Thursday, 30 October 2014

मूर्च्छा से परम जागरण (Osho on Puran )

Below this is ; The story is from Puran , Narad-Moh-Bhang ( Illusion Break of Narada ) , a very popular hindi scripture , embraces many short meaningful stories , many diamonds are there in hidden form.

On of Narad's many requests to get introduced of Lord's Maaya . Vishnu says to narad go and take bath in front of river , and as Narad take bath and come up , sudden all scene get different , just alike Dream , but realistic .. character get changed , here is narad is shishya feel and guru (vishnu ) is sit in front of him ... than he came closer and ask to guru with folded hands , i am coming to take shower as demonstrated by you , pl show me how is world .. read next :-

पुरानी कथा है:-

एक युवा संन्यासी ने अपने गुरु
को पूछा, यह संसार है क्या? गुरु ने कहा, तू
ऐसा कर, तू आज गांव में जा, फला—फलां द्वार
पर भिक्षा मांग लेना। लौट कर जब आएगा तब
संसार क्या है, बता दूंगा। युवक तो भागा।
ऐसी शुभ घड़ी ठग गई कि गुरु ने कहा कि संसार
क्या है, बता दूंगा। तू भिक्षा मांग ला।उसने
जाकर द्वार पर दस्तक दी। एक सुंदर युवती ने
द्वार खोला। अति सुंदर यूवती थी। युवक ने
ऐसी सुंदर स्त्री कभी देखी न थी। उसका मन
मोह गया। वह यह तो भूल ही गया कि गुरु के
लिए भिक्षा मांगने आया था, गुरु भूखे बैठे होंगे।
उसने तो युवती से विवाह का आग्रह कर
लिया। उन दिनों ब्राह्मण किसी से विवाह
का आग्रह करे तो कोई मना कर
नहीं सकता था। युवती ने कहा,मेरे पिता आते
होंगे। वे खेत पर काम करने गए हैं। हो सकेगा। घर में
आओ, विश्राम करो।वह घर में आ गया। वह
विश्राम करने लगा। पिता आ गए, विवाह
हो गया। वो गुरु की तो बात ही भूल गया।
वह भिक्षा मांगने आया था, यह तो बात
ही भूल गया। उसके बच्चे हो गए,तीन बच्चे
हो गए। फिर गाव में बाढ़ आई, नदी पूर चढ़ी।’
सारा गांव डूबने लगा। वह भी अपने तीन
बच्चों को और अपनी पत्नी को लेकर भागने
की कोशिश कर रहा है। और नदी विकराल है।
और नदी किसी को छोड़ेगी नहीं। सब डूब गए
हैं, वह किसी तरह बचने की कोशिश कर रहा है।
एक बच्चे को बचाने की कोशिश में दो बच्चे बह
गए। इधर हाथ छूटा, दो बह गए।
पत्नी को बचाने। बच्चा भी बह गया। फिर
अपने को बचाने की ही पड़ी तो पत्नी भी बह
गई। किसी तरह खुद बच गया, किसी तरह लग
गया किनारे, लेकिन इस बुरी तरह थक
गया कि गिर पड़ा। बेहोश हो गया।

जब आंख खुली तो गुरु सामने खड़े थे। गुरु ने
कहा,देखा संसार क्या होता है? और तब उसे
याद आया कि वर्षों हो गए, तब मैं
भिक्षा मांगने निकला था। गुरु ने कहा, कुछ
भी नहीं हुआ है सिर्फ तेरी झपकी लग गई थी।
जरा आंख खोल कर देख। वह भिक्षा मांगने
भी नहीं गया था। सिर्फ झपकी लग गई थी।

वह गुरु के सामने ही बैठा था। कुछ
घटना घटी ही न थी। वह जो सुंदर युवती थी,
सपना थी। वे जो बच्चे हुए, सपने थे। वह जो बाढ़
आई,सपना थी। वे जो वर्ष पर वर्ष बीते, सब
सपना था। वह अभी गुरु के सामने ही बैठा था।
झपकी खा गया था।

दोपहर रही होगी,झपकी आ गई होगी।

तुम यहां बैठे—
बैठे कभी झपकी खा जाते हो। तुम जरा सोचो,
तब एक क्षण की झपकी में यह पूरा सपना घट
सकता है।

क्यों? क्योंकि जागते का समय और
सोने का समय एक ही नहीं है। एक क्षण में बडे से
बड़ा सपना घट सकता है। कोई बाधा नहीं है।
तुमने कभी अनुभव भी किया होगा, अपनी टेबल
पर बैठे झपकी खा गए। झपकी खाने के पहले
ही घड़ी देखी थी दीवाल पर,बारह बजे थे।
लंबा सपना देख लिया। सपने में वर्षों बीत गए।
कैलेंडर के पन्ने फटते गए, उड़ते गए। आंख खुली, एक मिनट
सरका है कांटा घड़ी पर और तुमने
वर्षों का सपना देख लिया।

अगर तुम अपना पूरा सपना कहना भी चाहो
तो घंटों लग जाएं। मगर देख लिया।स्वप्न का समय जागते के
समय से अलग है। समय सापेक्ष है। अलबर्ट आइंस्टीन ने
तो इस सदी में सिद्ध किया कि समय सापेक्ष
है, पूरब में हम सदा से जानते रहे हैं, समय सापेक्ष है।

जब तुम सुख में होते हो तो समय
जल्दी जाता मालूम पड़ता है। जब तुम दुख में होते
हो तो समय धीमे— धीमे जाता मालूम
पड़ता है। जब तुम परम आनंद में होते हो तो समय
ऐसा निकल जाता है कि जैसे वर्षों क्षण में बीत
गए। जब तुम महादुख में होते
हो तो वर्षों की तो बात दूर, क्षण
भी ऐसा लगता है कि वर्षों लग रहे हैं और बीत
नहीं रहा, अटका है। फांसी लगी है।समय
सापेक्ष है। दिन में एक, रात दूसरा। जागते में एक,
सोते में दूसरा।

और महाज्ञानी कहते हैं कि जब
तुम्हारा परम जागरण घटेगा तो समय
होता ही नहीं। कालातीत! समय के तुम बाहर
हो जाते हो।सपना देखने के लिए नींद जरूरी है,
संसार देखने के लिए अज्ञान जरूरी है।
तो अज्ञान एक तरह की निद्रा है, एक तरह
की मूर्च्छा है, जिसमें तुम्हें यह
पता नहीं चलता कि तुम कौन हो।

नींद का और क्या अर्थ होता है? नींद में तुम
यही तो भूल जाते हो न कि तुम कौन हो? हिंदू
कि मुसलमान, स्त्री कि पुरुष, बाप
कि बेटे,गरीब कि अमीर, सुंदर कि कुरूप, पढ़े—
लिखे कि गैर—पढ़े लिखे—यही तो भूल जाते
हो न नींद में कि तुम कौन हो।मूर्च्छा में
भी और गहरे तल से हम भूल गए हैं कि हम कौन हैं।

portion taken from The Osho's ~ Astravakramahageeta

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