Monday, 20 January 2014

स्व चेतना ध्यान : ध्यान 1- thought

जब इक आत्मा विदा ले रही हो तो उसके अंतस में क्या चल रहा होता है । उसके अनुभव कहने के लिए जब उसकी जिव्हा उसका साथ नहीं दे रही हो , नेत्रों ने बाह्य जगत देखना बंद कर दिया हो उसको अपनी ही देह पथराती महसूस हो रही हो , उसके अनुभव इतने सघन है इतने गहरे है , क्यूंकि अब उसका सम्बन्ध उस संसार से जुड़ गया है , और इस अनमोल क्षण में वो एक सेतु जैसा अनमोल है , जो क्षण के लिए इधर से और उधर दोनों तरफ से जुड़ गया है। पर इस एक क्षण में वो असहाय है , पूरे जीवन जिसको वो अति प्रयास के बाद भी शब्द नहीं दे पाया , वो भाव सहज उसके सम्मुख खड़ा मुस्करा रहा है और असमर्थ है उसको बयां करने में , शरीर जा रहा है , इन्द्रिय अशक्त , आँखों के आगे अँधेरा , मौजूद प्रियजनों की दुख भरी सरसराती सी फुसफुसाहट , आह लगता है अब ये सांस आखिरी हो गयी। शरीर के दर्द त्यागने का वक्त आ गया , अब तुम मेरी शरण में हो , चलो ... विदा लो ! अब ये कौन कह रहा है ! 
क्या कभी ध्यान में आपने ये अद्भुत प्रयोग किये है ? अद्भुत ध्यान है ये अद्भुत परिणाम वाला है है ये ध्यान आपको सजह ही आपकी चेतना से जोड़ता है। फिर मौत किसी दूसरे की नहीं आपके अंदर अहंकार की होती है आपके अंदर की आसुरी वृत्ती की होती है जो पंच इंद्रियों से बंधी है जिनके कारण लोभ मोह राग द्वेष क्रोध वैमनस्य जैसे शत्रु घेरा डाल लेते है।
यह ध्यान आपको आपकी जमीन से 
जोड़ता है। 


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