Wednesday, 7 May 2014

आध्यात्मिक स्वार्थ

दोस्तों ! जो कुछ भी आपसे यह विचार बांटती हूँ , ये भाव भी आध्यात्मिक स्वार्थ के अँदर हीं है , ये सब मेरे अपने भले के लिये है , यदि इसको पढ़ के कोइ स्वयम का इन शब्दों से ताल मेल बिठा पाये , तो मेंरा सौभाग्य , अहो भाग्य , और उस परम को आभार !! 

कई कई स्तर पे भाव भी उपजते है , जिनको समझने वाले स्वयं ही गृहण करते चलते है , हर एक के ह्रदय को हर भाव का स्पर्श नहीं कर पाता , अक्सर बात दिमाग तक आके रुक जाती है , ऐसा नहीं कि विचार नहीं या के इक्छा नही , " सिर्फ " उपयोगिता नहीं मह्सूस होतीं। जब तक परिस्थितिया विपरीत न हो जाये तब तक जीवन चलता रहता है , अपनी गति से। 

एक बहुत अच्छा भाव पढा आप सब से बांटतीं हुँ , जीवन अक्सर छोटा पड़ जाता है , अपने अस्तित्व को " लोग क्या कहेंगे " के आधार पे समेटने मे। लोगो का क्या है ! हर हाल में कहने वाले तो मिल ही जाएँगे , समस्त असफलताओं के साथ हमारी आपकी शक्तियां समाप्त हो जायेगी , तद अनुरूप ढ़ालने मे।


 

आध्यात्मिक स्वार्थ ये कह्ता है , मानसिक और शारीरिक स्वस्थ्य के साथ और स्वस्थ्य लाभ करते रहना ही चाहिए , क्यूंकि यदि प्रयास छोडा तो तुरन्त ग्राफ़ क़ी रेखा नीचे को लुढ़कने लगती है , यहि संसार है ,संतुलन का प्रयास हीं मातृ उपाय है। ये मध्य बिंदु का साधना ही दुष्कर है , किसी के भी लिये , ये अत्ति सामान्य सा सांसारिक नियम है , या तो निर्माण हो रहा है या फिर तत्व अपने मूळ स्वरुप को वापिस लौट रहा है , स्थिरिता प्रयास है। संतुलन प्रयास है। और ये नियम प्राकृतिक है इसलिए भेद रहित है ज्ञानी के लिये भी , साधू (सज्जन ) के लिये भी सन्यासी के लिये भी , गृहस्त के लिये भी , बालक भी और वृद्ध भी , मर्यादित भी और , मर्यादित होने के लिये प्रयास रत भी।

सभी समान है प्रकृति के लिये, पदार्थ हो या जीव। वो सभी को सामान अवसर देती है।

आध्यात्मिक रूप से अपने जीवन के प्रति , अपने नैतिक घेरों के प्रति अपनी प्राथमिकताएं , कर्तव्य , जिम्मेदारियां स्वयं निर्धारित कीजिये बिना इस बोझ के कि लोग क़्या कहेंगे। और " सब से ऊपर " अपनी जीवन यात्रा , जिसके लिए जन्म लिया है , उसको विस्मृत नहि करना है एक पल के लिये भी। जीवन चूक गया तो वापिस नहीं मिलेगा इस रूप मे तो बिल्कुल भी नहीं । यदि पुनर्जन्म को मानते है तो ; कुछ और नए कार्मिक बन्धन होंगे , कुछ और नए पत्थर इकठे होंगे। फिर मेहनत होगी।

पर बिना काटे माया फ़ेरे कटेंगे नहीं ।

ॐ ॐ ॐ

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