Wednesday, 2 July 2014

सकारात्मक विचारो का प्रभाव और स्वास्थ्य



सबसे पहला प्रभाव ये की जीवन का संचार होने लगता है , ऐसा जैसे धारा के प्रवाह में कोई बड़ा पत्थर अटक गया हो , और सतत प्रवाहशील जैसे रुक के झील बन गया हो , जल को निकास ही नहीं मिल पर रहा , तो ठहरा हुआ रुका जल जैसे प्रदूषित और संक्रमित होने लगता है , निदान सिर्फ इतना की जल को प्रवाह मिले , तो उसमे गुणात्मक ताजगी बनी रहती है , प्रवाह जीवन-गति का दूसरा नाम है। जीवन स्वास्थ्य से सम्बंधित हर ध्यान , हर प्रयोग के बाद कुछ तथ्य मिले जो वास्तव में हीरे जैसे है। आपके शरीर में नस-नस में , अंग-अंग में विचारो का प्रभाव है। नख शिख बोले तो ज्यादा सही होगा। बाल से नाखून तक प्रभावित होते है आपके विचारों से , आपके शरीर से लेकर आपके आस पास का वातावरण प्रभावित होता है। इसकी अवहेलना करना किसी भी तरह से स्वास्थ्यवर्धक नहीं आपके आस पास और आपके स्वयं के लिए।

हमारा शरीर हाथ और पैरों से कितना भी बड़ा और लम्बा दिखे पर है वास्तव में ढाई फ़ीट का। इसी में सारा रहस्य , ज्ञान और विज्ञानं समाया है। और इसीलिए सारा अध्यात्म सारा धर्म सारे योग अनुष्ठान आदि यही से शुरू होते है संकल्पित होते है और प्रभाव डालते है तथा दिशा निर्देश भी देते है।

हमारे कर्म , हमारे विचार , हमारा स्वास्थ्य, और इसी दो ढाई फ़ीट के बीच में हमारा पूर्व तथा भविष्य का बीज यही कही छुपा हुआ , संकेत देती हूँ - मध्य के ७ चक्र को धारण कर्ता है जो , इड़ा पिंगला और सुषम्ना का वाहक है जो। वो ही है जो इस तत्व को चलित करता है। कहा है ? चलो खेले खेल , ढूंढे आज उसको जो छुपा है इनके ही अंदर कहीं।

जो ढूंढा तो पाया , पहले से लेकर सातवें तक उसी का साम्राज्य फैला हुआ है , हर कोशिका , मज्जा , नस , रक्त कण , और फड़कते धड़कते कूदते अंदरुनी अंग , एक ही कहानी कहते है , धड्को मेरी तरह , फड्को मेरी तरह , और उछाल कूद की इस गति को जीवन में उतार लो , मैं ( परम आत्मा ) यहीं हूँ तुम्हारे साथ , तुम्हारे पास , तुममे ही समाया हुआ।

यदि तुम इस रहस्य को देख पाओगे , तो जानोगे उदास होने की कोई वजह ही नहीं , कोई कारन नहीं की तुम अपने ही अंगो को हानि पहुँचाओ अपने ही विचारो से , ये तो आत्मघात है , जिसकी इज़ाज़त " मै " ( परम आत्मा ) नहीं देता , वस्तुतः आत्मघात भी नहीं , आत्मघात तो स्वयं का होता है , यहाँ तुम्हारा क्या है ? जिसको तुम बिना आज्ञा नष्ट कर रहे हो ?

ये मस्तिष्क का कैसा उपयोग है जो सिर्फ विष अंदर फेंक रहा है ,जिसका प्रभाव तुम्हारे अंग अंग को गला रहा है , और तुम सोये हुए से अर्धमूर्छत से वो ही जीवन जिए जा रहे हो , क्यों ?

हजारो बीमारियां और उनके जीवाणु तुम्हारे विचारों के द्वारा अंदर घुसपैठ किये है , और तुमको आभास भी नहीं। अविश्वास में घिरे हुए को विश्वास करना भी मुश्किल है वो भी अदृश्य सत्ता पे , पर यदि नाड़ी के स्पंदन पे यकीं है , ह्रदय की धड़कन पे यकीं है , अपने होने पे यकीं है , तो उसके कारन पे भी यकीं करना ही होगा !

उपाय भी है बहुत साधारण , ध्यान द्वारा सब सहज है। अदृश्य को देखने का कोई और दूसरा तरीका ही नहीं , वैसे ही जैसे मौन को सुनने के लिए मौन ही होना पड़ता है।



चलो ! आज उन्ही बिमारियों से निपटने का आसान तरीका बताते है, जो भी थोड़ा भी जाने है वो यही कहते है की १०० में से ९० बीमारिया मनस्थति का नतीजा है , और आप स्वतः यकीं कर सकते है जब अपने ही विचारो के सकारात्मक परिणाम से आपका सामना होगा , आईये कुछ ऐसे वाक्य है जिनको अपने ह्रदय में स्थान देते है , जो हजारो लाखो बिमारियों को चुटकी में सही कर सकते है -

१- स्वयं के अंदर झांकना अति सुन्दर अनुभव देने वाला है , बाहर को देखना पीड़ादायक है।

२- मैं स्वयं से बहुत प्रेम करता है , मेरा होना स्वयं में औचित्य जनक है। मैं स्वयं को पूर्ण स्वीकार करता हूँ।

३- मुझे जीवन की यात्रा पे पूर्ण विश्वास है , और पूर्ण स्वीकार है।

४- मैं प्रेम हूँ , मैं इस प्रेम को इसी रूप में स्वीकार करता हूँ , और स्वयं को भी , तथा दुसरो में भी मैं इसी प्रेम को देखूंगा।

५- मैं जीवन की प्रक्रिया में पूर्ण विश्वास रखता हु , और मुझे पूर्ण विश्वास है की मैं सुरक्षित हूँ।

६ - मैं अपने अतीत को पूर्ण रूप से विदा कर चूका हूँ , और मैं आगे बढ़ने के लिए पूर्ण स्वतंत्र हूँ , अपने ह्रदय भाव से मैं प्रेम करते हुए आगे बढ़ने का संकल्प लेता हूँ।

७- जब मैं स्वयं को प्रेम करूँगा तो जीवन भी मुझे प्रेम करेगा और सहायता करेगा।

८- रक्त के शीतल प्रवाह के लिए मैं पिछले समस्त द्वश क्रोध को यही विदा दे रहा हूँ , और इस भाव के साथ ही परम शांति का अनुभव कर रहा हूँ ।

९- मैंने आज में जीने का निर्णय किया है , ये मेरा भाव मुझेमे नवीन जीवन संचार कर रहा है।

१० - जीवन देह मुझे परम पिता से मिला है जिसको सम्भालना मेरा प्रथम कर्त्तव्य है , और मैंने जीवन का चयन किया है।

११- मेरी दृष्टि से ज्यादा संपन्न अंतर्दृष्टि का विकास हो रहा है , जो विश्वास योग्य है , बाह्य दृष्टि से कही ज्यादा मुझे साफ़ साफ़ दिख रहा है।

१२ - मेरे दिमाग में शांति है।

१३- मेरे मन की गति धीमी है और दिशा सही।

१४ - मैं ही हूँ एक मात्र जो अपनी मदत कर सकता हूँ , स्वयं से प्रेम कर सकता हूँ , स्वयं को जीवन दे सकता हूँ।

१५ - मैं ही हूँ जो बुद्धि में मन में विचारों में वास करता हूँ , और सम्पूर्ण स्वास्थ्य के साथ इस सीमित जीवन में ; मैं ही स्वयं के रहस्य की गुथि सुलझा सकता हूँ . मेरा अस्वस्थ्य होना मेरे संकल्प में बाधक बनेगा , इस जीवन का उद्देश्य अधूरा रह जायेगा , जो मैं होने नहीं दूंगा। 

यकीं कीजिये आप ही स्वयं को प्रसन्न , संतुष्ट , शांत , और स्वस्थ रख सकते है , अपनी विचार शक्ति पे भरोसा कर सकते है। परन्तु अपनी इस वैचारिक शक्ति को समझने और जानने के लिए आपको स्वयं को जानना अति आवश्यक है।

" ध्यान " द्वारा ये दुष्कर कार्य सहज है , आप कर सकते है।

ध्यान-योग में मुख्यरूप से मस्तिष्क , ह्रदय और वाणी का सहयोग है , इनसे ही संतुलन स्थित करके , चक्रो में संतुलन लाते है। सुषम्ना गतिशील होती है , इड़ा और पिंगला के सहयोग से ऊपर को ऊर्जा चलती है।

और आपकी अंतर्दृष्टि सहस्त्रधार की तरफ विकसित होती जाती है।

भोजन और विचार , इनके अलावा भी और कुछ है क्या ? स्वस्थ भोजन स्वस्थ विचार , यानी स्वस्थ जीवन।

शुभकामनाये !

No comments:

Post a comment