Wednesday, 2 July 2014

संसार , अध्यात्म और वासना (कामेक्छा की त्वरा )



दोस्तों ! 

विचार और ध्यान के पड़ाव पार करते करते , एक स्थिति ऐसी भी आती है , जब सही गलत जैसी भाषा का महत्त्व ही नहीं रहता , बस छोटे छोटे असंख्य परिस्थतियों और विचारों के घेरे है और उनमे घूमते चक्कर लगाते , मस्तिष्क। जो किसी भी क्षण प्रगति के साथ अपना घेरा बदल देते है , और घेरे के बदलते ही नजरे और नजारें दोनों ही बदल जाते है। और उस घेरे में चक्कर काटना शुरू हो जाता है। ऐसा ही यहाँ हर जीव कर रहा है , अपने अपने चक्कर अपने अपने घेरे।

हमारी दृष्टि सिमित है , अनुभव कम है , तर्क ज्यादा , और निर्णयात्मक प्रवृति सुरक्षित महसूस होती है , इसीलिए झट से निर्णय भी बन जाते है , और वास्तव में ये निर्णयात्मक प्रवृत्ती कई बार असावधानियो से बचाती भी है तो कई बार उल्टा भी हो जाता है , यानि की जो नहीं है हमारे निर्णयय हमें वैसा ही देखने पे विवश कर देते है।

वासना अपने शुध्हतम रूप में कामना से जुडी है , और साथ ही साथ बेकाबू वेग से भी जुडी है। अपने दिव्य स्वरुप में ये संकल्प से जुडी है , इक्छा से जुडी है। इन्द्रियां माध्यम है या सहयोगी भी कह सकते है , हमारे सांसारिक जीवन में और आध्यात्मिक उपलब्धियों में भी वासना यानी इक्छा का संतुलित रूप सुंदरतम है।

कई बार स्वयं ज्ञानी गुरु जन भी हमको समझाते समझाते स्वयं दुविधा में पड़ जाते है ,की इनकी मंद बुद्धि में ये गहन विषय कैसे डाला जाए ? क्यूंकि उनके लिए सही गलत जैसे शब्द का अस्तित्व ही नहीं, पर हमारे दिमाग में कुछ ऐसी ही छाप है। हम विवश है , सिर्फ सही या गलत की दृष्टि से सोचने को। बचपन से यही सीखा है , देखा है , और इसी में अनुभव भी मिले है। तो ये सही गलत का भाव भी गहरा है। विषय गहन भी तभी तक जब तक बिजली नहीं कौंधती , एक बार बिजली कौंधी फिर सब प्रकाश प्रकाश , कुछ गहन नहीं , सब स्वक्छ सब सरल , उसके जैसा सरल तो और कुछ है ही नहीं , शुध्हतम स्वरूप , जहाँ उलझाव है ही नहीं। जितनी उलझने है , इस मस्तिष्क की परिधि के इर्द गिर्द ही है। हृदय द्वार फूल जैसा सुगन्धित है। शब्दों से परे अनुभव करने जैसा है।




चर्चित उदाहरण ही लेती हूँ। ओशो ने कहा -

आध्यात्मिक वासना भी होती है !
और जब तक आध्यात्मिक वासना है,
तब तक आध्यात्म का कोई जन्म नहीं होता है !
जिसको हम संन्यासी कहते है,
उनमें अधिक लोग सांसारिक वासना छोड़ देते हैं,
आध्यात्मिक वासना पकड़ लेते हैं!
वास्तविक संन्यासी वही है, 
जिसकी कोई वासना नहीं है -
न सांसारिक, न आध्यात्मिक ! ओशो ~

गुरु ने जो बात कही वो अक्षरशः सत्य है , पर एक सीमित समुदाय या मानसिकता के लिए , ये परम सत्य नहीं। किसी भी व्यक्ति की कोई भी बात अगर कुछ प्रकट कर रही है किसी सन्दर्भ को या विषय को तो स्वयं ही सीमित हो जाती है। ये बात वहां कारगर है , जहाँ संसारी और अध्यात्मि अपना केंद्र से संतुलन बिगाड़ लेते है , संसारी वासनाओ में लिप्त संसार में विचरण करता है , और आध्यात्मिक , उसका पलड़ा अध्यात्म की तरफ असंतुलित होक झुक जाता है। वासनाएं वहां भी जागृत हो जाती है।वस्तुतः वासना का सीधा सम्बन्ध इक्छाओ और रुचियों से है। अगर ये बेलगाम हो जाये तो कही भी उपद्रव ही करती है। इस वासना के वेग को शब्दों में बांधना कठिन है , संसारी हो तो दुर्गुण का नाम दिया जाये , अध्यात्म में क्या दुर्गुण , पर आपकी जानकारी के लिए सिर्फ " दुर्गुण " ही नहीं " गुण " भी प्रबल वासना समेटे होते है। इक्छा की प्रबलता मस्तिष्क को विक्षिप्त करती है , फिर वो अध्यात्म हो या संसार , अवश्य ही गुरु ने ऐसे मनुष्यों के लिए के लिए तीसरा संतुलन का मापदंड दिया है ; जो पहले से ही अति असंतुलित है। 
पर एक दूसरी कड़ी भी है जो संतुलित और अनुशासित हो के चलती है , उसमे भी इक्छा है उसमे भी संकल्प है , क्यूंकि बिना इक्षा और संकल्प के तो पल भर एक स्थान पे बैठना भी संभव नहीं होता। जीवन सम्पूर्ण रूप से जीने के लिए है, इक्छा और संकल्प का होना आवश्यक है। पर अनुशासित और संयमित। ध्यान देने वाली बात है की अत्यधिक अनुशासन और अत्यधिक सय्यम भी अंत में उपद्रव-फल देने वाले ही साबित होते है। 

पर पहली इक्छा ही कार्य को धक्का देती है , पहला संकल्प ही मनुष्य को अध्यात्म की गहराईयों में उतारता है। तो वासना यदि इक्छा का रूप है स्वागत योग्य है , मनुष्य की संकल्प लेने की शक्ति सराहनीय है। संतुलन का कार्य आंतरिक बुद्धिमत्ता करती है , और फिर कुछ तो प्रारब्ध से भी निर्देश मिलते है। जिनको दैवीय संकेत भी कहते है। कहते है हर एक को उसका मार्ग जन्म से मिलता है ,उसपे चलना बस उसका धर्म है , पड़ोस के मार्ग को देख विचलन नहीं होना चाहिए। बस इस बुद्धि के साथ अध्यात्म की इक्षा या संसार का गमन , सब एक है। अध्यात्म भाव प्रधान है , और संसार कर्म प्रधान। 

दोनों का सुन्दर मेल एक सुन्दर बगीचा बनाता है। किसी का किसी से विरोध नहीं वरन सुन्दर संतुलन है। 

बहुत महीन बुनावट है , ध्यान से सुलझाने योग्य है , सही गलत का प्रश्न नहीं , स्वीकार और स्वीकार की भी बात नहीं। जिनके लिए उचित हो वे ये असंतुलन की कारगर दवा ले जाये , जिनके लिए उचित न हो , वे अपना संतुलन स्वयं बनाये। वास्तविक सद गुरु का काम संतुलन को स्थापित करना है। बिलकुल वैसे ही जैसे एक चिकित्स्क का काम मर्ज का इलाज़ करना है , जितना गंभीर मर्ज उतनी दवा तेज। 

इक्षाओ के प्रति जागरूक हो जाना , साक्षी हो जाना , अस्तित्व के प्रति साक्षी हो जाना , स्वयं के प्रति साक्षी हो जाना। अध्यात्म की पूर्ण उपलब्धि है। इसके बाद एक और अंतिम छलांग है वह गुरु भी आपके साथ नहीं। वो छलांग आपको स्वयं ही लगानी है। इतनी इक्छा बचा के रखिये की वो छलांग लग सके। बस इक्छा का काम हो गया , संकल्प पूरा हुआ। 

संसार में भर्मित करने वाले भटकाने वाले वक्तव्यों और व्यक्तियों की कमी नहीं है , ये भी असंख्य है , इसीलिए स्वयं से प्रेम कीजिये , स्वयं को शांत भाव से सुझाव दीजिये , अपने गुरु स्वयं बनिए। आपका केंद्र आपको अवश्य सही राह दिखायेगा। 

आप सभी को शुभकामनाये !

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