Wednesday, 11 February 2015

ओशो थाओ उपनिषद ; मछली को गहरे पानी में रहने देना चाहिए

"मछली को गहरे पानी में रहने देना चाहिए।" - लाओत्से

इस सूत्र को और दृष्टियों से भी समझ लेना कीमत का है। जो भी मूल्यवान है आपके भीतर, और जिसको भी आप चाहते हैं कि बचाना है, उसे गहरे में डाल देना।

नष्ट करना हो तो बाहर, बचाना हो तो भीतर। वृक्ष उपर दिखाई पड़ता है, जड़ें जमीन में छिपी रहती है। जड़ें मूल्यवान हैं। वृक्ष जड़ों को दिखाने बाहर ले आए तो मौत हो जाएगी। वह जो भी गहरा और मूल्यवान है उसे भीतर ! उसका किसी को पता न चले।

इसका यह अर्थ नहीं कि पता नहीं चलेगा, जितना गहरा होगा उतनी जल्दी पता चलेगा। लेकिन आप पता चलाने की, चलवाने की कोशिश मत करना। क्योंकि आपकी कोशिश बताती है कि गहरा नहीं है। धर्म को, ध्यान को, विनम्रता को, सादगी को, सरलता को जितने गहरे में रहने दें उतना अच्छा।

क्योंकि जितनी होगी गहरी उतना ही उसके द्वारा रूपांतरण आपकी आत्मा का होगा। आपकी विनम्रता दूसरे को दिखाने के लिए नहीं है, आपकी विनम्रता आपको ही बदलने के लिए है। आपकी सादगी कोई बाजार में प्रदर्शन नहीं है, आपकी सादगी आपकी ही आत्मा का रूपांतरण है। वह आपके लिए ही है।

सूफी फकीर कहते हैं कि जब सब सो जाएं, सारी दुनिया सो जाए, तब चुपचाप अपनी प्रार्थना कर लेना। मस्जिद में जाकर मत करना, क्योंकि वहां डर है। कि शायद तुम प्रार्थना करने नहीं जा रहे, तुम सिर्फ दिखाने जा रहे हो कि तुम भी प्रार्थना करते हो। वह जो भीड़ इकठ्ठा होती है, वे जो लोग इकट्ठे होते हैं, उन्हें तुम भी दिखाना चाहते हो कि तुम भी धार्मिक हो।

एक रिस्पेक्टबिलिटी धर्म से मिलती है, एक आदर मिलता है कि यह आदमी भला है, आदमी ईमानदार है, यह आदमी सादा है, ईश्वर की प्रार्थना में लीन रहता है। ईश्वर की प्रार्थना, सूफी फकीर कहते हैं, चुपचाप अंधेरे में, जब कोई भी न जाने, तुम कर लेना। उसे भीतर गहरे में डाल देना, वह कोई बाहर उछालने की बात नहीं है। उससे दूसरे को कोई लेना-देना नहीं है, तुम्हारी अपनी बात है।

-ओशो थाओ उपनिषद

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