Wednesday, 4 June 2014

मनुष्य : स्व अंकुश एक मात्र उपाय

आश्चर्यजनक सत्य है , कितने पुष्प है जो दूसरे पुष्प से आग्रह करते दिखते है , कितने जीव है मनुष्य के आलावा जो दूसरे समान जीव से अनुग्रह करते है भजन पूजन ध्यान और अध्यात्म ध्यान सीखने के लिए , कितने पर्वत शृंखलाएँ है जो कष्ट में आंसू बहा रही है , या कितने अचल जीव है जो एक दूसरे को सहन नहीं कर पा रहे ? कारन सिर्फ एक है , प्रकर्ति में जो अचल है वो सम्पूर्ण है , प्रजनन से लेके विकास तक और अंत तक। पर मानव जैसे जितने भी चल जीव ही जिनको भी प्रजनन और विकास के लिए सहयोग चाहिए , उनमे ही लड़ने मरने और सहन शक्ति की कमी देखी गयी है।जितने भी द्वैत्व भाव वाले जीव है आधे अधूरे , उनमे ही लड़ मरने की प्रवृति पायी गयी है। अन्य वन्य जीव अपने प्राकृतिक स्वभाव पे काबू नहीं पा सकते , ये विचार भी नहीं ला सकते , जो मिला है , जितना मिला है उसी में जीना है और उसी में समाप्त हो जाना है। रोग कष्ट प्रकृति की आपदा सब मूक होके सहना है , ज्यादा से ज्यादा स्वयं को बचा लिया , मादा हुई तो तो अपने छोटे बच्चोको प्राकृतिक या उपस्थ्ति संकट से बचाने का प्रयास करती हुई पायी गयी। बस इससे अधिक नहीं। इससे ज्यादा सोचने समझने की शक्ति ही नहीं। सभी में अधूरापन है परन्तु रुचियों और कलात्मकता से अपनी विनष्टकारी प्रवृति पे काबू पाना सिर्फ मनुष्य स्वभाव है , जो और जीवों का सौभाग्य नहीं वो मानव का है की वो स्वयं के आत्मिक उत्थान के लिए प्रयासरत है निरंतर। और यही कारन है जो उसे अन्य जीवों से अलग करता है , अन्य जीव पूर्ण प्राकृतिक है उत्थान का प्रश्न ही नहीं , जब ज्ञान ही नहीं , जो प्रकर्ति से स्वभाव मिला है उसी में जीते और खपते जाते है। परन्तु मनुष्य ऊपर उठे तो कृष्णा जीसस बुद्धा बन जाये और रसातल में जाये तो उसका भी अंत नहीं। इसीकारण मनुष्य की चेतना को जागरूक रहना परमावश्यक है। कोई अन्य जीव इतना खतरनाक नहीं हो सकता , जितना मनुष्य स्वयं के लिए भी और समस्त प्रकृति के लिए भी खतरनाक है। 

धर्म का अंकुश , अध्यात्म का आग्रह द्वारा समग्र प्रयास है ... ध्यान द्वारा मनुष्य को मनुष्य की जड़ से जोड़ना है , चेतना से जोड़ना है , जिससे उसकी अपनी ही विनाशकारी शक्तियों पे अंकुश लगे । स्वभाव से स्वतंत्र रहने का आदी मनुष्य अति घातक कठोर और निरंकुश प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने वाला है , परन्तु मनुष्य में ही देवत्व की चेतना का भी वास है ; जहाँ करुणा प्रेम सद्भाव , साहचर्य सहयोग का भाव भी है और निरंतर अधूरेपन का भाव सालता है जिसको पुरा करने केलिए हर संभव प्रयास मनुष्य करता है , बुद्धि का स्वामी है , साहसी है पराक्रमी है और निरंतर एक आकर्षण परमतत्व से पता है तो दूजा जुड़ाव सांसारिकता से। और इसी खींचतान में सुन्दर संतुलन मानव का मानव होने के रूप में मिलता है। 




भाव , सम्बन्ध वाणी , प्रभाव , प्रभुत्व , मस्तिष्क की गुत्थी , चेतना के रूप मन आत्मा मस्तिष्क की जंग , एक जंग बाहर तो दूजी अंदर , समग्र शक्तियों पे अधिकार पाने की अतृप्त कामना , रहस्यमयी दुनिया को अनावृत करने की इक्छा , संक्षेप में मनुष्य की हार्दिक इक्छा है की स्वर्ग की यात्रा देह सहित की जाये , और नरक की सम्भावनाओ पे विचार साक्षात किया जाये। हो सके तो इंद्र सरीखे देवता यदि मिल जाये तो दो चार प्रशासनिक सुझाव भी दे ही दिए जाए। मनुष्य की ऊर्जा असीमित है परन्तु जीवन सीमित है, सीमित और असीमित का सामंज्यस और संतुलन ध्यान द्वारा , कर्म द्वारा , और पराक्रम द्वारा ही संभव है। अमानवीयता और अनैतिकता पे अंकुश का मात्र सामाजिक आधार रहस्यमयी दुनिया का भय है। जिसको ऋषि मुनियो ने सद्कर्म से और उनके परिणाम से बाँध के रखा।

क्या आपको समझ आया की ऋषि किसलिए सम्यक-विधान बना के गए ? 


ज्ञान के साथ तार्किक मनुष्य ने अन्य धार्मिक आध्यात्मिक मार्ग भी खोजे , सही है ; हर मार्ग सही है जो उसको उसकी मनुष्यता की याद दिलाता रहे। पर हर वो मार्ग जो उसको मनुष्यता से नीचे गिराये , उसपे अंकुश आवश्यक है ! यही मानव के दीर्घायु होने का एकमात्र उपाय है। वर्ना ऐसे उदाहरण भी इतिहास में है की जब सगे सम्बन्धियों के बीच युद्ध छिड़ा तो सब समाप्त होगया , फिर किसकी हार और किसकी जीत। सब अपने ही शास्त्रों में अनुभव संगृहीत है , उनको पारम्परिक धर्म की तरह नहीं अनुभव की तरह पढ़ना आवश्यक है । महाभारत गीता रामायण सिर्फ पुजारी , मंदिर और एक विशेष समुदाय तक सीमित न होके , पवित्र ग्रन्थ भाव से भी ऊपर मार्गदर्शन के रूप में उतारना चाहिए। भगवान का नहीं वो मानवीय इतिहास है ! भगवान के नाम पे व्यर्थ आलोचनाएँ तर्क वितर्क , सत्ता पे प्रश्नचिन्ह लगने ही है। परन्तु मानवीय धरोहर के रूप में सिर्फ सबक है !

ओह आज तो चर्चा विस्तार से हुई , धन्यवाद। आप सभी को आध्यात्मिक जीवन की शुभकामनायें !!

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