Wednesday, 29 October 2014

(hindi) किताब ए मीरदाद - अध्याय - 16 / 17 /18



      ध्यान रखना तुम कभी लेनदार न बनो


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अध्याय 16
     लेनदार और देनदार
      धन क्या है ?
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रस्तिदियन को नौका के
ऋण से मुक्त किया जाता है☜
नरौन्दा: एक दिन जब सातों साथी और मुर्शिद नीड़ से नौका की ओर लौट रहे थे तो उन्होंने द्वार पर खड़े शमदाम को अपने पैरों में गिरे एक व्यक्ति के सामने कागज़ का एक टुकड़ा हिलाते हुए क्रुद्ध स्वर में कहते सूना;
‘तुम्हारी लापरवाही ने मेरे धैर्य को समाप्त कर दिया है। अब मैं और नरमी नहीं बारात सकता।
अपना ऋण अभी चुकाओ नहीं तो जेल में सड़ो।”
हम उस व्यक्ति को पहचान गये,
उसका नाम रस्तिदियन था।
वह नौका के अनेक काश्तकारों में से एक था, जो कुछ रकम के लिये नौका का ऋणी था। वह चिथड़ों के बोझ से उतना ही झुका हुआ था जितना कि आयु के बोझ से। उसने ब्याज चुकाने के लिए यह कहते हुए मुखिया से विनयपूर्वक समय माँगा कि इन्ही दिनों मैंने अपना एकमात्र पुत्र खो दिया है और इसी सप्ताह अपनी गाय भी,
और इस शोक के फलस्वरूप मेरी बूढ़ी पत्नी को लकवा हो गया है। किन्तु शमदाम का ह्रदय नहीं पिघला।
मुर्शिद रस्तिदियन की ओर गये और कोमलतापूर्वक उसकी बाँह थामते हुए बोले;
मीरदाद: उठो, मेरे रस्तिदियन।
तुम भी प्रभु का रूप हो, और प्रभु के रूप को किसी परछाईं के सामने झुकने के लिये विवश नहीं किया जाना चाहिये।
फिर शमदाम की ओर मुड़ते हुए वे बोले;
मुझे ऋण-आलेख दिखाओ।
नरौन्दा: शमदाम ने, जो केवल एक पल पहले क्रोधाकुल हो रहा था, हम सबको चकित कर दिया जब उसने मेमने से भी अधिक आज्ञाकारी होकर अपने हाथ का कागज़ चुपचाप मुर्शिद के हाथ में दे दिया।
मुर्शिद ने कागज़ ले लिया और देर तक उसकी जांच की, जबकि शमदाम स्तब्ध, बिना कुछ कहे देखता रहा, मानो उस पर कोई जादू कर दिया गया हो।
मीरदाद: कोई साहूकार नहीं था इस नौका का संस्थापक। क्या उसने धन विरासत के रूप में तुम्हारे लिये इस उद्देश्य से छोड़ा था कि तुम उसे उधार देकर सूदखोरी करो ?
क्या उसने चल-संपत्ति तुम्हारे लिए इस उद्देश्य से छोड़ी थी कि तुम उसे व्यापार में लगा दो,
या जमीनें इस उद्देश्य से कि तुम उन्हें काश्तकारों को देकर अनाज की जमाखोरी करो?
क्या उसने तुम्हारे भाइयों का खून-पसीना तुम्हे सौंपते हुए कारागार उन लोगों को बंदी बनाने के उद्देश्य से छोड़े थे जिनका सारा पसीना तुमने बहा दिया है और जिनका खून तुमने आखरी बूँद तक चूस लिया है ?
एक नौका, एक वेदी, और एक ज्योति सौंपी थी उसने तुम्हे  इससे अधिक कुछ नहीं।
नौका जो उसका जीवित शरीर है। वेदी जो उसका निर्भीक ह्रदय है। ज्योति जो उसका ज्वलन्त विश्वास है। और उसने तुम्हे आदेश दिया था कि इन तीनों को इस संसार में सदा सुरक्षित और पवित्र रखना; इस संसार में जो विश्वास के अभाव के कारण मृत्यु के ताल पर नाच रहा है और अन्याय की दलदल में लोट रहा है।
और तुम्हारे शरीर की चिंताएँ कहीं तुम्हारे ध्यान को इस लक्ष्य से हटा न दें, इसलिये तुम्हे श्रद्धालुओं के दान पर निर्वाह करने की अनुमति दी गई थी।
और जबसे नौका की स्थापना हुई है दान की कभी कमी नहीं रही।किन्तु देखो ! इस दान को तुमने अब एक अभिशाप बना लिया है, अपने और दानियों के लिये।
क्योंकि दानियों द्वारा दिये गये उपहारों से ही तुम उन्हें अपने आधीन करते हो। जो सूत वे तुम्हारे लिये कातते हैं उसी से तुम उन पर कोड़े बरसाते हो।
जो कपड़ा वे तुम्हारे लिए बुनते हैं उसी से तुम उन्हें नंगा करते हो। जो रोटी वे तुम्हारे लिये पकाते हैं उसी से तुम उन्हें भूखों मारते हो।
जिन पत्थरों को वे तुम्हारे लिये काटते और तराशते हैं उन्ही से तुम उनके लिये बंदीगृह बनाते हो।
जो लकड़ी वे तुम्हे गर्माहट के लिये देते हैं उसी से तुम उनके लिये जुए और ताबूत बनाते हो।
उसका अपना खून-पसीना ही तुम उन्हें वापस उधार दे देते हो ब्याज पर। क्योंकि और क्या है पैसा सिवाय लोगों के खून-पसीने के जिसे धूर्तों ने छोटे- बड़े सिक्कों में ढाल लिया है, ताकि उनसे वे लोगों को बंदी बना लें ?
और क्या है धन-दौलत सिवाय लोगों के खून-पसीने के जिसे उन धूर्त व्यक्तियों ने बटोरा है जो सबसे कम खून-पसीना बहाते हैं, ताकि वे इससे उन्ही लोगों को पीस डालें जो सबसे अधिक खून-पसीना बहाते हैं?
धिक्कार है, बार-बार धिक्कार है उनको जो धन-दौलत इकट्ठी करने में अपने ह्रदय और बुद्धि को खपा देते हैं, अपने दिनों और रातों का खून कर देते हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या इकटठा कर रहे हैं।
वेश्याओं,हत्यारों और चोरों का पसीना; तपेदिक,कोढ़ और लकवे के रोगियों का पसीना; अंधों का पसीना,लंगड़ों तथा लूलों का पसीना; और साथ ही पसीना किसान और उसके बैल का, चरवाहे तथा उसकी भेड़ का, फसल को काटने तथा बेचने वाले का—-ये सब, और कितने ही और पसीने इकट्ठे कर लेते हैं धन-दौलत के जमाखोर |
अनाथों और दुष्टों का खून; तानाशाहों और शहीदों का खून; दुराचारियों और न्यायवानों का खून; लुटेरों और लुटेजाने वालों का खून; जल्लादों और उनके हाथों मरनेवालों का खून; शोषकों और ठगों तथा उनके द्वारा शोषित किये जाने वालों और ठगे जाने वालों का खून– ये सब,
और कितने ही और खून इकट्ठे कर लेते हैं धन-दौलत के जमाखोर। हाँ, धिक्कार है, बार-बार धिक्कार है उनको जिनकी धन-दौलत और जिनके व्यापार का माल लोगों का खून और पसीना है।
क्योंकि खून और पसीना तो आखिर अपनी कीमत वसूल करेंगे ही । और भीषण होगी यह कीमत और भयंकर उसकी वसूली । उधार देना, और वह भी ब्याज पर ! यह सचमुच कृतध्नता है, इतनी निर्लज्ज कि इसे क्षमा नहीं किया जा सकता ।
क्योंकि उधर देने के लिए तुम्हारे पास है क्या ? क्या तुम्हारा जीवन ही एक उपहार नहीं है ? यदि परमात्मा को तुम्हे दिये अपने छोटे से छोटे उपहार का भी ब्याज लेना हो तो तुम उसे किस चीज से चुकाओगे ?
क्या यह संसार एक संयुक्त कोष नहीं जिसमे हर मनुष्य, हर पदार्थ सबके भरण-पोषण के लिये अपना सब-कुछ जमा कर देता है ?
क्या बुलबुल अपना गीत और झरना अपना उज्ज्वल जल तुम्हे उधार देते हैं ?क्या बरगद अपनी छाया और खजूर अपने शहद-से मीठे फल क्कार्ज पर देते है ?क्या भेड़ अपना ऊन और गाय अपना दूध तुम्हे ब्याज पर देती हैं ? क्या बादल अपनी बर्षा और सूर्य अपनी गर्मी और प्रकाश तुम्हे मोल देते हैं ?
इन वस्तुओं तथा अन्य हजारों वस्तुओं के बिना तुम्हारा जीवन कैसा होता ? और तुममे से कौन बता सकता है कि संसार के कोष में, किस मनुष्य,किस वस्तु ने सबसे अधिक और किसने सबसे कम जमा किया है ?
शमदाम, क्या तुम नौका के कोष में रस्तिदियन के योगदान का हिसाब लगा सकते हो ? फिर भी तुम उसी के योगदान को—-शायद उसके योगदान के केवल एक तुच्छ अंश को—उसे ऋण के रूप में वापस देते हो और साथ ही उस पर ब्याज भी मांगते हो ?
फिर भी तुम उसे जेल भेजना चाहते हो और सड़ने के लिये वहां छोड़ देना चाहते हो ? क्या ब्याज मांगते हो तुम रस्तिदियन से ?
क्या तुम देख नहीं सकते तुम्हारे ऋण ने उसे कितना लाभ पहुंचाया है ? मृत पुत्र, मृत गाय, और पक्षाघात से पीड़ित पत्नी–इससे अधिक अच्छा भुगतान तुम क्या चाहते हो ?
इतनी झुकी पीठ पर ये इतने चिथड़े—इससे अधिक और क्या ब्याज वसूल कर सकते हो तुम ?
आह..
अपनी आँखें मलो, शमदाम ! जागो इससे पहले कि तुम्हे भी ब्याज सहित अपना ऋण चुकाने के लिये कहा जाये, और भुगतान न कर पाने की सूरत में तुम्हे भी घसीटकर जेल में डाल दिया जाये और वहां सड़ने को छोड़ दिया जाये।
यही बात मैं तुम सबसे कहता हूँ, साथियों।
अपनी आँखें मलो, और जागो। जब दे सको, और जितना दे सको, दो। लेकिन ऋण कभी मत दो, कहीं ऐसा न हो कि जो कुछ तुम्हारे पास है, तुम्हारा जीवन भी, एक ऋण बनकर रह जाये और वह ऋण लौटाने का समय तुरन्त ही आ जाये,
और तुम दिवालिया पाये जाओ और तुम्हे जेल में डाल दिया जाये।
नरौन्दा: मुर्शिद ने तब हाथ में थामे हुए कागज़ पर एक नजर डाली और कुछ सोचकर उसे टुकड़े-टुकड़े कर दिया, और उन टुकड़ों को हवा में बिखेर दिया। फिर हिम्बल की ओर मुड़ते हुए, जो नौका का कोषाध्यक्ष था,
वे बोले;मीरदाद: रस्तिदियन को इतना धन दे दो कि वह दो गाय खरीद सके
और जीवन के अंत तक अपनी और अपनी पत्नी की देख-भाल कर सके।
और तुम रस्तिदियन शान्त मन से जाओ। तुम अपने ऋण से मुक्त हुए।
ध्यान रखना कि तुम कभी लेनदार न बनो। क्योंकि लेनदार का ऋण देनदार के ऋण से कहीं अधिक बड़ा और भारी होता है।
अध्याय- 17
शमदाम हम से
   ही आता है
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मीरदाद के विरुद्ध अपने संघर्ष में शमदाम रिश्वत का सहारा लेता है नरौन्दा: कई दिन तक रस्तिदियन का मामला नौका में चर्चा का मुख्य बिषय बना रहा।
मिकेयन, मिकास्तर, तथा जमोरा ने जोश के साथ मुर्शिद की सराहना की;
जमोरा ने तो कहा उसे धन को देखने और छूने तक से घृणा है
बैनून तथा अबिमार ने दबे स्वर में सहमती और असहमति प्रकट की।
लेकिन हिम्बल ने ने यह कहते हुए स्पष्ट बिरोध किया कि धन के बिना संसार का काम कभी नहीं चल सकता और कम-खर्ची और परिश्रम के लिये धन- संपत्ति परमात्मा का उचित पुरस्कार है,
जैसे आलस्य और फिजूल-खर्ची के लिये गरीबी परमात्मा का प्रत्यक्ष दण्ड है।
उसने यह भी कहा की लेनदार और देनदार तो समय के अंत तक संसार में रहेंगे ही।
इस दौरान शमदाम मुखिया के रूप अपनी प्रतिष्ठा को सुधरने में व्यस्त था।
उसने एक बार मुझे बुलाया और अपने कमरे के एकांत में मुझसे कहा; ” तुम इस नौका के लेखक और इतिहासकार हो;
और तुम एक निर्धन व्यक्ति के पुत्र हो।
तुम्हारे पिता के पास जमीन नहीं,
उनके सात बच्चे और पत्नी है जिनके लिये उसे परिश्रम करना पड़ता है
और जिनकी न्यूनतम आवश्यकताएं उसे पूरी करना पड़ती हैं।
इस दुखद का एक भी शब्द मत लिखना,
कहीं ऐसा न हो कि हमारे बाद आने वाले लोग शमदाम को हास्य का पात्र बना लें।
तुम एक पतित मीरदाद का साथ छोड़ दो,
और मैं तुम्हारे पिता को भूमिपति बना दूंगा उसका कोठार तथा तिजोरी पूरी तरह भर दूंगा।”
मैंने उत्तर दिया कि परमात्मा मेरे पिता तथा उसके परिवार का शमदाम की अपेक्षा कहीं अधिक अच्छा ध्यान रखेगा।
जहां तक मीरदाद का सम्बन्ध है, उसे मैंने अपना मुर्शिद और मुक्तिदाता स्वीकार कर लिया है, और उसका साथ छोड़ने से पहले मैं अपने प्राण त्याग दूंगा।
रही नौका के इतिहास की बात, वह तो मैं ईमानदारी के साथ अपनी पूरी समझ और योग्यता के अनुसार लिखूँगा।
बाद में मुझे पता चला कि शमदाम ने ऐसे ही प्रस्ताव हरएक साथी के सामने रखे थे, किन्तु वे कितने सफल रहे यह मैं नहीं कह सकता।
हाँ, इतना अवश्य देखने में आया कि हिम्बल पहले की तरह नियमित रूप से नीड़ में उपस्थित नहीं होता था।
    पने चारों और घूमने दो
       पर समय साथ खुद मत घूमो।
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       अध्याय -18
       समय सबसे बड़ा मदारी है
        समय का चक्र,
         उसकी हाल और उसकी धुरी
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नरौन्दा: एक लंबे समय के बाद, जब बहुत-सा जल पहाड़ों से नीचे बहता हुआ समुद्र में जा मिला था,
हिम्बल के सिवाय बाकी सभी साथी एक बार फिर नीड़ में मुर्शिद के चरों और इकट्ठे हुए।
मुर्शिद प्रभु-इच्छा पर चर्चा कर रहे थे।
किन्तु अकस्मात वे रुक गये और बोले;
मीरदाद: हिम्बल संकट में है और वह सहायता के लिये हमारे पास आना चाहता है, किन्तु संकोच के कारण उसके पैर इस ओर उठ नहीं पा रहे हैं। जाओ अबिमार उसकी सहायता करो।
नरौन्दा: अबिमार बाहर गया और शीघ्र ही हिम्बल को साथ लेकर लौट आया। हिम्बल की हिचकियाँ बँधी हुई थीं और चेहरा उदास था।
मीरदाद: मेरे पास आओ, हिम्बल। ओह, हिम्बल, हिम्बल। तुम्हारे पिता की मृत्यु हो गई इसलिये तुम इतने असहाय हो गये कि दुःख ने तुम्हारे ह्रदय को बेध दिया और तुम्हारे रक्त को आँसुओं में बदल दिया।
जब तुम्हारे परिवार के सब लोगों की मृत्यु हो जायेगी तब तुम क्या करोगे ? क्या करोगे तुम जब तुम संसार के सब पिता और माताएँ, और सब बहनें और भाई तुम्हारे हाथों और आँखों की पहुँच से परे चले जायेंगे ?
हिम्बल; हाँ मुर्शिद। मेरे पिता की मृत्यु हिंसापूर्ण हुई है। एक बैल ने, जिसे उन्होंने हाल ही में खरीदा था, कल शाम उनके पेट में सींग भोंक दिया और उनका सिर कुचल डाला। मुझे अभी-अभी एक सन्देश वाहक ने सूचना दी है।
हाय, अफ़सोस !
मिरदाद: और उनकी मृत्यु, जान पड़ता है, ठीक उसी समय हुई जब उनका भाग्य उदय होने वाला था।
हिम्बल; ऐसा ही हुआ, मुर्शिद। ठीक ऐसा ही हुआ।
मीरदाद: और उनकी मृत्यु तुम्हे इसलिये और भी अधिक दुःख दे रही है कि वह बैल उन्ही पैसों से खरीदा गया था जो तुमने भेजे थे।
हिम्बल; यह सच है, मुर्शिद। ठीक ऐसा ही हुआ है। लगता है आप सब-कुछ जानते हैं।
मीरदाद: और वे पैसे मीरदाद के प्रति तुम्हारे प्रेम की कीमत थे।
नरौन्दा; हिम्बल आगे कुछ न बोल सका, क्योंकि आँसुओं से उसका गला रूँध गया था।
मीरदाद: तुम्हारे पिता मरे नहीं हैं, हिम्बल। न ही उनका स्वरूप और परछाईं नष्ट हुए हैं। परन्तु वास्तव तुम्हारे पिता के बदले हुए स्वरूप और परछाईं को देखने में तुम्हारी इन्द्रियाँ असमर्थ हैं।
क्योंकि कुछ स्वरूप इतने सूक्ष्म होते हैं, और उनकी परछाइयाँ इतनी क्षीण कि मनुष्य की स्थूल आँख उन्हें देख नहीं सकती।
जंगल में किसी देवदार की परछाईं वैसी नहीं होती जैसी परछाईं उसी देवदार से बने जहाज के मस्तूल,या मंदिर के स्तम्भ, या फांसी के यखते की होती है।
न ही उस देवदार की परछाईं धुप में वैसी होती है जैसी चाँद और सितारों के प्रकाश में, या भोर की सिंदूरी धुंध में होती है।
किन्तु वह देवदार, चाहे वह कितना ही बदल गया हो, देवदार के रूप में जीवित रहता है, यद्यपि जंगल के देवदार अब पहचान नहीं पाते कि वह बीते दिनों में उनका भाई था।
पत्ते पर बैठा रेशम का कीड़ा क्या रेशमी खोल में पल रहे कीड़े में अपने भाई की कल्पना कर सकता है ? या खोल में पल रहा कीड़ा उड़ते हुए रेशम के पतंगे में अपना भाई देख सकता है ?
क्या धरती के अंदर पडा गेहूं का दाना धरती के ऊपर खड़े गेहूं के डंठल से अपना नाता समझ सकता है ?
क्या हवा में उड़ती भाप या सागर का जल पर्वत की दरार में लटक रहे हिम्लाम्बों को भाई-बहनों के रूप में स्वीकार कर सकता है ?
क्या धरती अन्तरिक्ष की गहराइयों में से अपनी ओर फेंके गये टूटे तारे में एक भाई तारा देख सकती है ?
क्या बरगद का वृक्ष अपने बीज के अंदर अपने आपको देख सकता है ?
क्योंकि तुम्हारे पिता अब एक ऐसे प्रकाश में हैं जिसे देखने की तुम्हारी आँख अभ्यस्त नहीं हैं, और ऐसे रूप में हैं जिसे तुम पहचान नहीं सकते, तुम कहते हो कि तुम्हारे पिता अब नहीं हैं।
किन्तु मनुष्य का भौतिक अस्तित्व, चाहे वह कहीं भी पहुँच गया हो, कितना भी बदल गया हो, एक परछाईं जरुर फेंकेगा
जब तक वह मनुष्य के ईश्वरीय प्रकाश में पूरी तरह विलीन नहीं हो जाता।
लकड़ी का एक टुकडा चाहे वह आज पेड़ की हरी शाखा हो और कल दीवार में गड़ी खूंटी, लकड़ी ही रहता है। और अपना रूप तथा परछाईं बदलता रहता है।
जब तक वह अपने अंदर छिपी आग में जलकर भस्म नहीं हो जाता।
इसी तरह मनुष्य, जीते हुए और मरकर भी, मनुष्य ही रहेगा जब तक उसके अंदर का प्रभु उसे पूरी तरह अपने में समा न ले;
अर्थात जब तक वह उस एक के साथ अपने एकत्व का अनुभव न कर ले। परन्तु ऐसा आँख के एक निमेष में नहीं हो जाता जिसे मनुष्य जीवन-काल का नाम देता है।सम्पूर्ण समय जीवन-काल है, मेरे साथियों।
समय में कोई आरंभ या पड़ाव नहीं है। न ही उसमे कोई सराय है जहां यात्री जल-पान और विश्राम के लिये रुक सकें।
समय एक निरंतरता है जो अपने आप में सिमटती जाती है। इसका पछला छोर इसके अगले छोर के साथ जुड़ा है। समय में कुछ भी समाप्त और विसर्जित नहीं होता;
कुछ भी आरम्भ तथा पूर्ण नहीं होता।समय इन्द्रियों के द्वारा रचित एक चक्र है, और इन्द्रियों के द्वारा ही उसे स्थान के शून्यों में घुमा दिया जाता है।
तुम ऋतुओं के चक्र देनेवाले परिवर्तन का अनुभव करते हो, और इसलिये विश्वास करते हो कि सब कुछ परिवर्तन की जकड में है।
परन्तु साथ ही तुम यह भी मानते हो कि ऋतुओं को प्रकट और विलीन करनेवाली शक्ति एक रहती है,
सदैव वहती रहती है।
तुम वस्तुओं के विकास तथा क्षय को देखते हो, और निराशपूर्वक घोषणा करते हो कि सभी विकासशील वस्तुओं का अंत क्षय होता है।
परन्तु साथ ही तुम यह भी स्वीकार करते हो कि विकसित और क्षीण करनेवाली शक्ति स्वयं न विकसित होती है न क्षीण।
तुम बयार की तुलना में वायु के वेग का अनुभव करते हो, और कह देते हो दोनों में से वायु अधिक वेगवान है। किन्तु इसके बावजूद तुम स्वीकार करते हो कि वायु को गति देनेवाला और बयार को गति देनेवाला एक ही है, और वह न तो वायु के साथ वेग से दौड़ता है न ही बयार के साथ ठुमकता है।
कितनी आसानी से विश्वास कर लेते हो तुम ! कितनी आसानी से तुम इन्द्रियों के हर धोखे में आजाते हो ! कहाँ है तुम्हारी कल्पना ?
क्योंकि उसी के द्वारा तुम यह देख सकते हो कि जो परिवर्तन तुम्हे चकरा देते है, वे केवल हाथ की सफाई हैं।
वायु बयार से तेज कैसे हो सकती है ? क्या बयार ही वायु को जन्म नहीं देती ? क्या वायु बयार को अपने साथ लिये नहीं फिरती ?
ऐ धरती पर चलनेवालो,
तुम अपने पैरों द्वारा तय की गई दूरियों को क़दमों और कोसों में क्यों नापते हो? तुम चाहे धीरे-धीरे चलो चाहे सरपट दौड़ो,
क्या धरती की गति तुन्हें उन अंतरिक्षों और मण्डलों में नहीं ले जाती जहाँ स्वयं धरती को ले जाया जाता है ?
इसलिये तुम्हारी चाल क्या वही नहीं जो धरती की चाल है ? और फिर, क्या धरती को अन्य पिण्ड अपने साथ नहीं ले जाते, और उसकी गति को अपनी गति के बराबर नहीं कर लेते ?
हाँ,
धीमा ही वेगवान को जन्म देता है। वेगवान धीमे का वाहक है। धीमे और वेगवान को समय और स्थान के किसी भी बिन्दु पर एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
तुम यह कैसे कहते हो कि विकास विकास है और क्षय क्षय है, और वे एक दूसरे के बैरी हैं ?
क्या कभी किसी वस्तु का उद्गम क्षीण हो चुकी किसी वस्तु के अतिरिक्त और कहीं से हुआ है?
और क्या कभी किसी वस्तु में क्षय का आगमन विकसित हो रही किसी वस्तु के अतिरिक्त और कहीं से हुआ ह ?
क्या तुम निरंतर क्षीण होकर ही विकसित नहीं हो रहे हो? क्या तुम निरंतर विकसित होकर क्षीण नहीं हो रहे हो?
जो जीवित हैं, मृतक क्या उनके लिये मिटटी की निचली परत नहीं हैं ?
और जो मृतक हैं, जीवित क्या उनके लिये अनाज के गोदाम नहीं हैं ?
यदि विकास क्षय की संतान है और क्षय विकास की; यदि जीवन मृत्यु की जननी है, और मृत्यु जीवन की, तो वास्तव में वे समय और स्थान के प्रत्येक बिन्दु पर एक ही हैं।
और जीने तथा विकसित होने पर तुम्हारी प्रसन्नता वास्तव में उतनी ही बड़ी मुर्खता है जितनी मरने और क्षीण होने पर तुम्हारा शोक।
तुम यह कैसे कह सकते हो कि पतझड़ ही अंगूर की ऋतु है?
मैं कहता हूँ कि अंगूर शीत ऋतु में भी पका होता है जब वह बेल के अंदर अदृश्य रूप में स्पंदित हो रहा और सपने देख रहा केवल सुप्त रस होता है; और वह पका होता है बसंत ऋतु में भी, जब वह हरे रंग के छोटे-छोटे मनकों के कोमल गुच्छों के रूप में प्रकट होता है; और ग्रीष्म में भी, जब गुच्छे फ़ैल जाते हैं, मनके फूल उठते हैं और उनके गाल सूर्य के स्वर्ण में रंग जाते हैं।
यदि हर ऋतु अपने भीतर तीनों ऋतुओं को धारण किये हुए है, तो निःसंदेह सब ऋतुएँ समय और स्थान के प्रत्येक बिन्दु पर एक हैं।
हाँ,
समय सबसे बड़ा मदारी है,
और मनुष्य धोखे का सबसे बड़ा शिकार है। पहिये की हाल पर दौड़ती गिलहरी की तरह ही मनुष्य, जिसने स्वयं ही समय के पहिये को गति दी है, पहिये की गति पर इतना मोहित है, उससे इतना प्रभावित है कि अब उसे विश्वास नहीं होता कि उसे घुमानेवाला वह स्वयं है,
न ही वह समय की गति को रोकने के लिये ‘समय निकाल पाता’ है। और उस बिल्ली की तरह ही जो इस विश्वास में कि जो रक्त वह चाट रही है वह पत्थर में से रिस रहा है मांस  को चाटने में अपनी जीभ घिसा देती है,
मनुष्य भी इस विश्वास में की समय का रक्त और मांस है समय की हाल पर गिरा अपना ही रक्त चाटता जाता है
और समय के आरों द्वारा चीर डाला गया अपना ही मांस चबाये जाता है।
समय का पहिया स्थान के शून्य में घूमता है। इसकी हाल पर ही वे सब वस्तुएँ हैं जिनका इन्द्रियाँ अनुभव कर सकती हैं,
लेकिन वे केवल किसी समय और स्थान की सीमा के अंदर ही किसी वस्तु का अनुभव कर सकती हैं।
इस्ल्ये वस्तुएं प्रकट और लुप्त होती रहती हैं। जो वस्तु एक के लिये समय और स्थान के एक बिंदु पर लुप्त होती है,
वह दूसरे के लिये किसी दूसरे बिंदु पर प्रकट हो जाती है। जो एक के लिये ऊपर है, वह दुसरे के लिये नीचे है। जो एक के लिये दिन हो, वह दुसरे के लिये रात है।
और यह निर्भर करता है देखने वाले के ‘कब’ और ‘कहाँ’ पर।
समय के पहिये की हाल पर जीवन और मृत्यु का रास्ता एक ही है, साधुओ।
क्योंकि गोलाई में हो रही गति कभी किसी अंत पर नहीं पहुँच सकती, न ही वह कभी ख़त्म होकर रुक सकती है। और संसार में हो रही प्रत्येक गति गोलाई में हो रही गति है।
तो क्या मनुष्य अपने आपको समय के अंतहीन चक्र से कभी मुक्त नहीं करेगा ? करेगा, अवश्य करेगा, क्योंकि मनुष्य प्रभु की दिव्य स्वतंत्रता का उत्तराधिकारी है।
समय का पहिया घूमता है,
किन्तु इसकी धुरी स्थिर है।
प्रभु समय के पहिये की धुरी है।
यद्यपि सब वस्तुएं समय और स्थान में प्रभु के चारों ओर घूमती हैं, फिर भी प्रभु सदैव समय-मुक्त, स्थान-मुक्त और स्थिर है।
यदयपि सब वस्तुएं उसके शब्द से उत्पन्न होती हैं, फिर भी उसका शब्द उतना ही समय-मुक्त और स्थान-मुक्त है जितना वह स्वयं।
धुरी में शान्ति ही शान्ति है,
हाल में अशान्ति ही अशान्ति है।
तुम कहाँ रहना पसन्द करोगे ?
मैं तुमसे कहता हूँ, तुम समय की हाल पर से सरककर उसकी धुरी पर आ जाओ

और अपने आपको गति की
बेचैनी से बचा लो।
समय को अपने चारों ओर घूमने दो; पर समय के साथ खुद मत घूमो।  

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