Wednesday, 2 April 2014

माया ( note )


माया शब्द ही अपने में अत्यंत सूक्ष्म छोटा पर असीमित है , इसको पूर्ण रूप से समझना है तो वातावरण से समझ सकते है जैसे पूरी धरती को एक वातावरण कि चादर ने अपने में समेट रखा है। वैसे ही ठीक वैसे ही माया ने समस्त पृथ्वी को समेटा हुआ है , जिसमे वो सब है जो हमको इंद्रियों से सुलभ है और अनुभवजन्य है। और जो सुलभ या अनुभव जन्य नहीं हो सकता वो भी इसी के अंदर है किन्तु अभी सुप्त अवस्था में है । भावो का खेल तो बहुत ही छोटा सा अंश है। जहाँ तक आपके विचार जा सकते है या भविष्य में जाने की सम्भावना है , सब इसी माया के ही अंदर है।

कबीर जैसे व्यक्तित्व ने अपने इसी भाव से माया को इत्र की सुगंध जैसा कहने का प्रयास किया था - "


माया महा ठगनी हम जानी तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले माधुरी बानी , केसव के कमला वे बैठी शिव के भवन भवानी पांडा के मूरत वे बैठी तीरथ में भाई पानी , योगी के योगिन वे बैठी राजा के घर रानी , काहु के हीरा वे बैठी काहु के कोड़ी कानी , भक्तन के भक्तिन वेह बैठी ब्रह्मा के ब्राह्मणी कहे कबीर सुनो भाई साधो यह सब अकथ कहानी। "

धर्म अर्थ काम मोक्ष चार बनायीं गयी सीढ़ियाँ इसी माया के ही अंदर है। समाज व्यवस्था रिश्ते नाते गुण और दुर्गुण तथा इनसे उपजे परिणाम , सुख दुःख लोभ मोह काम क्रोध , कर्म अकर्म ये सब माया के दास है इस से तो सभी परिचित है। किन्तु इस धरती से हमारे सौरमंडल तक जो भी हमको प्रभावित कर सकते है , वो सब भी इसी के अधीन है।

इतना तो सहज अनुभव हो ही गया होगा , की माया का निरोध सम्भव ही नहीं। तत्वज्ञानी इसी लिए निर्विरोध सहज समर्पण का सुझाव देते है। तथा आपको सुझाव देते है कि , " इस संसार को भव-सागर (अथाह समंदर) जान के और मान के, मन मस्तिष्क समेत अपने हाथ और पैर ढीले छोड़ के तिनके के सामान सहज तैरते हुए जीवन- यात्रा का आनंद उठाना ही बुध्हिमानी है " ....

जो भी कर्म इस पल के लिए पृकृति से आदेशित है, पूरी श्रध्हा से पालन करेंगे। ये जानते हुए इस माया नगरी में सब परिवर्तन शील है , अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठां से करेंगे। जाते हुए पल गुजरते रहेंगे , आपको बिना छुए हुए। ये जानते हुए कि विषयों पे आपकी पकड़ हमेशा के लिए और एक जैसी नहीं , एक समय आप द्वारा किये गए समस्त कार्य नयी पीढ़ी द्वारा फिर से दोहराए जाने योग्य हो जायेंगे। जो गीत आज आपने गुनगुनाया है वो फिर से नया गीत बन के आएगा , यही परिवर्तन है। आने वालो का स्वागत करना है धरोहर सौपनी है और अलिप्त अवस्था से प्रस्थान करना है।

इस अलिप्त अवस्था से आप सभी कर्म कर सकते है सभी वैषयिक ज्ञान जो भी आपको रुचिकर हो उनके विस्तार और प्रसार में अपना योगदान दे सकते है। किन्तु आप कॉपीराइट करके बांध नहीं सकते विकास की गति को। सिर्फ योगदान दे सकते है। यदि आपका योगदान अभूतपूर्व है तो आने वाली पीढ़िया आपको याद रखेंगी। यदि नहीं तो भी कोई बात नहीं। जो जितना प्रकृति आपसे चाहती है , आप योगदान करे , और पूर्ण संतुष्टि के साथ विदा ले। इस भवसागर को पार करने का इससे बेहतर मार्ग और दूसरा नहीं। 

Photo: माया :

माया  शब्द ही अपने में  अत्यंत सूक्ष्म  छोटा  पर असीमित है , इसको  पूर्ण रूप से समझना  है तो  वातावरण   से समझ सकते है  जैसे  पूरी धरती को  एक  वातावरण कि चादर  ने अपने में समेट रखा है।  वैसे ही   ठीक वैसे ही  माया ने  समस्त पृथ्वी को  समेटा हुआ है , जिसमे वो सब है  जो हमको  इंद्रियों से सुलभ है  और अनुभवजन्य  है।  और जो सुलभ या अनुभव जन्य नहीं हो सकता वो भी इसी के अंदर है किन्तु  अभी सुप्त अवस्था में है ।   भावो का खेल तो  बहुत ही छोटा सा अंश है।  जहाँ तक आपके विचार जा सकते है  या भविष्य में जाने की सम्भावना है , सब इसी माया के ही  अंदर है।   

कबीर  जैसे  व्यक्तित्व  ने  अपने इसी  भाव से माया  को इत्र की सुगंध जैसा कहने का प्रयास किया था - " माया महा ठगनी हम जानी  तिरगुन फांस लिए कर डोले  बोले  माधुरी बानी ,  केसव  के  कमला  वे  बैठी  शिव  के   भवन  भवानी  पांडा  के  मूरत  वे  बैठी  तीरथ  में  भाई  पानी ,  योगी  के  योगिन  वे  बैठी  राजा  के  घर  रानी ,  काहु  के  हीरा  वे  बैठी  काहु   के  कोड़ी  कानी  ,  भक्तन  के  भक्तिन   वेह  बैठी  ब्रह्मा  के  ब्राह्मणी  कहे  कबीर  सुनो  भाई  साधो  यह  सब  अकथ  कहानी। "

धर्म अर्थ काम मोक्ष  चार  बनायीं गयी सीढ़ियाँ  इसी माया के ही अंदर  है। समाज  व्यवस्था  रिश्ते नाते गुण  और दुर्गुण  तथा इनसे उपजे  परिणाम ,    सुख दुःख लोभ मोह काम क्रोध , कर्म  अकर्म  ये  सब माया के दास है इस से तो सभी परिचित है।  किन्तु  इस धरती  से    हमारे सौरमंडल  तक  जो भी हमको प्रभावित कर सकते  है  , वो सब भी इसी के अधीन है।  

इतना तो  सहज अनुभव हो ही गया होगा , की माया का निरोध  सम्भव ही नहीं।  तत्वज्ञानी  इसी लिए निर्विरोध   सहज समर्पण का सुझाव देते है।   तथा   आपको  सुझाव देते  है कि , " इस संसार  को भव-सागर (अथाह  समंदर) जान के   और मान के, मन  मस्तिष्क  समेत   अपने हाथ  और पैर  ढीले   छोड़  के  तिनके  के सामान सहज  तैरते    हुए जीवन- यात्रा  का आनंद उठाना  ही बुध्हिमानी  है " ....

जो  भी  कर्म  इस पल के लिए पृकृति से आदेशित है, पूरी श्रध्हा   से  पालन करेंगे।  ये जानते हुए इस माया नगरी में  सब परिवर्तन शील है , अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठां से  करेंगे।  जाते हुए पल गुजरते रहेंगे  , आपको बिना छुए हुए।  ये  जानते हुए कि  विषयों पे आपकी पकड़  हमेशा के लिए और एक जैसी  नहीं ,  एक समय आप द्वारा  किये गए  समस्त  कार्य  नयी पीढ़ी  द्वारा  फिर से दोहराए जाने योग्य हो जायेंगे। जो गीत  आज आपने गुनगुनाया  है  वो फिर से नया गीत बन के  आएगा , यही परिवर्तन है।  आने वालो का  स्वागत करना है  धरोहर सौपनी है  और अलिप्त  अवस्था से  प्रस्थान करना है।  

इस अलिप्त अवस्था  से आप सभी कर्म कर सकते है  सभी वैषयिक  ज्ञान   जो भी आपको रुचिकर हो  उनके  विस्तार  और प्रसार में  अपना योगदान दे सकते है।  किन्तु  आप  कॉपीराइट  करके  बांध नहीं सकते विकास की गति को।  सिर्फ योगदान  दे सकते है।  यदि आपका योगदान अभूतपूर्व है  तो आने वाली पीढ़िया  आपको याद रखेंगी।  यदि नहीं  तो भी कोई बात नहीं।  जो जितना  प्रकृति आपसे चाहती है , आप योगदान करे , और पूर्ण संतुष्टि के साथ   विदा ले।  इस  भवसागर को पार करने  का इससे   बेहतर  मार्ग और दूसरा नहीं।  

( इस  चित्र  के माध्यम से  तो बहुत छोटा सा प्रयास   माया  को समझने का किया गया है , वस्तुतः  , माया  भी  भवसागर जैसी ही अथाह है , इसको समझना और सहज समर्पण ही  श्रेयस्कर   है )

ॐ ॐ ॐ



( इस चित्र के माध्यम से तो बहुत छोटा सा प्रयास माया को समझने का किया गया है , वस्तुतः , माया भी 

  भवसागर जैसी ही अथाह है , इसको समझना और सहज समर्पण ही श्रेयस्कर है )



ॐ ॐ ॐ

No comments:

Post a comment