Thursday, 19 June 2014

Dariya Kahai Sabad Nirbana - 05 Osho

तीनी लोक के ऊपरे, अभय लोक बिस्तार।
सत्त सुकृत परवाना पावै, पहुंचै जाय करार।।

लेकिन केवल वे ही पहुंच सकते हैं जो परवाने हैं। जो सत्य की ज्योति में जल जाने को तत्पर हैं। सत्त सुकृत परवाना पावै...जो अपने अहंकार को राख कर देने को तैयार हैं, जो अपने मन को भस्मीभूत कर देने को तैयार हैं, केवल वे ही--पहुंचै जा करार, वे ही उस अदभुत तट पर लगते हैं। उनकी नौका उस तट पर लग जाती है जहां न सुख है, न दुख है। सुख स्वर्ग, दुख नर्क--और दोनों के जो पार है, उसका नाम मोक्ष। उसी का नाम निर्वाण। दरिया कहै सब्द निरबाना।

जोतिहि ब्रह्मा बिस्नु हहिं, संकर जोगी ध्यान।
सत्तपुरुष छपलोक महं, ताको सकल जहान।।

ज्योति-स्वरूप। हैं ब्रह्मा, विष्णु, ज्योति-स्वरूप हैं शंकर, और ज्योति-स्वरूप हो जाओगे तुम भी, अगर योग को उपलब्ध हो जाओ, ध्यान को उपलब्ध हो जाओ। ध्यान का अर्थ है: तुम्हारा तादात्म्य छूट जाए--उन सब चीजों से जो तुम्हारे आसपास घटती हैं लेकिन तुम नहीं हो। जैसे दर्पण के सामने से कोई गुजरा, एक सुंदर स्त्री गुजरी और दर्पण ने कहा, अहह, मैं कितना सुंदर हूं! यह तादात्म्य। एक कुरूप आदमी निकला और दर्पण सिकुड़ गया और मन ही मन बेचैन हो उठा और बड़ी ग्लानि लगी कि मैं भी कैसा कुरूप! यह तादात्म्य। लेकिन सुंदर स्त्री निकली कि कुरूप पुरुष निकला, दर्पण चुपचाप देखता रहा, झलकता रहा, जो भी निकला उसको झलकाता रहा और जानता रहा कि मैं तो दर्पण हूं, जो भी मेरे सामने आता है उसका प्रतिबिंब बनता है--यह साक्षी भाव, यह ध्यान।

दुख आया, तुम दुखी हो गए--ध्यान चूक गया। सुख आया, तुम सुखी हो गए--ध्यान चुक गया। दुख आया, आने दो, जाने दो; सुख आया, आने दो जाने दो--तुम दर्पण रहो। तुम देखो भर। तुम इतना कहो कि अभी दुख है, अभी सुख है; अभी सुबह, अभी सांझ; अभी रोशनी थी, अब अंधेरा हो गया; अभी बसंत था, अब पतझड़ आ गया; अभी जिंदगी थी, अब मौत आ गयी; तुम बस देखते रहो, और जो भी तुम देखो, उसके साथ एक मत हो जाओ, एकाकार मत हो जाओ। बस इतनी सी ही कला है ध्यान की!
और जो ध्यान को उपलब्ध हो गया, वह योग को उपलब्ध हो गया। क्योंकि जिसने अपने आसपास घटती हुई घटनाओं से संबंध तोड़ लिया, उसका संबंध उस परम परमात्मा से जुड़ जाता है जो भीतर छिपा बैठा है। तुम दो में से एक से ही जुड़ कसते हो--या तो संसार से, जो तुम्हारे चारों तरफ है; या परमात्मा से, जो तुम्हारे भीतर है।

जोतिहि ब्रह्मा बिस्नु हहिं, संकर जोगी ध्यान।
सत्तपुरुष छपलोक महं, ताको सकल जहान।।

और अगर तुम सारे तादात्म्य छोड़ दो, तो तुम्हारे भीतर जो गुप्त लोक है, तुम्हारा जो रहस्यों का लोक है, तुम्हारे भीतर जो हृदय की अंतर गुहा है, जहां तुम्हारे अतिरिक्त कोई और नहीं जा सकता--इसलिए उसे गप्तलोक कहते हैं--बस तुम ही जा सकते हो वहां, दूसरा कोई तुम वहां नहीं ले जा सकते, अपने निकटतम मित्र को भी निमंत्रण नहीं दे सकते कि आओ मेरे भीतर, अपनी प्रेयसी को भी नहीं साथ ले जा सकता; प्रेयसी और मित्र तो बहुत दूर, अपने मन को भी साथ नहीं ले जा सकते, अपने तन को भी साथ नहीं ले जा सकते, अपने विचार के कण को भी साथ नहीं ले जा सकते, वहां कुछ भी नहीं ले जा सकते, सब बाहर का बाहर ही छोड़ देना पड़ता है। वहां तो बिलकुल ही निर्भार होकर...चित्तवृत्ति निरोध...जहां सारी चित्त की वृत्तियां बाहर छोड़ दी गयी हैं, वैसी निवृत्ति की दशा में, वैसी संन्यस्त दशा में तुम अपने भीतर प्रवेश करते हो। और अकेले तुम ही प्रवेश कर सकते हो। उसी को दरिया कहते हैं: छपलोक, गुप्तलोक, छिपा हुआ लोक।
सत्तपुरुष छपलोक महं, ताको सकल जहान।

और वहां तुम उसे पाओगे जिसका यह सारा संसार है, जिसका यह सारा विस्तार है। वहां तुम मालिकों के मालिक को पा लोगे। और जिसने उसे पा लिया, सब पा लिया। जिसने उसे जान लिया, सब जानने-योग्य जान लिया।


दरिया कहते है: तीनि लोक के ऊपरे...। अगर सच में सत्य की खोज करनी हो तो मन के ऊपर जाना पड़ता है, मनोविज्ञान के ऊपर जाना पड़ता है। तीनि लोक के ऊपरे, अभय लोक बिस्तार। वह चौथा है--जहां मन शून्य हो जाता है; जहां न दुख है, न सुख है, न दोनों का मिश्रण है; जहां दुख भी शांत, सुख भी शांत; जहां सब तरंगें शून्य हो गयीं; जहां चेतना की झील निस्तरंग है; जहां सब स्तब्ध हो गया; जहां कोई शोरगुल नहीं--न प्रीतिकर, न अप्रीतिकर--जहां न कांटे हैं, न फूल; जहां न अपने हैं न पराए; जहां न सफलता है न विफलता है; जहां मन की सारी दौड़े शांत हो गयी--जहां मन ही नहीं है--उस अ-मनी दशा को, उस उनमनी दशा को चौथी अवस्था कहा है, तुरीया कहा है।

उसको ही पतंजलि निर्विकल्प समाधि कहते हैं। जब तक विकल्प हैं, तब तक समाधि पूर्ण नहीं। जब तक कोई भी विचार है, तब तक समाधि पूर्ण नहीं। जब तक कोई भी अनुभव हो रहा है--सुख का या दुख का--तब तक समाधि पूर्ण नहीं है। जब कोई भी अनुभव नहीं होता, दर्पण तुम्हारी अनुभूति का बिलकुल निर्मल होता है, चित्त-वृति निरोध:, जहां चित्त की सारी वृत्तियां का निरोध हो गया है--वह दशा योग की है। वहां तुम परमात्मा से मिलते हो। उस चौथी दशा में तुम परमात्मा हो जाते हो। तीनि लोक के ऊपरे, अभय लोक विस्तार।

आर वहीं भय मिटता है, इसलिए उसे अभय लोक कहा है। जो दुखी है, वह भी भयभीत रहता है--कि कहीं और दुख न आ जाएं। जो दुखी है, वह भयभीत रहता है कि पता नहीं कब इन दुखों से छुटकारा होगा, होगा भी कि नहीं होगा। जो सुखी है, वह भी भयभीत रहता है कि यह कितनी देर टिकेंगे सुख! अतीत के अनुभव यही कहते हैं कि सुख आते हैं, चले जाते हैं, टिकते नहीं। तो जो सुखी है, भय के कारण जोर से पकड़ता है। जो दुखी है, वह हटाता है। मगर चैन दोनों को नहीं है। जो सुखी है वह भी जानता है कि आज नहीं कल हाथ से छिटक जाएगा सुख। इसलिए पकड़ लो, चूस लो! मगर जितने जोर से तुम सुख को पकड़ोगे, उतने जल्दी छिटक जाता है।

सुख पारे जैसा है; मुट्ठी बांधी कि बिखर जाएगा। फिर बीनते फिरो पूरे फर्श पर और न बीन आओगे। और जिंदगी लोगों की बिखरे हुए पारों को बीनने में ही बीत जाती है। और दुख को तुम जितना हटाओ, उतना तुमसे चिपकेगा। दुख से तुम जितने भागोगे, छाया की तरह तुम्हारा पीछा करेगा। यह हमारी सामान्य अवस्था है। दोनों हालत में भय बना रहता है। दुखी आदमी तो भयभीत होता ही है कि इतना तो मिल गया, पता नहीं, हे प्रभु, और अब क्या होने को है! 

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