Sunday, 22 June 2014

योग



हाँ योग शब्द के जरिये हम पुस्तक-ज्ञान में नहीं उतरेंगे। बस ऊपर ऊपर तैर के कुछ अनुभव लेंगे और जीवन से जुड़े अति महत्त्व पूर्ण बातों को जानने की चेष्टा करेंगे , उम्मीद करती हूँ की इन जानकारी को आप सभी व्यवहार में भी ले के आएंगे। 

बसे पहला योग है मन का , जिसमे प्राणायाम आता है , ध्यान आता है , , इसी ध्यान और प्राणायाम के अलग अलग समुच्चय से तथा जोड़ से चक्र-दोष दूर किये जाते है तथा इन्द्रियों को संयमित तथा दीक्षित किया जाता है । ध्यान में सबसे जरुरी और प्रथम सीढ़ी है , वो है विपस्यना ध्यान अथवा बाहर और अंदर आती जाती साँसों को गहरा , धीमा और धीमा गहरा करते हुए हर आती सांस से सकारातमक विचारो का प्रवेश करना है , और हर बाहर जाती सांस द्वारा नकारात्मक विष को शरीर से बाहर करना है। चक्रो को भी बल देते है आस पास बहती ऊर्जा की सकारात्मक तरंगो के द्वारा , ये सब आपकी उस ईक्षा शक्ति से संभव होता है जिसको चेतना कहते है। 

दूसरा योग में ही है संतुलित आहार व्यवहार और विचार , इनको अगर एक नाम दे तो कह सकते है तीसरा योग संकल्प का योग है , जिसमे व्यवहारिक तौर पे बल प्रयोग नहीं होता , पर आत्मिक रूप से स्वयं से आग्रह होता है। जो भोजन शरीर के लिए स्वस्थ्य वर्धक है , स्वाभाविक तौर पे शरीर उसको ग्रहण करके प्रसन्न होता है , जो व्यवहार समाज में विभिन आयु के लोगो के बीच उचित है मर्यादित है , वो व्यवहार का अनुपालन प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है , जो स्वयं की ही प्रेरणा का फल है , बल पूर्वक अन्य कोई आपको मर्यादित नहीं कर सकता , करेगा भी तो भी आपका मस्तिष्क विद्रोह करेगा , स्वीकार नहीं करेगा , बल प्रयोग से , मन और बुद्धि की मायावी छाया से आच्छादित शक्ति और बलवान होती जाती है। सर्वथा नकारात्मक परिणाम देने वाली। इसलिए ये ये मनोयोग भी है। विचार के योग से तात्पर्य है , संतुलित संयमित विचार , और अधिक समझे तो केंद्रित विचार जो इक्षा शक्ति का सूचक भी है , इस योग से संकल्प को बल मिलता है , योगी का ध्येय स्पष्ट होता जाता है।

तीसरा योग है शरीर को स्वस्थ रखने का , शरीर को उसकी विभिन्न मांस पेशियों को , हड्डियों को जोड़ो को स्वस्थ रखने के लिए , विभिन्न आसन द्वारा चलायमान रखने का प्रयास निहित होता है , विभिन्न प्रचलित आसन है विधिया है , जो इतनी आम तौर पे प्रचलित भी है , की ज्यादा कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं ,  ये  समाज में  योगासन  के नाम से प्रचलित  है । बाबा रामदेव ने तो इस योग को बहुत प्रसिद्धि दिलाई है , सद गुरु जग्गी वासुदेव इसी योग को उपा - योग के नाम से कहते है तथा आर्ट ऑफ़ लिविंग में शारीरिक व्यायाम योग के नाम से जाना जाता है क्यूंकि वह  संस्था का मुख्य केंद्र  सोऽहं ध्यान पे जोर है , बाकी कुछ खेल और कुछ योग। यही स्थति ओशो के आश्रमों में भी है ,,कुछ ध्यान  तो कुछ  आसन की पद्धतियाँ  मिला जुला कर  सुन्दर  और स्वस्थ मन के अनुकूल  व्यंजन  तैयार किया जाता है  । तथा जितने भी आध्यात्मिक गुरु आश्रम है , वो इन्ही योग को अलग अलग वेशभूषा में परोसते है , क्यों ? क्यूंकि हमको नयापन चाहिए , हमको स्वयं पे विश्वास ही नहीं होता आसानी से। तो ये गुरु भी आपको यही अहसास दिलाते है की आपमें ही सारी शक्तियां निहित है। कहीं बाहर नहीं जाना स्वयं में ही नगीनों की तलाश करनी है , खजाना है हमारे अंदर ही है। तो वहीं पे आगये फिर से " आपो गुरु आपो भव

अब यदि इन तीनो में अंतर करना चाहे अलग करना चाहे , तो असंभव है ( वैसे अध्ययन के लिए एक-एक विषय पे एक से अधिक पुस्तकें बनी है और वो भी अत्यधिक सघन फिर उनको समझने के लिए उनकी भी व्याख्याएं उपलब्ध है ) , पर ये सब अंदर ही अंदर जुड़े हुए है एक ही है , एक ही शरीर के अंग , और सब मिलकर आपकी यात्रा को सुदृढ़ बनाते है। अच्छा मानसिक स्वस्थ , अच्छा व्यवहार , अच्छा शारीरिक स्वास्थ्य , उचित दिशा के लिए लिया गया संकल्प , को ही योग और साधक को योगी कहते है। योगी अलग वेश भूषा से नहीं , वरन प्रज्ञा से होते है। वैसे ही जैसे सन्यासी वेशभूषा से नहीं आत्मा से होते है। 

इन्ही को यदि आप और अधिक विस्तार से जानना चाहे , तो पतंजलि का अष्टांग योग सूत्र है , जो मुख्य है। शिव विज्ञानं भैरव है जिसमे प्राणायाम की तकनिकी बताई गयी है। कृष्ण ने भी योग को अपने तरीके से समझाया है। वसिष्ठ ने भी श्री राम को योग शिक्षा दी थी पुस्तक का नाम ही लघु योग वशिष्ठ है। मूल संस्कृत में है क्यूंकि यही बोलचाल की भाषा थी , सबकी समझ के लिए अनुवाद भी उपलभ्ध है। 

पढ़ने के लिए न तो साहित्य में कमी है और न ही व्यवहारिक गुरुओं की , जिस तरफ देखिए मिल ही जाएँगे। फिर स्वयं की सामर्थ्य और वो ही स्वयं से संकल्प की आप स्वयं से क्या चाहते है ? तदनुसार ही प्रकर्ति आपकी मदद करेगी। 

मेरा ये मानना है की जितनी अपनी मदद् हम अपनी कर सकते है , कोई नहीं कर सकता , जितना हम अपना स्वयं का ध्यान रख सकते है , कोई नहीं रख सकता , और जितना आप स्वयंम को प्रेम कर सकते है , कोई नहीं कर सकता , बाहरी प्रेम गहरे हो सकते है , पर सबकी शारीरिक सीमाओं में है। और आपका स्वयं से सीधा सम्बन्ध है सीधा आत्मा के जरए परमात्मा से संपर्क है , कोई दीवार है ही नहीं , सिवाय आपके मस्तिष्क और मन के बेतुके तर्कों के। 

मेरा तो ये भी मानना है , किसी भी संकल्प या अनुभव का प्रवेश होता ही तब है जब पुस्तकीय ज्ञान की भागम भाग समाप्त हो जाती है , मन स्थिर हो के विश्राम मांगता है , भाग-भाग के थकान आती है। तभी ध्यान भी सुलभ होता है , और ज्ञान भी। और जब शरीर की विशेषताओं से सामना होता है तो उनकी कीमत का पता चलता है , तभी ये भी संकल्प आता है की आहार और व्यवहार का योग साधना उचित है , तभी शरीर के मन के स्वस्थ को और बढ़ने के लिए व्यायाम और प्राणायाम किये जा सकते है . और सकारात्मक परिणाम के साथ संकल्प और बलवान होता जाता है।

तो निष्कर्ष के तौर पे हम कह सकते है तीन बाते है 

१- ध्यान- योग 
२- संकल्प- योग 
३- आसन -योग 


इनमे ही समस्त योग विद्या समायी है। 

जटिल किन्तु सुलझी हुई परम की मायावी संरचना ऐसी ही है , की एक भी धागा पकड़ में आजाये तो सारी गांठे सुलझ जाती है , वर्ना हाथ पैर मारते रहिये , उलझना भी अंतहीन है , थका देता है और वांछित परिणाम भी नहीं देता । 

उलझे धागे के छोर को अगर ढूँढना है तो सबसे सरल है ध्यान द्वारा अंतरयात्रा करना , यही से सारे योग को बल मिलता है , यही से संकल्प भी जन्म लेता है , और यही जो है वो चक्रो को भी संतुलन में रखता है। ध्यान ही साधक की प्रथम सीढ़ी है और अंतिम पायदान भी ध्यान ही है। यही से सीधी छलांग सुरति में लगती है। और फिर ध्यान की भी आवश्यकता नहीं। सुरति में जो चला गया उसको किसी भी क्षण बिसरता नहीं , वो परमात्मा तो कण कण में बस गया अनुभव में रहता है। फिर ध्यान आधे एक घंटे का ड्रामा हो गया। पर वो तो पराकाष्ठा है , जहाँ सब कुछ छोड़ना है या छूट जाता है , गुरु भी पर शरुआत में तो यही सीढ़ी है , जिसमे सावधानी से चढ़ना है।

हर बार की तरह इस बार भी आप सभी को 

हार्दिक शुभकामनाये।

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