Sunday, 22 January 2017

आपो दीपो आपो भव


किसी विषय की सूचना कारन बनी जिज्ञासा / आकर्षण का ,
फिर उसको जानना कारन बना खोज का ,
फिर उस खोज में गहरे उतरना और उतर के बहुमूल्य उपलब्धि (निधि ) को इकठा करना कारन बना सर्वउपयोगिता का
और यही उपयोगिता फिर से जन्म देती है नयी खोज को , नयी सम्भावना को , नयी जिज्ञासा को और उस खोज के लिए नयी सूचनाओं को , गौर से देखिये ! अपनी धुरी पे इस लट्टू से घूमते गोल गोल घेरे को !
संक्षेप में इस उपयोगिता की अवस्था को जब आप जिज्ञासा की लंबी यात्रा के बाद उस को साकार कर पा रहे है तो तत्वगोचर अर्थात सुलभ अर्थात दृष्टिगोचर , तो आप भीड़ में विषय खोजी / वेत्ता के नाम से जाने जाते है। पर ह्रदय से आप भी अब तक जान चुके है की आप ने जो पहले से ( ज्ञात नहीं ) छुपा है उसी को जाना है , पर बड़ी बात है , छुपिछुपवल के खेल में ढूंढने का और फिर धप्पा का आनंद ही अलग है। हाँ ! इस खेल में ताकत के पलड़े असंतुलित है , एक तरफ असार , अपार , अबाध , अदृश्य महा शक्तिशाली और इधर सिमित आयु सिमित शक्ति फिर भी साहस से भरा ह्रदय और बुद्धि और पैनी दृष्टि , इसलिए अपनी कमजोर और सिमित अस्तित्व के साथ उपलब्धि मनुष्य के लिए हमेशा से प्रशसनीय रही है। क्या आपको भी वो गीत याद आ रहा है " निर्बल से लड़ाई बलवान की ये कहानी है दिए की और तूफान की " प्रशंसा और पारितोषिक आदि प्रोत्साहन और उत्साह का कार्य करते है , ये मनोवैज्ञानिक सत्य है। ये उपलब्धि बौद्धिक है तो विज्ञानं विषय को छूती है , और यही उपलब्धि अगर ह्रदय से है तो अध्यात्म की ऊंचाईयां छूती है। बहरहाल कौन कम कौन ज्यादा की चर्चा में शक्तिशाली दो कदम पीछे ही रहते है , क्योंकि ये तर्कशास्त्र में उपलब्धि अनुपलब्धि के आंकड़े और प्रमाण की प्रमाणिकता आदि और इसमें भी हार जीत का आनंद बालक्रीड़ा सा है। संभवतः योगी का खेल जरा अलग है , उसका सामना मनुष्य से नहीं केंद्र से है। इसलिए अन्य मनुष्य तो उसके प्रतिद्वंद्वी भी नहीं ! हाँ .....मित्र हो सकते है , सहचर हो सकते है , पर प्रतिस्पर्धी .... बिलकुल नहीं।
सामूहिक या आंतरिक चर्चा में जब विषयवेत्ता विज्ञानी तर्क सहित आध्यात्मि से उस की सोच का आधार माँगता है तो वास्तविक ज्ञानी आध्यात्मि हास्य से उसे मात्र बालक की दृष्टि से ही देख पाता है , नन्हा बालक जिज्ञासा में है उत्तर से प्रमाण निकालेंगे। किसका प्रमाण ! जो पहले से ही मौजूद है , और जहाँ योगी नितप्रति भेंट करते है, अनुभव करते है।
थोड़ी और विश करें ! जी हाँ ! अब डिश (एंटीना ) की बारी है ,
यहाँ विषय वेत्ता की सीमा है , उसका ज्ञान अदृश्य को उपयोगिता के लिए सुलभ करने तक है , कला सौहार्द का सूचक है , अध्यात्म की पकड़ यहाँ से शुरू होती है जहाँ विज्ञानं (जिज्ञासा नहीं पकड़ ) समाप्त होता है , उसके पहले अध्यात्म विषयों को सहारा बनाता है कभी गीत कभी संगीत कभी चित्र कभी प्रमाण संचय , आदि आदि , पर अब कोई प्रमाण नहीं , कोई विषय भी साथ नहीं। अब ! अब हम उतारते है परतों में प्रमाण रहित रहस्य की परतों में उनको अनावृत करने के लिए , और पाते है धरती की रहस्यमयी परतें , तरंगो और रंगों के रूप में वायु के जल के रूप में , इनमे छिपी ऊर्जा के रूप में। और गहरे उतरे तो पाया , इनमे भी हलके हजरे प्रभाव वाले स्तर है अर्थात घेरे है आव्रत्तियां है और सामायिक नियम बद्ध पुनरावृत्तियाँ भी है। थोड़ी और विश की , डिश को और सही किया। और गहरे उतरे तो पाया , धरती के ही तत्व अपने तत्व के पोषण का कारन बनते है देह का कारन बनते है जन्म और क्षय का कारन बनते है ,,,,अर्थात हर तत्व जो भी हम ग्रहण करते है , वो ऊर्जा रूप में अपने उसी तत्व को जा मिलता है नवजीवन के साथ। इनमे कोई मेल नहीं होता , भले ही आपकी पाकशास्त्र की कुशल रेसिपी कितनी भी रंगीन और मिलीजुली हो। आपके अंदर प्रवेश पाते ही आपके स्वयं के तंत्र उनको छन्न और अलग करना शुरू करदेते है जिसको आप पाचनतंत्र के नाम से जानते है। और व्यर्थ (जो वास्तव में परिवर्तित है व्यर्थ नहीं पर आपके लिए विष है ) मल द्वार से बाहर निकाल देते है। विषय था धरती के रहस्यमयी अदृश्य तत्व अपने ही तत्वो को जीवन देते है , वे सब पहचानते है , इनमे कोई मिलावट संभव नहीं , और यहाँ मिलावट का अर्थ आपकी अपनी देह समाप्त वो अन्य ऊर्जा पात सहन नहीं कर सकती। यानि आपकी नन्ही से देह में विशाल धरती की देह समाती है , ( ध्यान दीजियेगा ये आपकी नहीं , सिमित अवधि का उपयोग है ) और इस अवधि में धरती का पोषण आपको सुगम है। धरती आपके अंदर रहस्यमयी ऊर्जाओं संग मिल के आपकी देह के निर्माण में सहयोगी है , कैसे ! क्योंकि धरती की अपनी देह है जिसमे वो ही सब तत्व प्रचुर उपलब्ध है। मत भूलियेगा धरती स्वयं में खंड है सूर्य से अलग हुआ खंड। यहाँ याद कीजिये गया पूर्णमिदं का भाव और विज्ञानं का सिद्धान्त जो एक अनु में भी वो सब तत्व पाता है जो ब्रह्माण्ड के हैं ! और ऋषियों ने जाना- यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे
यानि अब तक आप अपनी और धरती की दैहिक अवस्था से परिचित हो चुके है। इसी प्रकार नवग्रह है और आकाशगंगाएं है। जो निरंतर विकसित हो रही है समाप्त हो रही है। ऐसा विषयवेत्ताओं द्वारा जाना जा चुका है। अर्थात यदि अनु का सिद्धान्त और उसकी सर्व व्यापकता को ही आधार बनाये तो माना जा सकता है जो जन्म ले रहा है और जिसका क्षय हो रहा है उसकी अपनी देह है जो बन रही है और मिट रही है। धरती पे वृक्ष वृक्ष की शाखाएं उसकी जीवनदायी वाहनियां जिनमे दौड़ता जलतत्व , पत्ती पत्ती तक ऊर्जा को रक्त के माध्यम से सुलभ करता जल तत्व , सब आपकी देह जैसा ही है। जिन्होंने भी ऊंचाई से देखा उन्होंने इसकी सम-तुलना धरती में फैली धमनियों से की है जिनमे जल प्रवाहित है। योगी का योग ध्यान आपके लिए कल्पना हो सकता है , पर उसे लिए उन्ही वैज्ञानिक सिधान्तो को और विशाल रूप में अनुभव करने जैसा है। जो अपने शरीर में उतर ब्रह्माण्ड में उतर जाता है , पहले वो अपनी धमनियों में रक्त कण बनता है फिर वो धरती की शिराओं में बहता है वो ही आकाशगंगा की शिराओं में दौड़ता है , पर वो ये भी जानता है के मानव बुद्धि पहले फिर विषयवेत्ता और बाद में इसी क्रम में उसके भी बाद विषय की खोज और उसकी पुनर उपयोगिता .....!

क्या कहते है आप ! यही क्रम है न !

यदि विज्ञान ये पिंड और ब्रम्हाण्ड की एकता का नियम .....खोज के बाद .....दे रहा है , "मैं" (atma) तो पहले से अनुभव लिया हूँ , क्योंकि सब मुझमे ही तो है , मैं ही मैं तो हूँ ’ इस देह में जन्मे सभी मित्र सहयात्री है , जिस ट्रैन में मैं बैठा उसी में ये बच्चा बैठा मुझसे ट्रैन का स्वरुप और प्रमाण मांगता है , कहता है इस ट्रैन में सीटें है , गलियां है , दरवाजे है , पेंट्री और ऐसे ही कई डब्बे भी है , पर क्या प्रमाण की ये ट्रैन ऐसी ही है जैसी आप कह रहे है ! लगता है अभी जिज्ञासा से भरा बच्चा है। कैसे कहें , हेलीकॉप्टर या पैराशूट से ही पूरी ट्रैक पे भागती इस ट्रैन का दर्शन सुलभ है। ट्रैन के अंदर बैठे-बैठे अंदाज ही लगा पाएंगे और प्रमाण इकठा करना आस पास के पदार्थों से ही संभव है , उसी बालक के पडोसी बालक कहते है - ‘भाई ! हम तो प्रमाण ही मानते है , और मेरे दोस्त को प्रमाण ही स्वीकार है , जो जो ये प्रमाण देता जायेगा हम मानते जायेंगे !’ ठीक है प्रमाण का अपना नजरिया , सत्य की अपनी सत्ता है ..... ऐसा ज्ञान योगी को होता है।
ऐसा अनुभव योगी को होता है
ऐसा ज्ञान साधक को होता है
और ये जानकारी बच्चे बच्चे को है।
जब ये पिंड और ब्रह्माण्ड अनुभव में आया तो जो सबसे महत्वपूर्ण बात स्पष्ट हुई की - धरती नष्ट हो रही है क्योंकि धरती की देह है ऊर्जा युक्त सौर मंडल बढ़ रहे है अर्थात उनका भी क्षय है नष्ट होंगे ही होंगे , अवश्यम्भावी है। अर्थात उनकी भी देह है , और सबको जो धारण कर रहा है उसकी भी देह है जिसमे हम कितने तुक्छ है की खुद को नजर ही नहीं आ रहे , हमारा समय भी छोटा हमारी सीमायें भी छोटी , हमारी गति भी छोटी और हमारी मति भी छोटी अब जब मति ही छोटी तो सोच बड़ी कैसे ! वो भी छोटी।
न न !!!!!
अभी रुकिए !!
अभी दो परिस्थितियों का मेल न करें !
गंध , ध्वनि , रंग और तरंग में अजीब कशिश है , जितने चाहो मेल और सांख्य आंकड़ो में उपलब्ध है हजारो लांखो करोड़ों , और हर एक के अपने सकारण बहाव भी है इसीलिए अर्थ के अनर्थ आसानी से संभव है , गंभीर या मनोरंजक खेलों में भी ऐसा ही है । गंभीर को हम राजनैतिक नाम देते है और मनोरंजक को सामाजिक।
हम्म !
छोटी यात्रा की चर्चा छोटी यात्रा पे करेंगे विषय वो ही रूप रस गंध स्पर्श पर अर्थ होंगे लौकिक रोजमर्रा के धार्मिक , सामाजिक और राजनैतिक ...... पर अभी आप बड़ी यात्रा पे है , उस यात्रा में आपकी याददास्त बड़ी है वो छोटी नहीं। संजोने की और बटोरने की आदत आपकी यहाँ की नहीं , कोई भी आदत / व्यव्हार / गुण / आकर्षण आपके अपने नहीं , यहाँ के भी नहीं , ये अति प्राचीन है और इनकी सत्ता विश्वात्मा ( जिसकी देह में आकाशगंगाएं बहती है ) में स्थिर है अर्थात उसकी भी देह है , जिसमे त्रिशक्ति वास करती है, अर्थात उन त्रिशक्ति-देह उसकी देह में ह्रदय है बुद्धि है, उस देह के ऊपर भी जो है , जो भी है , क्या नाम दें , देह रहित है फिर वो अंतहीन है क्योंकि उसी में उत्पन्न उसी में लय है। कोई भी नाम उसके साथ न्याय नहीं करेगा , समझ लें , इतना ही काफी है। वो ही महाशून्य है वो ही एक है जिसकी तरफ आप हम इक्छा से या अनिक्छा से बंधे हुए भाग रहे है। और इस विकास क्रम में यद्यपि आपकी सत्ता कुछ भी नहीं फिर भी आप उस महांश के अंश है , यानि सागर में बूँद आप है , और शिवोहम क्यों है क्योंकि उसका अंश आप में जीवित है आप में धरती जीवित है धरती के तत्व आपमें जीवित है और आप धरती पे जीवित है। इस गोल घेरे को समझने जैसा है , आप नष्ट एक अवधि में , धरती समाप्त एक अवधि में , सौरमंडल समाप्त एक अवधि में , ब्रह्माण्ड भी समाप्त एक अवधि में , ये अवधि काल का घेरा है गोल पहिया , अगर सागर और उसकी बूँद में जलतत्व एक है , अनु परमाणु या नन्हा अण्ड और वो ब्रह्माण्ड एक है , तो इस काल नामके विशाल समय के भी घडी घंटे पल एक ही है वो ही आवर्त्ती और पुनरावृत्ति के सिद्धान्त के साथ , अपनी धुरी पे गोल गोल घूमते हुए छोटे पहिये बड़े पहिये और बड़े पहिये। आपने डिजिटल नहीं यांत्रिक घडी देखी है , एक बार अनुभव कीजिये , स्विस घड़िया मशहूर रही है , और बिगबेन का भी वो ही सिद्धान्त है , दो लाईने याद आरही है " गाफिल है तू घड़ियाल ये देता है मुनादी गर्दू ने घडी उम्र की एक और घटा दी "
अपने संस्कारगत विश्वासों में जीवन पाते आप जरा इस यात्रा के महान अर्थ को जानिए तो पाएंगे सिर्फ प्रेम ही समस्त आकर्षण और ऊर्जा आपकी चेतना (जीवांश ) का आधार है। इसके अतिरिक्त सभी अनुलोम विलोम में संज्ञा सर्वनाम में विशेषण क्रिया में विभाजित है म फैले है और सर्वत्र टूटे बिखरे है . आप क्या कर रहे है , आप उन्ही टूटे टुकड़ों को जाने में या अंजानी जिज्ञासा में जोड़ रहे है। फिर संदेह में घिरते है तो फिर लगता है मोती इस माला में सही से नहीं गए , कुछ आगे पीछे हो गए फिर वो ही माला उधेड़ते है , फिर पिरोते है। सब यही कर रहे है क्या ज्ञानी जुलाहे का ताना बाना और क्या आध्यात्मि खानसामे का सतरंगी मसाले और लजीज पाकशास्त्र और क्या समग्र विषयों का ज्ञाता तो विशेष विषयवेत्ता , और क्या उत्कृष्ट राजनेता और समृद्ध धर्माचारी। पहले खुद वो इस पज़ल के ब्लाक से खेलते है फिर वो नन्हे टुकड़ो में आपको सौंप देते आप उनको वैसे ही जोड़ने लगते है। बस जन्मजन्मांतर के यही खेल है।
समझे क्या !
आपो दीपो आपो भव
प्रणाम

No comments:

Post a comment