Wednesday, 31 December 2014

गुरु को भी विदा : Osho

आप ने भक्ति—साधना के प्रसंग में अवतारी पुरुषों की चर्चा की उस प्रसंग में आप ने भगवान बुद्ध का वचन उद्धृत किया कि मुझे भी राह से हटाकर आगे जाना। लेकिन शायद इसी प्रसंग में कहा गया भगवान कृष्ण का प्रसिद्धवचन है —‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज,’ सब धर्म इत्यादि छोड़कर मेरी शरण आ। क्या इन परस्पर विरोधी वचनों पर कुछ प्रकाश डालने की कृपा करेंगे? 


जरा भी विरोध नहीं है। कृष्ण जो कह रहे हैं, वह यात्रा की शुरुआत है। बुद्ध जो कह रहे हैं, वह यात्रा का अंत है। कृष्ण जो कह रहे हैं, वह अर्जुन से कह रहे है जो नाव पर बैठा नहीं, जो झिझक रहा है नाव पर बैठने में कृष्ण कहते है—तू फिकर छोड़, यह नाव तेरे पास आकर लगी;’सर्वधर्मान् परित्यज्य’, छोड़—छाड़ सबबातचीत, सब बकवास, आ बैठ, मेरी शरण आ;मैं तेरा माझी, मैं तेरा सारथी, मैं तुझे उसपार ले चलूं? यह नाव तुझे ले जाएगी। सब छोड़कर निर्भय होकर इस नाव में बैठ।जब बुद्ध ने कहा है कि अगर मैं भी तुम्हारी राह में आ जाऊं,तो मेरी गर्दन काट देना, यह उस किनारे की बात है जब नाव दूसरी तरफ लग गयी और अर्जुन कहने लगा कि अब मैं उतरूंगा नहीं नाव से। इस नाव ने कितनी कृपा की है, मुझे संसार के सागर से ले आयी परमात्मा के किनारे तक, नहीं,इसे अब मैं छोडूंगा नहीं;और कृष्ण के पैर पकड़ ले और कहे कि तुमने ही तो कहा था— ‘मामेकंशरणं बज,’ अब कहा जाते हैं? अब नहीं छोडूंगा,अब चाहे प्राण रहें कि जाएं, तुम्हारे चरण पकड़े ही रहूंगा। तब उस दूसरी घड़ी मे कृष्ण को भी कहना पड़ेगा, 

जो बुद्ध ने कहा, कि पागल,अब नदी से उतर आया, अब नाव छोड़। अब मुझे भी छोड़। अब तो दूसरा किनारा आ गया, अब तो परमात्मा आ गया ! नाव का उपयोग था, संसार से परमात्मा तक, शरीर से आत्मा तक, अंधकार से प्रकाश तक, मृत्यु से जीवन तक, लेकिन अब तो परमात्मा के द्वार पर आकर खड़ा हो गया है,अब इसे भी छोड़, अब इस नाव को थोड़े ही ढोका! बुद्ध बार—बार कहते थे कि जब उतर जाओ दूसरे किनारे, तो नाव को सिर पर मत रख लेना। वह मूढ़ता होगी,अनुग्रह और कृतज्ञता नहीं। नाव को धन्यवाद देकर आगे बढ़ जाना।

कृष्ण का वचन पाठशाला मे भर्ती होने के दिन विद्यार्थी को दिया गया सूत्र है। बुद्ध का वचन,दीक्षांत समारोह समाप्त हो गया, विश्वविद्यालय से लौटते हुए विद्यार्थी को दिया गया अंतिम संबोधन है।विरोध जरा भी नहीं। चूंकि दोनों अलग —अलग समय में दिये गये और अलग— अलग लोगों को दिये गये,इसलिए तुम्हें चिंता हो सकती है।कृष्ण ने कहा था अर्जुन से, जो एक सामान्य व्यक्ति है। बुद्ध ने कहा था बोधिसत्वों से,जो आखिरी घड़ी में पहुंच गये है। बुद्ध मर रहे हैं, आखिरी घड़ी आगयी, उनके बोधिसत्व उन्हीं घेरे हुए हैं, उनके परम शिष्य उन्हें घेरे हुए हैं, आनंद रोने लगता है, बुद्ध आंख खोलते हैं, पूछते है—क्यों रोता है?तो आनंद कहता है—आप चले, अब हमारा क्या होगा? तब बुद्ध ने कहा है—अप्प दीपो भव, अपने दीये बनो। मेरे साथ जंहा तक आ सकते थे, आ गये।बुद्ध का वचन और कृष्ण का वचन एक ही यात्रा के दो छोर हैं। विरोध जरा भी नहीं। जैसे तुम सीढ़ी चढ़ते हो और मैं तुमसे कहूं—बिना सीढ़ी पर चढ़े तुम छत तक न पहुंचोगे। और फिर तुम सीढ़ी के अंतिम सोपान पर जाकर अटक जाओ और तुम कहो—अब मैं सीढ़ी नहीं छोडूंगा,क्योंकि इसी सीढ़ी ने मुझे इस ऊंचाई तक लाया, तो मैं तुमसे कहूंगा कि अब सीढ़ी छोड़ो, नहीं तो छत पर न पहुंच सकोगे। क्या मेरी बातों में विरोध होगा? दोनों में कुछ विरोधाभास है? सीढ़ी चढ़ाने के लिए कहा था—चढ़ो, छत पर नहीं पहुंचोगे;अब कहता हूं —सीढ़ी छोड़ो नहीं तो छत पर नहीं पहुंचोगे।विधियां पकड़नी होती हैं, एक दिन छोड़ देनी होती हैं। रास्तों पर चलना होता है, एक दिन रास्तों को नमस्कार कर लेनी होती है।परमात्मा मे प्रवेश के पहले तुमने जो भी किया था जो भी सोचा था,जो भी साधन, विधि—विद्यान, अनुशासन अपनेजीवन में आरोपित किये थे, सब को तिलांजलि दे देनी होती है। परमात्मा मे प्रवेश के क्षण में न तो कोई विधि पास होनी चाहिए न कोई मंत्र, न कोई तंत्र, परमात्मा में प्रवेश के समय सारी सीढ़ियां समाप्त हो जानी चाहिए। सारी नाव विदा हो जानी चाहिए। तो ही तुम प्रवेश कर सकोगे।

वचनों में भेद है, क्योंकि अर्जुन और आनंद में भेद है। अर्जुन अभी चलने को ही तैयार नहीं है, अभी वह ठिठक ही रहा है, आनंद चल चुका है अंत तक,आखिरी घड़ी आ गयी… और तुम्हें पता है, बुद्ध के मरने के चौबीस घंटे के भीतर आनंद परम ज्ञान को उपलब्धहो गया था;तो आखिरी घड़ी में था, बिलकुल आखिरी घड़ी में था,उतनी सी बाधा बची थी,बस थोड़ी सी बाधा बची थी,कि बुद्ध से जो लगाव था, जो आसक्ति थी,वही अटका रही थी। सब आसक्तिया टूट गयी थी—न धन से कुछ रस था, न पद से कुछ रस था, न मित्रों में कोई रस था, सारे रस जा चुके थे, सारे रसों में एक ही रस व्याप्त हो गया था,यह सदगुरु का रस, यह सदगुरु के चरणों को पकड़ लेने की आसक्ति गहन हो गयी थी। यह मोह प्रबल हो गया था। 

बुद्ध ने आनंद को कहा है—तू मुझे भी छोड़, तू अपना दीपक अब खुद बन, अब तू इस योग्य है, अपने पैर पर खड़ा हो सकेगा। मेरे कंधे पर कबतक बैठकर चलेगा? अब जरूरत भी नहीं है।मां चलाती है बच्चे को हाथ पकड़कर, एक दिन हाथ पकड़ कर चलाना होता है। फिर अगर बच्चा सदा के लिए यह हाथ पकड़ ले तो मां हाथ छुड़ा की, एक दिन हाथ छुड़ाना भी होता है,नहीं तो बच्चा जवान कब होगा, प्रौढ़ कब होगा?अगर मां अपने बीस साल के जवान लड़के को भी हाथ पकड़कर चलाए, तो तुम भी कहोगे कि मां भी पागल है और यह लड़का भी पागल है। और अगर मां पहले से ही अपने आठ महीने के बच्चे को हाथ का सहारा न दे, तो भी तुम पागल कहोगे।विरोधाभास कहा है ? अर्जुन छोटा सा बच्चा है, दुधमुंहा। आनंद युवा हो गया, लेकिन अब भी मां का आचल छोड़ना नहीं चाहता।अभी भी चाहता है मां को पकड़े रखे। ये दोनों वचन सत्य हैं, और दोनों वचन तुम्हारे लिए भी सत्य है—पहले दिन कृष्ण का वचन, अंतिम दिन बुद्ध का वचन। इस में विरोधाभास मत देखना। अक्सर धार्मिक महावचन विरोधाभासी दिखायी पड़ सकते हैं;क्योंकि धर्म एक बड़ा रहस्यपूर्ण जगत है—तर्कातीत।उल्टी ही चाल चलते हैं दीवानगाने इश्क करते हैं बंद आंखों को दीदार के लिए जब देखना हो परमात्मा को तो आंख बंद करनी होती है। तुम कहोगे, यह  क्या उल्टी बात? आदमी आंख खोल कर देखता है। आंख बंद करके देखने का क्या मतलब? मगर यही है हाल।असली को देखना हो तो आंख बंद करनी पड़ती है। छुद्रको ही देखते रहना हो तो आंख खुले भी चल जाता है। आंख खोलकरभी देखा जाता है और आंख से बंद करके भी देखा जाता है। जो खुली आंख से दिखता है, वह सपना है और जो बंद आंख दिखता है,वही सत्य है।कबीर का प्रसिद्ध वचन है—भला हुआ हरि बिसरियो सर से टली बलाय, जैसे थे वैसे भये अब कछु कहा न जाय। बड़ा अदभुत वचन है। ठीक बुद्ध का वचन है। भला हुआ हरि बिसरियो, झंझट मिटी, यह हरि भी मिटे और भूले,यह झंझट भी मिटी। भला हुआ हरि बिसरियो, सर से टली बलाय। तुम चौकोगे थोड़ा कि हरि और सर की बलाय! शांडिल्य तो कह रहे हैं कि भजो, हरि नाम संकीर्तन, डूबो;और कबीर का दिमाग खराब हुआ है कि कहते है— भला हुआ हरि बिसरियो, सर से टली बलाय। बलाय ! हरि का नाम ! यही तो, हरि का नाम ही तो साधन है; इसको बला कहते हो!एक दिन बला हो जाती है।जो विधि एक दिन सहयोगी होती है,वही विधि एक दिन बाधक हो जाती है। तुम बीमार हो, तुम्हें औषधि देते हैं। फिर बीमारी चली गयी,फिर औषधि लेते रहोगे तो बलाय हो जाएगी। जिस दिन बीमारी गयी,उसी दिन बोतल फेंक देना और नहीं तो लाइंस क्लब में जाकर भेंट कर आना, मगर छुटकारा पा लेना उस से। फिर बोतल को लिए मत घूमना। और यह मतकहना कि इससे इतना लाभ हुआ, अब कैसे छोडूं? ऐसा कृतझ कैसे हो जाऊं? इसी बोतल ने तो सब दिया, स्वास्थ्य दिया, बीमारी गयी, अब तो पीता ही रहूंगा, अब छोड़नेवाला नहीं हूं। अब तो इस पर मेरी श्रद्धा बड़ी सघन हो गयी। शांडिल्य  कह रहे हैं—डूबो हरि भक्ति में;यह कृष्ण की शुरुआत। और कबीर  बुद्ध के तल से कह रहे है—भला हुआ हरि बिसरियो सर से टली बलाय, जैसे थे वैसे भये अब कछु कहा न जाए। अब क्या कहना है? कैसा राम— भजन किस का भजन कौन करे! किसलिए करे! अब शब्द का कोई संबंध न रहा। अब तो मौन है, सन्नाटा है।

हद टप्पै सो औलिया, बेहद टप्पै सो पीरहद बेहद दोनों टपै, ताका नाम फकीर हद टप्पै सो औलिया जो हद के बाहर चला जाए उसको कहते है—औलिया। बेहद टप्पै सो पीर जो बेहद के भी आगे चला जाए—सीमा के पार जाए, औलिया;असीम के भी पार चला जाए, उस का नाम पीर। हद बेहद दोनो टप्पै सब के पार चला जाए,वही फकीर है। उसे ही मैं संन्यासी कहता हूं।पकड़ना छोड़ने के लिए। विधियों का उपयोग कर लेना, ले लेना जितना रस उनमे हो, फिर जब रस उन का पी चुके तो उस थोथी विधि का ढोते मत रहना, फिर वह बला हो जाएगी।गुरु के सहारे दूसरे किनारे तक पहुंच जाओगे, फिर गुरु को भी विदा दे देनी होगी।संसार से गुरु छुड़ा लेता, फिर गुरु अपने से छुड़ाता है,तभी परमात्मा का मिलन है।

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