Saturday, 23 August 2014

अहम मात्र प्रवंचना है(पथ के प्रदीप)

कहते है एक सूत्र काफी है  उसकी चादर बनाने को 

यहाँ सूत्र  ही सूत्र  है,ध्यान से कोई एक उठा  लेना  !
                                                            (लता )





अहम मात्र प्रवंचना हैमैं जब मनुष्य को मरते देखता हूं, तो अनुभव होता है कि उसमें मैं ही मर गया हूं। निश्चय ही प्रत्येक मृत्यु मेरी ही मृत्यु की खबर है। और जो ऐसा नहीं देख पाते हैं, वे मुझे चक्षुहीन मालूम होते हैं। मैंने तो जगत की प्रत्येक घटना से शिक्षा पाई है। और, जितना ही उनमें गहरे देखने में मैं समर्थ हुआ, उतनाही वैराग्य सहज फलीभूत हुआ है। जगत में आंखें खुली हों, तो ज्ञान मिलताहै। और, ज्ञान आए, तो वैराग्य आता है।

मैंने सुना है कि एक अत्यंत वृद्ध भिखारी किसी राह के किनारे बैठा भिक्षा मांगता था। उसके शरीर में लकवा लग गया था। उसके पास से निकलतेलोग आंखें दूसरी ओर कर लेते थे। एक युवक रोज उस मार्ग से निकलता था और सोचता था कि इस जरा-जीर्ण मरणासन्न वृद्ध भिखारी को भी जीवन का मोह कैसा है? यह किस लिए भीख मांगता और जीना चाहता है?अंतत: एक दिन उसने उस वृद्ध से यह बात पूछ ही ली। उसके प्रश्न को सुन वह भिखारी हंसने लगा और बोला, ''बेटे!यह प्रश्न मेरे मन को भी सताया करताहै। परमात्मा से पूछता हूं, तो भी कोई उत्तर नहीं आता है। फिर सोचता हूं कि शायद वह मुझे इसलिए जिलाए रखना चाहता है, ताकि दूसरे मनुष्य जान सकें कि मैं भी कभी उनके जैसा ही था और वे भी कभी मेरे ही जैसे हो सकते हैं! 

इस संसार में सौंदर्य का, स्वास्थ्य का, यौवन का सभी का अहम, एक प्रवंचना से ज्यादा नहीं है।''शरीर एक बदला हुआ प्रवाह है और मन भी। उन्हें जो किनारे समझ लेते हें,वे डूब जाते हैं। न शरीर तट है, न मन तट है। उन दोनों के पीछे जो चैतन्य है, साक्षी है, द्रष्टा है, वह अपरिवर्तित, नित्य, बोध मात्र ही वास्तविक तट है। जो अपनी नौका को उसतट से बांधते हें, वे अमृत को उपलब्ध होते हैं।-सद्गुरु ओशो, ("पथ के प्रदीप" पुस्तक से संकलित)

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