Saturday, 31 May 2014

असंभव-संभव तंत्र

असंभव-संभव;अलौकिक-शरीर  लौकिक-शरीर सूक्ष्म-शरीर अतिसूक्ष्म-शरीर तंत्र का ताना - बाना 



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कुछ कार्य-संपादन इस तत्व निर्मित शरीर के जन्म के साथ असंभव है और कुछ इस शरीर के माध्यम से ही संभव ... इसकी सीमितता को मान के , जान के , आत्मसात कर लेना ही सम्पूर्ण आत्मस्वीकारोक्ति 
है

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जन्म स्वयं में स्वप्निल सत्य है जो अपने ही स्वप्न के 
अर्थात मृत्यु नाम के दूसरे किनारे पे जाके अपनी सीमितता को पूर्ण करता है और दूसरे सत्य की तरफ अग्रसर होता है। 

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इस स्वप्नवत संसार में धरती का छोर फिर भी मिल जायेगा परंतु तरंगो के किनारे ढूंढने निकलोगे तो जीवन समाप्त हो जायेगा , मृगमरीचिका रूप में ये आत्मा-मृग .. असार वन में भटक भटक के समाप्त हो जायेगा।

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जन्म से मृत्यु के बीच के घटना क्रम का एक एक करके घटती हुई घटना क्रमबद्धः रूप से जीवन रुपी माला में पिरोये हुए मनके के सामान स्वप्निल सत्य है 

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लोगो का अकस्मात् भेंट होना ,संपर्क होना ,अलग होना ,
नदी में बहते पत्तो के समान अथवा पहले से उपस्थित तरंगो का प्रवाह जैसा ही है जो मात्र सब स्वप्निल घटनाक्रम है. जीवो का जनम कहाँ किस रूप में कब तक किसके साथ बसेरा है , आदि आदि सब तरंगित यात्रा के भाग है

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एक बालक जन्म लेता है यदि समय पाश द्वारा तुरंत अलग करदिया जाये तो असीम कष्ट देता है परन्तु यही
समय के साथ अपना स्थान बनाने के बाद सहज रूप से चिड़िया जैसा उड़ जाये तो भी सिर्फ प्रसन्नता और आशीष ही बचता है। यदि इसके आलावा सम्बन्धो से कोई कष्ट ह्रदय में बाकी है तो वो स्वयं की अपरिपक्वता है , स्वयं का अज्ञान चित्त दशा है।

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ये भी विलक्षण है , जिस क्रम में जो भाव या वस्तु प्राप्त होती है उसी क्रम में वो अलग भी होती जाती है , और ध्यान दीजियेगा ,
जो वस्तु या भाव जी लिया जाता है , उसकी उपयोगिता पूर्ण हो जाती है , फिर वो अलग हो के भी कष्ट नहीं देती। कष्ट ...पीड़ा ....कच्चा भाव और 
शरीर से.जीवित अँग अलग अलग हो जाये वो ही देता है। स्वेक्छा से पूर्णता के साथ जिया हुआ भाव या अलग होता हुआ अंग भी पीड़ा नहीं देता , उदाहरण के लिए नाखून , या फिर केश या शरीर से उतरती हुई पुरानी खाल। 

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परिस्थतिजन्य सुख दुःख की तीव्रता का भान होना , छटपटाहट का भाव इसी स्वप्नमयी स्थति के अंश है 


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जो है जैसा है इसका भान होना आवश्यक है वो भी सम्पूर्ण स्वीकृति के साथ। किसी भी सम्बन्ध की खुदाई करने चले तो कुछ नहीं नहीं मिलगा शुन्य के सिवा , क्यूंकि मनुष्य स्वयं में शुन्य है। अस्तित्व विहीन है।

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इस शरीर और ऊर्जा के सम्मिलन में ही सारा रहस्य अपने को अनावृत करता है , ऊर्जा की सीमितता भी यही है की वो शरीर में है , तत्व उस ऊर्जा को बल पूर्वक गुरुत्वाकर्षण से पृथ्वी से जोड़ के रखता है, और उसकी निरंतर उर्ध्व गति की आकांछा बताती है की उसको ऊर्जा स्वरूप उसको निरंतर जागृत कर रहा है।

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संघर्ष असमंजस प्रयास और अस्थिरता , और निरंतर उद्वेग में रहना मस्तिष्क द्वारा स्वयं की चेतना को अनुभव करने की अवस्था का जीवित स्वप्निल प्रमाण है।

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ये भी अहसास होना की परिस्थतियाँ स्वयं की चाल से ही चल रही है , मनुष्य का संतुलन और समायोजन करते जाना , उसकी चेतना की निरंतर उर्ध्वगामी होती चेतना को दर्शाता है।

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क्लिष्ट और दुरूह शब्दों में न बांध के इसको सहज रूप से समझना ज्यादा उचित है की जन्म के साथ जो भी आपको मिला है , वो मृत्यु तक आपके साथ रहेगा। वो प्रतीति बहुत मौलिक है। इसके लिए किसी गहरे ध्यान की भी आवश्यकता नहीं।

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जब भी किसी ऐसे भाव का जन्म हो जो आपको निराशा की तरफ ले जाये , या फिर अत्यधिक सुख की तरफ खींचे , सुख में तो बिरले ही विचार करते है यदि किसी को सुख में विचार आ जाये तो निराशा घटेगी ही नहीं, निराशा अज्ञानता ही है, तो अपनी निराशा में विचार कीजियेगा , क्या ये आपको जन्म से मिला था ? यदि नहीं तो वो अपनी यात्रा में है और आप अपनी यात्रा में और ये भाव घट रहे है , भाव का घटना यानि की गति , प्रवाह , रुकेंगे नहीं , बह जाएंगे.... फिर वो चाहे अपना स्वयं से सम्बन्ध हो अथवा दूसरे से , कैसा भी सांसारिक भाव हो , वासनाएं हो , शोक हो , क्षणिक मोह हो , सब जो भी आपको यात्रा के मध्य में मिला है , वो आपसे अपने निश्चित समय पे अलग होना ही है। और जो भी जन्म से मिला है उसमे विकास हो या न हो , नश्वरता के सिद्धांत में क्षय भी हो , रोग हो पीड़ा हो (
दुर्घटना अथवा प्रारब्ध जन्य अपवाद छोड़ के ) परन्तु सामान्य रूप से वो मृत्यु तक चलेगा !

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ध्यान में अवश्य अपने स्वयं के गर्भ में नौ माह के वास की अवधि की यात्रा कीजियेगा स्वयं को उसी बीज रूप में, पहुँचाना है जहाँ से आपने ऊर्जा रूप में जननी के गर्भ में प्रवेश किया था ! और इस बीज रूप से बस पल भर दूर है आपका वास्तविक स्वरुप , शायद पल भी नहीं। और पास।

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इस वास्तिवक स्वरुप में या तो इस छोर से उत्तार जाइए जो जन्म से पूर्व का है , या फिर उस छोर से जो मृत्यु के पश्चात है , ये ऊर्जामय स्वरुप आपका ही है जो समस्त विकारो से अलग है। एक विकार छोड़ के , और वो है समस्त विकारो का जन्म स्थान , इन्द्र्य जनित सुखी जीवन जीने की परम आकांक्षा। यही है वो उद्भव स्थल जहाँ से बैठ के आपका तथाकथित मन और बुद्धि खेल खेलते है। तब तक जब तक मृत्यु आपको अपने आगोश में नहीं ले लेती।  पर ये भी जन्म तो आपकी ही इक्छा  थी ऊर्जा सहित सूक्ष्म शरीर रूप में। 


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थोड़ा और गहरे उतरेंगे तो ये सूक्ष्म शरीर भी नजर आएगा , और इसी बंधी समस्त वासनाओ की डोर भी दिखेगी। और इसका साक्षात्कार ही इससे छूटने का उपाय भी है। क्यूंकि इस सूक्ष्म शरीर से परे जो ऊर्जा है वो उस परम ऊर्जा का ही अंश है , इस परम अवस्था में कोई राग नहीं कोई द्वेष नहीं , मोह नहीं क्रोध नहीं , वासना नहीं , और स्वयं में परम पवित्र है। परम शब्द सबसे अधिकतम अभिव्यक्ति है भाषा की इसलिए मनुष्य के पास इसके अतिरिक्त कोई शब्द भी नहीं जो इस अवस्था को वर्णित करे ....

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इस अवस्था की परम अनुभूति ध्यानावस्था में सहज उपलब्ध है। स्वयं को स्वयं से जोड़ने का इससे बेहतर कोई उपाय ही नहीं , चूँकि इस अवस्था के लिए शब्द नहीं , भाषा यहाँ पंगु है , इस छलांग को सुखद मौन के माध्यम से पूरा किया जाता है। ( 
सुखद इसलिए  क्यूंकि मौन  अति दुःख की अवस्था का भी सूचक है जो फलित नहीं होता ,दुःख कारण  बन सकता है परन्तु शांति - सुख की अवस्था का मौन ही अनुकूल फलित होता है और सुख  का अर्थ  शांति से है आत्मिक  विश्राम से है )

बस जीवन का , यही छोटा सा असंभव - संभव सा शाश्वत सत्य है !


Buddha says: THE MASTER SHINES IN MEDITATION in the night.
By "the master" he means one who is trying to be a master of himself; by "warrior" he means one who is trying to be a master of others. But once you have attained, once you have become enlightened, then there is no question of day and night, no question of sun and moon. Osho 
The Dhammapada: The Way of the Buddha, Vol 11
Chapter #7
Chapter title: Beyond the beyond
17 April 1980 am in Buddha Hall


जीवन यात्रा की असीम शुभकामनाये !

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