Monday, 27 October 2014

(hindi) किताब ए मीरदाद - अध्याय -10/11

        यह संसार गवाहीयां के लिए नहीं
          प्रेम बिखेरने  के लिए है।
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अध्याय 10
      ☞ निर्णय तथा निर्णय-दिवस
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मीरदाद: मुझे कोई निर्णय नहीं देना है,
देना है केवल दिव्य ज्ञान ।

मैं संसार में निर्णय देने नहीं आया,
बल्कि उसे निर्णय के बंधन
से मुक्त करने आया हूँ ।
क्योंकि केवल अज्ञान ही न्यायधीश
की पोशाक पहनकर क़ानून के
अनुसार दण्ड देना चाहता है ।
अज्ञान का सबसे निष्ठुर
निर्णायक स्वयं अज्ञान है ।
मनुष्य को ही लो ।
क्या उसने अज्ञानवश अपने
आपको चीरकर दो नहीं कर डाला
और इस प्रकार अपने लिये तथा
उन सब पदार्थों के लिये जिनसे
उसका खण्डित संसार बना है
उसने मृत्यु को निमंत्रण नहीं दे दिया ?
मैं तुमसे कहता हूँ………
प्रभु और मनुष्य अलग नहीं है ।
केवल है प्रभु-मनुष्य या मनुष्य-प्रभु ।
वह एक है ।
उसे चाहे जैसा गुणा करें,
चाहे जैसे भी भाग दें, वह सदा एक है ।
प्रभु का एकत्व उसका स्थाई विधान है ।
यह विधान स्वयं लागू होता है ।
अपनी घोषणा के लिये,
या अपना गौरव तथा सत्ता
बनाये रखने के लिये इसे न न्यायालय की आवश्यकता है न न्यायाधीश की ।
सम्पूर्ण ब्रम्हांड–
जो दृश्य है और जो अदृश्य है–
एकमात्र मुख है जो निरंतर
इसकी घोषणा कर रहा है–
उनके लिये जिनके पास सुनने के लिये कान हैं ।
सागर, चाहे वह विशाल और गहरा है, क्या एक ही बूंद नहीं ?
धरती, चाहे वह इतनी दूर तक फैली है,
क्या एक ही ग्रह नहीं ?
इसी प्रकार सम्पूर्ण मानव–जाति
एक ही मनुष्य है;
इसी प्रकार मनुष्य, अपने सभी संसारों सहित,
एक पूर्ण इकाई है ।
प्रभु का एकत्व,
मेरे साथियों,
अस्तित्व का एकमात्र कानून है ।
इस्क दूसरा नाम है प्रेम ।
इसे जानना और स्वीकार करना जीवन को स्वीकार करना है ।
अन्य किसी कानून को स्वीकार करना अस्तित्व-हीनता या मृत्यु को स्वीकार करना है ।
जीवन अन्तर में सिमटना है;
मृत्यु बाहर बिखर जाना ।
जीवन जुड़ना है;मृत्यु टूट जाना ।
इसलिये मनुष्य,
जो द्वैतवादी है,
दोनों के बीच लटक रहा है ।
क्योंकि सिमटेगा वह अवश्य,
किन्तु बिखरकर ही ।
और जुड़ेगा वह अवश्य,
किन्तु टूटकर ही ।
सिमटने और जुड़ने में वह
कानून के अनुसार आचरण करता है;
और जीवन होता है उसका पुरस्कार ।
बिखरने और टूटने में
वह कानून के विरुद्ध आचरण करता है;
और मृत्यु होता है उसका कटु परिणाम ।
फिर भी तुम, अपनी दृष्टी के दोषी हो,
उन मनुष्यों पर निर्णय देने बैठते हो
जो तुम्हारी ही तरह अपने आपको दोषी मानते हैं ।
कित्ने भयंकर है निर्णायक और उनका निर्णय !
निःसंदेह, इससे कम होंगे मृत्यु-दण्ड के दो
अभियुक्त जो एक-दूसरे को
फाँसी की सजा सुना रहे हों ।
कम हास्यजनक होंगे,
एक ही जुए में जुते दो बैल जो
एक-दूसरे को जोतने की धमकी दे रहे हों ।
कम घृणित होंगे एक ही
कब्र में पड़े दो शव जो
एक-दूसरे को कब्र के योग्य ठहरा रहे हों ।
कम दयनीय होंगे दो निटप अंधे
जो एक-दूसरे की आँखें नोच रहे हों ।
न्याय के हर आसन से बचो,मेरे साथियो ।
क्योंकि किसी भी व्यक्ति या
वस्तु पर फैसला सुनाने के लिये
तुम्हे न केवल उस कानून को जानना होगा
और उसके अनुसार जीवन बिताना होगा,
बल्कि गवाहियाँ भी सुननी होंगी ।
और किसी भी विचाराधीन मुकद्दमे
में तुम गवाही किनकी सुनोगे ?
क्या तुम वायु को न्यायालय में बुलाओगे ?
क्योंकि आकाश के नीचे जो कुछ भी होता है,
वायु उसके होने में सहायक और प्रेरक होती है ।
या फिर तुम सितारों को तलब करोगे ?
क्योंकि संसार में जो भी घटनाएँ घटती हैं,
सितारे उनके रहस्यों से परिचित होते हैं ।
या फिर तुम आदम से लेकर
आज तक के प्रत्येक मृतक को
न्यायालय में उपस्थित होने का आदेह जारी करोगे ?
क्योकि सब मृतक जीने वालों में जी रहे हैं ।
किसी भी मुकद्दमे में पूरी गवाही प्राप्त करने के लिये ब्रम्हांड का गवाह होना आवश्यक है ।
जब तुम ब्रम्हांड को न्यायालय में बुला सकोगे,
तुम्हे न्यायालयों की आवश्यकता ही नहीं रहेगी ।
तुम न्यायासन से उतर जाओगे
और गवाह को न्यायाधीश बनने दोगे ।
जब तुम सबकुछ जान लोगे,
तो किसी के विषय में निर्णय नहीं दोगे|
जब तुम्हारे अंदर संसारों को
एकत्र करने का सामर्थ्य पैदा हो जायेगा,
तब तुम जो बाहर बिखर गये है
उनमे से एक को भी अपराधी नहीं ठहराओगे;
क्योंकि तुम जान लोगे कि बिखरनेवाले को उसके बिखराव ने ही अपराधी घोषित कर दिया है
और अपने आपको दोषी माननेवाले को
दोषी ठहराने के बजाय तुम
उसे उसके दोष से मुक्त करने का प्रयत्न करोगे ।
इस समय मनुष्य अपने ऊपर स्वयं लादे हुए बोझ से बुरी तरह दबा हुआ है ।
उसका रास्ता बहुत उबड़-खाबड़ तथा टेढ़ा-मेढ़ा है ।
हर फैसला जज और अभियुक्त दोनों के लिये सामान रूप से एक अतिरिक्त बोझ होता है ।
यदि तुम अपने बोझ को हलका रखना चाहते हो,
तो किसी के विषय में फैसला करने न बैठो ।
यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारा
बोझ अपने आप उतर जाये,
तो शब्द में डूबकर सदा के लिये उसमे खो जाओ ।
यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारा मार्ग
सीधा तथा समतल हो
तो दिव्य- ज्ञान को अपना मार्गदर्शक बना लो ।
मैं तुम्हारे पास निर्णय लेकर नहीं,
दिव्य-ज्ञान लेकर आया हूँ ।
बैनून:- निर्णय दिवस के विषय में तुम क्या कहते हो ?
मीरदाद -हर दिन निर्णय-दिवस है, बैनून ।
पलक की हर झपक पर हर प्राणी के कर्मों का हिसाब किया जाता है|
कुछ छिपा नहीं रहता ।
कुछ अन्तुला नहीं रहता |
ऐसा कोई विचार नहीं है,
कोई कर्म नहीं,
कोई इच्छा जो विचार,
कर्म या इच्छा,
करनेवाले के अंदर अंकित न हो जाये ।
संसार में कोई विचार,
कोई इच्छा, कोई कर्म फल दिये बिना नहीं रहता;
सब अपनी विधा और प्रकृति के
अनुसार फल देते हैं|
जो कुछ भी प्रभु के विधान के अनुकूल होता है,
जीवन से जुड़ जाता है|
जो कुछ उसके प्रतिकूल होता है,
मृत्यु से जा जुड़ता है|
सब दिन एक सामान नहीं होते, बैनून ।
कुछ शांतिपूर्ण होते हैं,
वे होते हैं ठीक तरह से
बिताई गई घड़ियों के फल|
कुछ बादलों से घिरे होते हैं,
वे वे होते है मृत्यु में
अर्ध-सुप्त तथा जीवन में
अर्ध-जाग्रत अवस्था में बिताई गई घड़ियों के उपहार।
कुछ और होते हैं जो तूफ़ान पर सवार,
आँखों में बिजली की कौंध और
नथनों में बादल की गरज लिए तुम पर टूट पड़ते हैं।
वे ऊपर से तुम पर प्रहार करते हैं;
वे धरती पर तुम्हे सपाट गिरा देते है
और विवश कर देते हैं
तुम्हे धूल चाटने पर
और यह चाहने पर कि
तुम कभी पैदा ही न हुए होते।
ऐसे दिन होते हैं
जान- बूझ कर विधान के
विरुद्ध बिताई गईं घड़ियों का फल।
संसार में भी ऐसा ही होता है।
इस समय आकाश पर छाये हुए
साये उन सायों से रत्ती भर भी
कम अमंगल-सूचक नहीं हैं जो
जल-प्रलय के अग्रदूत बनकर आये थे।
अपनी आँखें खोलो और देखो।
जब तुम दक्धिनी वायु के घोड़े पर सवार
बादलों को उत्तर की ओर जाते देखते हो,
तो कहते हो कि ये तुम्हारे लिये बर्षा लाते हैं।
इंसानी बादलों के रुख से
यह अंदाजा लगाने में कि वे क्या लायेंगे,
तुम इतने बुद्धिमान क्यों नहीं हो।
क्या तुम देख नहीं सकते कि
मनुष्य कितनी बुरी तरह से
अपने जालों में उलझ गए हैं।
जालों में से निकल आने का दिन निकट है।
और कितना भयावह है वह दिन।
देखो,
कितनी सदियों के दौरान मन
और आत्मा की नसों से बुने गये हैं
मनुष्य के ये जाल!
मनुष्यों को उनके जालों में से
खींच निकालने के लिये उनके मांस तक को फाड़ना पड़ेगा; उनकी हड्डियों तक को कुचलना पड़ेगा।
और मांस को फाड़ने और हड्डियों को कुचलने का काम मनुष्य स्वयं ही करेंगे।
जब ढक्कन उठाये जायेंगे,
जो उठाये अवश्य जायेंगे,
और जब वर्तन बतायेंगे कि उनके अंदर क्या है,
जो वे निःसंदेह बतायेंगे,
तब मनुष्य अपने कलंक को कहाँ छिपायेंगे
और भागकर कहाँ जायेंगे?
जीवित उस दिन मृतकों से
ईर्ष्या करेंगे, और मृतक जीवितों को कोसेंगे।
मनुष्यों के शब्द उनके कन्ठ में चिपककर रह जायेंगे,
और प्रकाश उनकी पलकों पर जम जायेगा।
उनके ह्रदय में से निकलेंगे नाग और बिच्छू,
और यह भूलकर कि उन्होंने स्वयं
अपने ह्रदय में इन्हें बसाया
और पाला था, वे घबराकर चिल्ला उठेंगे,
कहाँ से आ रहे हैं ये नाग और बिच्छू?
अपनी आँखे खोलो और देखो।
ठीक इसी नौका के अंदर,
जो ठोकरें खा रहे संसार के लिए
आलोक- स्तम्भ के रूप में स्थापित की गई थी,
इतनी दलदल है
कि तुम उसे किसी तरह से भी पार नहीं कर सकते.
यदि आलोक-स्तम्भ ही फन्दा बन जाये,
तो उन यात्रियों की कैसी भयंकर
दशा होगी जो समुद्र में हैं!
मीरदाद तुम्हारे लिये
एक नई नौका का निर्माण करेगा।
ठीक इसी नीड़ के अन्दर वह
उसकी नींव रखकर उसे खड़ा करेगा।
इस नीड़ में से उड़ कर तुम
मनुष्य के लिये शांति का सन्देश लेकर नहीं,
अनन्त जीवन लेकर संसार में जाओगे।
उसके लिये अनिवार्य है
कि तुम विधान को जानो
और उसका पालन करो।
जमोरा: हम प्रभु के विधान
को कैसे जानेंगे और कैसे करेंगे उसका पालन?
   संसार हम
          प्रेम सिखने आए है

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अध्याय 11
     प्रेम प्रभु का विधान है।
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मीरदाद: प्रेम ही प्रभु का विधान है।
तुम जीते हो ताकि तुम प्रेम करना सीख लो।
तुम प्रेम करते हो ताकि तुम जीना सीख लो।
मनुष्य को और कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं।
और प्रेम क्या है,
सिवाय इसके कि प्रेमी प्रियतम को
सदा के लिये अपने अंदर लीन कर लें
ताकि दोनों एक हो जायें?
और मनुष्य को प्रेम किस्से करना है?
क्या उसे जीवन- वृक्ष के
एक विशेष पत्ते को चुनकर
उस पर ही अपना पूरा प्यार उड़ेल देना है?
तो फिर क्या होगा उस शाखा का
जिस पर वह पत्ता उगा है?
उस तने का जिससे वह शाखा निकली है?
उस छाल का जो उस शाखा की रक्षा करती है?
उन जड़ों का जो छाल,
तने, शाखाओं और पत्तो का पोषण करती हैं?
मिटटी का जिसने जड़ों को छाती से लगा रखा है?
सूर्य, समुद्र, वायु का जो मिटटी को उपजाऊ बनाते हैं?
यदि किसी पेड़ पर लगा एक
छोटा सा पत्ता तुम्हारे प्रेम का अधिकारी हो
तो पूरा पेड़ उसका कितना अधिक अधिकारी होगा?
जो प्रेम सम्पूर्ण के एक अंश को चुनता है,
वह अपने भाग्य में आप ही
दुखों की रेखा खींच लेता है।
तुम कहते हो, ”एक ही वृक्ष पर
भाँती-भाँती के पत्ते होते हैं।
कुछ स्वस्थ होते हैं, कुछ अस्वस्थ,;
कुछ सुंदर होते हैं, कुछ कुरूप;
कुछ दैत्याकार होते हैं, कुछ बौने।
पसंद करने और चुनने से
भला आप कैसे बच सकते हैं।”
मैं तुमसे कहता हूँ कि बीमारों के
पीलेपन में से तन्दुरुस्तों की ताजगी पैदा होती है।
मैं यह भी कहता हूँ कि कुरूपता
सुंदरता की रंग-पटटी, रंग और कूँची है,
और यह भी कि बौना,
बौना बौनापने कद में से कुछ न होता
यदि उसने अपने कद कद में से
कुछ कद दैत्य को भेंट न कर दिया होता|
तुम जीवन-वृक्ष हो।
अपने आपको टुकड़ों में बाँटने से सावधान रहो।
फल की फल से तुलना न मत करो,
न पत्ते की पत्ते से,
न शाखा की शाखा से;
और न तने की जड़ों से तुलना करो,
न वृक्ष की माटी-माँ से।
पर तुम ठीक यही करते हो
जब तुम एक अंश को बाकी अंशों से अधिक,
अथवा बाकी अंशों को छोड़कर
केवल एक अंश को ही प्यार करते हो।
तुम जीवन-वृक्ष हो।
तुम्हारी जड़ें हर स्थान पर है।
तुम्हारे फल हर मुंह में हैं।
इस वृक्ष पर फल जो भी हों;
इसकी शाखाएँ और पत्ते जो भी हों;
जड़ें जो भी हों, वे तुम्हारे फल हैं;
वे तुम्हारी शाखाये और पत्ते हैं;
वे तुम्हारी जड़ें है ।
यदि तुम चाहते हो कि
वह सदा दृढ़ और हरा-भरा रहें,
तो उस रस का ध्यान रखो
जिससे उसकी जड़ों का पोषण करते हों।
प्रेम जीवन का रस है,
जबकि घृणा मृत्यु का मवाद।
किन्तु प्रेम का भी,
रक्त की तरह,
हमारी रगों में बेरोक
प्रवाहित होना नितान्त आवश्यक है।
रक्त के प्रवाह को रोको तो
वह एक ख़तरा, एक संकट बन जायेगा।
और घृणा क्या है
सिवाय दबा दिये गये या रोक लिये गये प्रेम के,
जो इसी लिये घातक बिष बन जाता है।
खिलानेवाले और खानेवाले, दोनों के लिये;
घृणा करनेवाले और घृणा पानेवाले, दोनों के लिये?
तुम्हारे जीवन-वृक्ष का पीला पत्ता
केवल प्रेम से वंचित पत्ता है।
पीले पत्ते को दोष मत दो।
मुरझाई हुई शाखा प्रेम की भूखी शाखा है।
मुरझाई हुई शाखा को दोष मत दो।
सड़ा हुआ फल केवल घृणा का पाला गया फल है।
सड़े हुए फल को दोष मत दो।
बल्कि दोष दो अपने अंधे और कृपण मन को,
जो जीवन-रस को भीख की तरह थोड़े-से व्यक्तियों में बाँटकर अधिकाँश को उससे वंचित रखता है,
और ऐसा करते हुए अपने
आपको भी उससे वंचित रखता है।
आत्म-प्रेम के अतिरिक्त कोई प्रेम सम्भव नहीं है।
अपने अंदर सबको समा लेनेवाले अहम् के अतिरिक्त अन्य कोई अहम् वास्तविक नहीं हैं।
इसलिये प्रभु शब्द प्रेम है,
क्योंकि वह इसी अहम् से प्रेम करता है।
जब तक प्रेम तुम्हे पीड़ा देता है,
तुम्हे अपना वास्तविक अहम् नहीं मिला है,
न ही प्रेम की सुनहरी कुंजी तुम्हारे हाथ लगी है।
क्योंकि तुम एक क्षणभंगुर अहम् को प्रेम करते हो, तुम्हारा प्रेम भी क्षण-भंगुर है।
स्त्री के लिए पुरुष का प्रेम, प्रेम नहीं।
वह प्रेम का एक बहुत धुंधला चिन्ह है।
संतान के लिये माता या पिता का प्रेम,
प्रेम पवित्र मंदिर की देहरी-मात्र है।
जब तक हर पुरुष हर स्त्री का प्रेमी नहीं बन जाता
और हर स्त्री हर पुरुष की प्रेमिका,
जब तक हर संतान हर माता या पिता की संतान नहीं बन जाती और हर माता या पिता हर संतान की माता या पिता, जब तक स्त्री पुरुष हाड-मांस के साथ हाड-मांस के घनिष्ठ सम्बन्ध की डींग भले ही बाँध लें,
किन्तु प्रेम के पवित्र शब्द का उच्चारण कभी न करें।
क्योकि ऐसा करना प्रभु-निंदा होगी।
जब तक तुम एक भी मनुष्य को शत्रु मानते हो,
तुम्हारा कोई मित्र नहीं जिस ह्रदय में शत्रुता का वास है, वह मित्रता के लिये सुरक्षित
आवास कैसे हो सकता है?
जब तक तुम्हारे ह्रदय में घृणा है,
तुम प्रेम के आनंद से अपरिचित हो।
यदि तुम अन्य सभी वस्तुओं का
जीवन-रस से पोषण करते हो,
पर किसी छोटे-से कीड़े को उससे वंचित रखते हो,
तो वह छोटा-सा कीड़ा अकेला ही
तुम्हारे जीवन में कडवाहट घोल देगा।
क्योंकि किसी वस्तु या
किसी व्यक्ति से प्रेम करते हुए
तुम वास्तव में अपने आप से ही प्रेम करते हो।
इसी प्रकार,
किसी वस्तु या किसी
व्यक्ति से घृणा करते हुए
तुम वास्तव में अपने आपसे ही घृणा करते हो।
क्योंकि जिससे तुम घृणा करते हो
वह उसके साथ जुड़ा हुआ है
जिससे तुम प्रेम करते हो–
ऐसे जुड़ा हुआ है जैसे
किसी सिक्के के दो पह्लू
जिन्हें कभी एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
यदि तुम अपने प्रति ईमानदार रहना चाहते हो
तो उससे प्रेम करने से पहले जिसे तुम चाहते हो
और जो तुम्हे चाहता है,
उससे प्रेम करना होगा
जिससे तुम घृणा करते हो
और जो तुम्हे घृणा करता है|
प्रेम कोई गुण नहीं हैं।
प्रेम एक आवश्यकता है;
रोटी और पानी से भी बड़ी,
प्रकाश और हवा से भी बड़ी।
कोई भी अपने प्रेम करने का अभिमान न करें।
प्रेम को उसी सरलता और
स्वतंत्रता के साथ स्वीकार करो
जिस सरलता तथा
स्वतंत्रता से तुम सांस लेते हो।
क्योंकि प्रेम को उन्नत होने के लिये
किसी की आवश्यकता नहीं।
प्रेम तो उस ह्रदय को उन्नत कर देगा
जिसे वह अपने योग्य समझता है।
प्रेम के बदले कोई पुरस्कार मत माँगो।
प्रेम ही प्रेम का पर्याप्त पुरस्कार है,
जैसे घृणा ही घृणा का पर्याप्त दण्ड है।
न ही प्रेम के साथ कोई हिसाब-किताब रखो;
क्योंकि प्रेम अपने सिवाय किसी और को
हिसाब नहीं देता।
प्रेम न उधार देता है
न उधार लेता है;
प्रेम न खरीदता है,
न बेचता है,
बल्कि जब देता है
तो अपना सब-कुछ दे देता है;
और जब लेता है तो सब-कुछ ले लेता है।
इसका लेना ही देना है।
इसका देना ही लेना है।
इसलिये यह आज,कल
और कल के बाद भी सदा एक-सा रहता है।
एक विशाल नदी ज्यों-ज्यों अपने आपको समुद्र में खाली करती जाती है,
समुद्र उसे फिर से भरता जाता है।
इसी तरह तम्हे अपने आपको प्रेम
में खाली करते रहना है,
ताकि प्रेम तुम्हे सदा भरता रहे।
तालाब, जो समुद्र से मिला उपहार
उसी को सौंपने से इनकार करता है,
एक गंदा पोखर बनकर रह जाता है।
प्रेम में न अधिक होता है, न कम।
जिस क्षण तुम उसे किसी श्रेणी में
रखने या मापने का प्रयत्न करते हो,
उसी क्षण वह तुम्हारे हाथ से निकल जाता है,
और पीछे छोड़ जाता है
अपनी कडवी यादें।
न प्रेम में अब और तब होता है,
न ही यहाँ और वहाँ।
सब ऋतुएं प्रेम की ऋतुएँ हैं,
सब स्थान प्रेम के निवास के योग्य स्थान।
प्रेम कोई सीमा या बाधा नहीं जानता।
जिस प्रेम के मार्ग को किसी भी प्रकार की बाधा रोक लें,
वह अभी प्रेम कहलाने का अधिकारी नहीं है।
मैं अकसर तुम्हे कहते सुनता हूँ
कि प्रेम अंधा होता है,
अर्थात उसे अपने प्रियतम में
कोई दोष दिखाई नहीं देता।
इस प्रकार का अंधापन सर्वोत्तम दृष्टि है।
काश तुम सदा इतने अंधे होते कि तुम्हे किसी भी वस्तु में कोई दोष दिखाई न देता।
स्पष्टदर्शी और बेधक होती है प्रेम की आँख।
इसलिए उसे कोई दोष दिखाई नहीं देता।
जब प्रेम तुम्हारी दृष्टि को निर्मल कर देगा,
तब कोई भी वस्तु तुम्हे प्रेम के
अयोग्य दिखाई नहीं देगी।
केवल प्रेमहीन,
दोषपूर्ण आँख सदा दोष खोजने में व्यस्त रहती है।
जो दोष उसे दिखाई देते हैं वे उसके अपने ही
दोष होते हैं।
प्रेम जोड़ता है। घृणा तोडती है।
मिटटी और पत्थरों का यह
विशाल और भारी ढेर,
जिसे तुम पूजा शिखर कहते हो,
क्षण भर में बिखर जाता
यदि इसे प्रेम से बाँध न रखा होता।
तुम्हारा शरीर भी,
चाहे वह नाशवान प्रतीत होता है,
विनाश का प्रतिरोध अवश्य कर सकता था
यदि तुम उसके प्रत्येक कोषाणु को
समान लगन के साथ प्रेम करते।
प्रेम जीवन के मधुर संगीत से स्पंदित शान्ति है,
घृणा मृत्यु के पैशाचिक धमाकों से आकुल युद्ध है।
तुम क्या चाहोगे?
प्रेम करना और अनन्त शान्ति में रहना,
या घृणा करना और अनन्त युद्ध में जुटे रहना?
समस्त धरती तुम्हारे अंदर जी रही है।
सभी आकाश तथा उनके निवासी
तुम्हारे अंदर जी रहे हैं।
अतः धरती और उसकी गोद में पल रहे
सब बच्चों से प्रेम करो
यदि तुम अपने आप से प्रेम करना चाहते हो।
और आकाशों तथा उनके सब वासियों से प्रेम करो
यदि तुम अपने आप से प्रेम करना चाहते हो।
तुम नरौन्दा से घृणा क्यों करते हो, अबिमार ?
नरौन्दा: मुर्शिद की आवाज और उनके विचार-प्रवाह में इस आकस्मिक परिवर्तन से सब अचम्भे में पड़ गये।
मैं और अबिमार तो अपने आपसी मन-मुटाव के बारे में ऐसा स्पष्ट प्रश्न पूछे जाने पर अवाक रह गये,
क्योंकि उस मन-मुटाव हमने
बड़ी सावधानी के साथ सबसे छिपाकर रखा था
और हमें विश्वास था, जो अकारण नहीं था,
कि उसका किसी को पता नहीं है।
सबने परम आश्चर्य के साथ हम
दोनों की ओर देखा और
अबिमार के होंठ खुलने की प्रतीक्षा करने लगे।
अबिमार:(धिक्कार्पूर्ण दृष्टि से मुझे देखते हए) नरौन्दा, क्या मुर्शिद को तुमने बताया ?
नरौन्दा: जब अबिमार ने मुर्शिद कह दिया है
तो मेरा ह्रदय प्रसन्ता से फूल उठा है,
क्योंकि जब मीरदाद ने अपना भेद खोला उससे बहुत पहले हमारे बीच इसी शब्द पर मतभेद पैदा हुआ था;
मैं कहता था कि वह शिक्षक है
जो लोगों को दिव्य ज्ञान का मार्ग दिखने आया है,
और अबिमार का हठ था
कि वह केवल साधारण व्यक्ति है।
मीरदाद: नरौन्दा को संदेह की
दृष्टि से न देखो, अबिमार,
क्योंकि वह तुम्हारे द्वारा लगाए गए दोष से मुक्त है।
अबिमार: तो फिर तुम्हे किसने बताया?
क्या तुम मनुष्यों के विचारों को भी पढ़ लेते हो?
मीरदाद: मीरदाद को न गुप्तचरों की
आवश्यकता है न दुभाषियों की।
यदि तुम मीरदाद से उसी
तरह प्रेम करते जैसे वह तुमसे करता है ,
तो तुम आसानी से उसके
विचारों को पढ़ लेते और
उसके ह्रदय के अंदर भी झाँक लेते|
अबिमार: एक अंधे और बहरे
मनुष्य को क्षमा करो, मुर्शिद।
मेरे आँख और कान खोल दो,
क्योंकि मैं देखने और सुनने
के लिए उत्सुक हूँ।
मीरदाद: केवल प्रेम ही चमत्कार कर सकता है।
यदि तुम देखना चाहते हो तो
अपनी आँख की पुतली में प्रेम को बसा लो।
यदि तुम सुनना चाहते हो
तो अपने कान के परदे में कान को स्थान दो।
अबिमार: किन्तु मैं किसी से घृणा नहीं करता,
नरौन्दा से भी नहीं।
मीरदाद: घृणा न करना प्रेम करना
नहीं होता, अबिमार।
क्योंकि प्रेम एक क्रियाशील शक्ति है;
और जब तक यह तुम्हारी हर चेष्टा को,
तुम्हारे हर पद को राह न दिखाये,
तुम अपना मार्ग नहीं पा सकते;
और जब तह प्रेम तुम्हारी हर
इक्षा में हर विचार में हर
विचार में पूरी तरह समा न जाये,
तुम्हारी इच्छाएँ तुम्हारे सपने में
कँटीली झाड़ियाँ होंगी तुम्हारे
विचार तुम्हारे जीवन में शोक गीत होंगे।
इस समय मेरा दिल रबाब है,
और मेरा गाने को जी चाहता है।
ऐ भले जमोरा,
तुम्हारा रबाब कहाँ है ?
जमोरा: क्या मैं जाकर उसे ले आऊं, मुर्शिद?
मीरदाद: जाओ, जमोरा।
जब जमोरा रबाब लेकर लौटा तो
मुर्शिद ने धीरे से उसे अपने हाथ में ले लिया
और स्नेह के साथ उस पर झुकते हुए
उसके हर तार का सुर मिलाया
और फिर उसे बजाते हुए गाना शुरू कर दिया।
मीरदाद: तैर, तैर, री नौका मेरी,
प्रभु तेरा कप्तान।
उगले जीवन और मृतक पर
नरक अपना प्रकोप भयंकर,
आग में उसकी तप कर
धरती हो जाये ज्यों पिघलता सीसक,
नभ-मंडल में रहे न बाकी किसी
तरह का कोई निशान।
तैर,तैर, री नौका मेरी,
प्रभु तेरा कप्तान।
चल, चल री नौका मेरी,प्रेम
तेरा कम्पास।
उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम
कोष अपना तू जाकर बाँट।
तरंग-श्रंग पर तुझको
अपने कर लेगा तूफ़ान सवार,
मल्लाहों को अन्धकार में वहां से
तू देगी प्रकाश।
चल, चल री ऐ नौका मेरी,
प्रेम तेरा कम्पास।
बह, बह, री ऐ नौका मेरी,
लंगर है विश्वास।
गड़बड़ कर चाहे बादल गरजे,
कौंधे तड़ित कड़क के साथ,
थर्रा उठें अचल,
फट जाएँ,खण्ड-खण्ड हों,
फैले त्रास, मानव दुर्बल-ह्रदय हो जायें,
भूल जायें वे दिव्य प्रकाश,
पर बहती जा री नौका मेरी,
लंगर है विश्वास।
नरौन्दा: मुर्शिद ने गाना बन्द किया
और रबाब पर ऐसे झुक गये जैसे प्यार में खोई माँ छाती से लगे अपने बच्चे पर झुक जाती है।
और यद्यपि रबाब के तार अब
कम्पित नहीं हो रहे थे,
फिर भी अभी उसमे से
‘तैर, तैर, री नौका मेरी,
प्रभु तेरा कप्तान”
की धुन आ रही थी।
और यद्यपि मुर्शिद के होंठ बंद थे,
फिर भी उनका स्वर कुछ समय
तक नीड़ में गूँजता रहा,
और तरंगे बनकर तैरता हुआ
पहुँच गया चारों ओर ऊँ
ची-नीची चोटियों तक;
ऊपर पहाड़ियों और नीचे वादियों तक;
दूर अशान्त सागर तक;
ऊपर मेहराबदार नीले आकाश तक।
उस स्वर में सितारों की
बौछारें और इन्द्र-धनुष थे,
उसमे भूकम्प थे और साथ ही थीं
सनसनाती हवाएँ
और गीत के नशे में झूमती बुलबुलें।
उनमे कोमल, शबनम-लड़ी धुंध से ढके
लहराते सागर थे।
लगता था मानो सारी सृष्टि
आभार-भरी प्रसन्नता के साथ
उस स्वर को सुन रही हैं।
और ऐसा भी लगता था मानो
दूधिया पर्वत-माला
जिसके बीचोंबीच पूजा-शिखर था,
अचानक धरती से अलग हो गई है
और अन्तरिक्ष में तैर रही है—
गौरवशाली, सशक्त तथा
अपनी दिशा के बारे में आश्वस्त।
इसके बाद तीन दिन तक
मुर्शिद किसी से एक शब्द भी नहीं बोले।
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