Thursday, 8 January 2015

खिद्र की चेतावनी:एक व्यक्ति ने ध्यान दिया (osho_


अपने पागलपन से बाहर आओ,यह अस्तित्व बहुत सुन्दर है। 

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मूसा के गुरु खिद्र ने चेतावनी दी कि एक घड़ी आ रही है जब दुनिया का सारा पानी अपना गुणधर्म बदल देगा। जो भी उसे पीयेगा, पागल हो जायेगा। और जिसको पागलपन से बचना है, वह इस पानी को बचा ले। एक आदमी ने सुनी।

आदमी हैरानी का रहा होगा। वैसे ही आदमी बनो, तो ही तुम्हारी जिंदगी में कुछ घट सकता है। नये की सुनो। नये की गुनो। नये को पहचानो।
लेकिन उसके लिए नयी आंख चाहिए, नया हृदय चाहिए। पुराना हृदय, पुरानी आंख, नये को कैसे पहचानेगी? और इसीलिए तुम चूक जाते हो। और परमात्मा सदा नया अवतरण है। प्रतिपल वह नया होकर आ रहा है। उसकी कला चुक नहीं गई है। जिनकी कला चुक जाती है, वे ही पुराने को दोहराते हैं। परमात्मा अनंत कला है। वह कभी नहीं चुकेगा। उसे पुराने को दोहराने की जरूरत न पड़ेगी। वह रोज नये को जन्माता जायेगा। पुराने को तो तभी दोहराते हो जब तुम और कुछ नहीं कर पाते। तुम्हारी प्रतिभा चुक जाती है, उसकी प्रतिभा चुकी नहीं। वह नये कृष्ण बनायेगा। नये राम बनायेगा। नये बुद्धों को जन्म देगा। वह रोज नया करेगा और नये को सुनने की क्षमता ही उससे मिलन का द्वार बनेगी।
एक आदमी ने सुना।


 
केवल एक व्यक्ति ने खिद्र की चेतावनी पर ध्यान दिया।

बाकी लोगों ने भी सुना तो होगा… इसलिए सुनना पर्याप्त नहीं है। कान से सुना होगा। एक कान से आया होगा, दूसरे कान से निकल गया होगा। उनमें कई पंडित भी होंगे, जिन्होंने सुना होगा और कुछ अर्थ निकाला होगा। उन्होंने कहा होगा, ‘यह तो प्रतीक है। कहीं पानी बदलता है? इसका कुछ मतलब है। इस मतलब में कुछ राज है।’ उन्होंने बड़े शास्त्र रचे होंगे, लेकिन पानी नहीं बचाया होगा। उन्होंने चेतावनी की व्याख्या की होगी। उन्होंने चेतावनी पर बड़े-बड़े सिद्धांत रचे होंगे, लेकिन पानी नहीं बचाया होगा।


पंडित ऐसा ही है। वह दूसरे को समझाने में जीवन गंवा देता है और जो वह दूसरे को समझा रहा है, कभी अपनी जिंदगी में नहीं उतारता। और वही कसौटी है। क्योंकि जिसको तुम बहुमूल्य समझते हो दूसरे के लिए, उसे तुम इतना मूल्यवान भी नहीं समझते कि अपनी जिंदगी में उतारो।
पिरहो नाम का यूनान में एक दार्शनिक हुआ। वह लोगों को समझाता था, ‘जीवन असार है। और आत्महत्या एकमात्र उपाय है।’ वह खुद तिरान्नबे साल तक जीया। आत्महत्या नहीं की उसने। और बड़े मजे से जीया। उससे बुढ़ापे में किसी ने पूछा कि, ‘पिरहो, जिंदगी से तुम समझाते हो कि जिंदगी बेकार है और आत्महत्या एक मात्र उपाय है, और तुम्हारी मानकर हमने सुना कई लोगों ने आत्महत्या भी कर ली। तुमने क्यों नहीं की?’ उसने कहा कि ‘मेरी मजबूरी है। मुझे समझाने के लिए लोगों को, रुके रहना पड़ा। नहीं तो समझाता कौन?’


पंडित तुम्हें समझाता है, परमात्मा तक पहुंचो। वह परमात्मा तक नहीं जाता है। तुम्हें समझाने के लिए रुका रहता है। तुम्हें समझाना परमात्मा तक जाने से ज्यादा मूल्यवान है? नहीं, वह कभी इसे मूल्यवान ही नहीं समझता। वह जो भी कह रहा है, वह व्यवसाय है। वह भी शोषण की विधि है। उसे खुद भी कभी पक्का नहीं जंचा। तुम अगर पंडित के हृदय में खोजोगे, तो संदेह छिपा हुआ पाओगे। वह दूसरों को समझाता होगा श्रद्धा, उसके भीतर तुम संदेह का कीड़ा पाओगे, जो उसके भीतर की आत्मा को काटता रहता है।


सुना बहुत लोगों ने होगा, लेकिन एक ने ध्यान दिया और जिसने ध्यान दिया वही केवल बचेगा। बहुतों ने विचार किया होगा, ध्यान एक ने दिया।
ध्यान और विचार में फर्क है। विचार का अर्थ है, तुम विस्तार में चले जाते हो। विश्लेषण में चले जाते हो। ध्यान का अर्थ है, एक चीज पर तुम एकाग्र हो जाते हो। तुम्हारी सारी जीवन-ऊर्जा वहीं लग जाती है। दांव लग जाता है। ध्यान का अर्थ है, तीर की तरह तुम एक ही निशाने की तरफ चलने लगते हो। विचार का अर्थ है, हजार चीजें चारों तरफ हो जाती हैं। तुम खंड-खंड होकर सोचने लगते हो। क्या ठीक, क्या नहीं ठीक! क्या करना, क्या नहीं करना!


समझो कि तुम्हारे घर में आग लगी हो और कोई तुमसे कहे कि घर में आग लगी है। तुम इस पर विचार करोगे या ध्यान ? तुम अगर विचार करोगे, तो जलोगे। क्योंकि विचार में समय लगेगा और आग तुम्हारे लिए नहीं रुकेगी। जो ध्यान देगा वह झट से छलांग लगा कर बाहर जायेगा। विचार फिर भी किया जा सकता है, लेकिन ध्यान निरंतर कृत्य बन जाता है। और विचार कृत्य से बचाव बन जाता है। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि तुम कृत्य से बचने के लिए विचार करते रहते हो। और तुम कहते हो जब तक निर्णय न कर लें, तब तक कृत्य को कैसे उतारें?
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, ‘संन्यास का विचार चल रहा है। सोच रहे हैं, छलांग लेनी है, अभी समय लगेगा।’ मैं उनसे पूछता हूं कि मृत्यु तुमसे पूछ कर न आयेगी, किसी भी क्षण आ जायेगी। तुम मृत्यु से यह न कह सकोगे कि जरा रुको, मैं संन्यास के लिए सोच रहा हूं, मैं संन्यास ले लूं फिर मरूं; न तो जन्म तुमसे पूछ कर आता है, न मृत्यु तुमसे पूछ कर आती है। न प्रेम तुमसे पूछ कर आता है; घट जाता है, अचानक तुम पाते हो किसी व्यक्ति के प्रेम में पड़ गये हो।


संन्यास को तुम सोच रहे हो। जो भी महत्वपूर्ण है उस पर ध्यान दिया जाता है, सोचा नहीं जाता। जो महत्वहीन है, उसको ही लोग सोचते हैं। सोचना, स्थगित करने की तरकीब है, पोस्टपोन करने की तरकीब है, टालने की तरकीब है। तुम सोचने की बात ही तब उठाते हो, जब तुम टालना चाहते हो। तुम क्रोध के लिए नहीं सोचते कि कल करूंगा, सोच कर करूंगा। अभी करते हो। ध्यान तुम कहते हो, ‘सोचेंगे।’ तुम्हें किसी की हत्या करनी हो, तो तुम तत्क्षण करते हो। क्योंकि तुम भी जानते हो एक क्षण अगर चूक गये, फिर शायद न कर पाओगे। क्योंकि वह क्षण क्रोध का फिर आये, न आये। लेकिन अगर दान देना हो, तो तुम कहते हो, ‘सोचेंगे।’ और तुम भी भलीभांति जानते हो कि यह क्षण भी चूक जायेगा।
मार्क ट्वेन ने लिखा है अपने संस्मरण में, ‘एक चर्च में मैं गया। जो पुरोहित बोल रहा था वह इतना अदभुत बोल रहा था कि पांच मिनट सुनने के बाद मुझे लगा कि दस डालर मेरी जेब में हैं, दान करके जाऊंगा। यह चर्च देने जैसा है।


‘व्याख्यान चलता रहा, लेकिन मेरे भीतर एक नई उलझन चलने लगी कि दस देना जरूरी है? पांच से काम नहीं चल जायेगा? जैसे ही मैंने सोच लिया कि दस देना है, वैसे ही व्याख्यान से मेरा संबंध टूट गया और भीतर एक धारा चलने लगी कि पांच से भी चल जायेगा? और अभी कुछ कहा तो है नहीं किसी को। किसी को पता भी नहीं है। पांच ही दे देंगे। तो कोई ऐसा थोड़ी है, पांच क्या कम है?’


आधा व्याख्यान होते-होते मार्क ट्वेन ढाई पर आ गया। खत्म होते-होते उसने सोचा कि एक डालर भी कौन देता है? यहां जो लोग देनेवाले हैं; कोई चौथाई डालर देगा, कोई आधा डालर देगा। एक डालर सब से बड़ा दान होगा। एक काफी है। और जब दान-पात्र आया तो मार्क ट्वेन ने लिखा है कि मैंने अपना डालर तो डाला ही नहीं, एक डालर उसमें से उठा लिया। मैंने सोचा, कौन देख रहा है? और इस आदमी ने एक घंटा खराब किया मेरा। एक घंटा व्याख्यान दिया, एक घंटा मेरा खराब किया। एक डालर लेकर घर आ गया।


तुम जिस चीज पर भी कहते हो, ‘सोचेंगे'; जरा गौर करना, तुम टाल रहे हो। और क्षण होते हैं जीवन में कृत्य के। जब तुम एक शिखर पर होते हो, जहां से कृत्य फलित होता है। क्योंकि कृत्य तभी फलित होता है, जब तुम्हारी पूरी जीवन-ऊर्जा एक शिखर पर केंद्रित हो जाती है; तभी कृत्य फलित होता है। इसलिए क्रोध तुम उसी वक्त करते हो। क्योंकि अगर यह शिखर खो गया, फिर कल तुम न कर पाओगे। इसलिए ज्ञानियों ने कहा है, बुराई को स्थगित करना, सोचना; और भलाई पर ध्यान देना, और करना। बुराई को कहना, कल करेंगे। भलाई को कहना, अभी! इसी क्षण! उसमें क्षण भी मत खोना। अगर तुम यह नियम मान लो…।


इससे उलटा नियम तुम मान ही रहे हो। उसका ही तुम्हारा जीवन परिणाम है, कि बुराई को तुम तत्क्षण करते हो। भलाई को तुम कल पर टालते हो। पाप आज करते हो, पुण्य अगले जन्म में। पाप अभी, पुण्य बुढ़ापे में। किसी के प्राण लेना हो तो आज, और प्रार्थना करनी हो तो कल। वह कल कभी नहीं आता। पापी का जीवन–यह उसका सूत्र है: बुराई अभी, भलाई कल। परमात्मा का जीवन: भलाई अभी, बुराई कल। जो कल पर छोड़ा वह कभी नहीं होता। कल पर छोड़ने की कुशलता विचार है; कि सोचेंगे। सोचने में समय लगेगा, त्वरा चली जायेगी, क्षण खो जायेगा, तुम भूमि पर आ जाओगे। भावावेश खो जायेगा।


एक आदमी ने ध्यान दिया। ध्यान का अर्थ है, इस बात ने उसे ऐसा पकड़ लिया, कि पूरा जीवन दांव पर है। उसने कुछ सोचा नहीं।
उसने कुछ पानी बचा कर रख लिया। निश्चित तिथि के बाद वही हुआ, जो खिद्र ने कहा था। और इस एक आदमी को छोड़ कर गांव के सभी लोग पागल हो गये। लेकिन जब उसने लोगों से बातचीत की, तब उसे पता चला कि सब उसे ही पागल मानते हैं।
स्वाभाविक है। जहां सभी पागल हों, वहां बुद्धिमान होना बड़ा खतरनाक है। जहां सभी बीमार हों, वहां स्वस्थ होना खतरा लेना है। जहां सभी अंधे हों, वहां आंखें मुसीबत में डालेंगी। क्योंकि जहां सभी एक जैसे हैं और तुम पृथक, भीड़ तुम्हें पागल करेगी। और भीड़ बड़ी है। बहुमत उसका है। तुम अकेले हो। सिद्ध करने का कोई उपाय भी नहीं है। सिद्ध तुम किसके सामने करोगे? किसको समझाओगे? वहां समझने वाला भी कोई नहीं है। लोग हंसेंगे और वे कहेंगे, ‘देखो पागल को।’


ऐसा ही घट रहा है पूरे जीवन में। जिस भीड़ से तुम घिरे हो, वह भीड़ अपने को ठीक समझती है। अगर तुम जरा लीक से यहां-वहां हटे, तो वह तुम्हें पागल समझती है।


बड़ी प्रसिद्ध कथा है, कि ऐसा हुआ कि एक सम्राट को एक चालबाज आदमी ने कहा, कि मैं तुम्हें देवताओं के वस्त्र लाकर दे सकता हूं। देवताओं के वस्त्र कभी पृथ्वी पर आये नहीं थे। उस सम्राट ने कहा कि जो भी खर्च करना हो, किया जाये। यह ऐतिहासिक बात है। मैं अकेला पहला आदमी होऊंगा जिसको देवताओं के वस्त्र मिले। तुम लेकर आओ। उस आदमी ने कहा, ‘कई करोड़ों का खर्च है। आना-जाना, यह यात्रा लंबी और रिश्वत! वहां भी कोई ऐसे नहीं मिल जायेंगे। द्वारपाल, और फिर द्वारपाल से लेकर देवताओं तक पहुंचना। बहुत रिश्वत! सम्राट ने कहा, ‘कुछ भी हो, कुछ भी खर्च हो, एक ही बात खयाल रखना, घोखा देने की कोशिश मत करना। नहीं तो जिंदगी से हाथ धोओगे।’ उसने कहा, ‘धोखे का कोई सवाल नहीं है। इसी महल में मुझे कमरा दे दिया जाये, चारों तरफ पहरा लगा दिया जाये।’

महल में कमरा दे दिया गया। चारों तरफ पहरा लगा दिया गया। धोखे का कोई कारण नहीं था। निश्चित तिथि पर वह आदमी बाहर आया। एक बड़ी खूबसूरत पेटी ले कर आया। दरबार में पेटी रखी। सारे दरबारी इकट्ठे हैं। राजधानी में बड़ा शोरगुल है। लोग इकट्ठे हैं। भीड़ों पर भीड़ टूट रही है। महल की तरफ रास्ते भरे हुए हैं। सारी राजधानी भर गई है देखनेवालों से। देवताओं के वस्त्र! उसने राजा की पगड़ी ली, पेटी में हाथ डाला। खाली हाथ बाहर निकाला और कहा, ‘यह देवताओं की पगड़ी। लेकिन एक बात कह दूं, जब मैं चलने लगा, तो देवताओं ने कहा, ये साधारण वस्त्र नहीं हैं। केवल उन्हीं को दिखलाई पड़ेंगे जो अपने ही बाप से पैदा हुए हों।’


हाथ खाली था। पगड़ी उसमें थी नहीं। राजा ने गौर से भी देखा कि पगड़ी है नहीं, लेकिन अब झंझट है। उसने झट से पगड़ी ली और कहा, ‘अहा! कैसी सुंदर पगड़ी!’ जो थी ही नहीं, सिर पर रख ली। सारे दरबारी तालियां बजाने लगे। एक-एक को दिखाई पड़ा कि पगड़ी तो नहीं है। लेकिन जब सब ताली बजा रहे हों, सब को दिखाई पड़ रही है, तो हम क्यों झंझट में पड़ें?


यही सब की दशा थी। पगड़ी किसी को दिखाई न पड़ी, लेकिन सभी ने सोचा, कि बाकी सब को दिखाई पड़ रही है तो सिर्फ मैं ही नाहक अपने पिता और अपने वंश के संबंध में क्यों गलतफहमी का कारण बनूं? लोग एक दूसरे से बढ़-बढ़ कर तालियां बजाने लगे। और एक दूसरे से बढ़-बढ़ कर प्रशंसा करने लगे। कोई पीछे न खड़ा रहा क्योंकि कहीं शक न हो जाये, कि यह आदमी पीछे क्यों खड़ा है? कुछ बोलता क्यों नहीं? लोग चुप भी न रह सके क्योंकि कहना जरूरी है। जोर से कहना जरूरी है। और जब सबने प्रशंसा की, तो राजा ने कहा, ‘हो न हो, मेरा ही जन्म संदिग्ध है। मगर अब कुछ करना ठीक नहीं। चुपचाप पगड़ी पहन लेना ठीक है।’


पगड़ी उसने पहन ली, जो थी ही नहीं। यही सभी वस्त्रों का हुआ। वह चालाक आदमी उसके वस्त्र ले कर पेटी में डालता गया। क्योंकि वे भी कीमती थे और बचाना जरूरी थे। और खाली हाथ बाहर आता। कोट आया, कमीज आया, और अंत में आखिरी वस्त्र भी उसका चला गया। राजा बिलकुल नंगा खड़ा है और दरबार ताली पीट रहा–‘इससे सुंदर वस्त्र कभी देखे नहीं गये।’


और उस चालबाज आदमी ने कहा कि ‘अब रथ तैयार किया जाये, क्योंकि करोड़ों लोग इकट्ठे हैं। और सभी वस्त्र देखने को आतुर हैं।’ और उस चालबाज आदमी ने गांव में डुंडी पिटवा दी, कि ये वस्त्र साधारण वस्त्र नहीं हैं। ये केवल उन्हीं को दिखाई पड़ेंगे, जो अपने ही बाप से पैदा हुए हैं।
सभी अपने बाप से पैदा हुए हैं। नंगा राजा रथ पर सवार गांव में निकला और भीड़ पागल हो रही है। वस्त्रों की प्रशंसा कर रही है। सिर्फ एक बच्चा, जो अपने बाप के कंधे पर बैठकर आ गया था, उसने अपने बाप से कहा, ‘मुझे तो राजा नंगा दिखाई पड़ता है।’


बाप ने कहा, ‘चुप नासमझ! अगर किसी ने सुन लिया, तो मुसीबत होगी। ये वस्त्र ऐसे हैं, कि जब तू बड़ा हो जायेगा तब दिखाई पड़ेंगे। तू अभी बच्चा है।’ सिर्फ उस एक बच्चे को राजा नंगा दिखाई पड़ा। उसको ही सत्य दिखाई पड़ा। लेकिन बाप ने कहा, ‘तू बड़ा हो जायेगा तो तुझे भी दिखाई पड़ेगा। घबड़ा मत। जल्दी मत कर। यह अनुभव से दिखाई पड़ता है।’


सभी बाप अपने बेटों से यही कह रहे हैं, ‘अनुभव से दिखाई पड़ेगा!’ बेटे को दिखाई पड़ता है, पत्थर की मूर्ति; बाप कहता है, ‘भगवान।’ राजा नंगा है, बाप कहता है ‘वस्त्र पहने हुए हैं।’ बाप झुकता है, बेटे को भी झुकाता है। ‘झुको, नमस्कार करो, यह भगवान हैं।’ बेटा इंकार भी करना चाहता है। उसका इंकार सही भी है, क्योंकि उसे वही दिखाई पड़ता है जो है, कि यहां सिर्फ मूर्ति है, खिलौने के सामने झुकाया जा रहा है। लेकिन बाप कहता है, ‘अनुभव से तुझे भी दिखाई पड़ेगा।’ और इसको भी अनुभव से दिखाई पड़ने लगेगा। दिखाई इसलिए पड़ने लगेगा, क्योंकि अनुभव का केवल इतना ही मतलब है कि चालबाज हो जायेगा। और यह भी समझ लेगा कि इसमें इंकार करने में झंझट है। भीड़ झूठ मानती है तो भीड़ का झूठ मान लेना उचित है। भीड़ जो कहती है उसके साथ चलने में सुविधा है।


असत्य भी सुविधापूर्ण है, अगर भीड़ मानती है। सत्य की तरफ इशारा करना अपने लिए असुविधा पैदा करनी है। क्योंकि भीड़ ने शर्तें लगा रखी हैं। अगर तुम कहो कि मंदिर में रखी हुई मूर्ति सिर्फ पत्थर है, तो लोग कहेंगे, ‘तुम नास्तिक हो। तुम अपने बाप से पैदा नहीं हुए हो। तुम सड़ोगे नर्क में।’ और भीड़ तुम्हें हजार तरह की झंझटें पैदा करेगी। तुम्हें कुंए से पानी न पीने देगी। तुम्हें साथ बैठ कर भोजन न करने देगी। तुम्हारे विवाह में मुसीबत आयेगी। तुम्हारे बच्चों के विवाह न हो सकेंगे।


मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं कि ‘आपकी बातें तो ठीक लगती हैं। लेकिन मैं जैन हूं। मैं ज्यादा अभी आ नहीं सकता, क्योंकि मुझे लड़की की शादी करनी है। शादी हो जाये, फिर मुझे कोई डर नहीं। फिर मैं आऊंगा। लेकिन अभी लड़की की शादी करनी है। अगर ज्यादा आया गया और लोगों को संदेह हो गया, तो मुझे लड़की की शादी करने में मुसीबत हो जायेगी।’


तुम्हारा धर्म तुम्हारी सुविधा है, या तुम्हारा सत्य?…सुविधायें! और जो सुविधायें खोज रहा है, उसे सत्य कभी न मिलेगा।


ओशो 

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