Saturday, 26 July 2014

ध्यान के दीप संग विचार : एक प्रयास


प्रिय , मित्र / आत्मन / साधक / ध्यानी  !

आपकी साधना  आशा है  सकुशल चल रही होगी , अध्यात्म  में आप  कहाँ तक पहुंचे ?  क्या मस्तिष्क पे काबू आया ?  क्या भागता मन आपकी सुनता है, भागने से पहले आपसे आज्ञा  लेता है  अथवा  भाग जाने के बाद आपको सुचना देता है , की पकड़ सको तो पकड़ो   ?

चार मानव मस्तिष्क एकत्रित हो के  कितना तार्किक शोर मचा सकते है ? क्या  अंदाजा है  आपको ? नहीं ; क्यूंकि तर्क करते समय आप दूसरों की सुनते ही कहाँ  है ?  स्वयं कहते है स्वयं ही सुनते है , और अपने ही शोर और उत्तेजना से अपना सिर-दर्द करते है , दोष सामने वाले पे  डाल देते है , किसी भी तर्क - पद्धति के तर्क का यही रास्ता है।   और यही कारन है की दो पक्ष  कठोर दीवाल के साथ  अपने अपने पक्ष को पकडे अपनी ही बात कहते और सुनते है।  

ईश्वर सत्ता  पे तर्क करने का भी  ऐसा ही  मूर्खता भरा  प्रयास  है।  ईश्वर-प्रमाण पे तर्क ? इस से  बड़ा मूर्खता पूर्ण कोई तर्क हो ही नहीं सकता। ये तो विषय  ही ध्यान का है , मौन का है , तर्क का नहीं।  

शास्त्र  सही है !  
प्रमाणित है भी की नहीं है !  
ईश्वर  है  की  नहीं ! 

आपकी  तार्किक शक्ति  और  धर्म के प्रति आपकी जिज्ञासा  बताती है की आप  बहुत कुछ जानने की इक्षा रखते है , पर पात्रता अभी नहीं  जागी है इस कारण शाब्दिक बहस में उलझ गए है , वो भी  अपने ही जैसी विकसित बुद्धि  के किसी  अन्य इंसान  के साथ ।  शुक्र  मनाईये  की आप मानव रूप में हिंदू धर्म जन्मे है , तो आप खुल के  चर्चा   पा  रहे  है  , अपनी बात समझा पा  रहे है। इसी संसार  में  अन्य धर्म इसकी इजाजत तो  दूर ,उलटे सजा  देते  है।  आप खुल के खिलाफत कर भी नहीं सकते, यानि मजबूरन वो सोच वो जीवन  जीने को जन्म से बाध्य है । लाखों में बिरले ही होते है  जो धर्म परिवर्तन  अपने  नैतिक इक्षा से ये  जानके  की फलां धर्म उनकी सोच के अनुसार  नहीं ;  कर पाते है  अधिकतर मात्र स्वीकार करते है ,  ये तो हुई  स्वतंत्रता की बात।  अब  बात आती है जवाब की , तो धन्यवाद दीजिये उनको जो आपके सवालों के जवाब देने को तैयार हो गए।  क्यूकी  इन  गहराईयों का  जवाब शब्दों में है ही नहीं, आपके विश्वास में है और आप  स्वयं यात्रा में है , विश्वास कहाँ से आएगा, विश्वास को भी तो कदम ज़माने के लिए  जमीन चाहिए ।  ( अहसास है मुझे  की कुछ लोगो को मेरी बात से ऐतराज  हो सकता है , पर यकीं मानिये , सही ध्यान  स्वयं आपको आपके हर प्रश्न का उत्तर स्वयं देगा वो उत्तर  किसी मध्यस्थ के जरिये से नहीं  सीधा  मिलेगे आपको  )

किसने क्या !  सही कहा !  क्या गलत ! ये तर्क सिर्फ हजारो साल तक ही नहीं , आज भी उतने ही सशक्त है और आज भी इनके उत्तर मस्तिष्क में नहीं , कैसे होंगे ?  जो उत्तर ध्यान  में  मिलते है , परम मौन में प्रस्तुत होते है , वो उत्तर भाषा में कैसे मिलंगे ? 

दिमाग कहता है दौड़ो , और आप दौड़ पड़ते है  बिना सोचे।  मन का काम ही छलना  है , वो आपको जितना छलता है  आप उतना ही प्रसन्न और संतुष्ट हो जाते है।  जितनी रंग में लपेट के कथाएं आप तक पहुँचती है आप उतने ही ज्यादा  उस पात्र के भक्त हो जाते है।   अगर मैं कहु की सिर्फ सफ़ेद रंग के भक्त बन जाओ , कितने होंगे जो मेरी बात मानेंगे !  संभवतः वो ही जिसने  दो ही रंग जाने है , एक सफ़ेद और एक  काला।  

जितने भी रंग और रंगो के मेल संभव है  उतनी  ही कथाएं और उनके पात्र भी संभव है , उतने ही मत  और उतने ही भक्त  भी संभव है।  और जितने  भक्त  संभव है  उतने ही भगवान भी संभव है।  क्यूंकि भगवान भक्त ही श्रद्धा का रूप  है।  जितने भगवान  उससे कहीं ज्यादा  उनके चरित्र की कथाएं।  यहाँ तर्क कहाँ है ?  विश्वास से भी कभी कोई तर्क हो सका है ? विश्वास तो खुद अपने ही कोकून  में बंद  होता है।  भगवान तो  फिर  सीधा  शक्ति के रूप से  जुड़े है।  कोई  हमारे जैसा इंसान  यदि अपनी चेतनावश  हमारी श्रद्धा का  पात्र हो जाता है , तो  हम-समूह रूप में  उनके  खिलाफ कुछ नहीं सुन सकते।  आहत होते है  अपने श्रद्धेय के खिलाफ  सुनने में।  यही आस्था  धर्म के लिए है।   मानव बुद्धियाँ  आहत होती है  अपने धर्म को लेकर संवेदनशील है। 

चलिए  थोड़ी  देर को  प्रगाढ़ कल्पना कीजिये , की आप ही वो परम शक्तिशाली  परमात्मा  है।  अरे !कल्पना कीजिये  बस  की आप उसका अंश नहीं  स्वयं परम ऊर्जा है , और आपसे  समस्त चराचर जगत प्रस्फुटित  है , धरती भी  नक्षत्र भी , और धरती  जीव भी ,  अब अगले स्तर  पे आ के  जरा सोचे , आपकी अपनी  बनायीं दुनिया में  क्या क्या हो रहा है , और फिर कल्पना कीजिये  की वो कितना तर्कसंगत है .. !  कुछ चिड़ियाँ इकठा मिल के कितना शोर मचा सकती है और वो  प्रमाण के लिए बिना प्रमाण के। समुद्र में मछलियाँ  आपस  में मिल के कितना  भी कलह कर सकती है आपके अस्तित्व  प्रमाण के ऊपर और वो क्या प्रमाण लाएंगी  जिससे आपके अस्तित्व का  प्रमाण दे सके और आप वो ही कर रहे है जो आपको जैसे करना है , क्या आप अपने एक एक कृत्य को चिड़ियों से और मछलियों से  प्रमाण लेके कर रहे है ?   क्या आपको मछलियों से प्रमाण लेने की आवश्यकता है ?  तो मछलियाँ क्या कर रही है ? क्यों आपके ऊपर बहस करके वो अपना श्रम व्यर्थ कर रही है ? और आपको आपके नारद जी  सुचना दे (कल्पना कीजिये ) की मेडिटेरियन  समुद्र के  गहरे तल में  स्थित  एक कोने  में  कुछ मछलिया आपके नाम पे उत्पात मचा रही है। या आसमान पे उड़ते  चिड़ियों के झुण्ड  में मार काट मची है , आपकी सत्ता को लेकर , यदि आप उनको जान सकते उस व्यर्थ प्रलाप को महसूस कर सकते है , तो आपकी क्या  सोच बनेगी  ? सोचिये ?  हमसब भी ऐसा ही कुछ कर रहे है , उस परम सत्ता की सत्ता पे  बहस करके ,  न सिर्फ बहस वरन झगड़ा  भी  करते है , और इसी झगडे में खून भी कर डालते है।  कैसा पागलपन है , कैसी आस्था है ? कैसी  सत्ता के प्रति भक्ति भाव है ? मुझे तो पागलपन ज्यादा नजर आता है।  

परम फिर भी अपनी गति से अपनी धुरी पे ही नृत्य कर रहे है बिना आपके प्रमाण पत्र  के मिले ।  आपको आज तक अपनी स्थति समझ नहीं आई।   अपनी सीमा आपको समझना बाकी है।  आपका अपना जीवन अभी रिक्त है , क्यूंकि उद्देश्य ही पता नहीं।  और आप झगड़ा उस सत्ता पे कर रहे है।  

अपने उद्देश्य को जानिए , परमात्मा  के  भी अस्तित्व को जान जायेंगे।  ध्यान कीजिये , प्रकृति से एकलयता बनाइये  तो जीवों के जन्म और मृत्यु के रहस्य भी स्पष्ट  होंगे।  बिना तर्क बिना बहस , मौन में, परम मौन को छू के  परम  के रहस्य  को अनावृत कीजिये। 

इस बहस में  क्या धरा है की किस शास्त्र  में क्या लिखा है और क्या नहीं। क्या सही और क्या गलत ?  

शास्त्र लिखने वालो ने अपने अनुभव से लिखा , आप अपनी बुद्धि और दृष्टि से पढ़ रहे है।  दोनों में कोई मेल है ?  नहीं।  उनके अनुभव  और आपकी बुद्धि में कोई मेल नहीं।  मेल तब होगा जब आप भी अनुभव युक्त हो जायेंगे।  उसके पहले  सिर्फ रासायनिक प्रतिक्रिया होगी  वो भी दो भिन्न रसायन के मेल की। 

दूसरे बात जन्म और मृत्यु , पुनर्जन्म आदि आपके लिए जिज्ञासा का विषय हो सकता है , पर परमात्मा के लिए  ये  क्रिया है ही नहीं , ऊर्जा का  प्रस्फुटन और स्वयं का स्वयं से खेल कह सकते है वार्ना उसके साम्राज्य में खेल शब्द भी  नहीं है बस हो रहा  है अकारण  और इससे ज्यादा कुछ नहीं ।  परमात्मा के सम्बन्ध में कोई भी बात करनी है  तो मौन में ही संभव है , चिड़ियों की तरह  चहचाहट  के साथ   वो फल मिलेगा ही नहीं।  सिर्फ शोर होगा , और शोर के बाद सन्नाटा।  

ऐसी  ही एक बहस  सुन के आ रही हूँ जिसमे  दो पक्ष भिड़े पड़े थे , आज कल  धरती पे  देवकी  का जन्म संभव है की नहीं ! आधुनिक  युग में जरासंध  जन्म ले सकता है की नहीं !  और   कैसे कहा गया की इस काल में  शकुनि ने जन्म लिया  और मर भी गया।  ये तो सीधा शास्त्र की मर्यादा के विपरीत कहा गया।  

मैं न तो इस पक्ष में हूँ न उस पक्ष में , मेरा मत सबसे अलग है।  पर जो चर्चा में उलझे हुए दो दल थे, उनकी बात कहती हूँ  , पहली बात , यदि आपका विश्वास नहीं  तो मत  मानिये , लेकिन  यहाँ आपकी जिज्ञासा भी है , की कुछ रहस्यमयी  शायद पता चले , किसी जादू का खुलासा हो ! ये मस्तिष्क की खुजली  है , की आप बहस में उलझे है ,  दूसरा पक्ष  कह रहा है  की वो  ज्ञानी है  और उसे सब पता है , यहाँ भी  एक बात की सत्यता तो है की दूसरा पक्ष  आप जैसा अज्ञानी तो बिलकुल नहीं , थोड़ा जरूर है जो इस विषय के लिए प्रमाण दे रहा है।  

जिसको हम रहस्यमयी दुनिए कहते है , वास्तव में वो बहुत सरल  है , रहस्य सारे हमारे दिमाग में ही बसते है।  

उसकी दुनिया में ज्यादा प्रपंच है ही नहीं।  उत्पति और विनाश  क्रम में है , तमाम  लिंक  तो हमारे मोह ने बनाये है , लोभ तो इतना ज्यादा की हमको  सिर्फ पता ही नहीं होना है वरन जंतर मंत्र तंत्र से सब हमारी इक्षा से भी होना है।  बस यही समस्या है।  आज्ञा मनना तो बड़ी बात है सब हमारी इक्षा से भी  नहीं हो सकता , ये क्या परमात्मा कर रहा है ? आपकी इक्छा का तो जरा भी मान नहीं । वास्तव में !  हम बहुत ही सीमित शक्ति से संपन्न है , इसको स्वीकार करना ही है।  किसने कब जन्म लिया कब नहीं , क्या ये हमारा विषय है ?  बिलकुल नहीं।फिर भी हमारी जिज्ञासा है।  

ईश्वर आपसे कुछ नहीं छिपता , वो तो स्वयं ही खुला हुआ है।  बस कमी हमारी पात्रता में है।  उसके जैसा सहज सरल  प्रेमिल  और  नियमित , किसका  उदहारण दू वो स्वयं में उदाहरण है।  

आप इसको कैसे भी समझ सकते है , अपने आत्मिक विकास के अनुसार , संसार में दो शक्तिया  हमेशा प्रकट  रही है ,एक  जो दानव की मानसिकता  की तरफ   झुकी है  दूसरी को  देव मनःस्थति  को झुकी है , आप इनको  देव और दानव भी कह सकते है।  हजारों साल पहले भी थी  और आज भी है।  

तो इसका अर्थ ये भी हुआ  की  देव दानव    धरती का हिस्सा  है  और गुण स्वरुप है।  तब भी थे आज भी है।   बीच के मानव  तब भी थे  आज भी है।   तो क्या  और कहाँ आश्चर्य है ?  की कृष्ण  जन्म ले सकते है की नहीं !   कृष्ण की माता जन्म ले सकती है की नहीं !  और राक्षस जन्म ले सकते है की नहीं !  यही न ! 

यदि आप ध्यानी  की मनःस्थति से प्रश्न में  प्रवेश करे  तो समझना कम अनुभव ज्यादा होगा , यदि आप  मनुष्य की तरह सोचेंगे  तो शब्द ज्ञान  ज्यादा होगा , अनुभव कम , थोड़ा तीव्रता का अंतर है बस।  

ध्यानियों ने  पाया , ऊर्जा  का एक स्वरुप है ,  और  अंतहीन है ,  तत्व के साथ मेल करते ही   शरीर धारण करती है। और अपनी अवधि पूरी होते ही  विदा लेती है (नष्ट नहीं होती  सिर्फ विदा लेती है ) गुण धर्म के अनुसार , अलग अलग समय पे आवश्यकतानुसार  वो जन्म लेती है। सभी  ऊर्जाएं इसी नियम के अंतर्गत है।  क्यूंकि समस्त ऊर्जा एक ऊर्जा से प्रस्फुटित है। इसलिए सभी पे एक नियम लागु होता है। इस नियम के अंतर्गत , कृष्ण की माता  उनके पिता  उनके सहयोगी  बंधू बांधव  और देव राक्षसगण  सभी शामिल है।   सिर्फ कृष्ण ही क्यों  राम का समय भी इसमें  शामिल कर लेते है। 

पर वो नाम  वो रूप  किसी  को दोबारा नहीं मिलता, प्रकर्ति  नित्य  और नूतन है ,तत्व के रूप को  दोहराती नहीं   , थोड़ा ही सही अंतर होता है। पर गुणधर्म  स्वयं को दोहराते  है  वो परिवर्तित नहीं होते।  इसी  के अंतर्गत  आप  इनकी गिनती  उँगलियों पे कर सकते है ,  करोडो वर्षों में भी ये नहीं बदलते।  

देव  देवता  राक्षस  भगवान  आदि हमारे दिए शब्द है , ग्रन्थ शास्त्र  हमारे बनाये है  इसलिए हमें ही इनको छन्नी  से छान के  अलग करना पड़ेगा।  तो अंत में आपके पास एक हाथ में   गुणधर्म  ही बचता है  और दूसरे में  ऊर्जा ।  तो ये तो करोडो वर्षो से यही है , कहीं गए ही नहीं। तो बहस का अर्थ भी नहीं।  






शुभकामनाये 

No comments:

Post a comment