Saturday, 11 October 2014

Pick flower wisely

Be wise  be gentle  and be  clear , while flower picking , do not compare  with other's bag , others ground  and others  colors ... all are separate by karma and circumstances  though  energy is one and same .

What matter's  who is alike  this or that  big worshiped personality  or not , what matters  if Noun  is different .. leave all mental chasing .... leave all illusions ... come out  of all illusive  logic  and stand on ground of reality .. and what is reality ?   and reality is   stands  on this dot to that dot ... means from  first breath  and on last breath ... in between  just  goal is  love compassion  gratitude  and service .... no matter big or small   meaningful is whatever  walk is  this walk is towards  direction only . "

Remembering some one ask  question from Osho  as  its very common  "what you feel , where you find yourself  in the place of  Rama  or Krishna or Budhha , (just think  how stupid  question is this from my end )  and whatever his reply  my is also ...... what matters if  my need get fulfilled with little kids saying , or it can  comes to me  through  poor  and  socially illiterate shoemaker  or washerman  or weaver ...  or  one lady of village ...... what matters ?  my job is on selection ground of intakes  , i have to pick flowers  according to me .  either it comes  from meera  or kabir  or  music  or painting  or budhha  or mahaveer  or osho  or  vedas or sages ... from where  my frequency  able to connect i will do .. so that  nature  also give helps through frequencies only , if you alert and awake you can catch  bhava from bhava .  No wordily money   can serve  direct  here .

* gist is  feel always direct connected  with source  as you are ! be aware in receiving ends . believe it  all power is within you only .

Forget  which  sentence  comes from where ?  only remember your Goal  , only pick only that flower which is  comes under your need . wandering is no solution , the word Information is much big  and your brain is small , the word Knowledge is much deep  and your grasping is limited . the world religion is mysterious  , so do not jump only on  curiosity  , some time goalless  curiosity  takes on dark ends .  some time  wandering  gives frustration .

In simple  word  if i can suggest  only , go for self made , leave ready-mades . These readymades mathods  or mantras   may look  beautiful  and fashionable and followed by lacs of people  , but sure it will give unfulfilled thirst at end ...   Do lighten-up  your own path by yourself only


My Dear  Life is one .  just know yourself by you only .  Opt Universally  correct method from era that is self exploration  through meditation with deep Silence , for health  either mental or physical love yourself , respect yourself as temple of God .. do respect  of those ways  from which  destiny provide  you guidance  , by acceptance  and surrender  do prayers  well being for entire  energy of mother earth ... if all goes good  you will also goes good .

* Be  alert  of mind running  and maund's  forceful wishes

* Do strong  with your chakra power  by give  them your own strength .. do not look outer for ... In entire outer human world no one is  capable to give  you  this  power  except  main source of center can provide this abundance  power  during through  your perfect inner connection .

* Be wise  always  while  logic , logic are always mental output .. right and wrong is only mind game .

Just be with you , with your journey , with your destiny ...

Self Journey is  so much exclusive  even  your parents can not  share good bad of you , neither you can share  your kids  goods and bads ... what your parent  can do ,  they  can prepare  for  happenings of you smoothly ...... as same you can also  do for kids , do not try to  cut distinct , you can not !  just accept  whatever is going , with effort only for very best  you can do at your part , cos you also have own limits !! as everyone  have  in human birth .

check possessiveness ! check flow - is it smooth  on your side !

do you understand what i am saying Friend !!

Just read below  add-on  Osho Hindi explanation on the ground of comparison ... yes  i am also agree here , Rama is Rama  and Krishna is Krishna ,  everyone  with no duplicate's , nature is unique ...

क्या आप राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, जीसस और मुहम्मद की कोटि के व्यक्ति हैं? कृपया मेरे संशय दूर करें।
ओशो  कहते है - " कैलाश कोठारी, राम राम हैं, कृष्ण कृष्ण, बुद्ध बुद्ध, मैं मैं हूं। न तो वे मेरी कोटि के व्यक्ति हैं, न मैं उनकी कोटि का व्यक्ति हूं। इस दुनिया में दो व्यक्ति एक जैसे होते ही नहीं, कोटियां तो होंगी कैसे? तुम वस्तुओं की बातें कर रहे हो या आदमियों की? और ये तो फिर आदमियों में भी आदमी हैं! ये तो फूलों में भी फूल हैं! इनकी कोई कोटियां होती हैं? राम जैसा कोई दूसरा व्यक्ति हुआ?
क्या तुम सोचते हो राम और कृष्ण एक ही कोटि के व्यक्ति हैं? कोई तालमेल दिखता है तुम्हें राम और कृष्ण में? राम हैं मर्यादा-पुरुषोत्तम, फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं। आज्ञाकारी हैं। नितांत आज्ञाकारी। परंपरावादी हैं, रूढ़िग्रस्त हैं। सठियाये बाप ने चौदह साल जंगल भेज दिया, तो भी चले गए। यह भी न कहा कि क्यों, किसलिए, क्या कारण है! और बाप निश्चित सठियाया हुआ था। बूढ़े आदमी जब भी कभी जवान लड़कियों से शादी कर लेते हैं तो झंझटें खड़ी होती हैं यह राम के पिता ने एक जवान लड़की से शादी कर ली थी; अब वह जवान लड़की जो भी मनवाती मानना पड़ता था। यूं तो हर पति को मानना पड़ता है, लेकिन जितना बूढ़ा हो उतना ज्यादा मानना पड़ता है। इसने एक बिलकुल बेहूदी असंगत अन्यायपूर्ण बात मनवा ली कि चौदह साल के लिए राम को वनवास दे दो। और दशरथ यह भी न कह सके कि इसकी तुक क्या है! खैर दशरथ न कह सके, ठीक थी। मगर राम! राम में बगावत तो है ही नहीं। राम तो बिलकुल जी-हुजूर हैं! क्रांति तो है ही नहीं। क्रांति की चिनगारी तो है ही नहीं। एकदम आज्ञाकारी हैं। बिलकुल गोबर-गणेश हैं!
अगर मैं राम की कोटि का होऊं भी तो इनकार कर दूं। उनके साथ में नहीं बैठ सकता। मेरी उनसे न बनेगी। मेरे पिता अगर मुझसे कहते कि चौदह साल जंगल चले जाओ, चौदह साल की तो बात दूर, चौदह मिनिट के लिए भी कहते तो मामला आसान नहीं था। मैं तो वही करूंगा जो मुझे ठीक लगता है मैं तो इंच भर अपने अनुभव, अपने बोध से अन्यथा नहीं कर सकता हूं, चाहे लाख कोई कहे, पिता कहें, सारी परंपरा कहे, शास्त्र कहें, पंडित-पुरोहित कहें।
राम पंडित-पुरोहितों को खूब जंचे। इसलिए राम की कोई हैसियत भगवान की नहीं है, लेकिन पंडित पुरोहितों ने राम को भगवान का पर्यायवाची कर दिया। राम शब्द भगवान का पर्यायवाची हो गया। कृष्ण शब्द भगवान का पर्यायवाची नहीं हुआ, खयाल रखना। बुद्ध शब्द भगवान का पर्यायवाची नहीं हुआ। इस देश में कोई दूसरा नाम भगवान का पर्यायवाची हो गया। राम कहा यानी भगवान कहा। राम को जपो यानी भगवान को जपो। राम यानी अल्लाह। राम यानी खुदा।
क्यों पंडित-पुरोहितों ने राम के नाम को इतना ऊपर चढ़ा दिया? कारण है, क्योंकि अतीतवादी हैं राम। बाप की ही नहीं मानी, बाप की मानना तो केवल प्रतीक है। बाप की मानना मतलब--बीते की मानना, व्यतीत की मानना, जो जा चुका उसकी मानना, जो मर चुका उसकी मानना, जो सड़ चुका उसकी मानना। अतीत को मानने का नाम...वह तो प्रतीक है बाप को मानना! बाप यानी अतीत। और जो अतीत को मानता है वह पंडित को भी मानेगा, पुरोहित को भी मानेगा।
कैसी-कैसी मूढ़तापूर्ण बातें राम ने मान लीं! पंडितों ने कह दिया कि इस शूद्र के कानों में सीसा पिघला कर डाल दो, क्योंकि मनु-स्मृति कहती है कि कोई शूद्र अगर वेद सुन ले तो उसके कानों में सीसा पिघला कर डाल देना चाहिए। राम ने डाल दिया। मैं यह न कर सकूंगा। सीसा तो दूर पिछलाया हुआ, किसी शूद्र के कानों में पानी भी नहीं डाल सकूंगा। मैं कैसे राम की कोटि में हो सकता हूं? मैं परंपरा-मुक्त, मैं परंपरा-विद्रोही। राम से मेरा क्या लेना-देना हो सकता है? राम को तो मैं भगवान भी मानने को राजी नहीं हूं।
यह देश जिस दिन राम से मुक्त हो जाएगा उस दिन देश में क्रांति होगी, उसके पहले क्रांति नहीं हो सकती। क्योंकि राम की आड़ में पंडित छिपे हैं, पुरोहित छिपे हैं, इस देश के सारे न्यस्त स्वार्थ छिपे हैं। वे सब बच्चों को बचपन से सिखाना शुरू कर देते हैं कि राम जैसे बनो, देखो क्या मर्यादा, क्या पिता की आज्ञा! मैं इन बातों का कोई मूल्य नहीं मानता। आज्ञाकारिता का जो इतना गुणगान किया जाता है, वह कौन करता है गुणगान? वह वे ही लोग गुणगान करते हैं आज्ञाकारिता का, जो समाज में कोई रूपांतरण नहीं देखना चाहते।
मैं बगावती हूं। मैं इस जिंदगी को बदला हुआ देखना चाहता हूं। आदमी दुख में बहुत जी लिया, नर्क में बहुत जी लिया। यह पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है।
तो राम की कोटि का तो मैं नहीं हूं। कृष्ण की कोटि का भी मैं नहीं हूं, क्योंकि कृष्ण मैं सब तरह की राजनीति है। मेरे जीवन में राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। कृष्ण धोखाधड़ी करने में भी कोई संकोच नहीं करते। कृष्ण अवसरवादी हैं, जैसे मौका देखे वैसा करने को राजी हो जाते हैं। उनके जीवन में और मेरे जीवन में क्या तालमेल हो सकता है? कृष्ण तो युद्ध को छोड़कर भाग गए। इसलिए तो उनका एक नाम बन गया--रणछोड़दास जी। हम होशियार हैं अच्छे नाम देने में।
भगोड़ा न कहा, रणछोड़दास जी कहा। और कृष्ण तो बेईमान भी साबित हुए। वचन दिया था कि शस्त्र नहीं उठाऊंगा युद्ध में और शस्त्र उठा लिया, वचन भंग कर दिया। वचन वगैरह की कोई कीमत नहीं है, कोई मूल्य नहीं है जैसे राजनेता बदल जाते हैं, अभी कुछ कभी कुछ। क्या कहते हैं क्या करते हैं, कुछ हिसाब नहीं। कृष्ण न मालूम किन-किन की स्त्रियां चुरा लाए, सोलह हजार स्त्रियां इकट्ठी कर लीं! इस तरह की बातों में मुझे कोई रस नहीं है।
कृष्ण की गीता से भी मैं पूरी तरह राजी नहीं हूं, क्योंकि वह मूलतः हिंसा का संदेश है--प्रेम का नहीं शांति का नहीं। और कृष्ण की गीता असंगतियों से भरी है, विरोधाभासों से भरी है। क्योंकि चेष्टा है कि उस समय तक जो भी धर्म की धारणाएं थीं, सबको किसी तरह समाहित कर लिया जाए। राजनेता हमेशा यह हरकत करते हैं। गांधी भी यही हरकत में लगे हुए थे। इसलिए वे गीता को माता कहते थे। कहेंगे ही गीता-माता, क्योंकि वही गोरखधंधा वे भी कर रहे थे--अल्लाह ईश्वर तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान। न अल्लाह से मतलब है, न ईश्वर से मतलब है। न सबको सन्मति मिले, इससे मतलब है। मतलब है कुछ और है। मतलब यह है कि यह हिंदुस्तान बंट न जाए।
राजनेता हमेशा बड़ा दे चाहता है, छोटे देश से घबड़ाता है। जितना छोटा देश उतनी छोटी उसकी राजनीति। उतनी सीमित उसकी राजनीति।
गांधी राम के भी बड़े भक्त थे। अंतिम समय भी जब गोली लग तो उनके मुंह से हे राम निकला। और यूं हरिजनों की बात करते थे। मगर गांधी ही हरिजनों को हिंदुओं के घेरे में रोकने का कारण बने। हरिजनों को कभी का हिंदुओं से मुक्त हो जाना चाहिए। क्या रहना ऐसे लोगों के साथ, जिन्होंने सिवाय तुम्हें सताया और कुछ भी न किया? पांच हजार साल जो तुम्हारी छाती पर मूंग दले, उन दुष्टों के साथ क्या रहना? अलग हो जाओ, हट जाओ! लेकिन गांधी ने हर तरह की कोशिश करके हरिजनों को अच्छा नाम दे दिया--हरिजन। अछूत, शूद्र भद्दे लगते हैं, अच्छा नाम दे दिया। रहे आओ। सब तरह समझा-बुझा कर उनको रखने की कोशिश की। उन्हीं मंदिरों में प्रवेश करवाने की गांधी कोशिश करते रहे, जिन मंदिरों ने हरिजनों की जिंदगी को दूभर कर दिया है।
मुझसे कोई कहे कि हरिजनों को मंदिर प्रवेश मिलना चाहिए, मैं तो कहूंगा कि हरिजनों को अगर ब्राह्मण पैर भी पड़ें और कहें हमारे मंदिर आओ तो नहीं जाना चाहिए। ये मंदिर प्रतीक हैं गुलामी के। ये इन्हीं हरिजनों को सताने के प्रतीक हैं। ये इन्हीं के खून के गारे से बने हैं। इन मंदिरों में कदम नहीं रखना चाहिए, थूकने भी नहीं जाना चाहिए लेकिन गांधी जी की पूरी जीवन चेष्टा यही रही। उनके भक्त विनोबा की भी यही चेष्टा है कि हरिजनों को प्रवेश होना चाहिए मंदिर में। किसका मंदिर है यिह? मतलब हिंदू के घेरे के बाहर हरिजन न चला जाए, नहीं तो और ताकत कम हो जाएगी, और राजनीति टूट जाएगी। हरिजन को भी रोक लो; पाकिस्तान भी न बने, यह भी रोक लो। इसलिए अच्छी-अच्छी बातें करो--धर्म की, भजन-कीर्तन करो।
कृष्ण और मेरी कोटि में क्या लेना-देना? बुद्ध को हुए ढाई हजार वर्ष हो गए। ढाई हजार वर्ष में तुम सोचते हो आदमी वहीं का वहीं है? मैं बुद्ध के ढाई हजार साल बाद आया हूं। ढाई हजार साल में आदमी ने बहुत विकास किया है। बहुत! बुद्ध तो डरते थे स्त्रियों को संन्यास देने में और मैंने स्त्रियों के हाथ में पूरा का पूरा संघ समर्पित कर दिया है। बुद्ध तो वर्षों तक इनकार करते रहे कि स्त्रियों को संन्यास नहीं दूंगा, क्योंकि उनको भय था: अगर स्त्रियां संघ में सम्मिलित हुई तो मेरा धर्म नष्ट हो जाएगा। यह भी क्या धर्म हुआ, जो स्त्रियों के सम्मिलित होने से नष्ट हो जाता हो? बड़ा कमजोर धर्म हुआ, जिसको स्त्रियां नष्ट कर दें। लगता है बुद्ध अभी भी यशोधरा से डरे हुए हैं, अभी भी। कहते हैं न कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीने लगता है! पता नहीं यशोधरा ने कितना सताया होगा, कि ऐसी घबड़ाहट छा गई कि बुद्धत्व आ गया, ज्ञान को उपलब्ध हो गए मगर वह यशोधरा का डर जो समाया है वह नहीं निकलता। स्त्रियों को इनकार करते थे, नहीं सम्मिलित करेंगे। और कहा भी, जब सम्मिलित किया...मजबूरी में किया। क्योंकि बुद्ध की मां मर गई थीं जन्म देने के बाद ही। तो सौतेली मां ने बुद्ध को बड़ा किया। सौतेली मां जब संन्यास लेने आई तो बुद्ध इनकार न सके। जिसने बड़ा किया, पाला-पोसा और बहुत प्रेम दिया, जितना सगी मां भी न दे सकती उतना प्रेम दिया--कैसे उसे इनकार करें? इनकार न कर सके, उसे स्वीकार करना पड़ा। और जब मां को स्वीकार कर लिया तो फिर स्वभावतः और भी स्त्रियों के लिए द्वार खुल गया तो बुद्ध ने जिस दिन मां को दीक्षा दी उस दिन यह घोषणा की कि मेरा धर्म पांच हजार वर्ष टिकता, अब केवल पांच सौ वर्ष टिकेगा। क्योंकि स्त्रियां सम्मिलित हो गईं, अब सब भ्रष्ट हो जाएगा।
मुझे तुम कैसे बुद्ध की कोटि में रख सकते हो? बुद्ध अपने भिक्षुओं को कहते थे--जब वे यात्रा पर जाते--कि देखो रास्ते में कोई स्त्री मिल जाए तो देखना मत। मेरा कहीं तालमेल बैठ सकता है? मैं तो कहूंगा: रास्ते में कोई स्त्री लिए जाए तो जी भर कर देख लेना, कि फिर लौट-लौट कर न देखना पड़े। थोड़ी दूर लौट कर भी उसके साथ चलना पड़े तो चल पड़ना। थोड़ी दूर चलकर साथ-साथ देख ही लेना, ठीक से ही देख लेना, ताकि सपने में न आए, ताकि पीछे सताए न।
बुद्ध कहते थे, स्त्रियों को देखना ही मत बुद्ध अपने भिक्षुओं को कहते थे कि चार फीट से ज्यादा देखना ही मत आगे, चार फीट जमीन पर नजर रखना। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। जब चार फीट देख कर चलोगे तो क्या खाक स्त्री को देखोगे! स्त्री दिखाई ही नहीं पड़ेगी।
आनंद बुद्ध से प्रश्न पूछा करता था। आनंद की बड़ी कृपा है मनुष्य जाति पर, क्योंकि उसने ऐसे प्रश्न पूछे जो शायद अगर न पूछे होते तो हमें पता भी न होता कि बुद्ध के उत्तर क्या होते। आनंद ने पूछा कि भगवान, यह भी हो सकता है कभी, देखना पड़े। कोई ऐसी स्थिति हो सकती है कि देखना पड़े।
सच तो यह है कि मैं यह पूछूंगा कि जब तक तुम देखोगे नहीं कि वह स्त्री है कि पुरुष, तब तक स्त्री को नहीं देखना यह तय कैसे करोगे? पहले तो देखना ही पड़ेगा कि भई कौन है, स्त्री है कि पुरुष, स्त्री है तो नहीं देखना। मगर वह तो देखना हो ही गया। अब चाहे आंखें मिचो, चाहे जोर से भींच लो, कस कर भींच लो, पट्टी बांध लो; मगर क्या, अब देख तो चुके ही। या तो यह कहो कि किसी को देखना ही मत, स्त्री हो कि पुरुष, गया हो कि घोड़ा, हाथी हो कि ऊंट, देखना ही मत--तो ठीक। जब तुम कहते हो स्त्री को मत देखना, तो इसका मतलब, भेद तय करना पड़ेगा--घोड़ा जा रहा है, खच्चर जा रहा है, हाथी जा रहा है, आदमी जा रहा है कि स्त्री जा रही है, कौन जा रहा है? एक दफा तो देखना ही पड़ेगा। फिर चाहे आंखें नीची कर लेना, फिर चाहे आंखें बंद कर लेना, चाहे फोड़ ही लेना।
तो मैं तो यह मानता हूं, जब तक तुम स्त्री को देखोगे नहीं तब तक नहीं देखने का सवाल ही नहीं उठता। और जब देख ही लिया तो अब क्या खाक नहीं देखना! अरे अब देख ही लो। अब जी भर कर देख लो। निपटारा ही कर लो अधूरा अधूरा देखोगे तो यह स्त्री की छवि छलकती रह जाएगी। और मनुष्य की कल्पना स्त्री को जितना सुंदर कर लेती है उतना यथार्थ में कोई स्त्री सुंदर नहीं होती, न कोई पुरुष इतना सुंदर होता है। कल्पना। कल्पना खूब रंग भर देती है इंद्रधनुष बना देती है जहां कुछ भी नहीं। फूल खिला देती है जहां राख भी नहीं। तारे सजा देती है जहां अंधकार भी नहीं। रात को दिन बना देती है। मिट्टी को सोना कर देती है। कल्पना जादू है।
लेकिन आनंद ने पूछा कि अगर किसी स्थिति में देखना ही पड़े, फिर क्या करना? तो बुद्ध ने कहा: फिर छूना मत। अगर देख भी लो, भूल-चूक से देखना भी पड़े तो आंख बचा कर निकल जाना। मगर छूना मत।
एक तरफ तो कहते हो कि शरीर हड्डी मांस मज्जा, अरे इसमें रखा क्या है! और दूसरी तरफ कहते हो--छूना मत! हड्डी मांस मज्जा को छूना मत! एक तरफ तो कहते हो शरीर तो मिट्टी का पुतला और दूसरी तरफ कहते हो छूना मत। दोनों बातों में विरोध है। अगर शरीर मिट्टी का पुतला है तो छुओ बराबर है। मिट्टी को तो छूते हो रोज। मिट्टी से तो बच कर नहीं चलते।
बुद्ध ने तो अपने भिक्षुओं को कहा: जूते मत पहनना। अगर यह बात सच थी कि मिट्टी को छूने में खतरा है तो बुद्ध के भिक्षु को तो जूता निकालना ही नहीं चाहिए, चाहे रात सोए, चाहे कुछ भी करे, भोजन करे, जूता तो डाले ही रहना चाहिए। क्योंकि कहीं मिट्टी छू जाए! मिट्टी ही अगर स्त्री का आधार है, देह का आधार है, तो फिर तो मिट्टी को भी छूने में घबराहट होनी चाहिए।
मगर नहीं, यह सब बात कहने की है। यह सिर्फ निंदा के लिए कि मिट्टी है। यह सिर्फ घबड़ाने के लिए है। यह वीभत्सता प्रगट करने के लिए कि स्त्री में क्या है--हड्डी, मांस मज्जा, मवाद! अरे क्या इसको छू रहे हो! शर्म नहीं आती?
और तुममें क्या है? तुम्हारे शरीर में क्या है? स्त्री के ही शरीर से तुम्हारा शरीर बना है। तुम्हारे शरीर में भी वही हड्डी मांस मज्जा है। और हड्डी मांस मज्जा हड्डी मांस मज्जा से निकली है। हड्डी मांस मज्जा हड्डी मांस मज्जा ही है, इसमें इतना क्या परेशान होना?
बुद्ध ने कहा: छूना मत। लेकिन आनंद भी एक था! उसने कहा: कोई ऐसी स्थिति भी हो सकती है कि छूना पड़े। समझो कि कोई स्त्री गिर गई और उसको उठाना पड़े; न हो स्त्री, कोई भिक्षुणी गङ्ढे में गिर जाए तो उसको निकालना पड़े तो छूना कि नहीं?
बुद्ध ने कहा: छूना पड़े छू लेना मगर बोलना मत। देख रहे हो क्या शतरंज की चालें चली जा रही हैं! इधर आनंद भी चाल चला जा रहा है, उधर बुद्ध भी चाल चलते हैं कि फिर बोलना ही मत। और आनंद ने कहा: भई कोई ऐसी हालत भी हो सकती है कि बोलना भी पड़े, कि पूछना पड़े कि बाई कैसे गिर गई, कि टांग तो नहीं टूट गई, कि अस्पताल पहुंचा दूं, कि तेरा घर कहां है, कि क्या करूं क्या न करूं? चल लेगी कि कंधे पर उठा कर ले चलूं। कुछ पूछना पड़े और बिलकुल बिना एकदम उठा कर भाग खड़े होओ, वह भी नहीं जंचेगा। और दूसरे लोग पकड़ लें तुमको कि क्या मामला है, तुम्हीं ने तो नहीं गिराया था इस स्त्री को? इसकी हड्डी टूट गई, तुम भाग खड़े हुए! बोले तक नहीं! यह भी न पूछा कि बाई, चोट कहां लगी! सज्जनता भी कोई चीज है, शिष्टाचार भी।
तो आनंद ने कहा कि अगर कुछ पूछना भी पड़े तो? तो बुद्ध ने आखिरी चाल चली। उन्होंने कहा: फिर तुम्हें जो करना हो करना, एक बात खयाल रखना कि ध्यान रखना, जागरूक रहना। होश न खो देना।
मुझे तुम बुद्ध की कोटि में कहां रखोगे? मैं भी कहता हूं: होश रखना। अरे जब होश ही रखना है तो जी भर कर छूना! जब होश ही है तो फिर क्या डर! फिर बोलो भी, बतियाओ भी, गपशप भी करो, छुओ भी, नाचो भी, गाओ भी ! जब होश भी है...। यह तो होश न हो उनके लिए ये बातें ठीक थीं, बुद्ध ने जो कहीं। और जिनमें होश नहीं है वे अगर न भी देखेंगे तो क्या होगा? बच कर भी निकल जाएंगे तो क्या होगा?
मैं तो कहता हूं: होश पर्याप्त है। और होश को साधने के लिए यह सम्यक अवसर है। होश को साधोगे कहां? उसके लिए चुनौती कहां है? जहां चुनौती है वहीं साधने की सुविधा है।
मैं बुद्ध से पच्चीस सौ साल बाद हूं, उसी कोटि में कैसे हो सकता हूं? कोई उपाय नहीं।
और तुम कहते हो--महावीर! महावीर से मेरा क्या तालमेल बिठाओगे? असंभव है तालमेल बिठालना। महावीर मानते हैं शरीर को दमन करने में, सताने में, गलाने में। मैं शरीर का दुश्मन नहीं। मैं तो शरीर को मंदिर मानता हूं। मैं तो कहता हूं शरीर को प्रेम करो: शरीर परमात्मा की देन है किसी पाप का फल नहीं। शरीर को स्वस्थ रखो, सुंदर रखो, सजाओ। महावीर तो शरीर के बड़े दुश्मन हैं। वे तो कहते हैं: भूखे मरो, अनशन करो, उपवास करो। मैं तो सम्यक आहार पर भरोसा करता हूं। न ज्यादा खाओ न कम। दोनों दुश्मनी हैं। ज्यादा खाओ तो शरीर के साथ दुश्मनी है, कम खाओ तो शरीर के साथ दुश्मनी है। उतना खाओ जितना शरीर को जरूरत है न कम न ज्यादा। उतने सोओ जितना शरीर को जरूरत है।
महावीर तो तपस्वी हैं। मैं तो तपश्चर्या के पक्ष में नहीं। मैं तो तपश्चर्या को एक तरफ की हिंसा मानता हूं। कुछ लोग दूसरों को सताते हैं, कुछ लोग खुद को ही सताते हैं। दुनिया में दो तरह के सताने वाले लोग हैं। जो दूसरों को सताते हैं वे कम से कम बेहतर हैं उनसे जो खुद को सताते हैं, क्योंकि दूसरे को सताओगे तो दूसरे को कम से कम आत्मरक्षा का उपाय तो है। तुम तलवार चलाओ तो वह ढाल तो उठा सकता है, भाग तो सकता है। वह भी तो तलवार निकाल सकता है। मगर खुद को सताओगे तो, तो कोई आत्मरक्षा का उपाय ही न बचेगा। जब तुम ही सताने वाले हो, जब रक्षक ही भक्षक हो गया, तो फिर तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी।
महावीर तो बाल लोंचते हैं। मैं तो बाल लोंचने को पागलपन का लक्षण मानता हूं। अक्सर स्त्रियों जब गुस्से में आ जाती हैं तो बाल लोंचती हैं। तुम भी जब बहुत गुस्से में होते हो ऐसा मन होता है कि लोंच-लांच कर रख दो। यह तो क्रोध में विक्षिप्तता में...। लेकिन महावीर बाल लोंचते हैं। क्यों? क्योंकि उस्तरा तो एक वैज्ञानिक साधन हो गया। हद हो गई--उस्तरा और वैज्ञानिक साधन! तो खुद अपने घर में ही लोहे को घिस-घिसा कर उस्तरा बना लो, और क्या करोगे? मगर लोंचना बालों को! मगर वह महावीर की तपश्चर्या का अंग है। नंगे रहना धूप में, सर्दी में...! मुझे तुम कैसे महावीर की कोटि में रखोगे? और महावीर तो कहते हैं: संसार दुख है, आवागमन से .छुटकारा पाना है। और मैं कहता हूं: संसार आनंद है और प्रभु की अनुकंपा है कि तुम्हें उसने संसार की भेंट दी। इसी संसार में ही संन्यास के फूल को खिलाना है। महावीर तो संसार को छोड़ने के पक्षपाती हैं। मैं संसार को जीने का पक्षपाती हूं--उसकी समग्रता में, उत्सवपूर्वक, अनुग्रह से। मुझे तुम कैसे महावीर की कोटि में रखोगे?
कैलाश कोठारी, तुम भी क्या फिजूल के प्रश्न पूछते हो! मैं यह नहीं कह रहा हूं कि उनसे ऊपर हूं, वे मुझसे नीचे हैं या वे मुझसे ऊपर हैं, मैं उनसे नीचे हूं। मैं तो मानता हूं इस पृथ्वी पर कोई न ऊंचा है, न कोई नीचा है। राम और कृष्ण और बुद्ध को ही ऊंचा नहीं नीचा नहीं, मोर और हिरण और गुलाब के फूल, इनको भी मैं अपने से ऊंचा या नीचा नहीं रखता। यह सारा अस्तित्व एक है। इसमें कोई दूसरा है ही नहीं कि कोई ऊंचा हो सके, कोई नीचे हो सके। इसमें अगर कोई फर्क भी है लोगों में, तो बस एक ही बात का तर्क है। कुछ लोग सोए हैं, उनकी मर्जी उनको नहीं सोना, जाग गए। दुनिया में बस इतना ही फर्क है कि सोए हुए लोग और जागे हुए लोग। मगर दोनों में कोई ऊंचा-नीचा नहीं है। मैं तो अज्ञानी को भी बुद्धों से नीचा नहीं मानता, क्योंकि दोनों का अंतर्तम तो एक ही है।

 - "ओशो " ...
Bahuri Na Aisa Daon - 09

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