Saturday, 27 September 2014

निगोद - ओशो




जैनों को तो बड़ी दिक्कत है, क्योंकि परमात्मा में वासना नहीं होनी चाहिए। चूंकि परमात्मा में वासना नहीं होनी चाहिए, इसलिए जैन नहीं मानते कि परमात्मा से सृष्टि को बनाया। तो फिर सृष्टि कैसे बनी? अपने-आप बनी? अब उनको और झंझट खड़ी होती है कि अपने आप चीजें बन कैसे गयीं! अपने-आप एक घड़ी तो बन जाए। तुम रेगिस्तान में चले जा रहे हो और तुम्हें एक घड़ी पड़ी मिल जाए, क्या तुम सोच भी सकोगे कि यह अपने-आप बन गयी होगी पड़े-पड़े-पड़े-पड़े, रेते इस तरह होते-होते हजारों-लाखों सालों से घड़ी बन गयी होगी? कांटे बन गए होंगे, टाइम बताने लगी होगी, टिकटिकाने लगी होगी? अगर घड़ी नहीं बन सकती अपने आप तो इतना नाजुक जीवन कैसे निर्मित हो गया है? और कि सुव्यवस्था से चल रहा है!

फिर यह सृष्टि क्यों? प्रयोजन? लक्ष्य? फिर आत्माएं अगर बनी नहीं तो आयी कहां से? तो जैनों को एक सिद्धांत खोजना पड़ा: निगोद से आयीं। निगोद का अर्थ है: एक ऐसा अंधकार-लोक, जहां अनंत आत्माएं पड़ी हैं, फिर धीरे-धीरे निगोद से छूटती जाती हैं और संसार में आती जाती हैं। मगर निगोद कहां से आया? और निगोद में ये अनंत आत्माएं क्यों पड़ी हैं और कब से पड़ी हैं? और कुछ क्यों छूटती हैं? और अनंत पड़ी ही रहती हैं! अनंत तो रखनी ही पड़ेगी वहां, नहीं तो एक दिन धीरे धीरे निगोद खत्म! निगोद खत्म तो संसार खत्म! इधर संसार में लोग मोक्ष पाते जाएंगे धीरे-धीरे और निगोद से कोई, आएगा नहीं, बस्ती उजड़ती जाएगी, उजड़ती जाएगी।

फिर जैन मुनि क्या करेगा? फिर जैन शास्त्रों को क्या होगा? और फिर "विश्व जैन भारती' का क्या होगा? सब मामला ही गड़बड़ हो जाएगा। तो इधर मोक्ष है, अनंत आत्माएं मुक्त हो चुकी हूं अब जरा मजा देखना अनंत आत्माएं मुक्त हो चुकी हैं, मोक्ष मैं जा चुकी हैं! अब ये लौट नहीं सकती। और अनंत आत्माएं निगोद में पड़ी है, उनको मुक्त होना है। वे होती रहे मुक्त, कभी खतम नहीं होगी!

यह सारा खेल अफीमचियों की बकवास मालूम होता है। क्यों सीधे-सीधे स्वीकार नहीं करते कि हमें पता नहीं? क्या जरूरी है कि तुम्हें सब पता हो? और मैं तुमसे यह कहता हूं: आत्मज्ञान से इनका कोई संबंध नहीं। मुझे आत्मज्ञान हुआ, न मुझे निगोद का पता चला, न मुझे यह पता चला कि ईश्वर ने संसार बनाया, क्यों बनाया? स्वयं को जाना--एक परम संतुष्टि, एक परम आनंद, एक परम आलोक फैल गया! कुछ पूछने को न रहा, कुछ जानने को न रहा।

अगर इन फिजूल की बातों को ज्ञान समझा जाता है। अगर धर्मतीर्थ तुम पूछते हो ऐसी बातें, तो जरूर इन लोगों को बहुत आती हैं। वे तुम इन्हीं से पूछ लेना। मगर कोई इन्हें आध्यात्मिक अनुभव नहीं। आध्यात्मिक अनुभव तो इन सारी बातों से छुटकारा दिला देता है। ये सब अंधेरे में टटोलते हुए लोग हैं। और एक से एक कल्पनाएं कर रहे हैं। और एक से एक सुझाव दे रहे हैं। एक से एक समाधान खोज रहे हैं। और तुमसे कहता हूं: सिवाय समाधि के और कोई समाधान नहीं है। और जिसको समाधि उपलब्ध नहीं हुई, उसके सब समाधान बचकाने हैं, खतरनाक है; उससे सावधान रहना।

संथाल परगना आदिवासियों का क्षेत्र है। एक दिन इस क्षेत्र में एक बड़े नेता का आगमन हुआ। नेताजी लोगों को समझाने लगे: "हमारे देश की जनसंख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। आप लोगों को जानना चाहिए कि किसी न किसी स्थान में एक स्त्री हर मिनट पर एक संतान उत्पन्न कर रही है।'

भीड़ को चीर कर एक भोला सा व्यक्ति सामने आया और नेताजी से कहने लगा: " महाशय, क्यों न उस स्त्री को तुरंत मार दिया जाए।' एक बारगी में सफाया कर दो! क्या सरल तरकीब उसने निकाली! मगर बेचारा आदिवासी और क्या कर सकता है! वह यही समझा कि एक स्त्री किसी न किसी स्थान में हर एक बच्चे को जन्म दे रही है, वही उपद्रव का कारण है। उस स्त्री को क्यों नहीं खत्म कर देते? नाहक इतना संततिनियमन समझा रहे हो और इतना उपद्रव कर रहे हो, लोग भूखे मर रहे हैं! उस स्त्री को खत्म कर दो। बात तो उसने पते की कही। मगर अज्ञान में बस बात इस तरह की ही हो सकती है।

तुमने यह भी पूछा कि यद्यपि तुलसी कहते हैं कि आपका साहित्य कोई न पढ़े; लेकिन जैन साधु एवं साध्वी मेरे यहां ठहरते हैं तो आपकी पुस्तकें पढ़ते हैं, टेप सुनते हैं और आपसे प्रभावित हैं।

लेकिन ये बेचारे कैदी हैं। इनको सहायता दो। और जैसे ही हमारा बड़ा कम्यून निर्मित हो जाता है, इनको मुक्त करो। जितने जैन साधु-साध्वियों को, हिंदू संन्यासियों को, महंतों को संतों को, जितनों को मुक्त कर सकते हो मुक्त करो। ये सड़ रहे हैं। इनकी आत्मा के विपरीत ये वहां अटके हुई हैं। लेकिन कहां जाएं अब, क्या करें अब? संसार में लौटे तो अपमान होता है। वह ऐसा लगता है जैसे थूका और फिर चाटा। वह जरा बेहूदा लगता है। और लोग मजाक उड़ाएंगे कि अरे बड़े संन्यास लिए थे, बड़ा सब छोड़ कर चले गए थे, अब कैसे लौट आए? भूल गयी चौकड़ी? आ गयी अकेले? और हमें भी समझा रहे थे। खुद ने भी पूंछ कटा ली थी, हमारी भी कटवाने फिर रहे थे। अब कैसे वापिस लौटे? किस मुंह से वापिस लौटे?

हिंदुओं के कोई पचास-साठ लाख संन्यासी हैं भारत में। और मैं कितने लोगों को मिला हूं! बीस वर्षों की यात्राओं में हजारों संन्यासियों से मिला हूं। और सब पीड़ित हैं और परेशान हैं। छूटना चाहते हैं। संसार से छूट गए, कुछ पाया नहीं; अब ये संन्यास से छूटना चाहते हैं, मगर अब जाएं कहां ? इनके लिए विकल्प मैं खोज रहा हूं। बस इतनी ही शर्त इनको समझा देना कि जब मेरे जगत में प्रवेश करो तो अपने संस्कारों को बाहर ही छोड़ आना। तुम्हारे संस्कारों को ले कर भीतर प्रवेश नहीं हो सकता है। तुम अगर अपने संस्कार छोड़ने को राजी हो तो मैं तुम्हें तुम्हारे कारागृह से मुक्त कर सकता हूं। मैं एक मुक्त आकाश दे सकता हूं, जहां तुम खिलो, फूलो; भूमि दे सकता हूं, जहां तुम्हारे बीज पड़े, जहां तुम्हारे जीवन में हरियाली आए; जहां तुम पहली बार अनुभव करो जीवन का अर्थ, गरिमा, गौरव; वहां तुम में भी चांद सितारे जुड़ जाएं!

और मेरे संन्यासियों को इस कार्य में लगना होगा, क्यों इन साधु-साध्वियों में कई भले लोग हैं, सीधे लोग हैं, अच्छे लोग हैं--जो इसीलिए उलझ गए हैं कि भले हैं सीधे-सादे हैं और जिन्होंने सोचा कि संसार में दुख है तो चलो आनंद की तलाश में। और आनंद की तलाश के नाम पर ऐसी जंजीरों में जकड़ गए हैं कि संसार से छूटना भी आसान था, अब इस संन्यास से छूटना मुश्किल पड़ रहा है उन्हें। 

मैं संन्यास की एक नयी अवधारणा को जन्म दे रहा हूं, जिसमें संसार छोड़ना नहीं है, बल्कि संसार को जीने की एक नयी कला सीखनी है। यूं जीयो संसार में जैसे कमल जल में जीता है। रहे जल में और जल छुए भी नहीं। इसके अतिरिक्त संन्यास की सब धारणाएं व्यर्थ हैं। 

- "ओशो "....
Bahuri Na Aisa Daon - 05

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