Saturday, 5 July 2014

सांकेतिक अस्तित्व की संकेत - भाषा

आत्मिक-बुद्धिमत्ता 

बहुत ही कम शब्दों में , अगर  व्यक्तिगत  सलाह  देनी हो  सावधानी की   तो क्या होगी ! बिलकुल सही तीन प्रकार के  व्यवसायियों से सावधानी की --
पहला  जो देश की सुव्यवस्था  का दावा  करते हो यानि देश पंडित  ,
दूसरा  जो  कहते हो  पारम्परिक धर्म के नियमो पे  हमारे कहे अनुसार चलो , यानि धर्म पंडित , और 
तीसरा प्रकार भी हमारे बीच ही  जो प्रभु के साक्षात्कार का  दावा  करते हो , यानी अध्यात्म पंडित।

व्यवसायी राजपंडित  देश के लिए  आपको मार  डालेंगे , व्यवसायी धर्म पंडित  धर्म के लिए  आपको सूली पे चढ़ा देंगे , और  व्यवसायी आध्यत्म पंडित  आपको  घुन की तरह  खा खा के समाप्त कर देंगे।

दावे की दवा यहाँ   कारगर नहीं होती  कर्म की दवा  लगती है  , पहली बात , दूसरी बात  आपकी  श्रद्धा  दुसरो से ज्यादा स्वयं के प्रति होना आवश्यक है।  तीसरी बात  आपको  स्वयं ही  परिश्रम करना पड़ेगा , मौन  होना सीखना पड़ेगा ,  स्वयं की यात्रा  दुसरो के कंधो से नहीं होती , खुद ही एक एक कदम चलना पड़ता है।

सौ प्रतिशत  सच मान के चलिए , आपके लिए  जितने  भी रास्ते सुलभ है , और आपको जितने भी प्रकाशस्तंभ  से लगते है , या मिलते है।  आपके लिए मात्र  संकेत स्तम्भ  है , कपडा टांगने की  खूंटी नहीं। उनका कार्य आपको संकेत देना है और आपका कार्य मात्र संकेत स्वीकार करना है , उनपे  जीवन भर के लिए लटकना नहीं  , और आपका कार्य  उन के सुझाये  संकेतो पे चलना इसीलिए उनका दूसरा नाम मार्गदर्शक भी है ( इसको समझे  ये  अति महत्वपूर्ण हैक्यूंकि अधिकांश धोका  यही है  ), वो भी  यदि आपका ह्रदय आपको  सुझाव दे तो ही।  बाद में  आपको  धोखा लगे पीड़ा हो  आरोप प्रत्यारोप शुरू हो ,  ये सब भी होगा , परन्तु  सब से जयादा नुक्सान आपको ही होगा , हर तरीके से , रुपया पैसा , समय  और शारीरिक ऊर्जा की हानि।  रुपया पैसा तो भुला भी जाये पर समय की हानि  और ऊर्जा की हानि  बिलकुल क्षम्य नहीं है , आप का केंद्र  भी नहीं क्षमा  कर पाएगा  स्वयं को  आपका परम केंद्र भी  आपको क्षमा नहीं करेगा , कैसे ? ऐसा नहीं की आप पे क्रोध होगा , वरन  वो अपने नियम से बाधित है , आपको सुअवसर देना उसका नियम है , परन्तु आपके पास ही अवधि सिमित है , शक्ति  सिमित है। इस कारन एक एक कदम आपका  स्वयं से प्रेम करने वाला और स्वयं  के जीवन पथ के  लिए उठना चाहिए , ऐसा सुझाव है।

मूल रूपसे  कई सद्गुरु  सुझाव देते रहे है , सम्पूर्ण स्वस्थ्य का , आत्मिक और शारीरिक  , * यह अति महत्त्व पूर्ण है। और सम्पूर्णता में , जब शरीर को स्वस्थ रखने की बात आती है तो भोजन प्रथम है और मन को स्वस्थ रखने की बात  में सकारात्मक विचार प्रथम है। भारतीय पतंजलि योग में योग , इतिहास में योग के पितामह  तथा अन्य योग  शास्त्र  का सम्पूर्ण  कहना ही यही है  , आप अपनी यात्रा  तभी कर सकते है  जब आप स्वस्थ हो , विचार ध्यान की क्षमता हो। साथ ही कर्तव्यों  के प्रति भी जागरूकता आवश्यक है  जो निजी तौर पे  स्वयं के लिए भी है और परिवार और समाज के लिए भी। माना  एक तरफ कुआं  है और दूसरी तरफ खायी , और आपकी यात्रा  एक मात्र  रस्सी पे संतुलन करने की है , पर संभव है  ये संतुलन भी संभव है , यदि आपका ध्यान विचलित न हो तो !  यदि आपका सम्पूर्ण ध्यान अपने  कदम की तरफ हो तो ! यकीं मानिये --- दूसरो की चाल देखेंगे  तो आप पहले गिरेंगे !! इसलिए  सबसे पहले  अपनी  प्रपंची प्रवृत्ति पे काबू पाना है , जो हमेशा दुसरो के कार्यकलापों  तथा  जीवन शैली की बखिया उधेड़ते रहते है।  फिर स्वयं को देखना है, पर आलोचनात्मक नहीं होना , स्वयं को स्वीकार करना है।  मस्तिष्क को  काबू करना है ,

आत्म केंद्रित होना  , इसी अवस्था का नाम है , जहाँ  आप केंद्र में  स्थित हो जाते है , फिर विचलन नहीं होता।  इसी ध्यान को पाने के लिए , गीता  , अष्टांग योग , अध्यात्म गुरु  आपको क्रिया करवाते है।  जबकि मूलतः , ये आपके स्वयं के अंदर से उत्पन्न होने वाला भाव है।  आपके सातो चक्रो में वास करता है।  आपके दो द्वार  ह्रदय  और मस्तिष्क  के अनायास  और अनावश्यक  द्वंद्व  को नष्ट करता है।  आपका आत्मकेंद्र  जागृत ही तब होता है , जब आप स्वयं को प्रेम   करते है।  स्वयं को यूँ ही तो कोई प्रेम करेगा नहीं ,  वास्तविकता  समझ  में  आना  चाहिए  ,  वस्तुतः इस वास्तिविकता  से सामना  आपका अपना ही  ध्यान कराता है , जहाँ आपकी समस्त उलझने  एकत्रित  हो के  ऊधम मचाती है या तांडव करती है।  आपको शिव सदृश हो योग साधना पड़ता है  उनको शांत करने के लिए।  सब कुछ  आपको ही करना है , आश्रय-भाव सफल नहीं होता , बाह्य विधि कार्य नहीं करती , सिर्फ मौन और ध्यान दो ही  विधिया  आपके लिए  आपकी मित्र है।  गुरु भी इनको ही जागृत करते है आपके ही अंदर  आपके ही लिए , और यदि आप इनको जागृत कर सकते है  तो आपको गुरु की भी आवश्यकता नहीं।  स्वयं को जानना  बहुत सरल है।  और एक बार स्वयं को जान लिया  तो स्वयं के केंद्र से मिल लिए , तो परम केंद्र  तो स्वयं उपस्थित है।

बस इससे ज्यादा इस जीवन में कुछ  करना नहीं है , पाना नहीं है ।  यही गंतव्य है यही प्रारब्ध है  और यही जन्म का उद्देश्य।  यही सद्गति है , यही मुक्ति है , यही मोक्ष है।  इसके अलावा कोई और परिभाषा है ही नहीं।

और अधिक  खुदाई करनी है , तो गुण  मिलने शुरू हो जायेंगे , जैसे  सरलता , छल कपट  से दूर रहना ( देने  और लेने  दोनों से )  जिंदगी को  इसी पल में जीना , सन्तुष्टता के साथ , स्वयं के जन्म का आदर करना , दुसरो को ( प्रकृति  मनुष्य , सम्बन्ध ) भी जीने  के लिए स्थान देना , अपने दायित्वों को सम्मान पूर्वक पूर्ण करना। और संसार से विदा लेना  बिना मोह  और माया के प्रभाव के।  सम्पूर्ण  चेष्टा और प्रयास  मात्र  सत्य से साक्षात्कार होते ही  होने लगता है।

इसके बाद भी यदि आप खुदाई जारी रखते है तो आपको सिर्फ शुन्य मिलेगा , और ये शुन्य इतना विस्तृत है की इसका कोई पार नहीं।  स्वयं आपके अपने केंद्र से ये शून्य  शुरू होके  उस परम केन्द्र पे  जाके  समाप्त होता है !  क्या कहा !  समाप्त होता है , नहीं नहीं , अनवरत चक्र है ..............

समाप्त नहीं होता  वरन परम के केंद्र  से लौट के दोबारा  ये ऊर्जा घेरा  आपके  और हर जीव  हर कण के केंद्र से जा मिलता है , और अपना वर्तुल पूरा करता है । जैसा आप इस चित्र के द्वारा  समझ सकते है , ये  चित्र कहने की चेष्टा कर रहा है  अनवरत ऊर्जा के आवागमन की  कहानी।  और जिन ग्रहो की ऊर्जा  या  चुंबकीय शक्ति कम होने लगती है , वे  स्वयं ही नष्ट हो जाते है  और ऐसे नष्ट हुए असंख्य उल्का पिंड  नक्षत्र में घूम रहे है।  जिनमे  चेतना है , जिनमे  चुंबकीय शक्ति है  वे अपनी धुरी पे घूम रहे है , साथ ही साथ  उनके  इर्द गिर्द भी  जिनके  तरंगित शक्ति  का प्रभाव उनको प्रभावित करता है  इस प्रकार  कुछ  तारा समूह मिल के सौरमंडल का निर्माण करते  है और इन सौर मंडल में  जो भी है  वो  प्रभावित है , हम और आप तो बहुत
सूक्ष्म है  और इसीको  खगोल विज्ञानं  भी कहता है , यही  ज्योतिष है , इन्ही  की चाल  और  विभिन्न गतियों का अध्ययन करके  जो  वास्तविक जान कार  है वो संभवतः  की  समझते है  वर्ना व्यवसाय  यहाँ भी है, सांसारिक व्यवसायियों  से  सावधानी  बरतनी है , यदि आप व्यवसाय करना ही चाहते है  तो सीधा एक से कीजिये  बिना मध्यस्थ के  ।




 भाषा  मात्र मानसिक भ्रमित करने वाला  उलझाव है , संस्कृत हिंदी उर्दू  फ़ारसी आदि  अपने अपने समय की प्रचलित भाषाओं में ग्रन्थ बने।  संस्कृत में यदि कुछ लिखा मिल जाये  इसका ये अर्थ बिलकुल नहीं की   वो अकाट्य सत्य है , सिर्फ यही की  उस वक्त के  बुद्धिजीवियों की बोल चाल  की भाषा में लिखा गया  वक्तव्य मात्र।  उतना ही प्रामाणिक  जितना आज कल हिंदी भाषा  में कोई बुद्धिजीवी लिखे।  तो सत्य किसी भी भाषा लेख  मंत्र विधा  के जरिये मिले  स्वागत योग्य है।  पर ध्यान देने योग्य है की - सत्य एक ही है।

इसलिए  ज्यादा खोदाखादी  उथलपुथल  और  उधेड़बुन अच्छी नहीं। किसी भी तरह के  भ्रम से  बचिए।

बस  इसके अतिरिक्त  और कुछ नहीं।  यही धर्म  और यही नीति।

शुभकामनाये !


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