Saturday, 17 May 2014

चक्र _ नृत्य -- कृष्णा _ नृत्य


चक्रो  का सम्पूर्ण ताल मेल समझते ही  कृष्णा  नृत्य  स्पष्ट हो जाता है , जहा  कृष्णा  अपने नृत्य द्वारा हर ऊर्जा केंद्र में  जीवन शक्ति  का संचार  अपने बांसुरी वादन द्वारा  करते है  , वो हर  जीव  के  मेरुदण्ड रुपी  खोखली  बांसुरी  में  अपने  प्राण फूंकते है ( ईश्वर की फूँक  स्वयं ईश्वर का ईंधन है ) और विभिन्न स्वर का जन्म होता है।  विभिन्न कलाओं को शक्ति मिलती है। सम्पूर्ण  रूप से  आनंदमय  अनुभूति ,  चक्र  नृत्य ,  ये शब्द ही अंदर से आनंदित कर गया , तो इसको जीना कितना सुखकारी हो सकता है !  अद्भुत  है।

जब  कण कण नृत्य  में मग्न है  , सपूर्ण ऊर्जा नृत्य  में डूबी है , तो इंसान क्यों अपने ही  सुख को   खंड खंड करके   उदास हो के बैठा है ,सीधी सी बात है , ऊर्जा  प्रकटीकरण  मांगती है , पल पल ये ऊर्जा  प्राकट्य को आतुर है , अलग अलग रूपों  में  , मानव में यही ऊर्जा चक्रो के रूप में  प्रकट होना चाहती है।  संतुलन में प्रकट हो तो सौंदर्य से भरी  किनारो से बंधी  नदी सामान  होती है , और असंतुलन में  बाढ़ की स्थति कितनी भी भयावह हो सकती है।

सम्पूर्ण ऊर्जा संगीतमय है  , सम्पूर्ण प्रकृति ऊर्जा के सहयोग से  नर्तन में लिप्त है ...... चक्रो  को  नृत्य से संगीत से जोड़ने का   सुन्दर प्रयोजन  है की ऊर्जा  अपने सुन्दरतम  रूप में अधिकतम प्रकट हो  , कला  माध्यम बनती है  हर प्रकृति के व्यक्ति को समेटने का ,  बह्योन्मुख  है तो भी सुन्दर और अंतरुनमुख है तो भी सुन्दर। कला   अपने  ह्रदय में हर भाव को समेटे  है  कह सकते है की  यदि अमृत का प्रभाव द्विगुणित करती है तो विष  के प्रभाव को  न्यूनतम करती है।  सारे  उद्वेग  मनःस्थतिया , खुशिया  , दुःख इसके आश्रय  में शांत  होते है।



इसी कारन जब  चक्रीय तालमेल    नृत्य से  जुड़ जाता है तो  सारी  अभिव्यक्तियाँ  चाहे वो  शारीरिक  हो मानसिक  हो या  आत्मिक  सभी  अभिव्यक्तियों को  शांत होने का अवसर मिल जाता है।

नृत्य द्वारा  शरीर को थकाया जाता है , और  अभिव्यक्ति दवरा  मन शांत होता है।  कलाकार की  कला संतुष्ट होती है , गायन वादन और नृत्य  तीनो  इसी  क्षेत्र में आते है ,  फिर  कलाओं के अन्य रूप जैसे लेखन भी कला है ,  चित्रकारी भी  कला है , अभिव्यक्तियाँ   और उनका  सुन्दरतम प्रकटीकरण  हर रूप में सुन्दर है।  सराहनीय है।   अपनी  अपनी योग्यता और रुझान के अनुसार  उचित मात्र में अपनाया जाना उचित फल देता है , निश्चित ही  जब हम  प्रतीक रूप से कला की बात करते है , तो व्यावसायिक दृष्टिकोण कहीं भी नहीं ठहरता।   व्यावसायिक  आवश्यकता इस विषय से बिलकुल  अलग है।

प्राकृतिक रूप से कलाओं  या फिर किसी भी रूचि अनुसार कला से जुड़ना   मानसिक और शारीरिक स्वस्थ्य के लिए वरदान समान है।

Dancing the seven chakras is like dancing into seven different inner landscapes, each with its own lessons, meanings and stories. We explore our instincts, sexuality, and power, how we love and communicate, our intuition and our spirituality.



गायन , वादन  और नृत्य तीनो में ही  अभिव्यक्ति  अलग अलग  चक्रो  को छूती है  ,  इसीलिए जब कलाकार  कला में डूब के  प्रकट होता है  तो अपनी परम ध्यान की अवस्था में ही  ठहरा होता है।  उन क्षणों में   उसको  टोकना  या  रोकना  , एक भक्त की पूजा को बीच में रोकने के सामन ही कष्टकारी है।   जो स्वयं कलाकार के  ऊपर  अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ता ,  एक ध्यानी का ध्यान  पूर्ण हो , कलाकार की कला पूर्ण  अभिव्यक्त हो तो उचित फल वाली सिद्ध होती है।

"To dance then, is to pray, to meditate, to enter into communion with the larger dance, which is the universe." Jean Houston

" When we dance to the tribal rhythms of the base chakra we reconnect to the primal part of our selves. We reclaim our deep inner instincts."

कुछ महत्वपूर्ण  चक्रो  के विषय में  नीचे चर्चा द्वारा  समझने का प्रयास  करते है



आप में यदि  एक रचनात्मक भाव मुखर है, तो आपके त्रिक अथवा स्वाधिष्ठान  चक्र पर ध्यान केंद्रित बनाने जीवन के लिए इस  विधि   से  अपनी  मदद कर सकते हैं. (अपने निचले पेट पर) अपने त्रिक चक्र में कुछ समय गहरी सांस लेने बिताना  है  और अपनी सांस एक जीवंत नारंगी प्रकाश से भर जाता है।  कल्पना की  प्रत्येक सांस के साथ अपने निचले पेट में इस प्रकाश  से भर रहा है ,  इस चक्र  के आंदोलन के लिए  , इसको  गोल घेरे में गोल गोल  बाएं से दाए और दायें से बाएं , फिर  पूर्ण  घेरे  में घुमाना है, ऊर्जा को  जिस रूप में भी प्रकटीकरण मिलता है  उसी रूप में  उसका विकास भी हो जाता है , इस कलात्मक  प्रयोग से  इस ऊर्जा  द्वारा   हम अपने अद्वितीय विचारों को जन्म दे सकते हैं ,  त्रिक / स्वाधिष्ठानचक्र खुलने के बाद हमारी  ऊर्जा  अन्य  रचनात्मक चक्रो को भी जगाने  लगती  है.


हमारे गले चक्र / विशुद्धि चक्र  को खोलने का सबसे शक्तिशाली तरीकों में से एक जप  माध्यम  है. जैसे ही हम अपने गले के चक्र को खोलते है  ,हम  वाणी  के प्रति  सहज हो जाते है  . गले चक्र के लिए एक सरल मंत्र "अम" 'हम' है. में एक गहरी सांस लेते हैं, और आप साँस छोड़ते के रूप में, ध्वनि "अम" 'हम'' का जाप. जब तक आप सहज महसूस करते है  इसका जाप कर सकते है , गले के क्षेत्र में कम्पन महसूस करना है  और यह स्वर आपके  अपने पूरे ऊर्जा क्षेत्र में स्पंदन  करता  हैं.


इसी प्रकार यदि  भाव  को चोट लगी है या भाव पक्ष  स्वयं को कमजोर महसूस करता है, रंग हरे रंग के कंपन का उपयोग कर शांत करना चाहिए  और भावों को  आराम देने  के लिए भी  इस कम्पन का उपयोग कर सकते हैं.


इस तरह (अपने ह्रदय  चक्र में) अपनी छाती के बीच में में एक हरे क्रिस्टल के भाव के साथ या आपके ह्रदय केंद्र में प्रकृति की चिकित्सा  के रूप में हरे रंग को  साँस द्वारा  अंदर  लेने में कल्पना   शांति मिलती है।सम्पूर्ण  ह्रदय चक्र  का साधना  श्री  कृष्णा और राधा  के  रास नृत्य से भी  जाना जा सकता है। और महा रास की अभिव्यक्ति  और गुणों का तो  वर्णन ही इस  ह्रदय  चक्र रूप  में  संभव नहीं  जहाँ सपूर्ण प्रेम भाव को सम्पूर्ण अभिव्यक्ति मिलती है।


आप  जीवन (पैटर्न, स्थितियों, नकारात्मक विचारों, से पीड़ित  है) से जारी करने के लिए करना चाहते हैं कुछ भी नहीं है, तो आप इस तीसरी आंख द्वारा / आग्यां चक्र  ध्यान की कोशिश से  लाभ  हो सकता है. नीला  रंग इस चक्र के लिए  प्रेरक है .......माँ पारवती को सती रूप में   को खोने के बाद  किया गया शिव का तांडव  नृत्य  इसी  चक्र को साधता है।

तीसरी आँख चक्र हमारे अपने व्यक्तिगत फिल्म स्क्रीन की तरह है; हम, हमारी यादें याद रात में हमारे सपने देखते हैं, और हम यह देखना चाहते हैं कि हमारे भविष्य की कल्पना कर सकते हैं. आप अपने तीसरे नेत्र की शक्ति को मजबूत करने के लिए इस सरल व्यायाम की कोशिश की तरह हो सकता है ...  तीसरे नेत्र की शक्ति  परम जीवन शक्ति है  जो आम  कल्पना से लेके परम कल्पना से जुड़ती है।  इस स्थान  सफ़ेद स्पष्ट क्रिस्टल स्क्रीन है , जिसके पटल पे आपके दवरा  रचित  चित्र  उभरते है , ये आपकी रचनाओ को भी शक्ति देता है।


(सिर के शीर्ष पर सहस्त्रधार ) मुकुट चक्र में हम अपने उच्च स्व द्वारा , अपनी  आत्मा से  संबंध बनाते हैं.जहाँ  हम अपने आप से पूछते  है " क्या मेरे जीवन की धुन  मेरी आत्मा के उद्देश्य से मिलती है ?" सहत्रधार  को नृत्य  और संगीत  द्वारा  कैसे साधे , जिज्ञासा  जागती है ! इसको साधने के लिए एक उपयुक्त स्थान  पे  आसान लगा के  अपनी आँखें बंद कर के  तीन गहरी साँस लें. यहाँ  जो भी  नकारात्मक भाव  अंदर से बाहर  निकालना  चाहते हैं , उस की एक स्पष्ट मानसिक छवि के रूप में.  विचार बना के एक बैंगनी लौ कल्पना  करते हुए  एक गहरी सांस लें और  अपने मुँह से साँस छोड़ते हुए , उस नकारात्मक विचार वाले चित्र को विदा देना है।  अपनी नाक द्वारा  ली गयी  साँसे  बैंगनी रंग की  लौ के रूप में   सकारात्मक  ईंधन हैं. और  अपने मुँह से गहरी  साँस  रुपी ईंधन को नकारात्मकता लौ के रूप में छोड़ते है , हमारी  बाहर छोड़ी गयी साँसे  नकारात्मक  ईंधन  का  सकारात्मक उपयोग है   और आहिस्ता आहिस्ता समस्त   सकारात्मक  परिवर्तन   सहस्त्रधार द्वारा  प्रवेश करने लगता है और नकारात्मक विचार पर्यावरण में  घुल जाते है ।



समस्त  भाव  ध्यान में  जीवन ऊर्जा  का  आंतरिक प्रवेश  और सामूहिक चक्र_नृत्य  होता है और इस रूप में ऊर्जा  का आवागमन हो पता है।

I began to think of the soul as if it were a castle made of a single diamond or of very clear crystal, in which there are many rooms, just as in Heaven there are many mansions.” Saint Teresa of Avila



In the Hindu tradition, Saraswati is the Goddess of learning, knowledge, and wisdom. The Sanskrit word sara means "essence" and swa means "self." Thus Saraswati means "the essence of the self.

यदि सभी  चक्र को ,उसकी ऊर्जा  उसके स्वरुप को जिया जाये  और जागरूकता के साथ जिया जाये , हमारी ऊर्जा क्षेत्र में परिवर्तन - अधिक उज्ज्वल और स्पष्ट हो जाता है. सकारात्मक  चुंबकीय  क्षेत्र चलायमान होके परस्थिति जनित  नकारात्मक  ऊर्जा  को परिवर्तन  करने के लिए आपके चक्र  तैयार हो जायेंगे , जो आपको भविष्य में  कई नए अवसरों  और व्यक्तियों तथा  नवीन अनुभव  से  मिळवायंगे ...




कला  के सभी  माध्यमों से उन्नत प्रभावशाली  चक्रीय ऊर्जा के प्रवाह की ....  सभी मित्रो और समस्त आत्माओ को शुभकामनाये 

ॐ ॐ ॐ 

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