Wednesday, 4 June 2014

ध्यान और प्रकति से आपका संवाद आवश्यक है !


प्रकृति रहस्यमयी नहीं , बिलकुल सरल है , अगर कुछ रहस्य दिखाई देता है तो अपनी इक्छाओं और अत्यधिक बाह्य वार्तालाप के कारन , जैसे ही अंदर मन स्थिर होता है , चित्तदशा के रुकते ही दृश्य साफ़ होने लगते है।

और ये देख के और भी आश्चर्य होता है की वो रहस्य अनावृत से हमारे आस पास बिखरे हुए है पहले से ही।

एक और उदाहरण लेती हु , वो है आत्मिक संज्ञान और विकास की दशा कैसे प्रकृति में एक एक स्तर पे स्पष्ट होती है। शारीरिक विकास तो दृष्टि से दीखता है इसलिए कहने की आवश्यकता ही नहीं। पर जो दृष्टि से नहीं दीखता उसकी चर्चा करती हूँ , अंतर्मन का विकास कैसे कैसे एक एक कदम पे प्रकृति के साथ ताल मेल बिठाता है।

ध्यान की सबसे पहली अवस्था , नेत्र बंद करके शांत चित्त होक एक स्थान पे थोड़ी देर सुखासन में बैठना। सुखासन जो बैठक मन को अच्छी लगे , मेरे अनुसार वो ही सुखासन है , यद्यपि दोनों पैर अंदर की तरफ मोड़ के आराम दायक स्थति में बैठना सुखासन कहलाता है।

पहला उदाहरण आपके आस पास रोज ही जन्म लेते फूलों से लेती हूँ , वो भी जीव है उनकी अपनी गति है। परन्तु हमारे ही समान प्रकर्ति का हिस्सा है , और उनके क्रमिक विकास के लिए प्रकृति उतनी ही उत्तरदयी है जितनी हमारे लिए।

अपने ध्यान की पहली बैठक और आपकी चित्त अवस्था एक बंद कली के सामान है। जिसने पौधे पे अपना स्थान लिया है। जो स्वयं नहीं जानती की उसका रंग रूप क्या है। पर उस कली का कोलाहल और जिज्ञासा हम तक पहुँचता नहीं इसलिए मौन में ही संवाद होता है। पहला पाठ प्रकृति से यही मिलता है की मौन कैसे रहा जाये। एक पौधा जागरूक अपने उत्तरदायित्व के प्रति अपने संघर्षों के प्रति , किन्तु परम मौन में विकसित होता हुआ , एकांत में निरंतर , उस जैसे बहुत है पर सभी की यात्रा है उसके ही समान।

प्रकृति का सृजन और विनाश दोनों ही मौन है , तो स्वयं प्रकर्ति की गहन मौनता का अंदाजा लगाना भी कठिन है.
फूल जब कली रूप में होता है तो सारी सुगंध और पराग सम्भावना रूप में मध्य में स्थित रहते है , बंद पटल के बीच, एक दम बीच में। वहीं से कली अपनी सृजन शक्ति तने द्वारा ले के , मध्य में ऊर्जा को स्थित खिलने का प्रयास करती है , ये शक्ति उसे प्रकृति से मिली है। पत्तियों का खुलना भी आश्चर्यजनक है ... कोई पूर्वानुमान नहीं , पुरे घेरे में से कही से भी एक एक करके इन पत्तियों का खिलना शुरू होता है और जैसे ही पत्तियों का खुलना शुरू होने लगता है , फूल का सौंदर्य और सुगंध दोनों वातावरण में फैलने लगते है।

ध्यान देने वाली बात है की सृजन की क्षमता तने द्वारा कली के अत्यंत मध्य भाग स्थित ऊर्जामय स्थान को भेजी जाती है। ठीक वैसे ही जैसे आप ध्यान के द्वारा अपनी समस्त सकारात्मक ऊर्जा का संग्रह कर इकठ्ठा करके समग्र शक्ति द्वारा अपने केंद्र में यानिकि ह्रदय स्थान में भेजते है। और इसी प्रयास द्वारा आपकी चेतना उर्ध्वमुखी होने लगती है। वृक्ष के तने  के उदाहरण को यदि अपनी भाषा में समझे तो मानव का मेरुदण्ड और  वृक्ष का  तना  एक सामान है ।

दूसरी बात जो अत्यंत महत्वपूर्ण है , वो सन्देश भी प्रकृति ने रहस्य नहीं रख्हा , स्पष्ट संकेत है वो ये की,' कली का पुष्प बनना , सुगंध देना , और फिर स्वयं से ही बीज का निर्माण होने देना , अत्यंत स्वाभाविक से दैनिक जीवन में लगते है , परन्तु यही अनबोले रहस्य है जो स्वयं से परिचय कराते है' ..... अपनी प्रारंभिक अवस्था में कली के किनारे उसको कस के पकडे होते है , जिनको हम अपनी समझ के लिए बंध कह सकते है , जो वहां तक की यात्रा विकास के लिए आवश्यक भी है , सहजता के साथ , विकास क्रम में पहले किनारों की पकड़ ढीली पड़ती है , फिर जो कसी हुई सिमिटी पत्तीयां है उनका धीरे धीरे खिलना आरम्भ होता है। एक एक पत्ती खुलती है , तब जाके फूल खिलता है, तत्पश्चात ही परागकण का विकास होता है जो पुनः बीज को जन्म देता है ......

परन्तु इस बीज रूप में पहुंचना सुनना जितना सरल और मनोहर लगता है , वास्तविक स्थति में यदि समझे तो आप जिस आसान पे प्रथम बार बैठे थे , आप वो रह ही नहीं सकते , बीज रूप में पहुंचना मतलब की आपने जन्म के रहस्य के अंदर जाके अपना स्थान पा लिया है। जो आपकी वास्तविक स्थिति थी वो ही भाव रूप में हो गयी है। पुनः ध्यान दीजियेगा , ये सारी यात्रा शरीर की नहीं भाव की है , इसलिए परिवर्तन भी आंतरिक ही है। जिसके प्रत्यक्ष गवाह आप ही होंगे। ये यात्रा निजी है। संभवतः आपके बगल में बैठा इंसान जो नित्य आपको स्नेह से स्पर्श करता है वो भी ये परिवर्तन न जान सके। क्यूंकि यहाँ मामला आंतरिक और निजी है। इसलिए ऐसा कोई भी भाव उचित नहीं होगा जिसमे आपका प्रयास हो की मेरे अंदर के परिवर्तन जगजाहिर हो जाएँ। ऐसा नहीं होता , न ही होगा।

बीज से उत्पन्न
उस कली की सर्वोत्तम उपलब्धि एक बीज  है , यानिकि  अब पुनः  गर्भ की और  प्रस्थान , यही विकास का क्रमबद्ध क्रम  है।    अब वो पुनः कई सम्भावनाओ के साथ नए पौधों और पुष्पों को जन्म देने के लिए तैयार है। अद्भुत है विलक्षण है , मौन में कहा गया  प्रकृति का सन्देश  है।   जो आपको सुनाई देना ही चाहिए मौन में !!



यह बीज रुपी स्थति तो बाह्य  प्रकट  रूप से   एक  सदगरु की है और आपके अंतस्थल की भी , इस अवस्था में स्वयं को संज्ञान पूर्वक ले के आना है की अंतरतम  बीजरूप हो जाएँ।
ऐसे ही उदाहरण बिखरे पड़े है प्रकति से संवाद शुरू होते ही आपको हर कण हर जीवन एक उदाहरण रूप में दिखेगा। ऐसी अद्भुत लीला है उस परम की।

तो क्या आप तैयार है अपनी अंतरयात्रा के लिए , कली से फूल और फूल से पराग पराग से बीज रूप में स्वयं को परिवर्तित करने के लिए ?

असीम शुभकामनाये !!

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