Tuesday, 14 October 2014

बुद्धत्व और तुम ( Osho )



हंकार छोटे-मोटे टीलों से खुश नहीं होता, राजी नहीं होता, उसे पहाड़ चाहिए। अगर दुख भी हो तो भी टीला न हो, गौरीशंकर हो। अगर वह दुखी भी है तो साधारण रूप से दुखी होना नहीं चाहता, वह असाधारण रूप से दुखी होना चाहता है।
लोग घिसटते रहते हैं, शून्य से बड़ी-बड़ी समस्याएं पैदा करते हैं। मैंने हजारों लोगों से उनकी समस्याओं के बारे में बात की है और अब तक मैं वास्तविक समस्या खोज नहीं सका। सारी समस्याएं बोगस हैं। तुम उन्हें इसलिए बनाते हो क्योंकि समस्याओं के बगैर तुम खालीपन अनुभव करते हो। कुछ करने को नहीं है, किसीसे लडना नहीं है, न कहीं जाना है। लोग एक गुरु से दूसरे गुरु जाते हैं, एक मास्टर से दूसरे मास्टर के पास, एक मनश्चिकित्सक से दूसरे मनश्चिकित्सक के पास, एक एनकाउण्टर ग्रूप से दूसरे एनकाउण्टर ग्रूप के पास, क्योंकि अगर वे नहीं जाएंगे तो खाली अनुभव करेंगे। और अचानक उन्हें जीवन की व्यर्थता का बोध होगा। तुम समस्याएं इसलिए पैदा करते हो ताकि तुम्हें ऐसा लगे कि जीवन एक महान काम है, एक विकास है और तुम्हें कठोर संघर्ष करना है।
हंकार संघर्ष में ही जी सकता है, ध्यान रहे, जब वह लड़ता है तभी। अगर मैं तुमसे कहूं कि तीन मक्खियों को मार दो तो तुम बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाओगे तो तुम मेरा विश्वास नहीं करोगे। तुम कहोगे, ' तीन मक्खियां?' इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। और इससे मैं बुद्ध हो जाऊंगा? यह संभव नहीं मालूम होता। अगर मैं कहूंगा कि तुम्हें सात सौ शेर मारने होंगे, तो वह संभव लगता है। समस्या जितनी बड़ी हो उतनी बड़ी चुनौती। और चुनौती के साथ तुम्हारा अहंकार उभरता है, ऊंची उड़ान भरता है। तुम समस्याएं पैदा करते हो, समस्याएं होती नहीं।
और पुरोहित, और मनोविश्लेषक और गुरु प्रसन्न होते हैं क्योंकि उनका सारा धंधा तुम्हारे कारण चलता है। यदि तुम नाकुछ से टीले नहीं बनाते और यदि तुम अपने टीलों को पर्वत नहीं बनाते तो गुरु तुम्हारी मदद कैसे करेंगे? पहले तुम्हें उस स्थिति में होना चाहिए जहां तुम्हारी मदद की जा सके।
वास्तविक सद्गुरु कुछ और ही बात करते हैं। वे कहते रहे हैं, ' कृपा करके जो तुम कर रहे हो उसे देखो, जो बेवकूफी कर रहे हो उसे देखो। पहले तो तुम समस्या पैदा करते हो, और फिर समाधान की खोज में जाते हो। ज्ररा देखो, तुम समस्या कयों पैदा कर रहे हो? ठीक शुरुआत में, जब तुम समस्या पैदा कर रहे हो, वहीं समाधान है। उसे पैदा मत करो। लेकिन यह तुम्हें रास नहीं आएगा क्योंकि तब फिर तुम अपने ऊपर जा गिरोगे, चारो खाने चीत हो जाओगे। कुछ करना नहीं? न कोई बुद्धत्व, न सतोरी, न कोई समाधि? और तुम गहनता से बेचैन हो, खाली हो, और किसी भी चीज से अपने आप को भरने को तत्पर हो।
केवल इतना ही समझना है कि तुम्हारी कोई समस्या नहीं है। इसी क्षण तुम सब समस्याएं मिटा सकते हो क्योंकि उन्हें बनानेवाले तुम ही हो। अपनी समस्याओं को गौर से देखो: तुम जितना गहरे देखोगे उतनी वे छोटी मालूम होंगी नजर गड़ाकर उन्हें देखते जाओ, तो धीरे-धीरे वे नदारद हो जाएंगी। उन्हें देखते चले जाओ, और तुम पाओगे, वहां सिर्फ खालीपन है-- एक सुंदर खालीपन तुम्हें घेर लेता है। न कुछ करना है, न कुछ होना है, क्योंकि तुम वह हो ही।]
बुद्धत्व कुछ पाने जैसा नहीं है, उसे जीना है। जब मैं कहता हूं कि मैंने बुद्धत्व पा लिया तो उसका अर्थ इतना ही है कि मैंने उसे जीने का निश्चय किया। बस बहुत हो गया! और तब से मैंने उसे जीया है। यह निर्णय है कि अब समस्याएं पैदा करने में तुम्हें कोई रस नहीं है। बस। यह निर्णय है कि तुम अब समस्याएं पैदा करना और फिर उनके समाधान ढूंढना, इन बेवकूफियों से बाज आ गए हो।
यह पूरी बकवास एक खेल है जो तुम खुद के साथ खेल रहे हो । तुम खुद ही छिप रहे हो और खुद ही खोज रहे हो। तुम दोनों पक्ष हो, और तुम इसे जानते हो। इसलिए जब मैं इसे कहता हूं तो तुम मुस्कुराते हो, तुम हंसते हो। मैं कोई मूढ़तापूर्ण बात नहीं कह रहा हूं; तुम इसे समझ रहे हो। तुम अपने आप पर हंस रहे हो। जरा खुद को हंसते हुए देखो, खुद की मुस्कुराहट का निरीक्षण करो ।तुम उसे समझते हो। ऐसा होना ही है क्योंकि यह तुम्हारा अपन खेल है। तुम छिप रहे हो, और खुद का ही इंतजार कर रहे कि स्वयं को खोज निकाले।
तुम अभी खुद को खोज सकते हो क्योंकि तुम स्वयं ही छिपे हुए हो। इसीलिए ज़ेन सद्गुरु चोट करते रहते हैं। जब कोई आकर कहता है, ' मैं बुद्ध होना चाहता हूं।' गुरु बहुत नाराज होता है क्योंकि शिष्य बुद्ध है ही। अगर बुद्ध मेरे पास आए और पूछे, बुद्ध कैसे हुआ जाए? तो मुझे क्या करना चाहिए? मैं उसके सिर पर चोट करूंगा। तुम किसे धोखा दे रहे हो, तुम बुद्ध हो!
स्वयं के लिए नाहक समस्या मत खड़ी करो। और तुम्हारे भीतर समझ पैदा होगी जब तुम देखोगे कि तुम कैसे समस्या को बड़ी से बड़ी करते चले जाते हो, तुम कैसे उसे गति देते हो, और तुम कैसे चाक को जोर से और जोर से घुमाते हो। फिर अकस्मात तुम अपने दुख की चोटी पर होते हो, और तुम पूरी दुनिया की सहानुभूति चाहते हो।
हंकार को कुछ समस्याओं की जरूरत होती है। यदि तुम इतनी सी बात समझ लो तो इसे समझते ही पर्वत फिर से टीले हो जाते हैं, और बाद में टीले भी विदा हो जाते हैं। अकस्मात चारों ओर खालीपन होता है, विशुद्ध खालीपन। बुद्धत्व का इतना ही अर्थ है: एक गहन समझ कि कोई समस्या नहीं है। फिर अगर कोई समस्या ही नहीं है तो तुम क्या करोगे? तुम फौरन जीना शुरू करोगे। तुम खाओगे, तुम सोओगे, तुम प्रेम करोगे, तुम गपशप करोगे, तुम गाओगे, तुम नाचोगे।
करने को और क्या है? तुम परमात्मा हो गए, तुमने जीना शुरू कर दिया!
अगर लोग थोड़े और नाच सकें, थोड़ा और गा सकें, थोड़ा और पागल हो सकें, तो उनकी ऊर्जा अधिक बहेगी, और उनकी समस्याएं धीरे-धीरे विलीन हो जाएंगी। इसीलिए मैं नृत्य पर इतना जोर देता हूं।इतना नाचो कि मस्त हो जाओ, अपनी पूरी ऊर्जा को नृत्य बनने दो और अचानक तुम देखोगे कि तुम्हारा कोई सिर नहीं है।सिर में अटकी हुई ऊर्जा सब तरफ बह रही है, खूबसूरत आकृतियां, चित्र,गति बनाते हुए। और जब तुम नाचते हो तो एक पल ऐसा आता है जब तुम्हारा शरीर एक ठोस चीज नहीं होती, वह तरल हो जाता है। जब तुम नृत्य करते हो तो एक पल आता है जब तुम्हारी सीमा इतनी साफ नहीं होती, तुम अस्तित्व के साथ पिघलकर एक हो जाते हो। सीमाएं एक-दूसरे में घुल जाती हैं। फिर तुम कोई समस्य पैदा नहीं करते।
जीओ, नाच करो, खाओ, सोओ, काम जितना हो सके समग्रता से करो। और पुन: पुन: ख्याल रखो, जब भी तुम खुद को देखो कोई समस्या निर्मित करते हुए, उससे बाहर निकल जाओ, तत्क्षण।

ओशो, एनसिएण्ट म्युज़िक इन दि पाइन्स
  प्र # 2

Source : https://www.facebook.com/Bodhiprem/posts/714266895309091:0

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