Thursday, 7 May 2015

आध्यात्म

अध्यात्म के जिस स्वरुप को मैंने जाना  है ,ऐसा लगता है , जैसे वहाँ समस्त उलझे  सांसारिक विभाजित विषय अध्यात्म में समा के स्वतः अपना परिचय समग्र रूप से  दे रहे हों   जो  अंततोगत्वा ॐ  नामके   भवसागर  में अस्तित्वगत   हो  गए हों  !   वहाँ  साहस  नहीं,  शौर्य  प्रदर्शन नहीं , होड़  नहीं , मात्र  " सरलता  सहजता  और  पूर्ण स्वीकृति "  कुंजी है , और यकीं मानिये  यही उस खजाने की  चाभी है जिसको जनम-जनम, तपस्या से , योग से,  भक्ति से और पराक्रम से  लोग ढूंढते है। जी हाँ  , सरलता, सजगता , सहजता ,पूर्ण  स्वीकृति   ये  गुण    परमात्मा  योग्य  बनाते  हैं।
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ये संसार  है , अपार  है , यहाँ  किसी भी  सुख का और न दुःख का कोई अंत है।  कोई  शब्द ही नहीं  जो इनको परिभाषित कर सके।  अनेकानेक परिस्थतियाँ  और असहनीय  दुखद अवस्थाये जिनके आगे सहनशक्ति भी कम पड़ने लगती है। बहुत लोग बहुत तरीके की परिस्थतियों में उलझे हो सकते है ,अवस्था  शारीरिक  और मानसिक रूप से  अत्यंत दुखद  हो सकती है , ऐसा भी हो सकता है  की  अवस्था  इतनी दुखद हो की   इंसान हार मान ले , संघर्ष करते करते  थक जाये , सब सच है , संसार  भोगना है , सच है।   किन्तु ये भी सच है की हर जीवन के कुछ निश्चित उद्देश्य  है वो उसे पूरे करने ही है , और जिस साहस  और धैर्य  से वो अपने गंतव्य  की और चलता है  वो ही उसकी तपस्या भी है
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और ये भी आप यकीं मानिये  की कथित  पराकाष्ठा  सी प्रतीत होती कोई भी अवस्था अंतिम नहीं मध्य की कड़ी ही है , इस  संसार में भोग्नो की कमी नहीं ।  व्याख्या  करू तो उसका भी ग्रन्थ बन जायेगा  पुराणो से भी बड़ा।
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मनोविज्ञान और चिकित्सा जगत  का वर्चस्व इसी कारन है , और  एक सीमा तक अध्यात्म भी  मनोविज्ञान की तरह ही  उपचार करता है , यहाँ एक बात तो स्पष्ट है  की संसार के विषय  जितने भी है  उनका सहयोग  और उपयोग  इस नश्वरता तक ही सिमित  है  इसी जन्म तक  या यूँ कहे बहुत थोड़ा सा  जीवन जीने योग्य बना देना , मनोविज्ञान और चिकित्सा आदि  पद्धतियाँ   यही करती है , आपके पीड़ा बिंदु तक पहुँच के उसका उपचार करती है।  ठीक है !  किन्तु  जैसे  संसार  अपार है  वैसे ही  चेतनाएं  और चेतनाओं की समस्याएं जो जड़ जगत की हो सकती है जैसे शारीरक चोट  या रोग  अथवा मानसिक  चोट अथवा रोग।  अब इनके  असंख्य कारन है  जो हर जीव के साथ  अलग अलग  उसकी परिस्थतियों के अनुसार बनते है।  यदि आपको अपनी गांठ मालूम है  तो निदान  हो सकता है  पर यदि नहीं पता  तो परिक्षण  करवाते रहिये और कोर्ट  की तारीखों की तरह  चिकित्सक से तारीखों पे  तारीखें लेते रहिये , पैसा का कोई अंत ही नहीं , ये उपचार इतने  महंगे है की साधारण पूंजीधारी के तो बस के नहीं।  फिर क्या करें ! परिस्थतियों से  लड़ते रहे  और लड़ते लड़ते थक जाएँ।  या किसी  आश्रम की शरण में जाये   तो वह भी  सस्ते महंगे आश्रमों की भरमार है ! इतने कष्टों में समाधान की एक रेखा भी नहीं , अपनों का सहयोग भी एक सीमा तक ही है , फिर  क्या करें ? कैसे  जीवन को स्वस्थ बनायें ? कैसे सम्बन्धो को  सुन्दर बनाये ?  कैसे अपने  संसार  को सुन्दर  बनाये ?
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ऊपर यदि आप पढ़ेंगे  तो पाएंगे  की अक्सर  एक निराशा का दौर  आता है  जब चहुँ ओर विष का ही प्रभाव छा जाता है। असफलता और  अँधेरा ही अँधेरा , बहतों ने महसूस किया होगा।  मन की सक्रियता जाती है  साथ ही तन की भी सक्रियता  चली जाती है , नतीजा  और शारीरिक तथा मानसिक बिमारिओं को निमंत्रण मिलता है।

नीचे लिखा ध्यान से पढियेगा , किसी भी ऐसे  मन की स्थति हो सकती  जो स्वयं की शक्ति से अपरिचित है  अभी तक।

Pradeep Agarwal : baba ji charan sparsh , mein apne bhotik jeevan ki asafaltao se haar chuka hu darta hu ki kahi is uljhan me aadhyatmik jeevan ki pragti ruk jaye. gurudev se mahakali ki deeksha mili hai guru mantra ki saadhna me laga hua hu gurudev ka nirvaan ho chuka hai,apne aap ko anath mehsoos karta hu mughe apni sharan me le lo baba mein kupatra hu gunheen hu mughe gale laga lo baba mera margdarshan karo baba taki me apne jeevan ka param lakshya prapt kar saku.

 नीचे  एक और  उदाहरण विचार योग्य है संभवतः  ये उदगार  गुरु   समक्ष  रखे गए  है  किन्तु  मौलिक  रूप  से  त्रुटियुक्त  है , आत्म संकल्प  ज्यादा आग्रह  है।  निकासी  और  प्रवेश  के  मार्ग   सूत्र  एक   ही  होता  है।  जो  भाव   प्रवेश  पायेगा  ही   निकासी   बाहर  भी  जायेगा  , यदि  किसी   को  प्रसन्न  करने   भाव  गहरा आया   बीज  रूप में  किसी  के  द्वारा प्रसन्न   होने  आकाँक्षा  भी  छिपी  है 

Binod Ghimire : Guru ji pranam, kabhi kabhi mai bhi depretionme aa jata hu. Mai depretion hatane hetu akant ki khj karake 2 ghantajarne ke bat jab man halaka mahasus karata hu to ghar lot ke aata hu ye tarika karyasid hoti  guhe.


एक और यकीं मानिये बिना विषय को समझे  सिर्फ बाहरी चमक धमक  में फंस के कठोर योग साधना या  प्रचलित  सन्यास आदि  तंत्र साधना  आपके जीवन का ध्येय नहीं  वो भटकाव है , या  आश्रम को सर्वस्व दान दे देना  किसी अभिलाषा के चलते की बदले में आपको वो मिलेगा  जो अद्वितीय है  तो भूल ही साबित होता है क्योंकि परिश्रम से जोड़ी  कौड़ी के खर्च से कौड़ी ही मिल सकती है ....अध्यात्म का रास्ता नहीं , भटकाव है  ।

आध्यात्म  सिर्फ  स्व  का  मार्ग  है ! स्वयं- भू  , स्व- यात्रा  , स्वनुष्ठान  , स्वसंकल्प , स्वमंथन , और स्वउत्थान।   क्यूंकि  स्वयं पे   कार्य -प्रयोग-होम   करते करते  मायावी-बाह्य-जगत  स्वतः  परिवर्तित   होता  है।  
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मैं यहाँ किसी एक विधा का पक्ष लेने नहीं बल्कि  आईने की तरह सब साफ जो दिख रहा है  वो ही कहना का प्रयास कर रही हूँ।  कुछ  उपचारो के लिए  चिकित्सा विज्ञानं की शरण में जाना ही पड़ता है , कोई अन्य उपाय काम नहीं आते   वरन  बुद्धिमत्ता का कार्य है , कुछ बिमारियों को दवा से  काबू करें   , पर ये निदान नहीं  सिर्फ रोगों की तेजी को रोकने का उपाय है।  कुछ उपाय दुआ से निकलते है  और ये उपाय  स्वयं के अंदर से आते है ,  कहते है दवाएं भी तभी काम करती है जब आत्मशक्ति का साथ हो ! ये आत्म शक्ति है क्या ?  ये आत्मशक्ति आत्मा की शक्ति है जो हम सभी में है , " हनुमान  जी की तरह  सुप्तावस्था में "  जब कोई याद दिलाता है  तो जागृत होती है।  और जिसदिन ये शक्ति जागृत होती है  उसदिन  से  रोगों की जड़ों का काटना शुरू होजाता है।  जिस आत्मा में  ये शक्ति जागती है उसे  किसी की शरण में नहीं जाना पड़ता  उसे परमात्मा स्वयं अपनी शरण में ले लेता है।  या इसको यूँ भी  कह  सकते है , सब कुछ तो पहले से अंदर  है ही, हर शक्ति के स्वामी हम है  पर  अज्ञानतावश  भूले हुए है।  और अपनी इसी भूल के कारण परमात्मा की सबसे प्रिय कृति का भरपूर निरादर भी करते है , क्यूंकि परमात्मा की कृति को अपना मान बैठे है।  और अन्य कृतियों को जाने अनजाने कारण मान बैठे है।  और यही  विषाक्त  वृक्ष का बीज है।   न हम अपने मालिक है  और न ही  बाह्य अन्य कृतियाँ हमारे   विषाक्त वातावरण की उत्तरदायी है।  वास्तिवक  ज्ञान  आने के बाद ही आभास होता है  की कितनी छल भरी माया है , बाहर तो सिर्फ प्रतिबिम् है , विषपान की  स्वीकृति तो अंदर से आ रही है।
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इतना अनुभव आने के लिए  ध्यान मार्ग को अपनाना  होता है , स्वयं का मंथन करना होता है , अपने  बीज अस्तित्व को छूना होता है , और  संसार के परिवर्तनशील  गुण को स्वीकृत करना  होता है , और अध्यात्म  का कार्य भी यही है , की  जीव को उसके मूल के दर्शन करा देना।   जीव को उसकी वास्तविकता से परिचित करवा देना।   बाह्य के जितने आवरण है  व्यतित्वगत , फिर वो कितने भी पुराने हो  कितने स्थायी  हो  एक बार  भेंट होने के बाद वो टिक नहीं सकते।  सरलता  का प्रवेश होता ही होता है।  और सजगता भी  की कही दोबारा विष आक्रमण न करे।   आभार  का आभास  ह्रदय से  क्यूंकि वास्तकिता  का सामना है।  फिर कोई छल नहीं  कोई प्रपंच  नहीं।  एक एक सम्बन्ध  ईशवर का आभार  और पुरस्कार है , जो  कुछ न कुछ लेनदेन  से जुड़ा है।  उसकी अपनी यात्रा है।
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अध्यात्म  की विशेषता है की  वो उस जड़ को  काट देता है  जो सांसारिक दुखों का मूल  है।  और यही से  अनहद  की यात्रा का आरम्भ भी।  अध्यात्म की गहराई के लिए कोई शब्द नहीं  सिर्फ भाव है , अनुभव है  और आभास  है।  इस यात्रा के सभी राहगीरों से निवेदन है  की अपनी शक्ति को स्वयं पहचाने।   किसी को  ये अधिकार न दे की वो आपकी शक्तियों का आपको ही  परिचय दे।  श्रद्धा करें ,स्वागत करें , मित्रता करें , सरलता से  जीवन के बहाव  पे डोलें।  किन्तु मध्यस्थ  की आवश्यकता ही नहीं , आप  और आपका परमात्मा  सीधा संपर्क में है , किसी और को उसकी योजना न बनाने दें , अक्सर  ऐसी ही मध्यस्थ  गतिविधयों में निराशा हाथ आती है  तो दोष किसका ?   निश्चय की आपकी तयारी  अपने केंद्र से मिलने की हुई नहीं है।  परमात्मा का आलोक सीधा ह्रदय के जरिये  ह्रदय में  उतरता है  मध्यस्थ के जरिये घूम के नहीं , वैसे भी प्रकाश की गति  सीधी ही है  . है ना !  प्रकाश की रेखा  को घूम फिर के चलना नहीं आता।
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इतना कहने का  मात्र इतना यही  तात्पर्य  है की स्वयं की शक्ति पे भरोसा कीजिये , अपनी शक्ति  को स्वयं पहचानिये  और अध्यात्म को  ओंकार  का सीधा  प्रतिनिधि मानिये बिना मध्यस्थ  के।  ओंकार आपको अवसर देगा  परीक्षा लेगा , और  स्वीकार की स्वीकृति भी देगा।  ओंकार का  आशीष  मिला  ही मिला है।  क्यूंकि इस अवस्था तक आते आते  परीक्षाएं  देते देते  अहंकार का रोआँ रोआँ  झड़  गया है , सहज स्वीकृति  का प्रवेश हुआ , सरलता  के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता ,व्यक्तित्व के आडम्बर तो दूर दूर तक दिखाई नहीं देते  , अब आप वो ही नहीं  जब आपने अध्यात्म  के पहले पाठ में  ध्यान साधा था।  ध्यान अब भी आपके साथ है  पर अब आप वो नहीं न ही  वो कष्ट आपको घेरते है  जो पहले आपको विचलित  करते थे।  और वो ही कष्ट विष भी छोड़ते थे जिसकारण तन और मन रोगी थे।  अब आप पूर्ण स्वस्थ है।
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है ना   प्यारा दुलारा अध्यात्म !

किन्तु  स्मरण  रहे ये महा मन्त्र : आपो गुरु आपो भवः

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