Thursday, 19 March 2015

समाधि को साधे ही क्यों? Osho

एक मित्र ने पूछा है: समाधि को साधे ही क्यों? क्या लाभ है? क्या मिलेगा? क्या फायदा है?

लाभ और फायदे की अगर दृष्टि हो, तो फिर भीतर जाया ही नहीं जा सकता है। लाभ की दृष्टि निरंतर बाहर ले जाती है। क्या मिलेगा, अगर इसकी दृष्टि हो तो भीतर जाना ही मत। क्योंकि वहां जो मिलेगा वह मिला ही हुआ है। वहां कुछ नया नहीं मिलेगा।

बुद्ध को हुआ ज्ञान, लोगों ने पूछा, क्या मिला? तो बुद्ध ने कहा, मिला कुछ भी नहीं, जो मिला ही हुआ था उसका पता चल गया है। मिला ही हुआ था, जिसे कभी खोया ही नहीं था, वही मिल गया है। 

तो जो लाभ के हिसाब में है उसे तो वह मिलना चाहिए जो कभी न मिला हो। तो समाधि इस अर्थ में प्रॉफिटेबल नहीं है, लाभदायक नहीं है। वहां वही मिलेगा जो मिला ही हुआ है।

लक्ष्य क्या है? कुछ, जीवन में जो महत्वपूर्ण है, वह सदा लक्ष्यहीन होता है, परपजलेस होता है। जब किसी को प्रेम किया है, तो पूछा था: प्रेम का लक्ष्य क्या है? नहीं, तब आप कहेंगे, प्रेम अपना ही लक्ष्य है। जब आप आनंदित हो उठते हैं, तब पूछा है: आनंद का लक्ष्य क्या है? किसलिए आनंदित होऊं? नहीं, तब आप बस आनंदित हो जाते हैं और कभी नहीं पूछते कि आनंद का लक्ष्य क्या है। कभी नहीं पूछते कि मैं पहले पता लगा लूं कि आनंदित होने से लाभ क्या होगा, तब मैं आनंदित होऊंगा। बस आनंदित होने के लिए सदा तैयार हैं। और आनंद का लक्ष्य क्या है? आनंद लक्ष्यहीन है। प्रेम भी लक्ष्यहीन है। और परमात्मा तो बिलकुल ही लक्ष्यशून्य है। जिसे कहीं नहीं जाना है वही परमात्मा है। जिसे कहीं नहीं पहुंचना है वही परमात्मा है। जो वहां सदा पहुंचा ही हुआ है जहां पहुंचने की आकांक्षा हो, वही परमात्मा है। समाधि उसका द्वार है।

तो अगर अभी लक्ष्य की दौड़ हो, तो थोड़े दिन लक्ष्य में ही दौड़ लेना, समाधि की फिक्र मत करना। क्यों? क्योंकि लक्ष्य में दौड़ कर पता चलता है कि सब लक्ष्य व्यर्थ है। अगर अभी लाभ की इच्छा हो तो लाभ ही कर लेना, जल्दी कोई भी नहीं है। और परमात्मा अंतहीन प्रतीक्षा करता है कि कोई जल्दी नहीं है। और थोड़ा खेलो, और थोड़ा खेलो, और इस जन्म खेलो, जितनी देर खेलना हो खेलते रहो, कोई जल्दी नहीं है। वहां कोई जल्दी नहीं है, क्योंकि समय की वहां कोई कमी नहीं है। कोई लिमिटेड टाइम हो, तो परमात्मा कहे कि पांच बज गए, अब सांझ हुई जाती है, अब आ जाओ। वहां न सांझ होती है, न पांच बजते हैं। अंतहीन इटरनिटी जहां है, समय शून्य है जहां, वहां कैसी जल्दी? वहां कैसी हड़बड़? वह प्रतीक्षा करता है, वह प्रतीक्षा करता है।
(निम्न कथा  पौराणिक  नारद  मुनि मोह भांग से  बहुत कुछ मिलती है )
सुनी है मैंने एक कहानी। एक ऋषि बहुत खोज करता है ईश्वर की। और खोज इसलिए करता है कि ईश्वर से मिल कर उसे पूछना है कि यह क्या है राज इस सारे संसार का? फिर एक दिन गरीब परमात्मा उसे मिल जाता है। बड़ी मुश्किल से मिलता है। गरीब इसलिए कह रहा हूं कि वह बचता रहता ही ऐसे आदमी से। क्योंकि आदमी मिल जाए तो झंझट खड़ी करता है। फौरन शंका-समाधान शुरू कर देता है कि यह शंका है, यह शंका है। वह इसी शंकाओं से बच कर तो छिपा हुआ है सब तरफ। कि जब तुम्हारी सब शंकाएं खतम हो जाएं तब तुम आना कृपा करके, उसके पहले मत आना। लक्ष्य क्या है जीवन का? क्यों बनाया जीवन? जब तुम्हारा कोई लक्ष्य न रह जाए तब आ जाना, तब झंझट न होगी, चुपचाप बैठ सकेंगे, बातचीत न होगी।

वह आदमी, ऋषि पहुंच गया है। उसने जाकर परमात्मा को पकड़ लिया और उसने कहा कि संसार का क्या रहस्य है? यह क्या चल रहा है? यह क्या खेल हो रहा है? यह मेरी कुछ समझ में नहीं आता। 

उस परमात्मा ने कहा, मुझे बड़े जोर की प्यास लगी है। देखते नहीं दुपहरी है और धूप तेज पड़ रही है! एक गिलास पानी कहीं से ले आओ, फिर पीछे मैं तुम्हें बताऊं।

वह ऋषि पानी लेने गया। वह एक झोपड़े पर पहुंचा है, ब्राह्मण का घर है, पिता बाहर गया है, लड़की है जवान, वह पानी लेकर बाहर आई है, ऋषि मोहित हो गए। अब ऋषि सदा से ही मोहित होते रहे हैं। क्योंकि ऋषि जिससे लड़ते हैं उसका भीतर राग बना रहता है। अब स्त्री से ही लड़ते-लड़ते वे ऋषि हुए होंगे। अब जब एक स्त्री आ गई है तो वह लड़ाई क्षण भर में खो गई है, और उन्होंने तो निवेदन कर दिया है कि मैं विवाह करना चाहता हूं। पिता आया है, पिता ने देखा कि ऐसा योग्य, स्वस्थ, सुंदर, साधुपुरुष मिल गया है, इससे अच्छा क्या है! विवाह हो गया। लेकिन वह गरीब परमात्मा उधर प्यासा बैठा है, वह वे ऋषि भूल गए। विवाह हो गया; उनके बच्चे हो गए हैं, और बूढ़े हो गए हैं, और बच्चों की शादियां हो रही हैं, और बच्चों के बच्चे हो गए हैं, और बहुत समय व्यतीत हो गया। और उधर वह गरीब परमात्मा राह देख रहा है कि वे पानी लेकर आते होंगे।

फिर जब बूढ़े हो गए हैं, तो बहुत जोर की बाढ़ आई है, वर्षा है और घनघोर पानी गिरा है। बाढ़ आ गई है, सारा गांव डूब रहा है, तो ऋषि अपनी पत्नी, अपने बच्चों और उनके बच्चों को सम्हाल कर बाढ़ से बचने की कोशिश करते हैं। एक को बचाते हैं, दूसरा बह जाता है; एक बच्चे को बचाते हैं, बच्ची छूट जाती है; बच्ची को बचाने जाते हैं, पत्नी छूट जाती है। उस बाढ़ में सभी बह जाते हैं, ऋषि भर किसी तरह तट पर थके-मांदे गिर पड़ते हैं, बेहोश हो जाते हैं। आंख खुलती है तो परमात्मा खड़ा है। वह कह रहा है, पानी नहीं लाए? बड़ी देर लगा दी। पानी कहां है? मैं प्यासा बैठा हुआ हूं।

तो वे ऋषि बहुत घबड़ा जाते हैं। वे कहते हैं, पानी कहां है! अभी तो बाढ़ ही बाढ़ थी, पानी ही पानी था! मेरी पत्नी भी खो गई, मेरे बच्चे भी खो गए। पर वे देखते हैं कि सूरज वहीं खड़ा है जहां छोड़ गए थे, जब पानी लेने गए थे। धूप उतनी ही तेज है, वही जगह है। तो वे कहते हैं, बड़ी मुश्किल में पड़ गया। लेकिन इतनी देर तो बहुत कुछ हो गया। इतनी देर तो मेरे बच्चे हो गए थे, बच्चों के बच्चे हो गए थे, उनकी शादी-विवाह का इंतजाम करना था। और बाढ़ आ गई थी, और सब गड़बड़ हो गया। और आप अभी यहीं बैठे हैं! और आप कह रहे हैं पानी? अभी तक आप पानी नहीं खोज पाए? 

परमात्मा ने कहा, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा ही कर रहा हूं। मैं सदा प्रतीक्षा करता रहता हूं। 

वह ऋषि कहता है, लेकिन इतना हो गया सब!

तो वे परमात्मा उससे कहते हैं कि वह सब समय के भीतर हो जाता है। लेकिन समय के बाहर कुछ पता नहीं चलता। समय के बाहर कुछ पत्ता भी नहीं हिलता है। वहां अनंत प्रतीक्षा है।

तो जल्दी क्या है? अभी आप जाएं पानी खोजने, जाएं किसी की कुटी पर, करें विवाह, बच्चे आने दें, शादी-विवाह करें, सब होने दें। जब बाढ़ आ जाए...और बाढ़ आती है, जब सब डूब जाता है। बाढ़ जरूर आती है। जब जिंदगी में जो हमने कमाया, वह सब डूबता लगता है। जिंदगी में जो चाहा, खोता लगता है। जिंदगी में जो बचाया, वह जाता लगता है। बाढ़ आ जाती है। और जब बाढ़ आती है और जब सब बह जाता है, और आखिर में आप ही बचते हैं, और सब बह जाता है, सब! और जब तट पर खड़े रह जाते हैं और आंख खोलते हैं, तो वह निकट है सदा, वह प्रतीक्षा कर रहा है। वह कहेगा, ले आए पानी?

मैं नहीं कहता हूं कि आप समाधि के लिए कोई लोभ से जाएं। लोभ से कोई समाधि में नहीं जा सकता। लाभ की दृष्टि से कोई नहीं जा सकता। समाधि को लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता। समाधि में जाने की आतुरता उनमें पैदा होती है जिन्हें सब लक्ष्य व्यर्थ दिखाई पड़ने लगते हैं। जिन्हें सब लाभ और हानियां बराबर होने लगती हैं, जिन्हें जिंदगी में हार और जीत समान दिखाई पड़ने लगती है, जिन्हें सुख और दुख में कोई फर्क नहीं रह जाता, जिन्हें जन्म और मृत्यु एक सी दिखाई पड़ने लगती है।

तो जाएं जिंदगी में, जल्दी नहीं है कोई। खोजें, खोजें, और परेशान हो जाएं और थक जाएं। और जिस दिन थकेंगे, बाढ़ आ जाएगी, लौट आएंगे उस किनारे पर। लेकिन जो आ गए हों उस किनारे पर, वे समाधि की खोज में लग जाएं। समाधि का कोई लक्ष्य नहीं है। समाधि से कुछ मिलता नहीं, खो बहुत कुछ जाता है। खुद ही खो जाते हैं।

लेकिन तब हमारा मन कहेगा: फिर, फिर हम किसलिए खोजें?

मत खोजें! खोजें जहां ठीक लगता है वहां! लेकिन कहीं भी खोजें, सब खोज व्यर्थ हो जाएगी! अंततः एक ही खोज सार्थक हो सकती है, और वह खोज अपनी खोज है। लेकिन वह लाभ-हानि के बाहर है। किसी चीज को तो बाजार के बाहर रहने दें। किसी चीज को तो कम से कम बाजार के मूल्यों के बाहर रखें। किसी चीज को तो कम से कम कमोडिटी न बनाएं, जो बाजार में बिकती हो, हानि होता हो और लाभ होता हो। कम से कम अपने को तो बाजार में सामान की तरह खड़ा न करें। एक चीज को तो छोड़ दें बाजार के बाहर। जब बाजार से थक जाएं, तब आ जाना। और थकने का उपाय यह है कि बाजार में जरा जोर से दौड़ लें; जितनी तेजी हो सके, ताकत से दौड़ लें, थक जाएं। संसार से जो थक जाते हैं, संसार की व्यर्थता जिन्हें दिखाई पड़ जाती है, संसार जिनके लिए कोई अर्थ नहीं रख पाता, वे फिर भीतर की यात्रा पर लौटते हैं। वे ही केवल भीतर की यात्रा पर लौटते हैं। लेकिन तब सवाल नहीं उठता कि लाभ क्या है? क्योंकि सब लाभ वे देख चुके। कोई लाभ लाभ सिद्ध न हुआ। तब वे यह नहीं पूछते हैं कि लक्ष्य क्या है? तब सब लक्ष्य खोज चुके और कोई लक्ष्य मिला नहीं। मिला भी, तो मिल कर भी पाया कि उसमें कुछ है नहीं। तब वे यह नहीं पूछते कि फायदा क्या है? पाएंगे क्या? वे कुछ पूछते ही नहीं। वे कहते हैं, अब तो हम उस जगह होना चाहते हैं जहां कोई लक्ष्य न हो, लाभ न हो, हानि न हो, सुख न हो, दुख न हो, पाना न हो, खोना न हो, आना न हो, जाना न हो, अब हम उस जगह होना चाहते हैं जहां कुछ भी न हो।

और आश्चर्य तो यह है कि जहां कुछ भी नहीं है वहीं सब कुछ का वास है। लेकिन वह तो पहुंच कर पता चलेगा। वह किसी के कहने से नहीं। क्योंकि किसी के कहने से अगर पता चला, तो आप उसको भी एक लक्ष्य बना लेंगे: अच्छा तो फिर ठीक है, सब कुछ को पाने के लिए चलते हैं।

 - "ओशो"....
SAMADHI KE DWAR PAR 06

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