Wednesday, 18 June 2014

समय की धूल


दोस्तों ,

" समय की धूल " इस छोटे से शब्द समूह में सदियों की यात्रा शामिल है ,  या किसी जानकार ने हमारे छोटे से अस्तित्व को " सितारों के धूल कण " कह दिया , पर ये गंभीर विषय है , अस्तित्व को दोबारा सोचने जैसा है और इस गंभीरता का त्याग कब और कैसे करना है ये भी विचारणीय है , समय के प्रवाह के साथ विद्वता स्वयं निर्देशित करती है , जब अनुभव का समय हो तो विचार आवश्यक है , और जब अनुभव हो जाये तो विचार का त्याग भी आवश्यक है , किसको कब छोड़ना , कब पकड़ना , ये सब समय के प्रवाह में पूर्व निर्देशित है , हमको तो बस उनको दिल से सुनना है . प्रकर्ति की कोई व्यवस्था निराधार नहीं , जन्म और मृत्यु भी। समस्या तो हमारे अपने ही अंदर है , जो पकड़ तो लेते है पर छोड़ नहीं पाते ,विषय आत्मसात यदि कला है तो विषय विसर्जन भी कला है , जिसको सीखना ही चाहिए। अध्यात्म के रास्ते में तो इस कला का बड़ा महत्त्व है , स्वभाव से ग्रहण करने में और अधिपत्य में माहिर मनुष्य को इद्रिया जनित सुख दुःख तो कुछ भी नहीं अंत में शरीर मोह साँसे गुरु सम्बन्ध भाव सब छोड़ के ईश्वर से साक्षात्कार करना ही है। और ये भाव की अंत में शुन्य भी अपना नहीं पराकाष्ठा है और अंतिम उपलब्धि है।

छोटे शब्द समूह ही अक्सर बड़ा अर्थ दे जाते है , चलिए थोड़ा संक्षेप में सांकेतिक समय की यात्रा में शामिल होते है , और देखते है की समय की गर्त में क्या क्या था जो अब नहीं , जो हमें मालूम भी है , क्यूंकि हम तो जानकार है , झट से दिमाग में बैठा लेते है , और फिर वो बीता हुआ समय अपने ही जीवन के अनुभव का हिस्सा लगने लगता है , और उसको झोले में डालना हमारे लिए कोई बड़ी बात नहीं , इसी तरह तो काल से अनंतकाल का जीवन चक्र चल रहा है।






चाँद सूरज सितारें तो बहुत दूर है कब उगे कब अस्त हुए कितने सितारें टूटे कितने नए बने, क्या ये वो ही सितारा वास्तव में वहां है जो हमको जैसा दिखाई दे रहा है , ये सब भी गूढ़ है सामान्य समझ से परे है , पर क्या आप अपने घर के आगे के वृक्ष के गिरती पत्तियां और खिल के गिरने वाले फूलों का हिसाब रख सकते है ? यदि हाँ , तो कितना और कब तक ? हमारा जीवन भी उनसे अलग नहीं , वैसा ही है। जिसका कोई हिसाब नहीं , पर एक फूल के लिए उसका खिलना और महकना काफी है , यही उसकी पूर्ण उपलब्धि है। पत्तियों का पेड़ पे लगना और ऋतू पे झर जाना उनकी नियति है , समझना है समय के इस बहाव को , समझना है नियति के चक्र को , समझना है अपने जीवन के महत्त्व को स्वयं के लिए ! जिस दिन ये समझ आगया उस दिन अध्यात्म का बीज पड़ तो वृक्ष भी बनेगा और पुष्प भी खिलेगा , ये वृक्ष की नियति है।

सामान्य से अर्थ में हमारे लिए  " समय  की धुल "  शब्द कोई मायने नहीं रखता , बस रोजमर्रा की सामानो के ऊपर पड़ी धुल पड़ने जैसा आभास देता है , यदि थोड़ा दार्शनिक हुए तो कुछ साल पुराने बीते हुए अच्छे और बुरे पलों तक घूम आये , और फिर रोज मर्रा की खिचड़ी जिंदगी में तमन्नाये चक्कर काटने लगी। पर यदि इसको व्यापक अर्थ में समझें , तो धरती पे खड़े बड़े बड़े पर्वत और घाटियां , नदियां और समुदर की संरचना , सिर्फ वैज्ञानिक विषय नहीं , विचार करने योग्य आध्यात्मिक विषय भी है।


भी को निजी तौर पे जन्मो का अनुभव याद हो या नहीं फर्क नहीं पड़ता , परन्तु देश और काल के इतिहास का आभास तो हम सभी को है , समय की ताकत का अंदाजा भी है। समय के विशाल गतिशील बहाव में हम सब का अस्तित्व कुछ भी नहीं .... यहाँ समय हमको नहीं समझेगा , उल्टा हमको समय को समझना है ! विशेषरूप से ; किन्ही पुराने खंडहरों में जब हम जाते है यदि किसी ने किसी पुराने बचे खुचे नगर या अवशेष की यात्रा की हो तो वह इसकी अनुभूति अति तीव्र होती है , सिर्फ पर्यटक की दृष्टि से नहीं वरन कभी हमारे जैसे ही लोगो ने वो जीवन हमारे ही सामान जिया है .......... शायद हमसे भी अधिक बुद्धिमत्ता के साथ !!


र समय का अपना कालचक्र होता है जिसको पूरा करते ही वो समय समस्त अनुभवों विकास क्रम संस्कृति , अध्यन , और समस्त उस काल के प्राकृतिक व्यक्तिगत स्पर्धा द्वेष , प्रेम , यदि बहुत ही अधिक प्रसिद्द हुए जिसको वर्षो तक याद किया जा सकता है , वो कथा रूप में परिणित किये गए। परन्तु जीवन इतना सूक्ष्म नहीं , बहुत विस्तृत है , उन कालों में भी , यदि राजा का वर्णन उपलब्ध है , तो प्रजा भी जरूर होगी , यदि प्रजा थी , तो अवश्य जनसामान्य के रूप में होगी , जिनके अपने अपने घर , बालक , परिवार , समाज , और जीने के सामान्य तरीके हमारे ही सामान होंगे। कल्पना कीजिये ! आज भी कितने है जो किसी राजा के संपर्क में है ? गिने चुने है न ! 

हने का अर्थ है , जो कथा रूप में साहित्य या शास्त्र हम तक आ पाते है , वो उस काल के इत्र की बूँद के सामान भी नहीं है , उससे भी सूक्ष्म यदि कल्पना है तो वो वही है। पर जीवन था ! मनुष्य थे ! अपनी ही प्रतीक अच्छाईयों और बुराईयों के साथ , युद्ध भी थे , व्यभिचार भी था , शत्रु भी थे , और मित्रों का भी वर्णन है। अच्छाई भी थी और बुराई भी , सिर्फ राजाओं में नहीं सामान्य जनता में भी जीवन था , जिसका कोई संग्रह उपलब्ध नहीं। जो भी कथाएं है राजाओं की है उनकी ही विजयगाथा की चर्चा है। सबसे बड़ी बात , आप जो आज जीवन जी रहे है , वो सिर्फ आप तक ही रह जाना है , बहुत प्रयास किया , तो शायद आपकी ही संतान आपको याद करले, इसके आगे लोग अपने परिवार में आपको कितना याद रखेंगे इसमें जरा द्विविधा है .. अपितु अपना अस्तित्व अपने ही जीवन तक सीमित है, तो जन्मो जन्मो तक कोई आपको याद करे .... ये भाव इसी क्षण त्याग योग्य है।


हली बात  !! ऐसे परिवर्तनशील काल और देश में ; जहाँ सिर्फ राजाओं की कथाये समाज को दिशा देती हों , आप अपना जीवन कैसे जीना चाहेंगे? दूसरी बात  !! क्या आपको नहीं लगता , राजाओं में विजय गाथा ,, युद्ध में जीते हुए समूह की होती है , हारे हुओं की नहीं , ध्यान देने योग्य है की यहाँ सही गलत जैसा प्रमुख प्रश्न समाप्त हो चुके , लिखने वाले ने अपने प्रिय का वर्णन लिख डाला , सही गलत का युद्ध अब विजय यात्रा गाथा में बदल चुका है। इन व्यक्तिगत विजय यात्राओं को कितनी मान्यता आपके द्वारा मिलनी चाहिए और कितना महत्त्व आपके जीवन में होना है ये आपको ही तै करना है।तीसरी बात !! समय जब सम्पूर्ण कालपक्ष को ही निगल जाता है, बड़े बड़े राज्य , बड़े बड़े राजा , उनकी कथाये , इतिहास का अंग बन गयी तो हम और आप बहुत कमजोर है , अपने ही आस पास नजर डालें , तो आपको मिलंगे , आम जीवन से जुड़े समाचार , जो रोज ही हम सुनते है , भीषण से भीषण जो किसी भी एक व्यक्ति की सहन शक्ति से बाहर है , ऐसे समाचार। उनको सुनके अपने रोज मर्रा के काम पे चल पड़ते है , इन्ही जीवन को उस काल का साहित्यकार जब अपने आस पास घटते देखता है , तो करुणा भाव उपजता है और तत्कालीन कथाये रूप लेती है ( यहाँ साहित्यकार के पुरस्कार की चर्चा नहीं मेरे ख्याल से किसी साहित्यकार की गुणवत्ता को पुरस्कार से तौलना उसका सबसे बड़ा उपहास है  ) और यही जब आम आदमी से ऊपर उठ के राजधर्म को छूतीं है तो सामाजिक  दिशा निर्देशित  करने वाले ग्रन्थ का रूप लेती है , और कालांतर में यही संग्रहण और संकीर्ण होके धार्मिक सामाजिक दिशा का रूप ले लेता है। चूँकि अब प्राचीन व्यवस्था है नहीं , पहले के समाज में और अब के समाज में फर्क है , पहले राजा नामक शासक होता था ( यहां सालो की नहीं वरन युगों की चर्चा है ) और धर्माधिकारी धर्म के और राजनीती में मुखिया हुआ करते थे , राजा उनकी सलाह अनुसार चलते थे , तो उनके द्वारा दिए गए नियम तत्कालीन थे ! इसको ही समझने की आवश्यकता है की समय बहाव में है और इतिहास में संग्रहण गवाह है की हम और आप पिछला छोड़ना ही नहीं चाहते , मानवीय स्वभाववश , ग्रहण करना और अधीकृत करना हमारे स्वभाव में है , परिवर्तन हमको सहज स्वीकार नहीं है। 

पर न हो तो क्या ? समय फिर भी बह रहा है , उसे हमारे आपके ज्ञान की आवश्यकता नहीं।


मय की धुल की ताकत को समझना है , जहाँ कल पर्वत थे वह अब खायी है , जहाँ नदियां बहती थी वह शहर बन गए , झीले बनी और समाप्त हुई , पृथ्वी क्षेत्र जो समुद्र ने दिए भी और अपने अंदर समेट भी लिए , इतने प्रवाहित समय के साथ आपको अपने छोटे से जीवन पे विचार तो करना ही चाहिए। इस समय से कोई नहीं बचा , बड़े बड़े ज्वालामुखी शांत हो गए , और नए नए बन भी गए। 

मनुष्य आज भी मनुष्यता को मारने में उतना ही व्यस्त है जितना सतयुग में था , जितना द्वापर में था। 

कोई फर्क आपको लगा ? 

कोई समझदारी ? 

राम समाप्त हुए , रावण समाप्त हुआ रामकाल समाप्त हुआ , कृष्ण समाप्त हुए , यदुवंशज समाप्त हुए , कृष्णकाल समाप्त हुआ , महाभारत हुई और बहा ले गयी अपने साथ उस काल की सब अच्छाई और बुराई। अब तो सिर्फ आलोचनाएँ बची है , उस काल की व्याख्याएं बची है , वो काल नहीं !!!! अपने ही कलयुग में देख लीजिये , किस तरह समय बहाये लिए जा रहा है मनुष्यता को मनुष्य को , और हम मूर्ख पता नहीं किस बुद्धिमानी को लिए हुए संभाले हुए जी रहे है , अपने छोटे से पृथ्वी के टुकड़े के इतिहास को देख लीजिये , जयादा दूर नहीं , मुसलमानो के अधिग्रहण के समय से , अलग अलग समय के अलग अलग शासन काल , और अलग अलग पीड़ाये , अलग अलग मान्यताएं , और सभी में खुद को क्षति पहुँचाने का सबसे बड़ा योगदान मनुष्य का स्वयं को है , सम्पूर्ण प्रकर्ति की आपदाओं से स्वयं को बचा लिया , जंगली जानवरो से बचा लिया , सब से बचा लिया , पर स्वयं से ? स्वयं ही मनुष्यता को समाप्त करने पे आमादा है , बिलकुल वैसे ही जैसे महाभारतकाल के बाद कृष्ण के देहावसान के पश्चात यदुवंशी स्वयं को मार काट के समाप्त हो गए थे। सब अपने ही इतिहास में वर्णित है , इनको समझने के लिए कही दूर नहीं जाना। 


किस मान्यता में जी रहे है आप ? विचार कीजिये ? ध्यान कीजिये ? अपनी स्थति को समझिए ! स्वयं भी मूर्खता से बचिए और जिनको बचा सकते है उनको भी सुझाव दीजिये , संतो के जीवन यदि समझा गया उनका अनुकरण करसके तो ही एक सीमा तक लाभ होगा ,यदि धर्म समझा गया तो ही उसका अनुकरण एक सीमा तक ही लाभ देगा ( ध्यान दीजिये एक सीमा तक ) क्यूंकि आपको अपनी निजता समझनी ही पड़ेगी। अपना जीवन उसका उद्देश्य और उसकी व्यापकता तथा क्षणभंगुरता स्वीकार करनी ही पड़ेगी।


हत्वपूर्ण है की जादू टोने और क्षणिक इक्षाओं की पूर्ति से ऊपर धर्म को समझाना है धार्मिक को नहीं , अध्यात्म को समझना है आध्यात्मिक को नहीं ! बिना सोचे पिछलग्गू होने के भाव को समझना है , और स्वयं का अस्तित्व अपने जीवन में अपने लिए बनाना है , पीढ़ियों के लिए नहीं। यदि आप अपना जीवन स्वस्थ रूप से समझ के जी सके तो आप अवश्य ही एक स्वस्थ सन्देश समाज को दे सकेंगे, नहीं तो परिवार को तो एक स्वस्थ विचार की परंपरा देंगे ही।

मझना है , समय के बहाव को , उसकी बेढंगी पर सधी चाल को , सही और गलत के सन्दर्भ से अलग , आलोचना से अलग , संग्रहण से अलग , समझना है विस्तृत सीमित जीवन को , और बुद्धिमत्ता से निर्णय लेना है की इस मिले समय को कैसे जिया जाये।


और अंत में समझना है समय की धुल को , धुल में विलुप्त होती संस्कृतियों को , और अपने जीवन की छोटी सी निजता के महत्त्व को। यदि कुछ प्राचीन से सीखना भी है तो उचित मात्र में आवश्यक है , अनुभव कीमती है , उनमे डूब जाना खो जाना उचित नहीं , स्वयं का अनुभव परम आवश्यक है किसी भी महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए। दूसरे के अनुभव ( मित्र के हो / गुरु के हो / संगृहीत कथा शास्त्र के हो / धर्म पुराण वेद वर्णित हो , कितनी भी प्रभुता वाले हो , स्थापित हो समाज में , आपको एक सीमा तक ही दिशा दे सकते है , संभवतः जो शायद आपके लिए उचित हो की न हो ये भी पता नहीं। ये जीवन रेडीमेड नहीं हो सकता , टेलरमेड ही काम आएगा। ध्यान दीजिये , टेलर भी आप ही है स्वयं के।



स्वयं की यात्रा , स्वयं पे विश्वास !



शुभकामनाये !!

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