Sunday, 4 May 2014

केंद्रित मौलिक शक्तियों का सुशासन और विकेंद्रीकरण



मौलिक शक्तियों मे जो भी आपको अधिक दुष्कर लग रही हो उनको प्रथम दृष्टि मे समझने के लिये छोटे छोटे विभाग बना के हर एक विभाग को अपनी योजना समझा दीजिये। ये तो हुआ आपका अपना शारीरिक और उर्जात्मक प्रशासनिक तंत्र जिस पे आप उसी प्रकार कार्यवाही कर सकते है जैसे कोइ भी सुचारू रुप से चलने वाला संस्थागत प्रशासनिक तंत्र , क्यूंकि उस परमेश्वर ने एक सम्पूर्ण तंत्र आपके हवाले किया है जिसकी देखभाल करना आपका नैतिक कर्तव्य भी है , इसमें सारे विभाग है अलग अलग व्यवस्था के लिये , और सम्पूर्ण व्यवस्था की जिम्मेदारी आपकी है। हालाँकि आपका कुछ भी नहीं , ठीक उसी प्रकार जैसे किसी के अधीन जब आप नौकरी कर रहे है तो वहाँ आपका क्या है ? सिवाय कर्तव्य के ? जब तक नौकरी पे है तब तक संस्था की देखभाल की जिम्मेदारी आपकी और जब ड्यूटी पूरी तब आपका कुछ नहीं , शरीर का त्याग भी ऐसे जैसे आपका कार्यकाल पूरा हुआ और अब किसी और के लिये जगह बनानी है । ठीक इसी प्रकार निर्लिप्त भाव से शरीर के किसी भी विभाग के रखरखाव और नैतिक व्यवस्था का दायित्व आपका है। 



मौलिक क्या है ? मौलिक वो सब है जो जो आपको प्रकृति से मिला है , वो भाव , वो अंग प्रत्यंग और प्रेरक भी। चूँकि ऊर्जा का वास नस नस मे है इस कारण हर सेल मौलिक शक्ति से भरा है। इसको और अधिक समझते है …… पहला विभाजन जो है वो मुख्य रूप से इन्द्रिय जनित है सात इन्द्रियां जिनमे पांच प्रमुख रुप से सभी परिचित है छठी इन्द्रिय जन्म_ऊर्जा मूलाधार से सम्बन्धित है और सातवी परा से यानी कि मोक्ष से। बीच की पांच दैनिक जीवन मे काम आती है। छठवी और सातवीं इन्द्रिय अनुभव युक्त है। इनके दुष्परिणाम से बचने तथा इनको समझने के लिये पात्रता ग्राह्यता आवश्यक है। पात्रता और ग्राह्यता के लिये ध्यान से सुँदर और सुव्यवस्थित कोइ अन्य उपाय है हि नहीं। गुरों मे गुरु श्रेष्ठ सदगुरु स्वयं आपके हृदय मे वास करते है। आपको किधर देखना ! वो गुरु आपको सहज प्रकाश देगा ।

इन्हीं दो इन्द्रियों मोक्ष और काम मे मानव चेतना अज्ञानतावश सबसे ज्यादा भटकती है क्यूंकि ये वर्णनतीत है अनुभव युक्त है और भारतीय समाज मे ज्यादा कुछ कोइ कहने और समझने वाला भी नहीं , परन्तु इनकी शक्तिओं को , वेग को और इनके प्रभाव को सभी उम्र के लोगो मे सहज समझा जा सकता है। ओशो ने इस विषय पे काफी कुछ कहने का यत्न किया है परन्तु दुर्भाग्य वश ठीक से समझा नहीं जा सका। 




अद्भुत बात ये है कि ये दोनो ही इंद्रियां ध्यान द्वारा अत्यंत सहजता से समझे जाने योग्य है। इतना तो निश्चित है , दमन सातों मे से किसी भी इन्द्रिय को स्वीकार नहीं … दमन से इनकी शक्तियां और विपरीत दिशा मे चलती है। हाँ ! जागरूकता और समझ से ये शांत होती है।

विकेंद्रीकरण की  चर्चा इसीलिए की थी , कि सातों इन्द्रिय शक्तियों को अलग अलग ध्यान  की  प्रक्रिया  द्वारा  शांत किया जा सकता है , ऊर्जान्वित चक्र साधना और इन्द्रियों को साधना एक ही बात है , सिर्फ़ शब्द अलग है , इनमे से प्रचलित पांच के लिये आपका मस्तिष्क और मन लयबद्ध तरीके से थोड़े योग से मान जाएँगे और दो के लिये थोड़ी साधना करनी होगी , इनकी तृप्ति लिये कभी कभी मन मस्तिष्क दोनो हि हड़ताल करेंगे। तो क्या ? आप अपने कर्मचारियों की  सारी मांगे मान लेते है ! कुशल प्रशासक उचित मांग उचित समय पर ही मानते है , अच्छे प्रशासक बनने के लिये आपको कुछ नहीं करना सिर्फ़ साक्षी भाव साधना है , शक्तियों का उठना बेकाबू होना और शांत होना सब आपको तटस्थ होके देखना है। मन और मस्तिष्क प्रबल सहयोगी है इन्द्रियों के। एक एक करके सातों द्वार पार करके जिस दिन आप केंद्र मे स्थित हो गए , ये सब आपके दास हो जाएँगे। फिर ये कष्ट नहीं देंगे वरन शक्ति बन जायेंगे। पांच के साधते ही छटा और सातवा स्वयम ही समझ जाते है कि आप उनके चक्कर मे आने वाले नहीं फ़िर हाड़ताल तो दूर वो आपसे जिद्द करना भी छोड़ देते है।

कुशल प्रशासक वो है जो अपने तंत्र को भली भांति समझता है कर्मचारियों के मूलभूत स्वास्थ्य का उचित ख्याल रखता है , उचित मांगो को स्वीकार करता है , अनुचित को समझा के अनुशासित करता है (दमन से नहीं ) परम ने आपको ये तंत्र सौंपा है बडे प्रेम से , अधिकार से।  आपको  भी इस  तंत्र  की  सम्पूर्ण व्यवस्था  भली प्रकार से समझ बूझ के करनी है  उसी  प्रेम  से  और  उसी  अधिकार से। दमनकारी दुष्ट शासक के रूप मे नहीं।

और एक बात बताऊँ , हम सब बड़े सयाने है , बालकाल से हमको सब पता है , घर के बुजुर्ग से लेकर , स्कूल के अध्यापक और प्रधानचार्य तक , फिर नौकरी मे बॉस और घर मे पति या पत्नी स्नेही का हम सम्मान करते है , और कठोर अनुशासन मे बंधने वाले को खूब खरी खरी पीठ पीछे से सुनते है , ऐसे दुष्ट शासक का तो कहना भी उतना ही मानते है जिसमे जीवन चलता रहे , जब कि प्रेम पूर्वक हमारा पालन पोषण यदि कोइ करता है , उसकि हर इक्षा का सम्मान हम करते है , और उसकी आज्ञा से कही ज्यादा प्रदर्शन हम अच्छा काम करके करते है।

तो फ़िर अलग क्या है ? जो आप नहीं जानते ? आप तो स्वयं बड़े सयाने है। तो फिर आपकी इंद्रियें भी तो आपके ही अंदर वास करती है। प्रेम से अनुशासित कीजिये और सुशासन की स्थापना कीजिये।

इन्द्रिओं के आलावा और मौलिक क्या है ? दूसरा विभाजन के अंतर्गत कुछ वृत्ति प्रेरक सहज होते है जो जन्म से या फ़िर कह लीजिये वंशानुगत और कभी कभी असामान्य रूप से जीव के जन्म से उसमे मौजूद रहते है , किसी, विशेष विषय मे अत्यधिक झुकाव , अत्यधिक समर्पण , और अत्यधिक योग्यता , आदि , मात्र इन्द्रियगत आधार पे नहीं होते , और ये गुण भी मौलिक है। इस प्रकार के गुणों का विकास , जीव में यदि हैं तो बड़ो का दायित्व है निश्चित समय तक उनको पोषित करना ताकि उचित समय पे वो पूर्ण शक्तिसे अपने को प्रदर्शित कर सके। उस जीव की परम संतुष्टि भी उसके पूर्ण प्रस्फुटन में ही है।

इस प्रकार मौलिक शक्तियों में जन्मजात वृत्तियों को समेटे सात इन्द्रियां , मन, और मस्तिष्क है जिनकी चर्चा ऊपर कर चुके है। दरअसल मन आपका मूल प्रेरक है ,इन्द्रियां और मस्तिष्क तब तक सुप्त है जब तक प्रेरक पीछे नहीं पड़ता। मन  इक्छा जागरण के लिये ओर  उनकी  तृप्ति के  लिए  इन्द्रियों  को  ही माध्यम बनाता और दिखावे के लिए मस्तिष्क की प्रेरक के रुप में कार्य करता है , फ़िर मस्तिष्क राजा की समान इन्द्रियों को आज्ञा करते है , और इन्द्रियाँ मूल रूप से मन कीं सतुष्टि की लिए कार्य करती रहती है । इस प्रकार से ये चक्र चलता रहता है। तो वस्तुतः मन ही आपका मूल चाणक्य है।  महान राजनीतिज्ञ , जो हर तर्क मस्तिष्क दवरा स्वयम को ही दिलवाता रहता है , और मनमाना कार्य करवाता चलता हैं और जीव वास्तव में जो असली राजा है , वो निर्बल सा जीवन जीता रहता हैं। पर सिर्फ तभी तक , जब तक मस्तिष्क मन और इन्द्रियाँ भेदन नही होता। 




तीसरे प्रकार के विभाजन मे मौलिक रुप से , भूख , प्यास , सोना , भाव दर्शन (हसना , रोना , करुणा , दया, प्रेम ; अतृप्त भाव के कारण उपजे क्रोध तथा भय के कारण उपजे लोभ , मोह , द्वेष आदि )



जिस दिन ये जाने गये। उसी दिन से ये मित्रवत व्यवहार करने लगते है। और मौलिक ऊर्जाओं का उद्गम स्थल समझते ही , स्वतः समस्त सम्बन्धित भावनाए सब तरंगे शांत झील के उपर उपर चलने वाली छोटी छोटी लहर सी मालूम पड़ती है , जिनका शांत झील के लिये कोइ अस्तित्व ही नही । वास्तव में झील जानती है समझती है , कि लहरे निश्चित समय के अंतर्गत है , परिवर्तनशील है। इनका क्या आना और क्या जाना ! स्थिर झील के जल मे जो सुंदरता है जो मौन मे सुख है निमग्नता मे जो आनंद है वो हल्की लहरो के उपर डोलने ए नही। सहज ही निर्बाधित शक्ति के उपयोग और दुरूपयोग का भान होने लगता है और करते भी साक्षी के समक्ष स्पष्ट हो जाता है।




मित्रों ! मेरे अंदर के सद गरू ने जो मुझे दिशा निर्देश दिया , वो मैने आपसे बांटा , निश्चित आपके अंदर वास करने वाले सदगरु भी वो ही है , और आपके लिये भी उन्होने पहले से ही रास्ता निश्चितकर लिया है। बाहर इधर उधर भटकने से और धोखा खाने से ज्यादा अच्छा कि आप उन पे.... अपने अंदर के गुरु पे विश्वास कर सकते है। 

आपको सफलता अवश्य मिलेगी ! 

असीम शुभकामनायें

ॐ ॐ ॐ

No comments:

Post a comment