Tuesday, 22 July 2014

ट्विन-सोल / ट्विन-फ्लेम सम्बन्ध


ट्विन -सोल या  ट्विन-फ्लेम  शब्द बहुत  फैशन  में है , बहुत चर्चित है , इसका मूल अर्थ अगर समझे  तो एक शक्ति  दो जो भागों में बंट के अलग हो गयी और भटक रही है, सारे संसार में शक्ति  ऐसे ही भटक रही है , इसका आधार अतृप्तता  से शुरू होता है , जहाँ गलती से या भाग्य से दो ऐसी  शक्तियाँ  साथ साथ हो जाती है , जो एक दूसरे की जीवन यात्रा में सहायक न हो के अज्ञानतावश  बाधक बन जाती है।

ये  ऊर्जा अत्यंत  नैसर्गिक  और  सहज  रूप  में  और  सरल  रूप  में  ही  घटित होती है , मनुष्य जनित धर्म समुदाय , जाति  समाज  देश  आदि  कृतिमता  से इनका कोई वास्ता नहीं , यहाँ तक की  उम्र  के तालमेल भी मनुष्य के ही दिमाग की उपज है  , जब एक-एक  क्रतिम मानव रचित धागा आप अपना काटेंगे / काटेंगी ;  तो संभवतः  आपको  ऐसी ऊर्जा महसूस हो जाये। जब की महसूस किया जाता है  की ऐसी भी शक्ति-उर्जा  है जो न मिलके भी दूर से  तरंगो द्वारा  अपनी धुरी  पर अलग हुई शक्ति को  उसकी यात्रा के लिए  जाने या अनजाने  में सहायक तरंगे  भेजती रहती है।और उसके इस जीवन की तमाम कठनाईओं   में भी तमाम  शुभ तरंगो से  आजीवन  सहायक रहती है। या फिर  जब भी संपर्क में ऐसी उर्जाये आती है  तो सहायक ही होती है।

सुनने में ये ट्विन-सोल शब्द बहुत सुन्दर सपने जैसा लगता है , क्यूकी मानव समाज में  ऐसा  सिर्फ परी-कथाओं में  मिलता है या देवी-देवताओं  के जोडे  में । पर  जो संसार का सपना है  वो भी  कहीं न कहीं हकीकत भी अवश्य  है , क्यूंकि सपना भी  वो ही देखा जा सकता है  जो इस संसार में  घटित हो चूका हो या होने वाला हो , इस स्वप्न  को देखने का  और कल्पना  करने  का आधार मस्तिष्क है और मन  जानता है की मस्तिष्क  उतना ही सोच सकता है जितना  उसके दिमाग के  ब्लू प्रिंट  में छपा हुआ है। इसके बाद  काले अंधकार के सिवा  कुछ नजर नहीं आ सकता।

जैसा  हम सभी जानते है , मानव मस्तिष्क  की जटिल रचना , यहाँ इक्छाये  सपने बन जाती है और सपने इक्छाये इसके साथ ही , ज्यादा  उलझाव  दिमाग और  मन दोनों के लिए नुकसान देने वाला है ,  इसलिए   अंतिम  परिणाम के रूप में , सहज स्वीकार की बात कही गयी है , और सहज समर्पण की भी , समाज  के ताने बाने को समझो तो उलझाव ही मिलता है , आध्यात्मिक अनुभव  सामाजिक संरचना में उलझ के संभव ही नहीं। सामाजिक तौर पे  जन्म के साथ  जीव को  संस्कार  परवरिश के तौर पे  अलग अलग समाज में अलग अलग ढंग  से दिए जाते  है , जिसमे   जन्म  से विवाह के बीच  एक पड़ाव  और विवाह से आगे के  जीवन के लिए दूसरा और अंतिम पडाव के रूप में  माना गया।  इनमे ही  सभी सलीको कायदो के साथ अपना जीवन  जीने की सलाह दी जाती है।  इन नियम कायदो के अनुसार माना गया की विवाह  उसी प्रकार जीव के भाग्य में पहले से लिखा होता है  जैसे जन्म किस परिवार में लेना है ये पहले से नियत है ।

पर ये भी  मन जाता है की आत्माओ के अपने भी  संपर्क होते है , जो अलग अलग कारणो से कभी मिल पाते है कभी नहीं।

इसके साथ ही  कई गुथियों के रूप में  जीवन जटिलताओं  को आत्मसात करता चलता है , जो बुजुर्गो की सीखें संस्कार  या घटनाये  अथवा   मानव-मन पे अपना चिन्ह  अंकित करती चलती है , उनमे से एक प्रमुख है अपने मन की बात न कह पाना ( किसी भी कारन से ) और  कही अंदर दबा लेना  , ये  मूलतः किसी भी समाज को सांस्कृतिक  दिशा भी देती है , किसी समाज में खुलापन है तो किसी समाज में ज्यादा कुंठाएं है ,  वैसे तो हर जीव शिकार होता है किसी भी उम्र में पर युवा  सबसे ज्यादा , यौन कुंठाएं ऐसे ही समाज की देन  है।  ऐसे में  दमित  और कुंठाओं से  भरे मन वाले समाज में ट्विन सोल  को समझना  और समझाना दोनों कठिन है।

इसलिए विद्वान  और  उस बुद्धिमत्ता  की उस चोटी को छू चुके गुरुजन के  लाख प्रयास के बाद भी , समाज से इस विषय के प्रति  संकोच और दहशत  नहीं निकलती।  मर्यादा  के लिए सही भी है।  मर्यादा होना उचित है।  पर  वास्तविक सच्चाईओं को भी स्वीकार  करना ही चाहिए।

ट्विन सोल  विषय  में उतरने से पहले विचारधारा का  संतुलन  भी आवश्यक है , वर्ना कल्पनाओ और सपनो में भटक भटक के  , मुख्य सपना  रुपी ये मिला जीवन भी  ध्वस्त हो जाता है।  नतीजा  सिर्फ और सिर्फ असंतोष।

किसी भी ज्ञान का मुख्य उद्देश्य अवश्य सन्दर्भ में रखना चाहिए। महत्वपूर्ण ये है की पसंद से  या  कीमत को ध्यान में रखते हुए ग्रहण की गयी  , अनमोल  वस्तु  क्या अपना कार्य कर प् रही है  ?  अथवा  नहीं ! उदाहरण के लिए  घडी !  या  कीमती बर्तन !  अथवा  बना हुआ घर ! यदि  घढ़ी अपना समय नहीं दिखा पा  रही , बर्तन  से भोजन में स्वाद  नहीं  आ रहा  और घर  मौलिक  शांति ही नहीं दे पा  रहा।  तो ये अपना मूल अर्थ खो देते है। ठीक वैसे ही  ज्ञान   अध्यात्म  भी अगर  समुचित भाव ग्रहण का कार्य नहीं कर प् रहा तो अपना मूल अर्थ हो खो देता है।

बिलकुल इसी तरह  ट्विन सोल  एनर्जी  से भी तात्पर्य है  की आप  अपने आस पास  की ऊर्जा को समझे जाने और महत्त्व दें।  हो सकता है  वो ऊर्जा जो आपके लिए सहायक है आपके आस [आस ही हो !  अथवा कहीं दूर से वो तरंग भेजने में सक्षम हो !  ऊर्जा  अपने  सामान आकर्षण में कैसे भी कार्य कर सकती है।  संभवतः थोड़ी गुणात्मक चेतना , थोड़ी जागरूकता से स्वीकृति , और आभार  का भाव आवश्यक है।  फिर आभास की सम्भावना बढ़ जाती है।

पर क्या करे  हमारा  संकुचित  मस्तिष्क , और  चंचल मन  सिर्फ मूलाधार में ही  अटक जाता है , फिर ऊपर उठने की जगह वहीं  से सारे भाव और निर्णय लिए जाते है।  यही कारन है की हमसे चूक हो जाती है। विषय की गहराई जन सामान्य  के लिए  मजाक बन के रह जाती है।  और इसी मानसिकता के साथ जब व्यक्ति  समाज में  कुछ  करने लायक बनते है , तो उपद्रव ही करते दिखाई देते है।

फिर  हजारो  करोडो   तक  एक  ही समान  ज्ञान का  प्रचार  प्रसार  हो , ये  भी  संभव  नहीं , क्यूंकि  सिर्फ भाव  भेजने  से तो  आधा  ही  काम  हुआ  आधा  अभी  भी  बाकी  है  , जो  ग्रहण  करेगा , जो  स्वीकार करेगा।

यहाँ  पहले  स्वयं  में उतरा हुआ , स्वयं को प्रेम योग्य  जाना हुआ  जीव जिसने  स्वयं में परम के दर्शन कर लिए हो , वो  ही  ट्विन -सोल  के मर्म को समझ सकता है।   वरना  बात  तत्व से  शुरू हो के तत्व पे ही समाप्त  हो जाएगी।  अग्नि का उद्देश्य  आधा  रह जायेगा।   ट्विन सोल  आपका ही  आधा हिस्सा  है , आपकी  ही  सहयोगी ऊर्जा है , आपकी  रचनात्मकता  है , आपका  ही अंश है। ट्विन-सोल मात्र  स्त्री  या पुरुष नहीं ,  ट्विन-सोल मात्र  स्त्री  और  पुरुष  की विभाजित / खंडित  यौन ऊर्जा नहीं , ये तो किसी भी ऊर्जा को समझने  का बहुत ही निम्नतम धरातल है  , जैसे   शीशा  देखे  तो सबसे पहले  आँख नाक और मुह  पे चढ़ा मेकअप नजर आएं , पर  गहराई  इससे भी कहीं ज्यादा   है।

क्यूंकि यात्रा  तत्व से  संवेदनशीलता की है। शरीर  और अंगो के पार  जाना ही होगा।  सांसारिक वासनाओं से ऊपर उठना ही होगा। ये स्वयं का  वास्तविक  चेहरा  बिना मेकप  के देख पाने  जैसा  कृत्य है।  जो वास्तव में  पहले खुद को जानने जैसा है  उसके बाद ही  ट्विन सोल  को समझ पाएंगे।  वो ही  एक ध्यान परम सहायक है , ध्यान से बड़ा मित्र और कोई होगा ? जो स्वयम  से मिलवाए  और फिर  सोल मेट से भी मिलवाए , जो  संसार से परिचय करवाये , और परम से भी मिलवाए। इतना सब जो आपके लिए  कर रहा है उसके प्रति  क्यों न प्रेम हो ? क्यों न श्रद्धा हो ? क्यों न आभार हो ? होना ही चाहिए। पर ध्यान  के प्रति ।



ध्यान दीजियेगा ! प्रेम  श्रद्धा   करुणा  की बात जब हम  तत्व स्तर  पे करते है , तो वो  परम के प्रति निष्ठां  और आभार रूप में  होती है। शरीर  को मात्र  कर्म का आधार मान कर  ऊर्जा  जीवन यात्रा में आगे बढ़ती है , अतः तत्व (शरीर  से ऊपर उठ के ) के लिए  नहीं  , मात्र ऊर्जा के लिए , मात्र  उस  दिव्य सहयोगी तरँग  के लिए आपकी संवेदना और आपके प्रयास  श्रद्धा पूर्वक होने चाहिए।  यही मूल धर्म है , यही प्रयास आपको आपके उद्देश्य  से भी मिलवाएगा।

शरीर ऊर्जा  से भरा  घर  है , बिना ऊर्जा  व्यर्थ मिटटी का है , इस ऊर्जा को ही  समझने के लिए  7 चक्र  में ज्ञानियों ने बांटा  है , अलग अलग  मर्म से  अलग अलग चक्र खोलने की विधिया बताई है , सारी  विधिया व्यर्थ है  अगर संवेदनशीलता  और गृह्यता ही नहीं।

चेतना में चक्र की अनुभूति नासमझी से होती है और नासमझी में द्वन्द होता है इसी से चक्र का अनुभव है ; द्वन्द में फंसी चेतना नासमझी से अपने में चक्र अनुभव करती है लेकिन जब इस चक्र के बनने का रहस्य समझ में आता है तो चक्र खुलता नहीं वह तो गायब हो जाता है और पीछे बचता है तत्व . 

कहीं भी अटकना नहीं  है , भूलना नहीं है क्षण भर को भी की आप जीवन यात्रा पे है ! आपकी यात्रा  कहीं भी क्षण मात्र  को भी रुकी नहीं , यदि साँसे  चल रही है तो यात्रा भी चल रही है।

इस सम्पूर्ण  ग्राह्यता  के बाद  आपकी आधी ट्विन सोल  भी आपके समक्ष  प्रकट होगी।  ये भी रुकेगी  नहीं  अपने निश्चित  समय पे आएगी  , मिलेगी  और  अपना कार्य करके चली जाएँगी , यदि आपमें संवेदनशीलता  जागृति होगी  तो आपको  ट्विन-सोल  उपस्थति का आभास हो जायेगा  वरना   तरंग रूप में वातावरण में  सिर्फ ख़ुशी , आराम  और सुगंध  का ही पता चल पायेगा ,  कोई पल , कोई विचार  , सुख या दुःख  कोई सम्बन्ध  , कुछ भी नहीं रुकेगा , सब कुछ गतिशील है , जन्म जन्मान्तर  की कल्पना  भी व्यर्थ है।  जन्म जन्मान्तर की सिर्फ यात्रा होती है।  वो भी स्व की।  जिसमे आप हम सभी है।


जीवन यात्रा की शुभकामनायें






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