमंत्रण स्वयं मिल जाता है।


देखा आपने !!!!  एक दम दुरुस्त रहने का  वैज्ञानिक सिद्धांत  जो प्रमाण के साथ परिणाम पे कार्य करता है , कैसे अपने  ही जनक अध्यात्म रुपी वृक्ष से जा मिला, जिस अध्यात्म को सामान्यतः  विज्ञानं आधार रहित  कल्पना लोक में विचरण कहता है । 

(पर मजे की बात  विज्ञानं  स्वयं स्वीकार करता है  के प्रमाण  की उन उंचाईयों  को जुटाने के लिए  कल्पनालोक में जाना ही पड़ता है   हाँ पर ये कल्पना  आननफानन  की नहीं   मनुष्य को सुविधा दे   जादुई  छलावे  और भटकाव  से बचाती है , ये तो है , वर्ना ऐसे भी  हमारे बीच  वो भी  मनुष्य ही है  जो आधारहीन  जादुई लोक  में   खुद भी तैरते है  और  नादानो  को  भी भटकाते है  , इसलिए कल्पना लोक   का विचरण बुद्धि  और भाव के  संतुलन में हो तो अच्छा  - आप्पो  गुरु  आप्पो  भवः  ) 

यहाँ आपको अवसर पहचानना है , जो प्रकृति आपको निरंतर दे रही है , इसका अध्यात्म से ज्यादा समझ से ताल्लुक है , प्रथम तो आपको सचेत हो जाना चाइये था जब आपकी आयु १५ वर्ष की थी , दूसरा संकेत आपको विवाह के समय मिलना चाहिए था , तीसरा संकेत जब आप माता और पिता बने थे , और चौथा स्पष्ट मुखर संकेत आपको अपने अकेलेपन से मिलना चाहिए। जहा अकेलापन एकांत है , बीमारी नहीं , आपकी जीवन यात्रा की तरफ उठता हुआ कदम है , मौन ही आपको मृत्यु शब्द के और सुनामी की तरह आती हुई मानसिक शारीरिक व्याधियों के अर्थ स्पष्ट करता है। यही क्षण चेतना जागृत करता है।

यहाँ इसलिए की नहीं आप बड़े ज्ञानी हो गए , बल्कि इसलिए अब आपके पास कोई उपाय नहीं बचा , और आप जीवन को समझने का प्रयास कर रहे है।

चलिए अब फिर उस सिद्धांत को ले के आते है जिससे वार्ता शुरू की थी , जिस अनुपात में ठंडी हवा, कमरे से बाहर जाएगी उसी अनुपात में गर्म हवा अंदर आएगी , यहाँ निश्चय आपका , आपका मौसम विभाग क्या कहता है , उसे ठंडी हवा चाहिए या गरम ,

निश्चित रूप से , प्रकृति के साथ ताल मेल सुखद होता है , जब अंतरात्मा ( मन / लौकिक चेतना ) नकारात्मकता से भरी है तो अब है वख्त शीतलता का , सकारात्मक ऊर्जा को निमत्रण देने का। और यहाँ भी प्रकृति आपके साथ है , जैसे ही प्रयास शुरू करते है , आपको परिणाम भी मिलने लगते है। परन्तु ये सिर्फ आपकी जानकारी के लिए ( sshhhhh ) क्यूंकि परिणाम पहले सोच लिया तो प्रयास हो ही नहीं पायेगा। यात्रा की सोचना है , सही टिकट , सही ट्रैन में बैठ गए तो सही मंजिल तक पहुँच भी जायेंगे। यात्रा और यात्रा में मिलने वाले सहयात्री भी अलग ही आनंद देते है।

शुभकामनाये आप सभी मित्रों को !!

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