Monday, 20 January 2014

मित्रता मात्र मूल मंत्र Note

यकीनन सारे दुरूह धर्मशास्त्र तुम्हारे मित्र हो सकते है , तुम्हारे सहयोगी हो सकते है , यदि तुम उनके पीछे चलना छोड़ दो , यदि उनके आगे शीश झुकाओगे तो सम्बन्ध मित्र का नहीं राजा और सामंत का हो जायेगा। मित्र बनाना है तो मित्रवत व्यवहार करना होगा। दंडवत प्रणाम की जगह हाथ मिलाना होगा। मित्र बनके वो तुमको ऐसा अनूठा ज्ञान देंगे जो सामंत बनके तुमको कभी नहीं मिल सकता। 

इसी तर्ज पर सारे सद्गुरु तुम्हारे मित्र हो सकते है , सारे का अर्थ गहरा है , इसका अर्थ है ऊर्जा रूप में या फिर शरीर में स्थित ऊर्जावान सभी जो पुरातन इतिहास से चले आ रहे सभी गुरुजनो के मित्र बन के तुम उनके ह्रदय में स्थान बना सकते हो जो शिष्यत्व से कभी सम्भव नहीं , शिष्य बनके तुम सिर्फ पद चिन्हो पे चल सकते हो , पर मित्र सीधा ह्रुदय में बैठता है , गुरुमित्र की मानसिक- तरंगो में वास कर सकता है , बिना बनी बनायीं परिपाटी को पालन किये अपने रास्ते खुद बना सकता है। जैसा गुरु भी चाहते है और धर्मशास्त्र भी। कोई गुरु नहीं चाहता कि आप उनके पदचिंहो पे चलना शुरू कर दे , हर गुरु की प्रसन्नता का फूल तभी खिलता है जब शिष्य उनके साथ साथ चलते है। मित्रता के बाद ही तुमको सहज ज्ञान होगा कि धर्म और धर्म शास्त्र के रचनाकार ; धर्म से क्या चाहते थे और क्या स्वरुप हो गया !

सरलता , सहजता और मित्रता ये मूल मंत्र है चाहे गुरु का साथ हो या धर्म का या फिर परमात्मा का , उनके साथ भी मित्र ही बनना।

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