Sunday, 25 May 2014

बुद्धा,एक भाव

( यादाश्त के आधार पे कुछ श्रेष्ठ-बुद्ध-भाव-विचार आप सब बाँट रही हूँ )

प्रसंग : एक ऐसे ज्ञानी गुरु बुद्ध के पास क्षोभ भाव के साथ आये , जिनको स्वयं के क्षोभ का ज्ञान नहीं था , आके प्रणाम किया और विनम्रता पूर्वक कहने लगे आपने मेरे शिष्यों को क्या कह दिया की वो मेरे शिष्य अब नहीं ! यही जानने के लिए आपके पास आया हु , कृपया अपने ज्ञान की दिशा और सिद्धांत बताएं ! 

क्या आप उत्तर देंगे ? 

बुद्ध ने कहा :  अवश्य ! 

आपके ज्ञान का आधार और सिद्धांत क्या है 

बुद्ध ने कहा: मात्र, ध्यान ! दिशा अनुभव की और दशा वैचारिक स्वतंत्रता की और संपादन स्व ध्यान द्वारा। इसके अतिरिक सिद्धांत और दिशा बंधन है। 

तो क्या आपके शिष्य आपके अनुगामी नहीं

बुद्ध ने कहा : संभव ही नहीं ही नहीं , क्यूंकि ज्ञान का मार्ग स्व अनुभव का है , सुझाव और मित्रता मात्र आधार है ..

क्या आपको पूर्ण विश्वास है ? 

बुद्ध ने कहा: क्या आपको अपने अविश्वास पे विश्वास है ? आपके विचार आपके प्रश्न आपकी मनःस्थति बताते है यदि अपने अविश्वास पे भी विश्वास कायम है तो ये भी ज्ञान की स्थति नहीं मस्तिष्क जनित तर्कपूर्ण स्थति ही है। "

( देर तक विस्तार से वाद विवाद शंका और तर्कपूर्ण स्थति से बाहर आते ही तत्क्षण वो बुद्ध के चरणो में गिर स्व-अनुभव की शिष्यता स्वीकार कर ली )




स्व-ध्यान अनुभव प्रयोग से पता चलता है > 
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मस्तिष्क के खेल भी निराले है , विश्वास भी छद्म और अविश्वास भी डोलता हुआ , फिसलता हुआ , छद्म अविश्वास कहीं झूट विश्वास का रूप ले कर धोखा देता हुआ दिखता है ! 

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टटोलना है कि अविश्वास ने कहीं सिर्फ स्थान तो नहीं बदला , पहले स्वयं पे विश्वास था और बाहर अविश्वास फैला था , अब अंदर अविश्वास और प्रयास से ह्रदय भर गया और कही एक स्थान पे विश्वास टिक गया है।

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पर ये भी परिवर्तनशील है ! अभी भी ये अवस्था तुरीय की नहीं ! चंचल है , चलायमान है, गतिवान है ! बुद्धिमत्ता पूर्वक ह्रदय की संशय से लपलपाती लौ का ठहर जाना ही मध्य की स्थिति है , अब कोई संदेह नहीं , प्रश्न जिज्ञासा तर्क समाप्त हुए !

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विचारो के जन्मस्थल को जानना ही उनसे छुटकारा पाने का मात्र उपाय है 

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अज्ञान ही समस्त विषमताओं की जड़ है जो मात्र ध्यान से दूर होता है !

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ध्यान का मार्ग स्व का मार्ग है अनुभव का मार्ग है , नियम पालन का नहीं ! जिसका अंत विकसित ज्ञान कमल रूप में होता है ! 

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ध्यानी स्वयं का अनुयायी होता है ! और अंतर्मन में स्थित शांत झील में विचरण करता जाता है। 

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ध्यानी का अनुगमन भी संभव नहीं क्यूंकि मात्र प्रत्यक्ष तत्व रूप से संकेत ही मिलते है। अनुगमन कर्ता को तत्व ही हाथ आएगा। भाव अनुभव फिसल जायेगा ! 

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ध्यान की अवस्था में प्रवेश से लेकर विकसित ज्ञान कमल तक की यात्रा एक विशाल नदी नाव द्वारा पार करने के समतुल्य है , जिसको नदी पार करने के पश्चात साथ नहीं ले जा सकते। सिर्फ अनुभव साथ जाते है ! 

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विचार में बहुत शक्ति है , बरगद के वृक्ष के सामान विचार अपनी जड़े  सु-प्रभाव और दुष्प्रभाव के रूप में शरीर में फैलतें है, इनका जन्मस्थल जानना ही इनसे मुक्ति का एक मात्र उपाय है ! 

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वैचारिक जन्मस्थल के ज्ञान के पश्चात ही बाहर के सामुद्रिक उथल पुथल से दूर अंतस्थल की शांत झील दिखयी पड़ती है। 

शुभकामनाये !

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