Wednesday, 11 February 2015

कृपा करके ध्यान सिखाए ; Osho

एक झेन फकीर से किसी आदमी ने जाकर पूछा है
कि मुझे ध्यान सिखाएं। तो उस फकीर ने
कहा कि तुम मुझे देखो और सीख लो। वह
आदमी बहुत मुश्किल में पड़ गया, क्योंकि वह
फकीर अपने बगीचे में गङ्ढे खोद रहा है। उसने
थोड़ी देर तो देखा, उसने
कहा कि गङ्ढा खोदना मैं बहुत देख चुका हूं, मैंने
बहुत खोदे हैं, आप कृपा करके ध्यान सिखाएं।
तो उस फकीर ने कहा कि अगर तुम मुझे देखकर
नहीं सीख सकते, तो मैं और कैसे सिखा सकता हूं; मैं
ध्यान हूं! मैं जो भी कर रहा हूं, वह ध्यान है। मेरे
गङ्ढे खोदने को ठीक से देखो। उस आदमी ने कहा,
मुझे तो लोगों ने भेजा था कि बड़े ज्ञानी के
पास भेज रहे हैं, मैं भी कहां आ गया।
गङ्ढा खोदना ही मुझे देखना होता तो मैं
कहीं भी देख लेता। उस फकीर ने कहा, एक-दो दिन
रुक जाओ।
कभी वह फकीर खाना खाने बैठता, कभी वह
सो जाता, कभी वह स्नान करता, कभी वह
गङ्ढा खोदता, कभी बीज बोता, दो दिन में वह
आदमी घबड़ा गया, उसने कहा, मैं ध्यान सीखने
आया हूं, इन सब बातों में मुझे कोई मतलब नहीं है।
तो उस फकीर ने कहा, लेकिन मैं
करना नहीं सिखाता, मैं होना सिखाता हूं।
अगर तुम मुझे गङ्ढा खोदते
देखो तो समझो कि ध्यान कैसे गङ्ढा खोदता है।
अगर तुम मुझे खाना खाते देखते हो,
तो देखो कि ध्यान कैसे खाना खाता है? मैं
ध्यान करता नहीं, मैं ध्यान हूं। उस आदमी ने कहा,
मैं भी किस पागल के पास आ गया! मैंने
सदा यही सुना था कि ध्यान किया जाता है,
अब तक मैंने सुना नहीं कि कोई ध्यान होता है।
उस फकीर ने कहा, यह तो बहुत मुश्किल सवाल है
कि पागल हम दोनों में से कौन है। और हम
दोनों तो इसको तय कर ही न सकेंगे।

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