Sunday, 13 April 2014

ध्यान , ध्यान सिर्फ ध्यान , ध्यान ही बचा सकता है (Note )

किसी मुगालते में मत रहना..... मित्रों , माया के परदे निराले है , सही की उद्घोषणा करते हुए अँधेरे में धकेलते जाते है ........., सत्य है !! प्रकाश की सम्भावना है , पर अभी घटना घटी नहीं , घट रही है , प्रतिक्षण , किसी भी निर्णय पे जाना अभी एक तरफ़ा साबित हो सकता है, जल्दबाजी होगी उसका प्रकट होना , इसलिए तटस्थ होके किसी भी निर्णय के भाव से बचना है। खोजना अवश्य पर किसी भी निर्णय के भाव से बचना है।

साक्षी भाव भी स्वयं के ऑपरेशन के लिए , बिना दुसरो के चीरफाड़ में उलझे हुए , शुरुआत के लिए इतना ही। ध्यान , ध्यान सिर्फ ध्यान , ध्यान ही बचा सकता है , आंतरिक चेतना ही बाह्य के उलझाव को सुलझा सकती है , क्यूंकि जो जगत अंदर है उसी का प्रतिरूप बाहर है।

एकाग्रता , अंतर्दृष्टि , स्वप्रयोग , चेतना की समग्रता ये कुछ सार बूंदे है जो आपके ध्यान में सहायक होंगी। इन्द्रियां जो भी बाह्य दर्शन कराती है उनको मात्र देख के माया को समझना मुस्कराना और फिर अपने अंतर में स्थिर हो जाना हे मन-योग का सधना है।

स्वामी महावीर के कुछ वचन आप सबसे बाँटना चाहती हूँ , शब्द क्या है बस फूल भी नहीं इत्र की बूंदे है

क्रमानुसार इनका अनुसरण यात्रा पे आगे बढ़ा सकता है .....

Top of top

* Silence and Self-control. ( मौन के सहयोग से स्व में ठहरना )

*Every soul is Independent. None dependence on another. (आपो गुरु आपो भवः )

*There is no separate existence of God. Everybody can attain God-hood by making supreme efforts in the right direction.(स्वध्यान , स्वाध्ययन , स्व अति महत्त्व पूर्ण है )

*Every soul is in itself absolutely omniscient and blissful. The bliss does not come from outside." ( प्रकाश आपके अपने अंदर से ही आएगा " जो पहले से ही मौजूद है। सिर्फ अनुभव करना है।)

* He, who conquers himself through himself, will obtain happiness.

एक ही ज्ञान की दिशा है , एक ही रास्ता है " स्वयं को जीतना " अद्भुत है पहले स्व को जीतना और फिर " स्व " में स्थिर हो जाना। 



इनको जानने के लिए किसी भी पूर्ववधारणा से मुक्ति आवश्यक है , एकदम उस बालक के सामान जिसको किसी भी भाषा का अभी ज्ञान नहीं , ऐसा बालक बनना है।

और एक बात यदि किसी को भी ये संशय हो की ये महावीर .... महावीर उनके लिए बने , उनके लिए कह रहे है तो मात्र ये भरम है , फूल खिल रहे है , वर्षा हो रही है , नदी बह रही है , हमारा सौभाग्य की हम नदी के किनारे खड़े है , हमारा सौभाग्य की अंदर से स्व प्रेरणा अंजुली बनाने की आ रही है। इस से ज्यादा स्वयं को महत्त्व देना अनावश्यक है और बुद्धि की दौड़ साबित होगा। आपके ज्ञान का सबसे पहला दर्शन आपको अपने लिए ही होगा। फिर जो तरंगे उठेंगी उसका दर्शन जो चाहेगा वो करेगा। 



" अपने को महत्त्व देना है सिर्फ और सिर्फ स्वदर्शन के लिए।" बाहर की दुनिया का अर्थ भी सहज ही समझ आ जायेगा। 
ॐ ॐ ॐ

No comments:

Post a comment